Monday, January 23, 2012

अकेला - कविता

(अनुराग शर्मा)

देखी ज़माने की यारी ...

कभी उसको नहीं समझा
कभी खुदको न पहचाना

दिया है दर्जा दुश्मन का
कभी भी दोस्त न माना

जो मेरे हो नहीं सकते
उन्हें दिल चाहे अपनाना

अकेला हो गया कितना
गये जब वे तो पहचाना

कठिन है ये कि छूटे सब
या के सब छोड़ के जाना?

45 comments:

  1. कभी उनने नहीं जाना,
    कभी खुद ने न पहचाना ,
    यही तो जिंदगी प्यारे,
    यही सबका है अफसाना !

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  2. कभी मुझको नहीं समझा
    कभी मुझको न पहचाना
    दिया दर्ज़ा जो दुश्मन का
    कभी भी दोस्त न माना

    जो मेरे हो नहीं सकते
    उन्हें दिल चाहे अपनाना
    अकेला हो गया कितना
    गये जब वे तो पहचाना

    कठिन है ये कि छूटे सब
    या के सब छोड़ के जाना?

    ....लागी नाहीं छूटे रामा, चाहे जीया जाये। काहे घबड़ाये, काहे घबड़ाये।

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  3. अकेला हो गया कितना
    गये जब वे तो पहचाना...

    रिश्तों की गहराई दूरियां समझाती है!

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  4. रिश्तों की गहराई को समझती सुन्दर कविता। धन्यवाद।

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  5. अकेले हैं तो क्या गम है..

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  6. कभी मुझको नहीं समझा
    कभी मुझको न पहचाना

    सरल सीधे शब्दों में बहुत कुछ कहती गज़ल ... रिश्तों को खंगालती गज़ल ...

    एक शेर और जोड़ रहा हूँ इसमें ...
    बहुत मुश्किल है बच्चों को
    ज़रा सी बात समझाना ...

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  7. सब छोड़ के जाना ,पर मन कहाँ माना ..?

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  8. कहाँ सम्भव है जीवन में, यूँ एकान्त हो जाना,
    हम भी नहीं सुनते, न हमसे मन कभी माना,

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  9. बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता !

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  10. जो मेरे हो नहीं सकते
    उन्हें दिल चाहे अपनाना

    यही तो प्रॉब्लम है .

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  11. सादगी और अर्थों की गहराई एक साथ!! रिश्तों को डिफाइन करती सुन्दर रचना!!

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  12. मौत का एक दिन मुअइन है... रात भर फिर नींद क्यों नहीं आती?

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  13. दिया दर्जा जो दुश्मन का
    सही था या गलत जाना

    खुदा था वो रकीबों का
    तभी काफ़िर मुझे जाना

    मुहब्बत ऐब थी मुझमें
    यही था उसका पैमाना

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  14. पढ़ी मासूम पंक्तियाँ मैने सुबह इस्पात नगरी में
    समझा गीत है यह तो! अभी देखा गज़ल निकला।

    कली को लाख कोसे पर अलि रहता फिदा उसपर
    करे गुनगुन मस्ती में समझो इक गज़ल निकला।

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  15. रिश्तों में दूरियां...हमें बताती हैं कि वो हमारे लिए क्या हैं।

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  16. दूर होकर ही नजदीकी के महत्व का ज्ञान हो पता है.

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  17. अकेला हो गया कितना
    गये जब वे तो पहचाना...
    अक्सर ऐसा होता है..... कम शब्दों में गहरी बात

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    गणतन्त्रदिवस की पूर्ववेला पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  19. @
    जो मेरे हो नहीं सकते
    उन्हें दिल चाहे अपनाना

    प्यार की जीत भी , हर जगह संभव नहीं सकती ....कुछ कसक रह ही जाती हैं !
    शुभकामनायें आपको !

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  20. ये कैसी बाते कर रहे हैं इन दिनों!

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    1. कविता बरसों पुरानी है जनाब!

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  21. छूटता तो नहीं है, छोड़ कर ही जाना है .... | हाँ कोई इक्के दुक्के गौतम या महावीर ऐसे भी होते हैं - जिनका छूट भी जाता है | बाकी हम सब साधारण लोगों को तो, छोड़ कर ही जाना है |

    "कभी मुझको नहीं समझा
    कभी मुझको न पहचाना"

    यही होता रहा है, हो रहा है, होगा |

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    1. न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
      यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
      (श्रीमद्भग्वद्गीता 18-11)

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    2. सत्य वचन ....

      अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फ़लम् |
      भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥

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    3. हाँ ! बिलकुल यही बात मेरे भी मन में आयी ....चाहते नहीं हैं पर अंततः सब कुछ छूट ही जाता है .....

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  22. जो मेरे हो नहीं सकते
    उन्हें दिल चाहे अपनाना

    अकेला हो गया कितना
    गये जब वे तो पहचाना

    कठिन है ये कि छूटे सब
    या के सब छोड़ के जाना?

    शब्द,दिल को अन्दर तक छूं गए ! शानदार अनुराग जी !

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    1. जो मेरे हो नहीं सकते
      उन्हें दिल चाहे अपनाना.very nice.

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  23. Replies
    1. वह वीडियो तो डिलीट हो चुका है, एक प्रति इधर भी है: http://www.youtube.com/watch?v=W_H3jOcJOfQ

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  24. जो उपलब्ध है उसमें आसक्ति नहीं हो पाती ...जो अनुपलब्ध है मन उसके लिए ही तड़पता रहता है ...पर जब उपलब्ध वाला भी नहीं रहता तब उसके महत्त्व का पता चलता है बन्धु !

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  25. अकेला हो गया कितना
    गये जब वे तो पहचाना\वाह बहुत सुन्दर कविय्ता बधाई आपको।

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  26. चकाचक बयानबाजी! :)

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  27. आज ब्लॉग पे आने से कम से कम ये तो हुआ न की दो खूबसूरत कविता पढ़ने को मिली..अंतर्मन और अकेला :)

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  28. बहुत खूब...
    सुन्दर रचनाओं का संग्रह है आपका ब्लॉग..

    बधाई.

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    1. कठिन है ये कि छूटे सब
      या के सब छोड़ के जाना?

      सुन्दर....

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