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Saturday, September 5, 2026

सच: कुछ हाइकु खरे-खरे

1. खरे बोल से तौबा


​कड़वा सच,
सुनाते ही रहते,
सह न पाते।
2. पर उपदेश

​ज़हर सच,
औरों को ही पिलाते,
खुद न पीते।

3. अहंकार

​कहते खरे,
कोई और जो कहे,
लगते खोटे।

4. दर्पण
सच का शीशा,
औरों को दिखाते हैं,
खुद छुपाते।

Tuesday, August 18, 2026

मौन का आधार और संवाद का आकार

मौन के विज्ञान के
विद्वान भी होंगे कहीं,
हम भला कैसे कहें कि
मौन का आधार क्या है।

प्रश्न जब कोई उठे और
उत्तरों की प्यास हो,
दो तटों को जोड़ दे
उस सेतु की ही आस हो।

कोरियन के प्रश्न का,
उत्तर जापानी में मिले,
राह छूटे समझ की जब,
संवाद का आकार क्या है?

जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।

रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?

चुप्पी ही उत्तर है क्या,
या बस उपेक्षा भाव है?
या अहंता से जन्मता
भीतरी कोई घाव है?

प्रश्न को समझे नहीं,
या वक्त माँगा जा रहा,
मौन के इस व्यूह का
सत्य और आगार क्या है?

संवाद ही तो ज़िंदगी का
सहज-सच्चा रूप है,
मौन जब छाया न दे तो
काटती वह धूप है।

जो शब्द की हत्या करे
और अर्थ को ही मेट दे,
उस मौन से बेहतर तो फिर
स्पष्ट एक इनकार है!

हम भला कैसे कहें
क्या मौन ही आधार है?

Sunday, August 16, 2026

संकेन्द्रीय वृत्त

(एक केयरगिवर की गाथा) मेरे जिम्मे थे—

हमारे साझा खाते, साझे ऋण, 
साझे कार्ड, और
हर वित्तीय बोझ 
जिसमें कुछ जाना था।

बिखरी पड़ी हैं
तुम्हारी खूबसूरत तस्वीरें
जिसमें मैं नहीं हूँ;
क्योंकि मैं हमेशा
कैमरे के उस पार खड़ा था।

तुम्हारे हिस्से में था—
एक विचित्र ब्रह्माण्ड,
कई संकेन्द्रीय वृत्तों का घेरा।

केंद्र में तुम,
हर फ्रेम में मुस्कुराते हुए,
चारों ओर के घेरों में
माता‑पिता, भाई‑बहन,
रक्त-सम्बन्धी, प्रशंसक,
दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी,
नितांत अजनबी भी।

बस एक भला मानस था
जिसके लिए मुस्कान नहीं थी
वह जो हर बार
पीछे खड़ा रहता था।

जो धीरे‑धीरे
निरंतर अपमानित होते हुए
पीछे छूट ही गया—
घर-परिवार,
नाते-संस्कार,
नज़र से भी,
याद से भी।

बहुत कुछ हुआ
समय-समय पर
डायरियाँ चीती गईं, 
तो लेखन गया, 
तस्वीरें पोती गईं, 
चित्रकला गई, 
फोटो काटे गए 
तो फोटोग्राफी बुझ गई, 
पौधे मारे जाने से,
बागवानी की आत्मा सिधार गई, 
‘कान‑पकाना’ कहकर
गायन रोका गया
इस प्रकार
गुनगुनाना भी शांत हो गया।

मेरा अस्तित्व ही नहीं
मेरी उपस्थिति भी
किसी अपराध की तरह
मिटाई जाती रही, 
धीरे-धीरे, लेकिन सतत।

इलेक्ट्रॉनिक्स कैश हुए, 
कलेक्टबल्स ट्रैश हुए, 
एक्सेसरीज़ दान में गईं— 
मित्रों-परिवारों से मिले
और दो चोरियों से बचे
उन सभी उपहारों को
जिन पर किसी का नाम था
एक-एक कर
किस अनाम प्रेत ने उठाया,
कभी पता न चला।

शिकायतों के चलते
दस घर बदलने पड़े
दशक बीतते-बीतते —
क्योंकि कोई घर कभी
मायके से दूर,
कोई परिजनों से कटा हुआ,
कभी मित्रों से बिछड़ा हुआ था।

