मेरे हिस्से में था—साझा खाता,
साझा उत्सव,
और हर वह तस्वीर
जिसमें मैं नहीं था;
क्योंकि मैं हमेशा
कैमरे के उस पार खड़ा था।
तुम्हारे हिस्से में था—
एक विचित्र ब्रह्माण्ड,
कई‑कई वृत्तों का घेरा।
बीच में तुम,
हर फ्रेम में मुस्कुराते हुए
चारों ओर
माता‑पिता, भाई‑बहन,
रिश्तेदार, प्रशंसक,
दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी,
नितांत अजनबी भी।
बस एक भला मानस था
जिसके लिए मुस्कान नहीं थी
वह जो हर बार
पीछे खड़ा रहता था।
और धीरे‑धीरे
पीछे छूट ही गया—
नज़र से भी,
याद से भी।
यदाकदा सामने लाया जाता था
जब सुरक्षा चाहिए होती,
या संकट में सहारा,
जब पैसों की ज़रूरत होती,
या किसी महफ़िल तक जाने को
चालक नहीं मिलता था,
या एक सर चाहिये होता था
नुकसान का ठीकरा फोड़ने को।
तुम्हारे खाते जुड़े थे
तुम्हारे अपने रक्त‑सम्बन्धों से—
गौरव, अपनी जाति से
द्वेष मुझसे, मेरे हितैषियों से।
तुम्हारे उत्सव सजते थे
तुम्हारे मित्र‑मंडल के लिए—
और मैं—
मैं बस कभी‑कभार
तुम्हें वहाँ छोड़ आता था,
जहाँ मैं स्वयं
कभी आमंत्रित नहीं था।
धीरे‑धीरे
मैं ग़ायब होता गया—
तुम्हारे जीवन से,
अपने जीवन से,
अपने लोगों से,
अपने मित्रों से,
और उन सब से
जो सच में मेरी परवाह करते थे।
और यह सब करते हुए
मैं साथ चलता रहा था
अपने ही सबसे बड़े शत्रु के
जिसने कभी नहीं गँवाया
एक भी अवसर
मुझे अपमानित करने का
अपनी सखियों में
उनके पतियों में
यारों में, दिलदारों में
यहाँ तक कि
मुहल्ले के दुकानदारों में।


