Friday, December 25, 2009

लेन देन - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

दीवारें मजदूरों की दर-खिड़की सारी सेठ ले गए।
सर बाजू सरदारों के निर्धन को खाली पेट दे गए।।

साम-दाम और दंड चलाके सौदागर जी भेद ले गए।
माल भर लिया गोदामों में रखवालों को गेट दे गए।।

मेरी मिल में काम मिलेगा कहके मेरा वोट ले गए।
गन्ना लेकर सस्ते में अब चीनी महंगे रेट दे गए।।

ठूँस-ठास के मन न भरा तो थैले में भरपेट ले गए।
चाट-चाट के चमकाने को अपनी जूठी प्लेट दे गए।।

अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।।

चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए।।

[आपको बड़े दिन, क्वांज़ा, हनूका, और नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!]

26 comments:

  1. अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
    रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।


    -बहुत उम्दा!! एकदम सटीक !!

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  2. बहुत ही सुंदर ओर सटीक लगी आप की यह कविता.
    धन्यवाद

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  3. प्यारी सी इस नज्म ने मन मोह लिया भाई
    बेहतरीन और सामयिक।

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  4. शोषण की सनातन गाथा को स्वर देती.रोज़ ठगे जाने की पीड़ा से निकली आवाज़.

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  5. "ठूंस-ठास के मन न भरा तो थैले में भरपेट ले गए।
    चाट-चाटके चमकाने को अपनी खाली प्लेट दे गए।।"

    हालात की तस्वीर है असली इस रचना में । बेहतरीन प्रविष्टि ।

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  6. चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
    हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए।।

    बहुत लाजवाब. एकदम सत्य.

    रामराम.

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  7. आज के हालात की अच्छी तफसीर पेश की है आपने -बहूत खूब !

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  8. बहुत बढ़िया!
    लोकोक्तियों और मुहावरों का सुन्दर प्रयोग किया है।

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  9. मेरी मिल में काम मिलेगा कहके मेरा वोट ले गए।
    गन्ना लेकर सस्ते में अब चीनी महंगे रेट दे गए।।

    बिल्कुल सटीक . सामयिक रचना

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  10. भैया! अमेरिका में हैं कि भारत में? दिव्य दृष्टि या गहन जुड़ाव?

    किस किस को कहूँ - डाहन मरे जा रहा हूँ!
    अधिक क्या कहूँ - इस एक पर मेरी सारी कविताएँ कुर्बान।

    सामान्यत: ऐसा कुछ दिखने पर मैं लम्बी चौड़ी हाँक देता हूँ लेकिन अर्थ सौन्दर्य, गुरुता, मार और प्रयोगों पर स्तब्ध हूँ - कुछ कहने लायक नहीं।

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  11. री मिल में काम मिलेगा कहके मेरा वोट ले गए।
    गन्ना लेकर सस्ते में अब चीनी महंगे रेट दे गए
    अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
    रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।
    वाह वाह बहुत सही और सटीक अभिव्यक्ति है । इस शानदार रचना के लिये बधाई

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  12. अरे अनुराग जी...वाह! वाह!!
    नहीं फिर से..वाह! वाह!!

    दिल से निकली हैं...लाजवाब लिखे हैं । खास कर इन दो पंक्तियों को तो संग लिये जा रहा हूं:-
    "चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
    हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए"

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  13. चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
    हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए।।

    वाह। सादी भाषा में 'व्‍यंजना' का आनन्‍द। साधुवाद।

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  14. chor uchchake jab jaha milte ek vahi ban jata dal/koi janta dal,koi bahujan dal,koi panja our kamal

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  15. jelo se nirvachit hote yaha kaisa kanoon/sabhya our sambhrant ho gaye kar-kar sou-sou khoon/

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  16. बहुत बेहतरीन..खासतौर पर

    अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
    रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।

    एक ग़ज़ल का शे’र याद आ गया--

    ऊँची ऊँची बिल्डिंगे बनीं
    लोग बेमक़ान हो गये॥॥।

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  17. साम-दाम और दंड चलाके सौदागर जी भेद ले गए।
    माल भर दिया गोदामों में रखवालों को गेट दे गए।।

    ये लाइन हिंदुस्तान में फैले करप्शन पर एकदम सटीक बैठती हैं...
    अनुराग जी आपका जवाब नहीं..

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  18. "ठूंस-ठास के मन न भरा तो थैले में भरपेट ले गए।
    चाट-चाटके चमकाने को अपनी खाली प्लेट दे गए।।"
    वर्तमान हालत को पेश करती एक यथार्थ वादी अभिव्यक्ति...........

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  19. ठूंस-ठास के मन न भरा तो थैले में भरपेट ले गए।
    चाट-चाटके चमकाने को अपनी जूठी प्लेट दे गए।।

    बहुत करारा व्यंग है ...... अच्छी रचना है .........सटीक और सार्थक ........

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  20. लेन देन के इस उपक्रम में, आये तो हम, लेट हो गये!

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  21. यथार्थ की व्यंगात्मक अभिव्यक्ति ...अतिसुन्दर.

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  22. अनुराग जी नमस्कार, सुन्दर बहुत खूब लिखा आपने मेरे ब्लाग पर आपका स्वागतहै। अंत महीने बचा रुपय्या जनसेवा के हेत ले गए।
    रक्त-सनी जिह्वा से बाबा शान्ति का उपदेश दे गए।।

    चिकनी-चुपड़ी बातें करके हमसे सारा देश ले गए।
    हाथी घोड़े प्यादे खाकर मंत्री जी चेक मेट दे गए।।

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