Friday, March 20, 2026

🌙ग़ज़ल - तुम्हारे हैं

Happy New Year 5128 📅 "रौद्र" नामक संवत्सर पर सबको शुभकामनाएँ 🙏 *श्री शालिवाहन शक 1948, युगाब्द 5128, संवत 2083 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुढीपड़वा, नवरात्रि व हिंदू नववर्ष पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभेच्छा* 🌹

उनको कुछ इस तरह दुलारे हैं,
जैसे वे सब भी उनको प्यारे हैं।

चोट दिल की कहाँ सँभालेंगे,
हम तो बस दर्द के सहारे हैं।

रात भर ख़ुद से बात करते हैं,
दिन में ख़ामोशियों के मारे हैं।

ज़िंदगी इक अजीब सौदा है,
हमने बस क़र्ज़ ही उतारे हैं।

कोई मंज़िल न, कोई रस्ता है,
हम तो गुज़रे हुए नज़ारे हैं।

कल की उम्मीद नहीं बाकी है,
आज भी आस पर गुज़ारे हैं।

तुम गए तब से रातें काली हैं,
चंदा है न गगन में तारे हैं।

हम तो दिन-रात इतना कहते हैं,
तुम भी कह दो कभी "तुम्हारे हैं!"
***

Thursday, March 5, 2026

लेखक को जानिये - अनुराग शर्मा के साक्षात्कार और वार्ताएँ

प्रकाशित साक्षात्कार-वार्ता, कथन-वाचन शृंखला में कुछ और साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत हैं।

विडियो साक्षात्कार - Video Interviews

आभार पूजा अनिल 
(किस्साटेल के लिये अनुराग शर्मा और पूजा अनिल की वार्ता हाफ़-सेंचुरी, आधी सदी का क़िस्सा पर )
https://www.facebook.com/share/v/172nDdavMp/
आभार विनीता तिवारी (सेतु के दस वर्षों पर अनुराग शर्मा और विनीता तिवारी की वार्ता)


आभार रचना श्रीवास्तव (शशि पाधा जी की पुस्तक कही-अनकही पर चर्चा)

आभार वैश्विक हिंदी परिवार - उतरी अमेरिका (प्रस्तोता: आस्था नवल)

Saturday, February 14, 2026

कविता: साक्षात्कार

कविता एक उल्लास है, पर्व है, होली सा
तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।