Sunday, April 21, 2013

नकद धर्म - स्वामी रामतीर्थ के शब्दों में

इंडिया बनाम भारत जैसी गरमागरम बहसों के बीच एक भारतीय धार्मिक विचारक के एक शताब्दी से अधिक पुराने शब्दों पर एक नज़र
यह कथन असंगत है कि अमेरिकावासी डालर (लक्ष्मी) के दास हैं। सच तो यह है कि लक्ष्मी स्वयं सरस्वती के पीछे लगी रहती है। जो लोग यह आरोप मढ़ते हैं कि अमेरिकनों का धर्म नक़द धर्म नहीं वरन नक़दी धर्म है, वे या तो अमरीका की सही स्थिति का ज्ञान नहीं रखते अथवा वे घोर अन्यायी हैं, और ‘अंगूर न मिलें तो खट्टे’ वाली कहावत उन पर चरितार्थ होती है।
कैलीफोर्निया में एक नारी ने अठारह करोड़ रुपया अर्पित कर एक विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसी प्रकार उस देश में विद्या की उन्नति और प्रसार के लिये प्रतिवर्ष करोड़ों का दान दिया जाता है। भारत की ब्रह्मविद्या की वहाँ कदर इसी से प्रकट है, कि जैसा ‘व्यावहारिक वेदांत’ अमेरिका में इस समय व्यवहृत हो रहा है। वैसा भारत में आज नहीं है। उन लोगों ने यद्यपि भारत के वेदांत को अपने में पचा लिया है और मनसा कर्मणा गृहण कर लिया है, फिर भी वे हिन्दू नहीं बन गये हैं।

वैसे ही हम भी उनके ज्ञान कला कौशल को अपने में पचा लेने पर भी अपनी राष्ट्रीयता को कायम रख सकते हैं। वृक्ष बाहर से खाद संग्रह करते हैं, स्वयं खाद नहीं बन जाते। बाहर की मिट्टी, जल वायु प्रकाश आदि ग्रहण करती और अपने में पचा लेती है, किन्तु वह स्वयं जल, वायु और प्रकाश नहीं हो जाती।

जापानियों ने अमेरिका और योरोप के विज्ञानशास्त्र और नाना कला कौशल को अपने में पचा लिया, फिर भी जापानी ही बने रहे। देवों ने अपने यहाँ से कुछ को असुरों के पास भेजकर उनकी जीवन तुल्य संजीवनी विद्या, सीख ली, परंतु वे असुर नहीं हो गये। इसी प्रकार तुम लोग भी अमेरिका, यूरोप आदि जाकर वहाँ से ज्ञान विज्ञान कला कौशल प्राप्त करो और इससे तुम्हारे धर्म और राष्ट्रीयता में धब्बा न आयेगा। जो लोग विद्या और ज्ञान, को भौगोलिक सीमा में परिसीमित करते हैं, जिनका कथन है, कि विदेशियों का ज्ञान हमारे यहां आने से अधर्म होगा और हम अपने ज्ञान को स्वदेश की सीमा से बाहर दूसरों के कल्याण के लिये क्यों जाने दें, और इस प्रकार जो लोग अपना ज्ञान पराया ज्ञान कहकर ज्ञान में विभाजन करते हैं, वे अपने ज्ञान को अज्ञान में बदलते हैं

