Wednesday, January 14, 2009

चंद अशआर

संजो के रखो इसे, हाथ से न जाने दो
बात निकलेगी तो बेकार चली जायेगी।
-x-X-x-

जब कभी लोग बुरे वक़्त से गुज़रते हैं
गैर बच जाते हैं अपने ही बुरे बनते हैं।
-x-X-x-

छोड़ फूलों को परे काँटे जो उठाते हैं
ज़ख्म और दर्द ही हिस्से में उनके आते हैं ।
-x-X-x-

सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।
-x-X-x-

[अनुराग शर्मा]

[यह पोस्ट लिखते समय पिट्सबर्ग का तापमान शून्य से १३ डिग्री सेल्सियस नीचे है। और आज रात में (भारत में शुक्रवार की सुबह) यह शून्य से २० अंश नीचे जाने वाला है ]

29 comments:

  1. सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।
    " भावुक अभिव्यक्ति...अश्को के बाँध टुटे तो सैलाब बह निकला ...बहुत सुंदर"

    Regards

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  2. jab kabhi log bure -----bahut khoob likha hai badhaai

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  3. सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।

    bahut shaandaar abhivyakti.

    raam raam.

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  4. वाह।

    छोड़ फूलों को परे कांटे जो उठाते हैं
    ज़ख्म और दर्द ही हिस्से में उनके आते हैं ।

    बहुत उम्दा। ये कुछ हमारे करीब लगा।

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  5. अच्‍छे अशआर हैं। पहला शेर बरबस ही 'बात निकली है तो दूर तलक जाएगी' की याद दिला देता है।

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  6. जब कभी लोग बुरे वक़्त से गुज़रते हैं
    गैर बच जाते हैं अपने ही बुरे बनते हैं।

    बहुत ही उम्दा बात कही आपने यही सच है ज़िन्दगी का सबसे बड़ा

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  7. वाह..बेजोड़। गजब के अशआर हैं, बात सीधे दिल में उतरती है। आम बोलचाल के शब्‍दों से बुनी आपकी शायरी की यह खासियत पाठकों को अपने प्रवाह में बहा ले जाती है।

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  8. ये लाइन बड़ी अच्छी लगी:
    गैर बच जाते हैं अपने ही बुरे बनते हैं।

    और ये तो कभी-कभी हो जाता है :
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।

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  9. हर शेर एक से बढ कर एक. बहुत ही सुंदर
    धन्यवाद

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  10. सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।
    प्रभावित कर गयी यह अभिव्यक्ति !

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  11. Aap roj kuch na kuch likhte rahen, kya khoob likha hai.

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  12. कविता पढ़ने पर जब नीचे का कोष्ठक में लिखा तापमान पढ़ा तो दशा की कल्पना नहीं कर पाया।
    मैं तो यही सोचता रहा कि इस तापमान पर तेल की पटरियों की क्या दशा होती होगी। बस कौतूहल है।

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  13. सुंदर रचना के लिए साधुवाद.

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  14. सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।

    चलो अच्छा ही हुआ, वर्ना यूं भी तो हो सकता था:

    इक परिज़ाद की रुसवाई का डर है वरना,
    हम भी सावन की तरह , खुल के बरसते यारों...

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  15. जब कभी लोग बुरे वक़्त से गुज़रते हैं
    गैर बच जाते हैं अपने ही बुरे बनते हैं।

    bahut sahi baat kahi hai aapne....

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  16. काफी दिनों बाद बेहतरीन अशआर पढे ।
    शुभकामनाओं सहित अतुल

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  17. अनुराग भाई,
    आपने खूब कहा जी ..
    और ...
    "मकर सँक्रात " गुजरा है
    - तिल गुड खायेँ -
    ठँड से भी बचाव और मिठास भी ..
    आपके जाल घर पर पधारे सभी पाठकोँ को मकर सँक्रात की बधाई

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  18. अच्छे शेर हैं.

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  19. भई वाह... अनुराग जी.. अब समझ में आया कि ये शायरी की गरमी ही इस ठंड में बचा रही है आपको... खैर.. बढ़िया...

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  20. भई वाह अनुराग जी अब समझ में आया कि ये शायरी की गरमी ही इस ठंड में बचा रही है आपको खैर बढ़िया

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  21. भाई उत्तम. बहुत उम्दा शेर.

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  22. सर भी भारी नहीं ये दम भी आज घुटता नहीं,
    बाद मुद्दत के मेरे अश्क बाँध तोड़ चले।

    बहुत खूब अशआर लिखे हैं.

    [sardi se bachey rahen..aur barf bari ka mazaa len...

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  23. जन्मदिन की बधाई का शुक्रिया अनुराग। मिठाई तो टोरांटो आने पर ही मिलेगी। प्लान बनाइये फ़ैमिली के साथ और आ जाइये।

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  24. छोटे छोटे बंद गहरे भावः बहुत सुंदर अनुराग जी
    Pradeep Manoria
    http://manoria.blogspot.com
    http://kundkundkahan.blogspot.com

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  25. अनुराग जी
    बहुत खूबसूरत शेर हैं, संजो कर रखने के लिए

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  26. वाह...........
    सुन्दर शेर.......

    अनु

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