Thursday, May 8, 2014

कहाँ गई - कविता

(अनुराग शर्मा)

कभी गाड़ी नदी में, कभी नाव सड़क पर - पित्स्बर्ग का एक दृश्य
यह सच नहीं है कि
कविता गुम हो गई है
कविता आज भी
लिखी जाती है
पढ़ी जाती है
वाहवाही भी पाती है
लेकिन तभी जब वह
चपा चपा चरखा चलाती है

कविता आज केवल
दिल बहलाती है
अगर महंगी कलम से
लिखी जाये तो
दौड़ा दौड़ा भगाती है
थोड़ा-थोड़ा मंगाती है
नफासत की चाशनी में थोड़ी
रूमानियत भी बिखराती है

कविता आजकल
दिल की बात नहीं कहती
क्योंकि तब मित्र मंडली
बुरा मनाती है
इसलिए कविता अब
दिल न जलाकर
जिगर से बीड़ी जलाती है

कविता सक्षम होती थी
गिरे को उठा सकती थी
अब इतिहास हुई जाती है
इब्नबबूता से शर्माती है
बगल में जूता दबाती है
छइयाँ-छइयाँ चलाती है
व्यवसाय जैसे ही सही
अब भी लिखी जाती है


कविता की चिंता छोडकर सुनिए मनोरंजन कर से मुक्त बाल-फिल्म किताब का यह मास्टरपीस

25 comments:

  1. फिर भी बिकी तो नहीं
    शायद खरीदी भी
    नहीं जाती है कविता ।

    बहुत खूब :)

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  2. आज का कमेण्ट कोट में:
    "कविता मेरे लिये रिक्त घट को भर देने वाला जल है, ज़मीन फोड़कर निकला हुआ अंकुर है, अन्धेरे कमरे में जलता हुआ दिया है, बेरोज़गार के लिये रोज़गार है या कि बेघर भटकते मन मन का एकमात्र ऐसा आश्रय है जहाँ बैठकर कुछ राहत मिल जाती है!
    ...
    मेरे अनुभूतियाँ कविता की ममतामयी गोद में बैठकर रचना की संज्ञा पा लेती हैं!!"

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  3. ☆★☆★☆



    व्यवसाय जैसे ही सही
    अब भी लिखी जाती है
    कविता !
    हां ! स्थिति निराशाजनक है अवश्य...

    आपने जिस बानगी को इंगित किया वैसी कविता फायदों वाले हर ठिकाने पर उपस्थित है...
    लेकिन, श्रेष्ठ काव्य-सृजन आज भी विपुल मात्रा में हो रहा है निःसंदेह !

    मंचीय काव्य जितना उभरा है वहां गुणवत्ता का भारी ह्रास अवश्य चिंता का कारण है ।

    बहरहाल आदरणीय अनुराग शर्मा जी
    सुंदर कविता के बहाने कविता पर कुछ कहने का अवसर देने के लिए हृदय से साधुवाद स्वीकार करें ।
    :)

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  4. bahut pasand aayi ye kavita ki andaj.........dhanyvaad

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  5. कविता पर विचारणीय काव्य रचना

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (09-05-2014) को "गिरती गरिमा की राजनीति" (चर्चा मंच-1607) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी।

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  7. जो वाकई सच्ची 'कविता' होती है वह शायद औरों की प्रशंसा की आकांक्षी नहीं होती ! एक अत्यंत निजी अनुभूति होती है ! वह व्यवसाय तो नहीं हो सकती ! आपकी रचना सोचने के लिये प्रेरित करती है ! आभार !

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  8. "केवल पुरानी कविताएँ चाहते हैं दोस्त"-- रामधारी सिंह 'दिनकर'

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  9. सुंदर कविता..धन्नो की आँखों की तरह..

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  10. ये सही है कि
    समयानुकूल हो गयी है
    आज की कविता
    लेकिन मेरे लिये
    आज भी
    जीवन की रिक्त पाटीपर
    इंद्रधनुषी रंग भरने
    जब तब चली आती है
    मेरी कविता ।
    जब मन पर
    छायी हो उदासी
    डराती मुझको
    मेरी ही तनहाई
    तब शब्दगंधा -सी
    मुझको बहलाने
    चली आती है
    मेरी कविता ...

