विद्वान भी होंगे कहीं,
हम भला कैसे कहें कि
मौन का आधार क्या है।
प्रश्न जब कोई उठे और
उत्तरों की प्यास हो,
दो तटों को जोड़ दे
उस सेतु की ही आस हो।
कोरियन के प्रश्न का,
उत्तर जापानी में मिले,
राह छूटे समझ की जब,
संवाद का आकार क्या है?
जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।
रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?
चुप्पी ही उत्तर है क्या,
या बस उपेक्षा भाव है?
या अहंता से जन्मता
भीतरी कोई घाव है?
प्रश्न को समझे नहीं,
या वक्त माँगा जा रहा,
मौन के इस व्यूह का
सत्य और आगार क्या है?
संवाद ही तो ज़िंदगी का
सहज-सच्चा रूप है,
मौन जब छाया न दे तो
काटती वह धूप है।
जो शब्द की हत्या करे
और अर्थ को ही मेट दे,
उस मौन से बेहतर तो फिर
स्पष्ट एक इनकार है!
हम भला कैसे कहें
क्या मौन ही आधार है?

सुंदर
ReplyDeleteभीतर का मौन ही आधार है, बाहर तो संवाद ही घटता है, ध्यान की गहराई में वह मौन मिलता है, जहाँ सारे प्रश्न खो जाते हैं, जब तक दूसरा है तब तक शब्दों का ही सहारा लेना पड़ता है। हर पीड़ा अहंकार से उपजती है और ध्यान में अहंकार गिर जाता है
ReplyDeleteभावपूर्ण लाज़वाब सृजन सर।
ReplyDeleteसादर।
मौन का आधार 'भीतरी परिपक्वता' और 'परिस्थितियों की समझ' है—चाहे वह आत्म-शांति के लिए चुना गया विवेक हो, या किसी स्थिति के विरुद्ध संचित किया जा रहा आक्रोश।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आपका हार्दिक आभार!
Deleteव्वाहहहह
ReplyDeleteसादर
वंदन
बहुत सुंदर
ReplyDeleteसुंदर रचना
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