Saturday, October 3, 2026

नाखुश - हिंदी ग़ज़ल

कामरेड नाखुश हैं हमसे, मंदिर-मस्जिद वाले भी
मज़दूरों के नेता नाखुश, नाखुश उनके लाले भी॥

नाशादों को शाद करूँ, यह सोच रहा हूँ कुछ दिन से
जले दिलों के इस जग में हों, थोड़े तो दिलवाले भी॥

अपने मन की बात कहे न, वह कैसे हो अपना सा
दिल में रखते बातें जी की, दुश्मन भी, घरवाले भी॥

झूठों के बाज़ार में सच की, क़ीमत कौन चुकाएगा
सच कहने वाले होठों पर, पड़ जाते हैं ताले भी॥

आँखों में ख़्वाबों के दीये, लेकर निकलेंगे जो लोग
ढूंढ रहे उनके पाँवों को, इन राहों के छाले भी॥

Sunday, September 13, 2026

ग़ज़ल: सँवारे क्यों

काम नहीं जो आने वाला, उसको कोई पुकारे क्यों।
बाज़ारों की इस बस्ती में, दिल को कोई निखारे क्यों॥

इस्तेमाल का दौर नया है, भोगें-फेंकें, चलो-टलो, 
पीछे छोड़ा जा सकता जो, उसको कोई सुधारे क्यों॥

जीवन मतलब मनरंजन, खेलें जब तक खेल चले,
टूटे हुए खिलौने पर अब, रंग कोई निखारे क्यों॥

हर नाते की उम्र लिखी है, विज्ञापन की तर्ज़ों पर,
डूबे यदि सम्बंध पुराना, उसको कोई उबारे क्यों॥

जर्जर होते हर रिश्ते को, तन्हा होकर छूटना है,
बीते कल की पगडंडी को, आख़िर कोई निहारे क्यों॥

काँच का झूमर नीचे गिरकर, कब का चकनाचूर हुआ,
बीन-बीन किरचों को उसकी, पागल कोई सँवारे क्यों॥

Saturday, September 5, 2026

सच: कुछ हाइकु खरे-खरे

1. खरे बोल से तौबा


​कड़वा सच,
सुनाते ही रहते,
सह न पाते।
​
2. पर उपदेश

​ज़हर सच,
औरों को ही पिलाते,
खुद न पीते।

3. अहंकार

​कहते खरे,
कोई और जो कहे,
लगते खोटे।
​

4. दर्पण
​
सच का शीशा,
औरों को दिखाते हैं,
खुद छुपाते।