(एक केयरगिवर की गाथा)
मेरे हिस्से में थे—साझा खाते,साझे उत्सव,और हर वह तस्वीरजिसमें मैं नहीं था;क्योंकि मैं हमेशाकैमरे के उस पार खड़ा था।
तुम्हारे हिस्से में था—
एक विचित्र ब्रह्माण्ड,
कई‑कई वृत्तों का घेरा।
बीच में तुम,
हर फ्रेम में मुस्कुराते हुए
चारों ओर
माता‑पिता, भाई‑बहन,
रिश्तेदार, प्रशंसक,
दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी,
नितांत अजनबी भी।
बस एक भला मानस था
जिसके लिए मुस्कान नहीं थी
वह जो हर बार
पीछे खड़ा रहता था।
जो धीरे‑धीरे
निरंतर अपमानित होते हुए
पीछे छूट ही गया—
घर-परिवार,
नाते-संस्कार,
नज़र से भी,
याद से भी।
***
डायरियाँ चीती गईं,
तस्वीरें पोती गईं,
फोटो काटे गए—
मेरा अस्तित्व ही नहीं
मेरी उपस्थिति भी
किसी अपराध की तरह
मिटाई जाती रही, सतत।
पौधे मारे गए,
गाना ‘कान‑पकाना’ कहकर
ठुकराया गया—
तो लेखन गया,
चित्रकला गई,
फोटोग्राफी बुझ गई,
बागवानी की आत्मा सिधार गई,
गुनगुनाना तक शांत हो गया।
इलेक्ट्रॉनिक्स कैश हुए,
कलेक्टबल्स ट्रैश हुए,
एक्सेसरीज़ दान में गईं—
मित्रों-परिवारों से मिले
और दो चोरियों से बचे
उन सभी उपहारों को
जिन पर किसी का नाम था
एक-एक कर
किस अनाम प्रेत ने उठाया,
कभी पता न चला।
दस घर बदले गये
दशक बीतते-बीतते —
क्योंकि कोई घर कभी
मायके से दूर,
कोई परिजनों से कटा हुआ,
कभी मित्रों से बिछड़ा हुआ था।
कभी ग़लत मोहल्ला,
कभी ग़लत शहर,
कभी ग़लत देश—
कभी मंज़िल ही ग़लत निकली।
किसी घर में धूप कम थी,
किसी में चाँद अधिक था।
कमी अलग-अलग थी,
पर समानता बस एक थी—
बदली अकेले मुझे ही करनी पड़ी।
सामान बाँधना, छाँटना,
भरना, ढोना, उतारना, खोलना,
सफ़ाई करना— सब मेरा काम।
तुम कभी साथ थीं ही नहीं
क्योंकि तुम्हारे अधिक ज़रूरी
सामाजिक फ़र्ज़ आन पड़े थे हर बार।
वक़्त गुज़रता गया
आशा धूमिल होती रही
परंतु मैं मिटा नहीं,
न भूत हुआ,
यदा कदा सामने लाया जाता रहा
जब सुरक्षा चाहिए होती,
या संकट में सहारा,
जब पैसों की ज़रूरत होती,
या किसी महफ़िल तक जाने को
चालक नहीं मिलता था,
या एक सर चाहिये होता था
खानदानी मूर्खता के
नुकसान का ठीकरा फोड़ने को।
तुम्हारे खाते जुड़े रहे
तुम्हारे अपने रक्त‑सम्बन्धों से—
गौरव, अपनी जाति से
द्वेष मुझसे, मेरे हितैषियों से।
तुम्हारे उत्सव सजते रहे
तुम्हारे मित्र‑मंडल के लिए—
और मैं—
मैं बस कभी‑कभार
तुम्हें वहाँ छोड़ आता था,
जहाँ मैं स्वयं
कभी आमंत्रित नहीं था।
धीरे‑धीरे
मैं मिटता गया—
तुम्हारे जीवन से,
अपने जीवन से,
सार्वजनिक पटल से,
अपने लोगों से,
अपने मित्रों से,
और उन सबकी दृष्टि से
जो सच में मेरी परवाह करते थे,
गाहे-बगाहे तारीफ़ भी।
और यह सब होते हुए भी,
मैं दशकों साथ चलता रहा था
अपने उस सबसे बड़े शत्रु के
जिसने कभी नहीं गँवाया
एक भी अवसर
मुझे निशाना बनाने का
दिल दुखाने का
मेरे विकेट उखाड़ने का
मेरे खिलाफ़ गोल करने का
मुझे अपमानित—
और बदनाम करने का
अपनी सखियों में
उनके पतियों में
यारों में, दिलदारों में
यहाँ तक कि
मुहल्ले के दुकानदारों में।