Saturday, March 30, 2024

हमसे छिपाते हैं (हिंदी ग़ज़ल)

अनुराग शर्मा

अनुराग शर्मा


दुनिया को जताते हैं, पर हमसे छिपाते हैं
इल्ज़ाम-ए-तोताचश्मी हमपर ही लगाते हैं।

आती हवा का झोंका, उन्हें छूके हमको छू ले
वो इतने भर से हम पर अहसान जताते हैं।

सारा जहाँ हमारा, है जिनका सबसे वादा 
बन ईद का वो चंदा बस मुझको सताते हैं।

पुल सबके लिए बनते दीवार मेरी जानिब 
दिल मेरा सरे बाज़ार, क्यूँ इतना दुखाते हैं।

मेरे लिये वो मोती, हम उनके लिये मिट्टी 
उनके लिये ही अपना, हम भाव गिराते हैं।

फिर भी कहीं कभी जो, अटकेगा काम कोई 
दम घुटने लगे मेरा, प्यार इतना लुटाते हैं।

चाहें तो अभी ले लें, चाहें तो बख्श दें सर
यह जान जिनपे हाज़िर, वो जान न पाते हैं॥

9 comments:

  1. इतना भाव भी ना गिराएं कि खान्ग्रेस हो जाएँ :) | सुन्दर |

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    1. परम भावहीन स्थिति में ऐसा स्वत: हो जाता है कि -
      वे भाव खाते हैं, हम भाव गिराते हैं
      ***
      अनुराग है उसने कहा, पर प्रीत दिल में थी नहीं
      हम किसी अहसान की, बोली लगाते भी तो क्या

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" सोमवार 01 अप्रैल 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

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  3. कभी दम घुटने तक प्यार जताया भी तो है
    हक़ है उन्हें कि अपनी क़ीमत बढ़ाये जायें

    मतलबी है यह दुनिया वह इसी दुनिया के हैं
    न उतरे चाँद से न आकाश पर बिठाया जाए

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  4. मेरे लिये वो मोती, हम उनके लिये मिट्टी
    उनके लिये ही अपना, हम भाव गिराते हैं।
    बड़े सुंदर भाव हैं !

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  5. बहुत सुन्दर

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मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।