Thursday, May 6, 2010

असुर शब्द का अर्थ - देवासुर संग्राम २



असुराः तेन दैतेयाः सुराः तेन अदितेः सुताः।
हृष्टाः प्रमुदिताः च आसन् वारुणी ग्रहणात् सुराः॥

ऐसा पढने में आया कि समुद्र मंथन में पहली बार उत्पन्न हुई सुरा को स्वीकार करने के कारण देवता सुर कहलाये. आइये इस कथन पर एक बार पुनर्विचार करें. सुरा के जन्म (समुद्र मंथन) के समय सुर (देवता) पहले से स्थापित थे. इसलिए यह मानना कि सद्यजन्मा सुरा - जिसका पहले नाम ही नहीं था - उसे स्वीकार करने की वजह से देवताओं और असुरों की दोनों जातियों का ही नया नामकरण हो गया, कुछ जमता नहीं. वैसे भी उस समुद्र मंथन में एक नहीं चौदह रत्न निकले थे जिनमें से अधिकाँश सुरा से अधिक दुर्लभ और बहुमूल्य बल्कि अद्वितीय थे. उनके नाम पर कोई नामकरण क्यों नहीं हुआ?

इससे भी बड़ी बात यह है कि पहले संग्राम और बाद में समुद्र मंथन देवासुर के बीच ही हुआ था. मतलब कम से कम असुर शब्द पहले से मौजूद था. फिर सुर शब्द के असुर से व्युत्पन्न होने की संभावना है न कि सुरा से. यहाँ मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सुर सुरापान करते थे या नहीं. मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि उनका नाम समुद्र मंथन से पहले से ही सुर था. कम से कम असुर शब्द तो पहले ही से प्रचलन में था. सुर और असुर दोनों ही शब्द ऋग्वेद में बहुत शुरू में ही प्रयुक्त हुए हैं और प्राचीन हैं.

एक नज़र देखने पर ऐसा लग सकता है जैसे सुर से असुर की व्यत्पत्ति हुई हो जबकि तथ्य इसके उलट है. असुर शब्द प्राचीन है. बाद में अ-असुरों को सुर शब्द से नवाज़ा गया था. सुर वे हैं जो असुर नहीं हैं या अब असुर नहीं रहे. आम तौर पर यह शब्द देवताओं के लिए प्रयुक्त होता है और असुर दानवों के लिए परन्तु जहां आदित्य, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि शब्द जातिसूचक (tribe/race/region) हैं वहीं सुर, असुर, देव और ऋषि शब्द उपाधियों जैसे हैं. इसीलिये कुछ असुर भी देवता हैं और कुछ मानव भी. ठीक उसी तरह जैसे ऋषि ब्राह्मण भी हैं राजा भी हैं और नारद जैसे देवता भी.

ऊपर के श्लोक का अर्थ केवल इतना ही है कि वारुणि को सुरों ने ग्रहण किया।

असुर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है असु+र. यहाँ असु का अर्थ है द्रव शक्ति या शक्ति का रस. आसव, आसवन आदि सभी इसी के सम्बंधित शब्द हैं. "र" का अर्थ है स्वामी. अर्थात असुर वे हैं जो या तो शक्तिरस के स्वामी हैं या फिर द्रव, तरल या जल की शक्ति के स्वामी हैं.

पारसी आर्यों में परमेश्वर का नाम अहुर माजदा (असुर ?) है जिसके तीनों प्रमुख सहायक असुर ही हैं. इन तीनों असुरों में मित्र का नाम इसलिए उल्लेखनीय है कि उनकी पूजा भारत और ईरान से बाहर भी विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से होती रही है इसके अनेकों प्रमाण उत्खनन से मिले हैं. मित्र का ज़िक्र वेदों में भी है. तो क्या कुछ वैदिक ऋषि एक असुर के पूजक थे या फिर पारसियों ने भाषा की किसी गलती या भेद से असुर को सुर कहना शुरू किया, या फिर यह दोनों दल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से कुछ सुरासुर दोनों ही हैं? या फिर सुर, सुरा और संयुक्त समुद्र-मंथन अभियान का मतलब उससे विपरीत है हमें आधुनिक प्रगतिशील विद्वान वर्ग द्वारा समझाया जाता रहा है?

