(अनुराग शर्मा)
सत्य नहीं कड़वा होता
कड़वी होती है कड़वाहट
पराजय की आशंका और
अनिष्ट की अकुलाहट
सत्यासत्य नहीं दिखता
हावी हो जाती घबराहट
कड़वाहट तो दूर भागती
सुनकर सत्य की इक आहट
सत्य नहीं दुख देता है
दुख देती अपनी चाहत
टूटन से हम रो पड़ते
मन मिलने पर होती राहत
सत्य नहीं भारी होता
भारी होती अपनी आदत
ढोती रहती है जड़ता जो
लाती दूरी, करती आहत।
सत्य है। कड़वा है नहीं कह सकते हैं :)
ReplyDeleteकम शब्दों में गहरी बात।
ReplyDeleteमुझे बेहद खुशी होगी अगर आप मेरे ब्लॉग पर आएंगे तो।
आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन फाउंटेन पैन का शौक और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...
ReplyDeleteसत्यमेव जयते, सही और सीधी बात..जो कड़वी लगती है वह सत्य नहीं उससे होने वाली घबराहट ही होती है..
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-03-2019) को "रिश्वत के दूत" (चर्चा अंक-3276) पर भी होगी।
ReplyDelete--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सटीक रचना
ReplyDeleteसत्य बयान किया है इस सत्य की अभिव्यक्ति में ...
ReplyDeleteसातीक सार्थक रचना ...
satyavachan kahe aapne. me aapki es abiyakti se sehmat hoon.
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