Saturday, February 14, 2026

साक्षात्कार

तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।

Monday, December 29, 2025

ग़ज़ल

छोड़कर हमको प्रिये, ताउम्र पछताओगी तुम
दिल हमारा तोड़कर, रहने कहाँ जाओगी तुम।

फूल से चेहरे पे आँसू का लगा जैसे हुज़ूम,
आईने में देखकर, खुद से ही घबराओगी तुम।

प्रेम की ख़ुशबू हमारे, बसती थी हर साँस में,
दौलतों में ढूँढती, उसको कहाँ जाओगी तुम।

रात की वीरानगी में याद कर करके मुझे,
नाम मेरा लेके फिर, चुपचाप रो जाओगी तुम।

हम तो इस वीराँ गली की धूल में मिल जाएंगे,
लौट आओ भी कभी, पर न हमें पाओगी तुम।

बच गया अनुराग, थोड़ा गर तुम्हारे पास भी,
ज़िक्र आयेगा जहाँ भी, चौंक सी जाओगी तुम॥

Thursday, November 27, 2025

❤️ जीवन को भरपूर जिया, खुश हो कर हर पल ❤️

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

बचपन से तूफ़ानी लहरों में उतरने लगा था,
घबराया जब भँवर में जीवन ठहरने लगा था।
लहरें दुश्मन, तैरना आता नहीं, डूबने को आया,
उस बहाव से ही, मैंने जीने का प्रण अपनाया।

रातों जागकर भी कोई किताब रास न आई, 
ठोकरें खूब लगीं, सफलता पास न आई।
शाला में पिछड़ा, मिला असफलता का उपहार,
अपनों की आँखों में देखी, निराशा और हार। 

दोस्तों पर विश्वास कर धन भी लुटाया,
बुद्ध संसार ने जमकर मुझे बुद्धू बनाया।
साँप-सियारों के जंगलराज में कोई कैसे रहे?
फिर भी रखा दिल साफ़, ज़माना जो चाहे कहे।

बेइंतहा मोहब्बत कर जब आँख बंद की थी, 
प्रेमिल कसमें खानेवालों ने ही विषपुटी दे दी थी। 
तकिया भीगता है, जब यादों की बाढ़ आती है,
आँसू नहीं गिनता, लेकिन पीड़ा भी कुछ सिखाती है।

जब-जब चैकमेट मिली, तब-तब अहंकार टूटा था,
शतरंज के राजा ने जाना, जीत का हर दाँव झूठा था।
कै़रम में रानी नहीं आती, पर फ़ाउल हो जाता है,
फिर भी मुस्कुराकर, मन अगली बाज़ी में लग जाता है।

जानता हूँ ये सब हार नहीं हैं, ये मेरी जीवन शैली हैं,
फटे-पुराने पत्ते पाकर, हारने वाली बाज़ियाँ खेली हैं।
जीतकर भी अपनों और आदर्शों के लिये जीवन हारा है,
मीरा-सुकरात ने भी तो विष, अमृत समझ स्वीकारा है॥