इस कमरे में प्रकाश फैला है। यह प्रकाश अत्यंत लुभावना और सुहावना है ! यदि हम कहें कि यह प्रकाश हमारा है, एकमात्र हमारा है, हाय, यह कहीं बाहर के प्रकाश से मिलकर अपवित्र न हो जाय; और इस भय से हम अपने प्रकाश को सुरक्षित रखने के लिये, कमरे की खिड़कियाँ रौशनदान कपाट सब बंद कर दें; चिकें, परदे गिरा दें, तो परिणाम यह होगा कि वह स्वयं प्रकाश ही लुप्त हो जायगा। नहीं-नहीं कस्तूरी के समान काला नितांत अंधकार छा जायगा। हाय, हम लोगों ने भारत में इस भ्रान्तिमूलक धारणा और चलन को क्या अपना लिया।
हब्बुलवतन अज मुल्के सुलेमाँ खुश्तर।
खारे-वतन अज संबुले-रेहाँ खुश्तर।। 
इसे भूलकर स्वयं काँटा बन जाना और स्वदेश को काँटों का वन बना देना, यह कैसी देशभक्ति है? साधारण तौर पर एक ही प्रकार के वृक्ष जब गुन्जान समूहों में इकट्ठा उगते हैं, तो सब कमजोर रहते हैं। इनमें से किसी को उस झुण्ड से अलग ले जाकर कहीं बो दें तो वही बढ़कर बड़ा और अति पुष्ट हो जाता है। यही स्थिति राष्ट्रों और जातियों की है। कश्मीर के संबंध में कहा जाता है-
गर फिरदौस ब-रु-ए ज़मींनस्त, हमींनस्त हमींनस्त हमींनस्त!!
किन्तु यही कश्मीरी लोग, जो अपने स्वर्ग अर्थात् कश्मीर से बाहर निकलना पाप समझते हैं, अपनी कमजोरी नादानी और गरीबी लिये प्रख्यात हैं। और वह पुरुषार्थी कश्मीरी पण्डित जो उस फिरदौस से बाहर निकलकर आये, उन्होंने अन्य भारतवासियों को हर बात में मात कर दिया। वे सब ऊँचे-ऊँचे ओहदों पर विराजमान हैं। जापानी जब तक जापान में बन्द रहे, वे कमजोर और पस्त रहे। जब वे विदेशों को जाने लगे, वहाँ की हवा लगी, वे सशक्त हो गये। योरोप के गरीब धनहीन और प्रायः निम्न स्तर के लोग जहाजों पर सवार होकर अमरीका जा बसे और आज उनकी जमात संसार की सबसे शक्तिशाली कौम है। कुछ भारत वासियों ने भी विदेश का मुँह देखा। जब तक स्वदेश में रहे उनकी कोई पूछ-गछ न थी। विदेशों में गये तो उन उन्नत कौमों में प्रथम श्रेणी के समझे गये और उन्होंने ख्याति प्राप्त की।
पानी न बहे तो उसमें बू आये, खञ्जर न चले तो मोरचा खाये।
गर्दिश से बढ़ा लिहर व मह का पाया, गर्दिश से फ़लक ने औज़ पाया।
वृक्ष सारी रुकावटों को काटकर अपनी जड़ों को वहाँ प्रविष्ट कर देते हैं जहाँ जल प्राप्त हो। इसी प्रकार अमेरिका, जर्मनी, जापान, इँगलैण्ड के लोग सागरों को चीरकर, पर्वतों को काटकर धन खर्च करके, सभी प्रकार की विपत्तियों और कष्टों को झेलकर वहाँ-वहाँ पहुँचे, जहाँ से उन्हें कम या ज्यादा, किसी भी प्रकार का ज्ञान हो सका। यह तो है एक कारण उनकी उन्नति का।
(~ स्वामी रामतीर्थ)

Wednesday, April 17, 2013

किसी की जान जाये, शर्म हमको मगर नहीं आती

घर दिल्ली की पश्चिमी सीमा पर  बहादुरगढ़ के पास और दफ्तर यमुना के पूर्व में उत्तर प्रदेश के अंदर। जीवन की पहली नौकरी, सीखने के लिए रोज़ एक नई बात। सुबह सात बजे घर से निकलने पर भी यह तय नहीं होता था कि दस बजे अपनी सीट पर पहुंचूंगा कि नहीं। मो सम जी वाली किस्मत भी नहीं कि सफर ताश खेलते हुए कट जाये। अव्वल तो किसी भी बस में सीट नहीं मिलती थी। कुछ बसें तो ऐसी भी थीं जिनमें से ज़िंदा बाहर आना भी भाग्य की बात थी। तय किया कि घर से सुबह छः बजे निकल लिया जाये।

