Saturday, February 12, 2011

याद तेरी आयी तो - कविता

(अनुराग शर्मा)


सुरमयी यादों की बात ही निराली है
भंडार है अनन्त जेब भले खाली है।

परदे के पीछे से झांक झांक जाती थी
हृदय में रहती वह षोडशी मतवाली है।

थामा था हाथ जो ओठों से चूमा था
रूमानी शाम थी आज भी हरियाली है।

याद तेरी आयी तो सहरा शीतल हुआ
चतुर्मास की सांझ घिरी घटा काली है।

दृष्टि क्षीण हो भले रजतमय केश हों
आज भी अधरों पे याद वही लाली है।

26 comments:

  1. बसंत का मौसम यादो का मौसम
    बहुत अच्छी कविता
    शुभकामनाये

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  2. आपकी कविता की बात ही निराली है।

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  3. श्रंगार पगी पंक्तियाँ।

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  4. han !aapki kavita vakai nirali hai ..

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  5. छा गये श्रीमान शर्मा जी..

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  6. सर जी, आपने मन के तार झंकृत कर दिए.

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  7. दृष्टि क्षीण हो भले रजतमय केश हों
    आज भी अधरों पे याद वही लाली है

    बहुत खूब...बड़ी ही प्यारी सी नज़्म है.

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  8. दृष्टि क्षीण हो भले रजतमय केश हों
    आज भी अधरों पे याद वही लाली है।

    Oh... क्या बात कही....
    प्रेम रस पगी मोहक अतिसुन्दर रचना...
    आनंद आ गया पढ़कर...

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  9. इस तरह के मामले मे,
    झोली अपनी खाली है।
    ------------------

    अंतिम पंक्तियों पर कभी पहले पड़ी दो लाईनें याद आ गईं, अनफ़िट लगे तो मत छापियेगा:)
    "हर मौसम में भले रहें,
    महबूबा के होंठ।
    हरे रहे अदरक रहे,
    सूख गये तो सोंठ॥"

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  10. दृष्टि क्षीण हो भले रजतमय केश हों
    आज भी अधरों पे याद वही लाली है।

    वाह...बेजोड़...
    नीरज

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  11. अति सुंदर शब्द विन्यास है, आनंद आया.

    रामराम.

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  12. क्या कहने अनुराग भाई आपका भी जवाब नहीं -फागुन आ गया !

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  13. शर्मा जी आपकी पिछली और वर्तमान कविता इतनी सहज और सरल हैं कि पाठक (और साथ में पाण्डेय ) को भी कविता रचने का जी कर जाता है.

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  14. बहुत प्यारी प्रेममयी पंक्तियाँ....

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  15. दृष्टि क्षीण हो भले , रजतमय केश हो ...
    मगर स्मृतियों में वही पल !
    सुन्दर !

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  16. बहुत अच्छी कविता,
    धन्यवाद.

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  17. बसंत इतना जोर मारेगा ये सोचा भी ना था :)

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  18. anurag ji , sunder bhav va praye ehsas .......man ko chhoo gaye.

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  19. अनुराग भाई!! ग़ज़ल के मक़्ते पर तो हम जब होंगे साठ साल के और तुम होगी पचपन की याद करा दिया!! और पहले के सारे अशार एक फ़्लैश बैक में ले गये!! अ जर्नी डाऊन द मेमोरी लेन!!

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  20. सुरमयी यादों की बात ही निराली है
    भंडार है अनन्त जेब भले खाली है।
    yade sada ke liye sir ji

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  21. थामा था हाथ जो ओठों से चूमा था
    रूमानी शाम थी आज भी हरियाली है
    ...वाह! बेहतरीन।

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