कामरेड नाखुश हैं हमसे, मंदिर-मस्जिद वाले भी
मज़दूरों के नेता नाखुश, नाखुश उनके लाले भी॥
नाशादों को शाद करूँ, यह सोच रहा हूँ कुछ दिन से
जले दिलों के इस जग में हों, थोड़े तो दिलवाले भी॥
अपने मन की बात कहे न, वह कैसे हो अपना सा
दिल में रखते बातें जी की, दुश्मन भी, घरवाले भी॥
झूठों के बाज़ार में सच की, क़ीमत कौन चुकाएगा
सच कहने वाले होठों पर, पड़ जाते हैं ताले भी॥
आँखों में ख़्वाबों के दीये, लेकर निकलेंगे जो लोग
ढूंढ रहे उनके पाँवों को, इन राहों के छाले भी॥

