Sunday, August 16, 2026

चीड़ और चांद

(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।

चांद आज
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद ची‌ड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।

हवा ने
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।

कभी‑कभी लगता है
चीड़ और चांद
दो पुराने दोस्त हैं।
एक ज़मीन पर टिक कर ऊँचा उठता है,
दूसरा गगन में रहकर
थोड़ा‑थोड़ा नीचे उतरता है।

... और इन दोनों के बीच
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।

Sunday, April 26, 2026

हिंदी ग़ज़ल: अनुराग शर्मा

द्वार प्रेम के खुले हुए हों, बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।

साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, रंजो-ग़म, विस्मय के हों।

कहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
रिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों।

तुमने थामा हाथ हमारा, युग तक यह विश्वास रहे, 
टूटन कैसी, रिश्ते जो हों, निष्ठा और आश्रय के हों।

फूल वही खिलते उपवन में, जिनकी रहे सलामत जड़,
झूठ की नींव गिरा दी जाये, भवन सभी विजय के हों।

Friday, March 20, 2026

🌙ग़ज़ल - तुम्हारे हैं

Happy New Year 5128 📅 "रौद्र" नामक संवत्सर पर सबको शुभकामनाएँ 🙏 *श्री शालिवाहन शक 1948, युगाब्द 5128, संवत 2083 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुढीपड़वा, नवरात्रि व हिंदू नववर्ष पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभेच्छा* 🌹

सबको कुछ इस तरह दुलारे हैं,
जैसे वे सब भी उनको प्यारे हैं।

चोट दिल की कहाँ सम्हालेंगे,
हम तो बस दर्द के सहारे हैं।

रात भर ख़ुद से बात करते हैं,
दिन में ख़ामोशियों के मारे हैं।

ज़िंदगी इक अजीब सौदा है,
हमने बस क़र्ज़ ही उतारे हैं।

कोई मंज़िल न, कोई रस्ता है,
हम तो गुज़रे हुए नज़ारे हैं।

कल की उम्मीद नहीं बाकी है,
आज भी आस पर गुज़ारे हैं।

तुम गए तब से रातें काली हैं,
चंदा है न गगन में तारे हैं।

हम तो दिन-रात इतना कहते हैं,
तुम भी कह दो कभी "तुम्हारे हैं!"
***