कभी पड़ोसी बुरे,
कभी मोहल्ला ग़लत,
कभी शहर, तो कभी देश—  
दो बार तो मंज़िल ही ग़लत निकली।

किसी घर में धूप कम थी,  
किसी में चाँदनी अधिक थी।  
कमी अलग-अलग होते हुए भी,
समानता एक ही रही—
हर शिफ़्टिंग मुझे अकेले ही करनी पड़ी।

सामान बाँधना, छाँटना,  
भरना, ढोना, उतारना, खोलना,  
सफ़ाई करना— सब अकेले ही किया
जैसे सारा जीवन, अकेले ही जिया।
तुम कभी साथ थीं ही नहीं
क्योंकि तुम्हारे अन्य सामाजिक फ़र्ज़
अधिक ज़रूरी लगे थे, हर बार, लगातार।

वक़्त गुज़रता गया
आशा धूमिल होती रही
परंतु मैं मिटा नहीं,
न भूत हुआ,
यदा कदा सामने लाया जाता रहा
जब सुरक्षा चाहिए होती,
या संकट में सहारा,
जब पैसों की ज़रूरत होती,
या किसी महफ़िल तक जाने को
चालक नहीं मिलता था,
या एक सर चाहिये होता था
खानदानी मूर्खता से हुई
हानियों का ठीकरा फोड़ने को।

तुम्हारे खाते जुड़े रहे
तुम्हारे अपने रक्त‑सम्बन्धों से
गौरव, अपनी जाति से
द्वेष मुझसे, मेरे हितैषियों से।

तुम्हारे उत्सव सजते रहे
तुम्हारे मित्र‑मंडल के लिए
और मैं—
मैं बस कभी‑कभार
तुम्हें वहाँ छोड़ आता था,
जहाँ मैं स्वयं
कभी आमंत्रित नहीं था।

धीरे‑धीरे
मैं मिटता गया—
तुम्हारे जीवन से,
अपने जीवन से,
सार्वजनिक पटल से,
अपने लोगों से,
अपने मित्रों से,
और उन सबकी दृष्टि से
जो सच में मेरी परवाह करते थे,
गाहे-बगाहे तारीफ़ भी।

और यह सब होते हुए भी,
मैं दशकों साथ चलता रहा था
अपने उस सबसे बड़े शत्रु के
जिसने कभी नहीं गँवाया
एक भी अवसर मुझे निशाना बनाने का
दिल दुखाने का
मेरे विकेट उखाड़ने का
मेरे खिलाफ़ गोल करने का
मुझे अपमानित
और बदनाम करने का
अपनी सखियों में
उनके पतियों में
यारों में, दिलदारों में
यहाँ तक कि
मुहल्ले के दुकानदारों में।

चीड़ और चांद

(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, 
अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।

चांद आज
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद ची‌ड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।

हवा ने
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।

कभी‑कभी लगता है
चीड़ और चांद
दो पुराने दोस्त हैं।
एक ज़मीन पर टिक कर ऊँचा उठता है,
दूसरा गगन में रहकर
थोड़ा‑थोड़ा नीचे उतरता है।

... और इन दोनों के बीच
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।

Sunday, April 26, 2026

हिंदी ग़ज़ल: अनुराग शर्मा

द्वार प्रेम के खुले हुए हों, बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।

साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, रंजो-ग़म, विस्मय के हों।

कहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
रिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों।

तुमने थामा हाथ हमारा, युग तक यह विश्वास रहे, 
टूटन कैसी, रिश्ते जो हों, निष्ठा और आश्रय के हों।

फूल वही खिलते उपवन में, जिनकी रहे सलामत जड़,
झूठ की नींव गिरा दी जाये, भवन सभी विजय के हों।

Friday, March 20, 2026

🌙ग़ज़ल - तुम्हारे हैं

Happy New Year 5128 📅 "रौद्र" नामक संवत्सर पर सबको शुभकामनाएँ 🙏 *श्री शालिवाहन शक 1948, युगाब्द 5128, संवत 2083 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुढीपड़वा, नवरात्रि व हिंदू नववर्ष पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभेच्छा* 🌹