दक्षिण भारतीय बैंक था सो कर्मचारी वर्ग उत्तर का और अधिकारी वर्ग दक्षिण का होता था। संस्कृति का अंतर भी स्पष्ट दिखता था। अधिकारी वर्ग के लोग झिझकते हुए हल्की आवाज़ में बात करने वाले, विनम्र, कामकाजी और धार्मिक से लगते थे। कर्मचारी  वर्ग के अधिकांश लोग - सब नहीं - वैसे थे जिन्हें हिन्दी में "लाउड" कहा जा सकता है। शाखा के वरिष्ठ प्रबन्धक एक अपवाद थे। दूध सा गोरा रंग, छोटा कद, हल्के बाल, पंजाबी भाषी। पहले दिन ही लंबा-चौड़ा इंटरव्यू कर डाला। छिपे शब्दों में नई नौकरी के खतरों से आगाह भी कर दिया। उसके बाद तो सुबह को रोजाना ही कुछ देर बात करने का नियम सा हो गया क्योंकि हम दो लोग ही सबसे पहले आते थे। पौने दस बजे अपनी घड़ी सामने रखकर हर आने वाले कर्मचारी को देखकर फिर अपनी घड़ी देखने वाले व्यक्ति ने जब मुझे यह सुझाया कि इतना जल्दी आने की ज़रूरत नहीं है तो कइयों को  झटका लगा।

तय यह हुआ कि मैं घर से यदि सात बजे निकलूँ तो नोएडा मोड़ पर लगभग उसी  समय पहुंचूंगा जब बड़े साहब की कार पहुँचती है। वहाँ से आगे बस और रिक्शे के झंझट से बचने भर से ही मेरी 40-45 मिनट की बचत हो जाएगी। फिर तो यह रोज़ का नियम हो गया। बड़े साहब के साथ छोटे साहब यानी शाखा प्रबन्धक जी भी आते थे। बैंक की अधिकारी परंपरा के वाहक, विनम्र, नफीस, टाल, डार्क, हैंडसम। शाखा में बड़ी इज्ज़त थी उनकी। कर्मचारी ही नहीं, ग्राहक भी सम्मान करते थे।  

बड़े साहब से पहचान बढ़ती गई मगर प्रबन्धक जी ने  "बेबी ऑफ द ब्रांच" की उपाधि देकर भी पद की गरिमा का सम्मान रखते हुए संवाद सीमित ही रखा। मेरे जॉइन करने के कुछ ही हफ्तों में दो-चार रिलीविंग पार्टियां हो गईं। बड़े साहब ने जहां हिन्दी और पंजाबी गीत सुनाये, प्रबन्धक जी ने मातृभाषा न होते हुए भी नफासत से भरी गज़लें सुनाकर शाखा भर को प्रभावित कर लिया। 

उस दिन जब हम तीनों कार में बातें करते आ रहे थे बड़े साहब बिना किसी संदर्भ के बोले, "लोग यह कैसे भूल जाते हैं कि उनके साथ भी यह हो सकता है।" जब तक मैं कुछ समझ पाता, बैंक की सफ़ेद अंबेसडर कार सड़क के बीच डिवाइडर के पास वहाँ खड़ी थी जहां एक स्कूटर पड़ा हुआ था। उसका चालक डिवाइडर पर चित्त बेहोश पड़ा था। सर फटा हुआ था पर खून जम चुका था। सर पर आर्टिफेक्ट की तरह रखा हुआ बिना फीतों का हैलमेट कुछ दूर पड़ा था। कोई बेहया वाहन उसे टक्कर मारकर मरने के लिए छोड़ गया था। दिल्ली-नोएडा मार्ग, थोक में आते जाते वाहन। किसी ने भी उसे न देखा हो, यह सोचना तुच्छ कोटि की मासूमियत होती। मैंने और बड़े साहब ने मिलकर उसका त्वरित निरीक्षण किया और जैसा कि स्वाभाविक था उसे कार की पिछली सीट पर बिठा दिया। 

