Thursday, July 3, 2014

आस्तीन का दोस्ताना - कविता


फूल के बदले चली खूब दुनाली यारों, 
बात बढ़ती ही गई जितनी संभाली यारों

दूध नागों को यहाँ मुफ्त मिला करता है, 
पीती है मीरा यहाँ विष की पियाली यारों

बीन हम सब ने वहाँ खूब बजा डाली थी, 
भैंस वो करती रही जम के जुगाली यारों 

दिल शहंशाह का अपना ये भुलावा ही रहा, 
जेब सदियों से रही अपनी भी खाली यारों

ज़िंदगी साँपों की आसान करी है हमने, 
दोस्ती अपनी ही आस्तीन में पाली यारों

30 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 05 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  2. "दूध नागों को यहाँ मुफ्त मिला करता है,
    पीती है मीरा यहाँ विष की पियाली यारों"
    आत्मा रो रही है! सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  3. mada aaya to bol.............."haan".........


    pranam.

    ReplyDelete
  4. दूध नागों को यहाँ मुफ्त मिला करता है,
    पीती है मीरा यहाँ विष की पियाली यारों
    बहुत खूब कहा है ये शेर, बहुत सुन्दर सभी अर्थपूर्ण पंक्तियाँ !

    ReplyDelete
  5. दयानिधि बरेली सेJuly 4, 2014 at 5:49 AM

    बिलकुल सही, आस्तीन भी हमारी और साँप भी।

    ReplyDelete
  6. जिन्दगी ऐसी ही है जैसी अब दिखती है...

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-07-2014) को "बरसो रे मेघा बरसो" {चर्चामंच - 1665} पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  8. ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, स्वामी विवेकानंद जी की ११२ वीं पुण्यतिथि , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  9. आपने जीवन को जीवंत कर दिया

    ReplyDelete
  10. ये तो विष से भी कड़वा सच बयान कर दिया आपने.. एक एक शेर सवा सेर और सन्देश सीधा निशाने पर!!

    ReplyDelete
  11. Pahla sher padhte hi zahan mein Kargil ki durghatana aa gayi..!
    Sabhi umda ashaar...

    ReplyDelete
  12. बहुत ही सशक्त और सटीक.

    रामराम.

    ReplyDelete
  13. बढ़िया ग़ज़ल

    ReplyDelete
  14. बीन हम सब ने वहाँ खूब बजा डाली थी,
    भैंस वो करती रही जम के जुगाली यारों

    यहां यही तो होता है। जानबूझ कर भैंस के सामने ही बीन बजायी जाती है। बेचारी भैंस सांपों को पिलाने के लिए दूध भी देती है, कसूरवार भी रहती है।

    ReplyDelete
  15. सशक्त और सटीक हर शेर वज़नदार है.

    ReplyDelete
  16. सशक्त और सटीक कटु सत्य......

    ReplyDelete
  17. बेहतरीन प्रस्तुति

    ReplyDelete
  18. ज़िंदगी साँपों की आसान करी है हमने,
    दोस्ती अपनी ही आस्तीन में पाली यारों
    - अच्छा परिभाषित किया है !

    ReplyDelete
  19. दिल शहंशाह का अपना ये भुलावा ही रहा,
    जेब सदियों से रही अपनी भी खाली यारों ..
    बात तो दिल की ही होती है ... जेब का भरा होना अपने हाथ में नहीं होता ... अच्छे शेर ...

    ReplyDelete
  20. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - ७ . ७ . २०१४ को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

    ReplyDelete
  21. ज़िंदगी साँपों की आसान करी है हमने,
    दोस्ती अपनी ही आस्तीन में पाली यारों

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति |
    नई रचना उम्मीदों की डोली !

    ReplyDelete
  22. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  23. दिल शहंशाह का अपना ये भुलावा ही रहा,
    जेब सदियों से रही अपनी भी खाली यारों
    बहुत उम्दा

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।