सबको कुछ इस तरह दुलारे हैं,
जैसे वे सब भी उनको प्यारे हैं।

चोट दिल की कहाँ सम्हालेंगे,
हम तो बस दर्द के सहारे हैं।

रात भर ख़ुद से बात करते हैं,
दिन में ख़ामोशियों के मारे हैं।

ज़िंदगी इक अजीब सौदा है,
हमने बस क़र्ज़ ही उतारे हैं।

कोई मंज़िल न, कोई रस्ता है,
हम तो गुज़रे हुए नज़ारे हैं।

कल की उम्मीद नहीं बाकी है,
आज भी आस पर गुज़ारे हैं।

तुम गए तब से रातें काली हैं,
चंदा है न गगन में तारे हैं।

हम तो दिन-रात इतना कहते हैं,
तुम भी कह दो कभी "तुम्हारे हैं!"
***

Saturday, February 14, 2026

कविता: साक्षात्कार

कविता एक उल्लास है, पर्व है, होली सा
तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।

Monday, December 29, 2025

छोड़कर हमको प्रिये - हिंदी ग़ज़ल

छोड़कर हमको प्रिये, ताउम्र पछताओगी तुम
दिल हमारा तोड़कर, रहने कहाँ जाओगी तुम।

फूल से चेहरे पे आँसू का लगा जैसे हुज़ूम,
आईने में देखकर, खुद से ही घबराओगी तुम।

प्रेम की ख़ुशबू हमारे, बसती थी हर साँस में,
दौलतों में ढूँढती, उसको कहाँ जाओगी तुम।

रात की वीरानगी में याद कर करके मुझे,
नाम मेरा लेके फिर, चुपचाप रो जाओगी तुम।

हम तो इस वीराँ गली की धूल में मिल जाएंगे,
लौट आओ भी कभी, पर न हमें पाओगी तुम।

बच गया अनुराग, थोड़ा गर तुम्हारे पास भी,
ज़िक्र आयेगा जहाँ भी, चौंक सी जाओगी तुम॥

Thursday, November 27, 2025

❤️ जीवन को भरपूर जिया, खुश हो कर हर पल ❤️

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

बचपन से तूफ़ानी लहरों में उतरने लगा था,
घबराया जब भँवर में जीवन ठहरने लगा था।
लहरें दुश्मन, तैरना आता नहीं, डूबने को आया,
उस बहाव से ही, मैंने जीने का प्रण अपनाया।

रातों जागकर भी कोई किताब रास न आई, 
ठोकरें खूब लगीं, सफलता पास न आई।
शाला में पिछड़ा, मिला असफलता का उपहार,
अपनों की आँखों में देखी, निराशा और हार। 

दोस्तों पर विश्वास कर धन भी लुटाया,
बुद्ध संसार ने जमकर मुझे बुद्धू बनाया।
साँप-सियारों के जंगलराज में कोई कैसे रहे?
फिर भी रखा दिल साफ़, ज़माना जो चाहे कहे।

बेइंतहा मोहब्बत कर जब आँख बंद की थी, 
प्रेमिल कसमें खानेवालों ने ही विषपुटी दे दी थी। 
तकिया भीगता है, जब यादों की बाढ़ आती है,
आँसू नहीं गिनता, लेकिन पीड़ा भी कुछ सिखाती है।

जब-जब चैकमेट मिली, तब-तब अहंकार टूटा था,
शतरंज के राजा ने जाना, जीत का हर दाँव झूठा था।
कै़रम में रानी नहीं आती, पर फ़ाउल हो जाता है,
फिर भी मुस्कुराकर, मन अगली बाज़ी में लग जाता है।

जानता हूँ ये सब हार नहीं हैं, ये मेरी जीवन शैली हैं,
फटे-पुराने पत्ते पाकर, हारने वाली बाज़ियाँ खेली हैं।
जीतकर भी अपनों और आदर्शों के लिये जीवन हारा है,
मीरा-सुकरात ने भी तो विष, अमृत समझ स्वीकारा है॥

Friday, October 17, 2025

उलटबाँसी सूरज की

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

सुबह के सूरज की तो 
शान ही अलग है
ऊँचे लम्बे पेड़ों पर

शाम की बुढ़ाती धूप भी
देर तक रहती है मेहरबान
उपेक्षित करके छोटे पौधों को

यह भी कमाल है कि
छोटे पौधे बढ़ सकते थे
काश! धूप उन तक पहुँच पाती।

Monday, March 31, 2025

खालीपन

नये पहाड़ चढ़ते हैं
सपाट पगडंडियों से 
जो थक चुके हैं
नये व्यंजन पकाते है वे
जो पुरानों से पक चुके हैं
***