इस सारी प्रक्रिया में ऐसे बहुत से व्यवसायियों की गाडियाँ वहाँ से गुज़रीं जो बैंक में रोजाना आते तो थे ही, हमारी एक नज़र पर अपनी दुनिया कुर्बान कर देने की बात करते थे। फिलहाल वे सभी हमारी नज़र से बचने की पूरी कोशिश में थे। दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को कार में सुरक्षित करने के बाद जब मैंने इधर-उधर देखा तो पाया कि हमारे रुकते ही सड़क पार करके फुटपाथ पर चले जाने वाले नफीस प्रबन्धक जी शाखा के समय से खुलने की ज़िम्मेदारी के चलते एक पार्टी के वाहन में शाखा की ओर चले गए थे। हमारे वहाँ से चलने से पहले ही एक पुलिस कार आकर उस व्यक्ति को अस्पताल ले गई। एक अन्य पुलिस वाहन ने रुककर हमसे कुछ सवाल-जवाब किए और नाम-पता लेकर वे भी चले गए। भला हो मोटरसाइकिल से गुजरने वाले उस लड़के का जो हमें देखकर पास के बीट-बॉक्स में पुलिस को सूचना देने चला गया था।     

हम तो जी उन बड़े साहब के वो मुरीद हुए कि आज तक हैं। रास्ते में बड़े साहब ने यह आशंका भी व्यक्त की कि दुर्घटनाग्रस्त को बचाने में खतरा तभी है जब उसकी जान बच न पाये। तब से अब तक काफी कुछ बदला है। दूसरों को बचाने वालों पर छाया संशय का खतरा टला है। क़ानूनों में ज़रूरी परिवर्तन हुए हैं ताकि लोग सड़क पर मरतों को बचाने में न डरें। फिर भी जयपुर की हाल की घटना यही बता रही है कि इंसान बनने में अभी भी काफी दिक्कतें हैं। एक माँ बेटी की जान सिर्फ इसलिए चली गई कि सड़क से गुजरे अनेक लोगों में से किसी के सीने में भी दिल नहीं धड़का। 27 साल पहले कही उनकी बात आज भी वैसी ही कानों में गूंज रही है,  "लोग यह कैसे भूल जाते हैं कि उनके साथ भी यह हो सकता है।"       
   

Friday, April 5, 2013

माल असबाब की सुरक्षा - हार की जीत

अमेरिका के एक हवाई अड्डे से बाहर आकर जब पार्किंग तक जाने के लिए शटल बस में बैठा तो मेरे साथ कई अन्य लोग भी चढ़े। बूढ़े हों या जवान, सीट लेने से पहले सबने अपनी भारी-भारी अटैचियों को सामान के लिए बनी जगह में करीने से लगाया। चालक भी सबके बैठने तक रुका रहा। अगले टर्मिनल पर फिर वही सब दोहराया गया। इस बार एक व्यक्ति के पास दो भारी सूटकेस सहित चार अदद थे। सामान की जगह खाली थी लेकिन उसकी नज़र सीट पर थीं। पीछे सीट भी खाली थीं मगर वहाँ तक कौन जाये सो वह सबसे आगे विकलांगों व बुज़ुर्गों के लिए छोड़ी सीट पर जम गया। चलने के लिए बनी थोड़ी सी जगह में अपनी अटैचियाँ और थैले भी अपने आस पास जमा लिए। उसके बाद हर टर्मिनल पर लोग उसके सामान से अपने घुटने टकराते हुए निकलते रहे मगर वह तसल्ली से अपने आइफोन पर संगीत सुनता रहा। न किसी अटकते हुए व्यक्ति ने उसे सामान रखने की जगह दिखाई और न ही उसने खुद तकलीफ की।

मुझे याद आया जब डीटीसी की बस में एक कंडक्टर ने किसी को अपनी अटैची पीछे रखने को कहा था और इस बात पर लंबी बहस चली जिसका निष्कर्ष यह निकाला कि सामान साथ न रखने पर उसके चोरी होने की आशंका बनी रहती है। मतलब यह कि जो आदमी दूसरों के लिए जितनी अधिक असुविधा पैदा कर सकता है उसका माल उतना ही सुरक्षित है। समाज जितना अधिक स्वार्थी और जंगली होगा, अपनी सुरक्षा और दूसरों की असुविधा का संबंध उतना ही गहरा होता जाएगा।