आइये अगली कड़ी में मित्र से इतर एक अन्य प्राचीन असुर से मिलकर देखें कि असुर आखिर किस शक्ति के स्वामि हैं और इस बारे में संस्कृत ग्रन्थ क्या कहते हैं. अन्य देवताओं इंद्र आदि के विपरीत उनकी पूजा आज भी होती है, वे अभी भी एक भारतीय समुदाय के अधिष्ठाता देवता हैं और असुर की पिछली परिभाषा (असु+र) पर आज भी खरे उतारते हैं. मेरे लिए वह एक वैदिक आश्चर्य है और शायद इस कन्फ्यूज़न को सुलझाने का एक सूत्र भी. क्या आप बता सकते हैं कि मैं किस असुर की बात कर रहा हूँ?

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Wednesday, May 5, 2010

सीरिया की शराब - देवासुर संग्राम 1


इस साल की शुरूआत होते-होते डॉ. अरविन्द मिश्रा ने जब सुर असुर का झमेला शुरू किया तब हमें खबर नहीं थी कि हम भी इसके लपेटे में आ जायेंगे. लेकिन हम भी क्या करें, दूर देश के झमेलों में टंगड़ी उड़ाने की आदत अभी गयी नहीं है पूरी तरह से. उस पर तुर्रा ये कि डॉ. साहब ने एक पोस्ट और लिखी थी जिसका हिसाब करना बहुत ज़रूरी था. इस आलेख का शीर्षक था - असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते!

जब अपने ही खाने में कोई रूचि न हो तो दूसरे लोग क्या खा पी रहे हैं इसमें हमें क्या रूचि हो सकती है फिर भी सुरापान की बात से लगा कि इस विषय पर रोशनी तो पड़नी ही चाहिए वरना कई भाई लोग अँधेरे का दुरुपयोग कर लेंगे. सो भैया वार्ता शुरू करते हैं दूर देश से जिसका नाम है सुरस्थान. इस राष्ट्र को विभिन्न कालों में लोगों ने अपने-अपने जुबानी आलस के हिसाब से अलग-अलग नामों से पुकारा है. इतिहासकारों के हिसाब से सुरस्थान के उत्तर में उनका पड़ोसी राष्ट्र था असुरस्थान. कभी यह द्विग्म सुरिस्तान-असुरिस्तान कहलाया तो कभी सीरिया-असीरिया. असीरिया के निवासी असीरियन, असुर या अशुर हुए और सुरिस्तान के निवासी विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हुए. जिनमें एक नाम सूरी भी था जिसका मिस्री भाषा में एक रूप हूरी भी हुआ. संस्कृत/असंस्कृत का स और ह का आपस में बदल जाना तो आपको याद ही होगा. तो हमारा अंदाज़ ऐसा है कि अरबी परम्पराओं की हूर का सम्बन्ध इंद्रलोक की अप्सराओं से है ज़रूर.

यह दोनों ही क्षेत्र प्राचीनतम मानव सभ्यताओं की जन्मस्थली कहे जाने वाले मेसोपोटामिया के निकट ही हैं. वही मेसोपोटामिया जहां कभी सुमेरियन सभ्यता खाई खेली. बल्कि फारसी भाषा के सुरिस्तान-असुरिस्तान तो ठीक वहीं हैं. क्या देवासुर संयुक्त समुद्र मंथन अभियान में सुमेरु पर्वत का प्रयुक्त होना कुछ अर्थ रखता है? अभी तो पता नहीं मगर आगे देखेंगे हम लोग. वैसे यवन लोग सुमेरु और असीरिया लगभग एक ही स्थान को कहते थे. सत्य जो भी हो परन्तु इन सभी स्थानों की भौगोलिक स्थितियों में काफी ओवरलैप तो है ही. हिब्रू भाषा में असुरिस्तान को अस्सुर और पहलवी में अथुर कहा गया है. बाद में अरबी में सीरिया को अल-शाम और असीरिया को अल-जज़ीरा कहा गया.

इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक खनन और खोजें हुई हैं जिनकी जानकारी इंटरनेट पर सर्वत्र उपलब्ध है. उदाहरण के लिए ढाई हज़ार साल पहले के असीरियन राजा असुर बनिपाल के बारे में जानकारी यहाँ विकिपीडिया पर है.

हम संस्कृत को देवभाषा कहते हैं. क्या होता अगर इसे सुरवाणी कहते? क्या सुरवाणी शब्द का तद्भव सुरयानी हो सकता है? अगर हो सकता है तो ध्यान रखिये कि असीरिया की भाषा को अरबी में सुरयानी कहते हैं. एक संभावना यह भी है कि निरंतर चलते देवासुर संग्राम के कारण इनकी सीमाएं गड्डमड्ड होती रही हों. यह तो था भारत से बाहर एक भौगोलिक दर्शन. अगले अंक में देखेंगे एक वैदिक आश्चर्य! तब तक के लिए आपकी ज्ञानपूर्ण टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा.

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