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  11. कविता आज केवल
    दिल बहलाती है
    अगर महंगी कलम से
    लिखी जाये तो
    दौड़ा दौड़ा भगाती है
    थोड़ा-थोड़ा मंगाती है
    नफासत की चाशनी में थोड़ी
    रूमानियत भी बिखराती है

    यह पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर
    सार्थक लगी !

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  12. युग बदलते हैं इंसान और उसका स्वभाव बदलता है , उसी लय में कविता का रूप आकार स्वभाव भी बदलता है जैसे आपकी कविता की सादगी मोह रही है तो उस का विरक्त भाव व्याकुल कर रहा है।

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  13. कविता आज केवल
    दिल बहलाती है
    अगर महंगी कलम से
    लिखी जाये तो
    दौड़ा दौड़ा भगाती है
    थोड़ा-थोड़ा मंगाती है
    नफासत की चाशनी में थोड़ी
    रूमानियत भी बिखराती है

    शानदार रचना...

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  14. जीवन के साथ लगी है -उसी की अनुहार पर ढलती है - कहीं भी हो मन को विश्राम दे ही जाती है कविता !

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  15. यह क्या कम है कि आज भी लिखी जाती है कविता। कुछ बेचने खरीदने के लिये पर कुछ दिल के अहसासों के लिये।

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  16. लिखी जाती है आज कविता अर्थ की मांग पर
    मगर याद रहती है सदियों बीत जाने पर वही
    जो लिखी जाती है दिल की पुकार पर !!

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  17. जैसी ही है .. सदियों से है और सदियों तक रहेगी कविता फिर भी ...
    दिल के अरमान नहीं निकले तो जीने का बहाना नहीं मिलता ... सांस तक कविता है ...

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  18. आज की कविता जैसी भी हो पर किसी-किसी के लिए अस्तित्व है वो.. किसी भी बाजार से अनजान सी..

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  19. खरी बात खरी कविता कहती है

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  20. बिल्कुल मोती के मनकों सरीखे शब्द पिरोये हैं इस रचना में आपने, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  21. लीजिये गुलजार साहब नें आपकी कविता उत्तर दे दिया। पूरा इंटरव्यू और विडियो इस लिंक पर है:
    http://www.hindustantimes.com/entertainment/bollywood/i-don-t-listen-to-sad-songs-gulzar/article1-1218468.aspx
    Q: You must be the only one who has not faced criticism for ­offensive lyrics. Did you ever fear your songs being called item numbers?
    A: Logon ko kehte suna hai ki Gulzar ne yeh gaana likha hai toh aap kuch bol nahi rahe, par kisi aur ne likha hota toh mitti kharab kar dete. There is a reason behind those lyrics. Film ke gaane ko isolation mein rakh kar mat dekhiye ­kyonki who film aur uski script aur characters ke liye likhey jaate hai. This is the case with Beedi Jalaile Le (Omkara, 2000). Wahan pe cigarette jalaile nahi banta. Is tune par mera gaana gora rang le le nahi fit hoga. Time period, as well as sense of humour has changed. Today’s ­generation is more ­independent. Pehle khusar pusar zyaada thi. This ­generation is much more honest and transparent. ..
    SMS aur Facebook ke zamaane mein dakiya daak laya nahi likh sakta, yeh mein jaanta hoon.

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    1. शुक्रिया गुप्ता जी। अभी वीडियो का दर्शन करता हूँ। जितना अपने लिखा उससे तो यही लगता है कि शायरे-अज़ीम को समझ नहीं आया कि सवाल हुक्के, बीड़ी या सिगरेट में से एक का चुनाव करने से कहीं आगे का है।

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  22. थोड़ा-थोड़ा मंगाती है
    नफासत की चाशनी में थोड़ी
    रूमानियत भी बिखराती है

    यह पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर

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