Tuesday, May 5, 2015

सांप्रदायिक सद्भाव

(लघुकथा व चित्र: अनुराग शर्मा)
जब मुसलमानों ने मकबूल की जमीन हथियाकर उस पर मस्जिद बनाई तो हिंदुओं के एक दल ने मुकुल की जमीन पर मठ बना दिया। मुकुल और मकबूल गाँव के अलग-अलग कोनों में उदास बैठे हैं। लेकिन इस बार गाँव में शांति है क्योंकि कोई यह नहीं कह सकता कि हिंदुओं ने मुसलमान या मुसलमानों ने हिन्दू को सताया है।

9 comments:

  1. खुदा और भगवान भी अलग अलग कोने देख रहे हैं ।

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  2. लोग इंसानियत को भूल गए हैं. इससे वोट नहीं मिलते इसीलिए संप्रदाय ज्यादा महत्व रखता है. खास तौर पर तब जब मजहब मिलते हैं या टकराते हैं. ताकि भुनाए जा सकें.

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  3. इन्सानियत ही जीवन जीने का सही आधार है हर धर्म मे इन्सानियत को हिइ तर्जीह दी गयी है1

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  4. बड़ी मुश्किल है - उकसाने का मौका भी तो हो !

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  5. मुकुल मकबूल एक और एक ग्यारा बन जाते तो शायद कुछ हल निकाल भी लेते ...
    पर ऐसा होता कहाँ है ...

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  6. शीर्षक भी कमाल का दिया है आपने आदरणीय।
    ऐसा सम्प्रददायिक सद्भाव सदियों से चला आ रहा है और न जाने कब तक चलेगा।
    सिर्फ चार लाइनों में ही मन को झखझोर देने वाली बात लिख दी है आपने।

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  7. सही लिखा है आपने

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  8. ऐसे साम्प्रदायिक सद्भाव को धिक्कारा ही जा सकता है।

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  9. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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