Monday, June 1, 2020

विदेह - लघुकथा

Anurag Sharma

"मैं बहुत अकेला हो गया हूँ। तुम्हारी माँ तो मेरा मुँह देखना भी पसंद नहीं करती। तुम भी कितने अरसे बाद आये हो बेटा। अब मुझे बहुत डर लगता है। … देखो, हमारे घर के सब कमरे ग़ायब हो गये हैं, बस यह एक बैडरूम बचा है, यह भी कितना सिकुड़ गया है।"

पिता एक साँस में जाने कितना कुछ कह गए थे। उनकी बातें सुनकर राज का दिल रो उठा था। माँ कब की जा चुकी थीं। पिता भी घर में नहीं, वृद्धाश्रम में थे। भूलने की बीमारी धीरे-धीरे उनकी याद्दाश्त खा रही थी। सदा सक्षम और योग्य रहे पिता को इस हाल में देखना राज के लिये कठिन था। घर ही नहीं, बाहर के संसार में भी पिता सराहे जाते थे। वे अपने विषय के विशेषज्ञ तो रहे ही थे, दुनिया भर के लोग व्यक्तिगत सलाह के लिये भी उनके पास आते थे। राज खुद भी अपनी हर चिंता, हर भय को पिता के हवाले करके निश्चिंत हो जाता था।

भीगी आँखों से कुछ कहने के बजाय वह पिता के गले लग गया। पिता के कंधे पर अपना सिर रखे-रखे ही उसे पिता की हँसी सुनाई दी। उसने मुस्कुराकर पूछा, "क्या याद आ गया पापा?"

"याद है, जब तू छोटा सा था, एक दिन आकर मुझसे लिपट गया। बिल्कुल आज के जैसे ही भीगी आँखों के साथ। पता है तूने क्या कहा था?"

"बताइये न पापा!" दोनों आमने-सामने खड़े थे और राज एक बार फिर अपने बचपन का वह किस्सा किसी बच्चे की तरह ध्‍यान से सुन रहा था। पिता उसे यह किस्सा पहले भी सैकड़ों बार सुना चुके थे। वह छह-सात साल का रहा होगा जब एक दिन पिता से लिपटकर माफ़ी मांगते हुए कहने लगा, "सॉरी पापा, टीनएजर होने के बाद अगर ग़लती से मैं कभी आपसे बदतमीज़ी करूँ, तो उसके लिये अभी से सॉरी बोल रहा हूँ!"

राज ने किसी टीवी सीरीज़ में कुछ नकचढ़े टीनएजर्स को अपने माता-पिता का अपमान करते हुए देखा था और समझा कि किशोरावस्था में सब बच्चे प्राकृतिक रूप से ही ऐसे हो जाते हैं।

"सॉरी बेटा।" किस्सा पूरा करके पिता राज से लिपटकर माफ़ी मांगते हुए रोने लगे।

"पापा, अब आप क्यों रो रहे हैं? मैंने तो माफ़ी मांग ली थी न।"

"मैं अब भूलने लगा हूँ बेटा। थोड़ा और बुढ़ा जाऊँगा तो शायद तुझे भी भूल जाऊँगा। इसलिये माफ़ी माँगना चाहता हूँ क्योंकि तब शायद यह भी भूल जाऊँ कि माफ़ी क्या होती है। सॉरी!"

13 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (03-06-2020) को   "ज़िन्दगी के पॉज बटन को प्ले में बदल दिया"  (चर्चा अंक-3721)    पर भी होगी। 
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
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    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    1. आभार शास्त्री जी

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  2. हृदय स्पर्शी लघुकथा. वृद्धावस्था का सार्थक शब्द चित्र.
    सादर

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  3. रिश्तों के खूबसूरत बंधन को शब्दों में बुनती हुई अच्छी कहानी

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  4. मार्मिक कहानी ! अत्यंत हृदयस्पर्शी !

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  5. संवेदना और करुणा का चित्रण

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    1. आज मन प्रस्सन है, कि टेक्नोलॉजी के माद्यम से, मन की भावनाओं को, बांधने वाली दीवारे, विलुप्त हो रही हैं. और ये उसी का प्रभाव है कि कई कलमें, एक सांथ मन के भावों की थाह लेने और जीवन की नीरसता को छिन्न-भिन्न कर, अंतिम श्वास की सार्थकता को, बयां कर, जीवन के सुखद प्रवास को, अभयदान देने को उत्प्रेरित हैं.

      सभी लेखनी के, अन्वेषण-कर्ताओं को आत्मिक नमन वंदन समर्पित हैं

      मैंने, नया-नया कलम पकड़ना सीखा है , औपचरिकता जानता नहीं हूं, आशा है बालक मानकर त्रुटियों को अनदेखा करेंगे.

      लेखक महोदय को साधुवाद, आपकी कलम जीवन की आत्मा को, माला रूप में पिरोने में, यूं ही आगे बढ़ती रहे ऐसी मंगल-कामना है.

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  6. हृदयस्पर्शी

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  7. बहुत बहुत धन्यवाद। आपके ब्लॉग में बहुत अच्छी सामग्री है

    रिश्तों के खूबसूरत बंधन को शब्दों में बुनती हुई अच्छी कहानी

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  8. Nice Post. Thanks for sharing this article

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  9. माफ़ी मांगने वाले लोग दुर्लभ होते जा रहे हैं. यूँ पहले से माफ़ी माँगना पसंद आया.

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  10. मर्मस्पर्शी लघुकथा ।

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