जो खुश हैं यथास्थिति से
उन्हें कुछ कमी नहीं
वे कभी उकताते नहीं
नया कुछ बनाते नहीं
ज़रूरत ही पाते नहीं।
***

खालीपन, बंजारापन
अकुलाहट,  आवारापन
शैतान का घर नहीं
सरस्वती का वास है
नवनिर्माण की आस है।
***

बोरियत उदासी नहीं
चयन का अभाव नहीं
उनसे उकताहट है
वर्तमान विकल्पों से कहीं आगे
एक नये क्षितिज की चाहत है।
***

Sunday, April 14, 2024

खिलाते नहीं (हिंदी ग़ज़ल)

अनुराग शर्मा

अनुराग शर्मा

कदम राजपथ से हटाते नहीं
गली में मेरी अब वे आते नहीं।

कहीं सच में आ ही न जाये कोई
किसी को बेमतलब बुलाते नहीं।

अंधेरे में खुश नापसंद रोशनी 
खिड़की से परदा उठाते नहीं।

नहीं होने देंगे कसक में कमी
घावों को दिल से मिटाते नहीं।

जो बातें हुईं और न होंगी कभी
उन्हें भी कभी भूल पाते नहीं।

भावुक बहुत हैं कृपालु नहीं
कभी भाव अपना गिराते नहीं।

उसूलों के पक्के सदा से रहे
खाते बहुत हैं, खिलाते नहीं॥

Saturday, March 30, 2024

हमसे छिपाते हैं (हिंदी ग़ज़ल)

अनुराग शर्मा

अनुराग शर्मा


दुनिया को जताते हैं, पर हमसे छिपाते हैं
इल्ज़ाम-ए-तोताचश्मी हमपर ही लगाते हैं।

आती हवा का झोंका, उन्हें छूके हमको छू ले
वो इतने भर से हम पर अहसान जताते हैं।

सारा जहाँ हमारा, है जिनका सबसे वादा 
बन ईद का वो चंदा बस मुझको सताते हैं।

पुल सबके लिए बनते दीवार मेरी जानिब 
दिल मेरा सरे बाज़ार, क्यूँ इतना दुखाते हैं।

मेरे लिये वो मोती, हम उनके लिये मिट्टी 
उनके लिये ही अपना, हम भाव गिराते हैं।

फिर भी कहीं कभी जो, अटकेगा काम कोई 
दम घुटने लगे मेरा, प्यार इतना लुटाते हैं।

चाहें तो अभी ले लें, चाहें तो बख्श दें सर
यह जान जिनपे हाज़िर, वो जान न पाते हैं॥

Thursday, March 21, 2024

विश्व काव्य दिवस की शुभकामनाएँ!

