Friday, June 15, 2012

प्रेम, न्याय और प्रारब्ध - कविता

छोड़ फूलों को परे कांटे जो उठाते हैं
ज़ख्म और दर्द ही हिस्से में उनके आते हैं
(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

बेदर्दी है हाकिम निठुर बँटवारा
ज़मीं हो हमारी गगन है तुम्हारा

जहाँ का हरेक ज़ुल्म हँस के सहा
प्यार में बुज़दिली कैसे होती गवारा

सभी कुछ मिटाकर चला वो जहाँ से
उसका रहा तन पर दिल था हमारा

तेरे नाम पर थी टिकी ज़िन्दगानी
नहीं तेरे बिन होगा अपना गुज़ारा

वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा


32 comments:

  1. दर्द के प्रबल भाव ...
    बहुत सुंदर रचना ...!!

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  2. आम बात आपकी इस ग़ज़ल में ख़ास हो गई है। यह इसके शिल्प का कमाल है।

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  3. वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
    बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा...
    कीमत ही नहीं जानी तो क्या कौड़ी क्या हीरा , सब एक ही तो !

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  4. सभी कुछ मिटाकर चले वे जहाँ से
    उनका रहा तन पर दिल था हमारा

    gahan marmasparshi

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  5. वाह..........
    सभी कुछ मिटाकर चला वो जहाँ से
    उसका रहा तन पर दिल था हमारा

    बहुत सुन्दर...
    अनु

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  6. नई तरह का आभास देती गज़ल....

    पहली लाइन में यदि बेदर्द होता बेदर्दी की जगह पर तो क्या ज़्यादा ठीक नहीं होता ...?

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  7. छोड़ फूलों को परे कांटे जो उठाते हैं
    ज़ख्म और दर्द ही हिस्से में उनके आते हैं

    बेहतरीन !

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  8. सभी कुछ मिटाकर चला वो जहाँ से
    उसका रहा तन पर दिल था हमारा

    किसी एक लाइन या किसी एक शब्द पर या कहू किसी एक वर्ण पर कुछ कह पाना दिल को दुखाने जैसा लगता है ,ये तो मेरा अपना फ़साने जैसा लगता है

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  9. वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
    बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा

    दीवानों के भाव भला कौन जानते हैं !
    सुन्दर ग़ज़ल .

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  10. तेरे नाम पर थी टिकी ज़िन्दगानी
    नहीं तेरे बिन होगा अपना गुज़ारा

    वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
    बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा

    बहुत सुन्दर !

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  11. हर पंक्ति, एक से बढ़कर एक, दमदार..

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  13. रचना और कैक्‍टस दोनों ही अच्‍छे लगे

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  14. बेदर्दी और हाकिम के नाम पर अभी तक हमें तो वो शेर याद आ जाता था जो नुमाईश में खजले की दूकान पर एक बैनर पर लिखा हुआ था,
    'लिखा परदेस किस्मत में, वतन को याद क्या करना
    जहां बेदर्द हाकिम हो, वहाँ फ़रियाद क्या करना'
    ये वाली गज़ल इक्कीस, इकतीस इक्यावन है|
    दीवाने अशर्फियाँ लुटाते हैं और खुद कौडियों के दाम बिक जाते है, बहुत खूब है जी|

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    1. सच में, क्या खूब!

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    2. तभी तो वे दीवाने कहलाते हैं ..

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  15. वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
    बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा
    har pankti sundar khaskar yah .....

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  16. ज़मीं हो हमारी गगन है तुम्हारा...........

    _______________
    पी.एस. भाकुनी
    _______________

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  17. सशक्त भाव ....सुंदर पंक्तियाँ

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  18. बहत खूब ....सुन्दर अभिव्यक्ति |

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  19. तेरे नाम पर थी टिकी ज़िन्दगानी
    नहीं तेरे बिन होगा अपना गुज़ारा ...

    ये सच है ... उनके बिना जीना आसान नहीं होगा ... नाम का ही इतना असर है ... सुन्दर गज़ल ...

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  20. वो दामे-मुहब्बत नहीं जान पाया
    बिका कौड़ियों में दीवाना बेचारा

    वाह....क्या बात है! बहुत खूब।
    आपको शुभकामनाएं।

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  21. मैं तो शीर्षक देख ही खुश हुआ जा रहा हूँ, कितना सटीक!
    वाह!

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  22. अहा! शानदार!! :) :)

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  23. बहुत अच्छी प्रस्तुति!शुभकामनाएं।

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  24. वो दाम-ए-मोहब्बत नहीं जान पाया। सच मोहब्बत सबसे कीमती चीज है। बिल्कुल नये बिंब। शुभकामनाएँ

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  25. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

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