आज के भारत का हाल नहीं पता लेकिन हमारे जमाने में एक व्यापक जनधारणा यह थी कि निजी क्षेत्र की क्षमता सरकारी तंत्र से अधिक होते है। दिल्ली में निजी क्षेत्र की रेड/ब्लू लाइन के अत्याचार रोज़ सहने वाले भी बिजली, पानी की बात चलने पर छूटते ही कहते थे, "प्राइवेट कर दो, दो दिन में हालत बदल जाएगी।" सुना है अब सब प्राइवेट हो गया है और झुग्गी-झोंपड़ी वाले भी हजारों रुपये के बिल से त्रस्त हैं। सुनवाई के नाम पर बस एक ही कार्यवाही होती है, कनैक्शन काटने की। कुकुरमुत्ते की तरह उग आए प्राइवेट स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय तक नहीं हैं और जनसेवा के नाम पर करोड़ों की ज़मीन खैरात में पाने वाले फाइव-स्टार अस्पतालों में मुरदों को भी निचोड़ लेने की अफवाहें आती रहती हैं।

बदइंतजामी और भ्रष्टाचार के चलते जब एक निजी बैंक का दिवाला पिट गया तो उसके कर्मचारियों की नौकरी और जमकर्ताओं की पूंजी बचाने के लिए उसका शव एक सक्षम सरकारी बैंक की पीठ पर लाद दिया गया। हमारी शाखाओं का भाषाई संतुलन रातों-रात बदल गया। पाटना वापस पटना हो गया लेकिन बेचारे पद्मनाभन जी कुछ और बन गए। काम न जानने का आधार काम न करने का कारण बना और "सेवा के लिए विकास" की जगह "मैन्नू ते कुछ पता ई नई" बैंक का नया आदर्श वाक्य बनने के सपने देखने लगा। कुल मिलाकर मेरा अवलोकन यही था कि काम करने वालों से काम तो होता है लेकिन कभी-कभार गलती भी हो सकती है। लेकिन जिसने कभी कुछ किया ही नहीं, टोटल-मुफ्तखोरी की, उसकी कलम न कभी कोई कागज़ छूएगी, न कभी उनके हस्ताक्षर पकड़ में आएंगे। हारने दो उनको जो अपनी ज़िंदगी गुज़र देते हैं खून-पसीना बहाने में।

समाज में सब कुछ सही नहीं है, सब कुछ सही शायद कभी न हो। लेकिन इतना तय है कि बेहतरी की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है। जब तक गलत करने वालों को सज़ा और सही उदाहरण रखने वालों को उत्साह नहीं मिलेगा, "ज्योतिर्गमय" की आशा बेमतलब है। बुराई के साथ कोई रियायत नहीं, लेकिन यह सदा याद रहे कि भले लोगों से मतांतर होने पर भी सदुद्देश्य के मार्ग में हमें उनका हमसफर बने रहना है। बल्कि सच कहूं तो मतांतर वाले सज्जनों की सहयात्रा हमारी उन्नति के लिए एक अनिवार्य शर्त है क्योंकि वे हमें सत्य का वह पक्ष दिखते हैं जिसे देखने की हमें आदत नहीं होती। अच्छाई को रियायत दीजिये। मिल-बैठकर चिंतन कीजिये। एक दूसरे के सहयोगी बनिए। आँख मूंदकर चलना मूर्खों की पहचान है। इंसानी शक्ल वाली भेड़ों के लिए तो बहुत से वाद, मजहब और विचारधाराएँ दुनिया में थोक में मौजूद हैं। सभी रेंगने वालों को कौन उठा पाया है? लेकिन पर्वतारोहियों का हित इसी में है कि हिमालय का पतन न हो। एक दूसरे को छूट दीजिये, सहयोग कीजिये लेकिन आपके आसपास "क्या" हो रहा है के साथ "क्यों" हो रहा है पर भी पैनी नज़र रखिए।

दूध देने वाली गाय हो या जहर देने वाला नाग, स्वार्थी लोगों ने दोनों को दुहा है लेकिन हमारी विशालहृदया संस्कृति ने दोनों को ही आदर दिया है। समन्वय हमारी संस्कृति के मूल में है। अतिवाद थोपने वाली, लोगों को दीवारों में बांटने वाली, या भेद के आधार पर हिंसा लादने वाली विचारधाराएँ उत्तरी, पश्चिमी या पूर्वी सीमा से घुसपैठ करने की कितनी भी कोशिश करें, भारतीय संस्कृति कभी नहीं कहला सकतीं।