चंद्रमा, आज रात

हम अच्छे हैं

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

अच्छा है
सब अच्छा होगा
क्योंकि हम अच्छे हैं
सब कुछ अच्छा रहा हमारा
क्योंकि हम सब अच्छे हैं
हमारे माता-पिता, भाई-भतीजे, सब अच्छे हैं
हमारे कपड़े, गाड़ी, गहने, बाड़ी, 
फ़ौजदारी, ज़मींदारी
बोले तो, सब कुछ बहुत अच्छा है
समस्या हमारे बाहर है
समस्या हमारे घर के बाहर है
समस्या हमारे जाति-सम्प्रदाय-देश-भाषा के बाहर है
समस्या दूसरी ओर की है
अपने से भिन्न, दूसरे लोगों की है
जिनके तौर-तरीके, खाना-पीना, ओढ़ना-बैठना
सब हमसे भिन्न हैं
शेख बिरहमन मुल्ला पाँड़े
पारसी यहूदी सिख ईसाई
जैन बौद्ध कामरेड कसाई
वे कोई भी हो सकते हैं
जिनके माँ-बाप, हमारे पुरखों जैसे सर्वगुण-सम्पन्न नहीं
और जिनका वर्तमान हमारे वर्तमान सा समृद्ध नहीं
और जिनका भविष्य हमारे बच्चों सा सुनहरा नहीं...
जिनके पास ज़मीन, लाठी, मुनाफ़ा, कैपिटेशन, डोनेशन, रिज़र्वेशन तो दूर
आशा की किरण तक नहीं है
जो पराये हैं अपने देश में
बेदरो-दीवार हैं अपने गाँव-कस्बे में
बेघर हैं अपने घर में
हमसे बर्दाश्त नहीं होते ऐसे लोग
चिंता है 
कि ये भिनकती हुई मधुमक्खियाँ
हमारे शहद के ढेर को दूषित न कर दें
ये चूज़े, ये चिड़ियाँ
तोड़ न दें हमारे बाज़ों को 
ये बंदर-भालू
जला न दें हमारी सोने की लंका
लार टपकाते ये वंचित-दलित
नज़र न लगा दें
हमारे ट्रैक्टर, बीएमडब्ल्यू, लैंडरोवर पर
हमारे खेत, खलिहान, गोदाम, महल-अट्टालिका पर
हमारे संचित धन पर।
हमारी जान को खतरा है
हमारी पहचान को खतरा है।
युद्ध से पहले संधि चाहिये
बाड़ के लिये समझौता ज़रूरी है
आतंकवाद की आड़ के लिये
समझौता एक्सप्रेस भी ज़रूरी है
फाँसी से पहले अहिंसा ज़रूरी है
क्रांति से पहले शांति ज़रूरी है
आज़ादी से पहले, विभाजन ज़रूरी है
बुतपरस्ती की नापाकी मिटाकर ज़मीन पाक करना ज़रूरी है,
पाकिस्तान ज़रूरी है।
उनके ग्रंथों में लिखी हैं, 
क्रूसेड की बात, जिहाद की बात, धर्मयुद्ध की बात
कर्म के फल की बात
क़यामत की बातें, आखिरत की बातें, प्रलय की बातें
ऐसी किसी भी प्रलय की आशंका से पहले
उनकी विचारधारा का, उनकी संस्कृति का 
उनके ग्रंथों का, उनके पुस्तकालयों का खात्मा ज़रूरी है।
उनका खात्मा ज़रूरी है।
हमारे अलावा, हमारे जैसों के अलावा हर किसी का 
खात्मा बहुत ज़रूरी है।
उसके बाद बस हम रहेंगे
सबसे अच्छे
इसलिये
सब अच्छा होगा
बहुत अच्छा होगा।
क्योंकि हम अच्छे हैं
हम सबसे अच्छे हैं
हमारे माता-पिता, भाई-भतीजे, नाते-रिश्तेदार, 
सब अच्छे हैं।
***

विश्व काव्य दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 
World Poetry Day was established by the United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO) during its 30th General Conference in Paris in 1999. It is celebrated on March 21st.

Tuesday, June 13, 2023

बेगाने इस शहर में

(अनुराग शर्मा)

बाग़-बगीचे, ताल-तलैया
लहड़ू, इक्का, नाव ले गये

घर, आंगन, ओसारे सारे
खेत, चौपालें, गाँव ले गये

कुत्ते, घोड़ा, गाय, बकरियाँ
पीपल, बरगद छाँव ले गये

रोटी छीनी, पानी लीला
भेजा, हाथ और पाँव ले गये

चौक-चौक वे भीख मांगते
जिनकी कुटिया, ठाँव ले गये

Tuesday, May 23, 2023

बीती को बिसार के...

(अनुराग शर्मा)

कुछ अहसान जताते बीती
और कुछ हमें सताते बीती

चाह रही फूलों की लेकिन
किस्मत दंश चुभाते बीती

जिन साँपों ने डसा निरंतर
उनको दूध पिलाते बीती

आस निरास की पींगें लेती
उम्र यूँ धोखे खाते बीती

खुल के बात नहीं हो पाई
ज़िंदगी भेद छुपाते बीती

जिनको याद कभी न आये
उनकी याद दिलाते बीती॥

Saturday, July 9, 2022

काव्य: भाव-बेभाव

(अनुराग शर्मा)

प्रेम तुम समझे नहीं, तो हम बताते भी तो क्या
थे रक़ीबों से घिरे तुम, हम बुलाते भी तो क्या 

