Saturday, July 9, 2022

काव्य: भाव-बेभाव

(अनुराग शर्मा)

प्रेम तुम समझे नहीं, फिर, हम बताते भी तो क्या
थे रक़ीबों से घिरे तुम, हम बुलाते भी तो क्या 

वस्ल के क़िस्से ही सारे, नींद अपनी ले गये
विरह के सपने तुम्हारे, अब डराते भी तो क्या

जो कहा, या जैसा समझा, वह कभी तुम थे नहीं
नक़्शा-ए-बुत-ए-काफ़िर, हम बनाते भी तो क्या

भावनाओं के भँवर में, हम फँसे, तुम तीर पर
बिक गये बेभाव जो, क़ीमत चुकाते भी तो क्या

अनुराग है तुमने कहा, पर प्रेम दिल में था नहीं
हम किसी अहसान की, बोली लगाते भी तो क्या

5 comments:

  1. Waah kya baat hai
    Bahut badhiya

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  2. अति सुंदर

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  3. विराग ना राग रहे
    अनुराग बहे भीतर,
    प्रमाद पिघल जाये
    बस जाग रहे भीतर !
    कोमल भावों से सजी बेहतरीन ग़ज़ल,

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  4. बहुत सुन्दर

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