Sunday, September 13, 2026

ग़ज़ल: सँवारे क्यों

काम नहीं जो आने वाला, उसको कोई पुकारे क्यों।
बाज़ारों की इस बस्ती में, दिल को कोई निखारे क्यों॥

इस्तेमाल का दौर नया है, भोगें-फेंकें, चलो-टलो, 
जो पीछे छोड़ा जा सकता है, उसको कोई सुधारे क्यों॥

जीवन मतलब मनरंजन, खेलें जब तक खेल चले,
टूटे हुए खिलौने पर अब, रंग कोई निखारे क्यों॥

हर नाते की उम्र लिखी है, विज्ञापन की तर्ज़ों पर,
डूबे यदि सम्बंध पुराना, उसको कोई उबारे क्यों॥

जर्जर होते हर रिश्ते को, तन्हा होकर छूटना है,
बीत कल की पगडंडी, आख़िर कोई निहारे क्यों॥

काँच का झूमर नीचे गिरकर, कब का चकनाचूर हुआ,
बीन-बीन किरचों को उसकी, पागल कोई सँवारे क्यों॥

Saturday, September 5, 2026

सच: कुछ हाइकु खरे-खरे

1. खरे बोल से तौबा


​कड़वा सच,
सुनाते ही रहते,
सह न पाते।
2. पर उपदेश

​ज़हर सच,
औरों को ही पिलाते,
खुद न पीते।

3. अहंकार

​कहते खरे,
कोई और जो कहे,
लगते खोटे।

4. दर्पण
सच का शीशा,
औरों को दिखाते हैं,
खुद छुपाते।

Tuesday, August 18, 2026

मौन का आधार और संवाद का आकार

मौन के विज्ञान के
विद्वान भी होंगे कहीं,
हम भला कैसे कहें कि
मौन का आधार क्या है।

प्रश्न जब कोई उठे और
उत्तरों की प्यास हो,
दो तटों को जोड़ दे
उस सेतु की ही आस हो।

कोरियन के प्रश्न का,
उत्तर जापानी में मिले,
राह छूटे समझ की जब,
संवाद का आकार क्या है?

जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।

रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?

चुप्पी ही उत्तर है क्या,
या बस उपेक्षा भाव है?
या अहंता से जन्मता
भीतरी कोई घाव है?

प्रश्न को समझे नहीं,
या वक्त माँगा जा रहा,
मौन के इस व्यूह का
सत्य और आगार क्या है?

संवाद ही तो ज़िंदगी का
सहज-सच्चा रूप है,
मौन जब छाया न दे तो
काटती वह धूप है।

जो शब्द की हत्या करे
और अर्थ को ही मेट दे,
उस मौन से बेहतर तो फिर
स्पष्ट एक इनकार है!

हम भला कैसे कहें
क्या मौन ही आधार है?