वस्ल के क़िस्से ही सारे, नींद अपनी ले गये
विरह के सपने तुम्हारे, फिर डराते भी तो क्या

जो कहा, या जैसा समझा, वह कभी तुम थे नहीं
नक़्शा-ए-बुत-ए-काफ़िर, हम बनाते भी तो क्या

भावनाओं के भँवर में, हम फँसे, तुम तीर पर
बिक गये बेभाव जो, क़ीमत चुकाते भी तो क्या

अनुराग है तुमने कहा, पर प्रीत दिल में थी नहीं
हम किसी अहसान की, बोली लगाते भी तो क्या

Tuesday, June 21, 2022

महाकवियों के बीच हम


हे खुले केश वाली तरुणी क्यूँ दिखती हो यूँ उदास प्रिये
आके छत पे तुम बैठ गयीं 
क्यूँ छोड़ के सारी आस प्रिये

इस छत पर है दीवार नहीं पर निष्ठुर यह संसार नहीं
मुस्कान तुम्हारी 
लाखों की,  हो चिंता से दो-चार नहीं

यदि केश तुम्हारे सूख गये तो चलो कलेवा कर लो तुम
शुभ दिन की शुरुआत करो मत बैठो ऐसे यूँ गुमसुम

(ए आई विस्तार, अंत में) 

***

एक मित्र ने वाट्सऐप पर निम्न टिप्पणी भेजी तो उपर्युक्त पंक्तियाँ स्वतः फूट पड़ीं

एक नवयुवती जब छज्जे पर बैठी  है। केश खुले हुए हैं और चेहरे को देखकर लगता है कि वह उदास है। उसकी मुख मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है। विभिन्न कवियों से अगर इस पर लिखने को कहा जाता तो वो कैसे लिखते...

😀😀😀😀😀😀😀😀😀

मैथिली शरण गुप्त

अट्टालिका पर एक रमणी अनमनी सी है अहो 
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो ? 
धीरज धरो संसार में, किसके नहीं है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।😀


काका हाथरसी

गोरी बैठी छत पर, कूदन को तैयार 
नीचे पक्का फर्श है, भली करे करतार 
भली करे करतार, न दे दे कोई धक्का 
ऊपर मोटी नार, नीचे पतरे कक्का 
कह काका कविराय, अरी मत आगे बढ़ना 
उधर कूदना मेरे ऊपर मत गिर पड़ना।😊


गुलजार

वो बरसों पुरानी इमारत 
शायद 
आज कुछ गुफ्तगू करना चाहती थी 
कई सदियों से 
उसकी छत से कोई कूदा नहीं था।
और आज 
उस 
तंग हालात 
परेशां
स्याह आँखों वाली 
उस लड़की ने
इमारत के सफ़े 
जैसे खोल ही दिए
आज फिर कुछ बात होगी 
सुना है इमारत खुश बहुत है...😀


हरिवंश राय बच्चन

किस उलझन से क्षुब्ध आज 
निश्चय यह तुमने कर डाला
घर चौखट को छोड़ त्याग
चढ़ बैठी तुम चौथा माला
अभी समय है, जीवन सुरभित
पान करो इस का बाला
ऐसे कूद के मरने पर तो
नहीं मिलेगी मधुशाला 😊


प्रसून जोशी

जिंदगी को तोड़ कर 
मरोड़ कर 
गुल्लकों को फोड़ कर 
क्या हुआ जो जा रही हो 
सोहबतों को छोड़ कर 😄


रहीम

रहिमन कभउँ न फांदिये, छत ऊपर दीवार 
हल छूटे जो जन गिरि, फूटै और कपार 😀


तुलसी

छत चढ़ नारी उदासी कोप व्रत धारी 
कूद ना जा री दुखीयारी
सैन्य समेत अबहिन आवत होइहैं रघुरारी 😟


कबीर

कबीरा देखि दुःख आपने, कूदिंह छत से नार 
तापे संकट ना कटे , खुले नरक का द्वार'' 😃


श्याम नारायण पांडे

ओ घमंड मंडिनी, अखंड खंड मंडिनी 
वीरता विमंडिनी, प्रचंड चंड चंडिनी 
सिंहनी की ठान से, आन बान शान से 
मान से, गुमान से, मत गिरो मकान से 
तुम डगर पे मत गिरो, तुम नगर पे मत गिरो
तुम कहीं अगर गिरो, शत्रु पर मगर गिरो।😃


गोपाल दास नीरज

हो न उदास रूपसी, तू मुस्काती जा
मौत में भी जिन्दगी के कुछ फूल खिलाती जा
जाना तो हर एक को है, एक दिन जहान से
जाते जाते मेरा, एक गीत गुनगुनाती जा 😀


राम कुमार वर्मा

हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाट मत जोहो।
जानता हूँ इस जगत का
खो चुकि हो चाव अब तुम
और चढ़ के छत पे भरसक
खा चुकि हो ताव अब तुम
उसके उर के भार को समझो।
जीवन के उपहार को तुम ज़ाया ना खोहो,
हे सुन्दरी तुम मृत्यु की यूँ बाँट मत जोहो।😀


हनी सिंह

कूद जा डार्लिंग क्या रखा है 
जिंजर चाय बनाने में 
यो यो की तो सीडी बज री 
डिस्को में हरयाणे में 
रोना धोना बंद कर
कर ले डांस हनी के गाने में 
रॉक एंड रोल करेंगे कुड़िये 
फार्म हाउस के तहखाने में..

😄😄😄😄😄😄😄😄😄

5 मिनट के बाद वह उठी और बोली, "चलो बाल तो सूख गए अब चल के नाश्ता कर लेती हूँ।"

🙏 हिन्दी प्रेमियों के लिए 🙏

🌸ऐसा आनंद किसी दूसरी भाषा में संभव नहीं है🌸
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ए आई विस्तार
छोड़ो उलझनें नारी तू खुशियों का गीत गाओ दिल से मिटा दो सब गम हंसते गीत सुनाओ रात का चाँद है साथी सितारे आसमान में खूबसूरत तुम्हारी मुस्कान प्यारी है गुज़रे पल हैं अनमोल हवा भी कहती है कुछ तो जिंदगी में रंग भरो रोज नया सूरज निकलेगा मुस्कान से दिन को संजो उठो ताजगी से दिन शुरू हर सुबह को सलाम करो हर धड़कन को पहचानो जिंदगी को गुलज़ार करो

Saturday, July 31, 2021

काव्य: वफ़ा

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

वफ़ा ज्यूँ हमने निभायी, कोई निभाये क्यूँ
किसी के ताने पे दुनिया को छोड़ जाये क्यूँ॥

कराह आह-ओ-फ़ुग़ाँ न कभी जो सुन पाया
ग़रज़ पे अपनी वो फिर-फिर हमें बुलाये क्यूँ॥

सही-ग़लत की हमें है तमीज़ जानेमन
न करें क्या, या करें क्या, कोई बताये क्यूँ॥

झुलस रहा है बदन, पर दिमाग़ ठंडा है
जो आग दिल में लगी हमनवा बुझाये क्यूँ॥

थे हमसफ़र तो बात और हुआ करती थी
वो दिल्लगी से हमें अब भला सताये क्यूँ॥

जो बार-बार हमें छोड़ बिछड़ जाते थे 
वो बार-बार मेरे दर पे अब भी आयें क्यूँ॥

वफ़ा ज्यूँ हमने निभायी, कोई निभाये क्यूँ
किसी के ताने पे दुनिया को छोड़ जाये क्यूँ॥
***

Sunday, July 18, 2021

एकाकी कोना

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

मन में इक सूना कोना है
जिसमें छिप-छिपके रोना है
अपनी पीर सम्भालो आप ही
कहके किससे क्या होना है॥

गलियों-गलियों फिरता मारा
रात विवश और दिन बेचारा
जागृत मनवा चैन न पाता
भाग्य में अपने कब सोना है॥

ग़र्द-गुबार और छींटें गंदी
इधर-उधर से हम पर पड़तीं
दुनिया धोने निकले थे अब 
तन-मन अपना ही धोना है॥ 

सीमित रिश्ते सतही नाते
खुद से बाहर सोच न पाते
जीते जी जिससे भी मिल लो
शव अपना खुद ही ढोना है॥

सुख आभासी दुःख आभासी
जीवन माया, या बस छाया
जो भी मिला इसी जीवन का
अपना क्या था जो खोना है॥