Sunday, February 7, 2021

कविता: निर्वाण

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)


अंधकार से प्रकट हुए हैं
अंधकार में खो जायेंगे

बिखरे मोती रंग-बिरंगे
इक माला में पो जायेंगे

इतने दिन से जगे हुए हम
थक कर यूँ ही सो जायेंगे

देख हमें जो हँसते हैं वे
हमें न पाकर रो जायेंगे

रहे अधूरे-आधे अब तक
इक दिन पूरे हो जायेंगे॥

16 comments:

  1. अंधकार से प्रकट हुए हैं
    अंधकार में खो जायेंगे

    बिखरे मोती रंग-बिरंगे
    इक माला में पो जायेंगे

    आध्यात्मिक रंग से सराबोर बेहतरीन कविता.... साधुवाद 🙏

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  2. सही है, जीवन का आरम्भ अंधकार से होता है और अंत भी, 'पूरे हो जाने' का सुंदर प्रयोग ! कविता और चित्र का आपसी संबन्ध कुछ स्पष्ट नहीं हुआ, वैसे चित्र अच्छा है

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-02-2021) को "बढ़ो प्रणय की राह"  (चर्चा अंक- 3973)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  4. शाश्वत दर्शन।
    सुंदर सृजन।

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  5. अति सुन्दर जीवन-सार ।

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  6. बहुत सुन्दर कविता है। लेकिन साथ में दिए इस चित्र की क्या कहानी है? :)

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  7. धन और मान का गरब न कीजो
    एक दिन यह सब खो जाएँगे!
    फिर कोंपल बनकर निकलेंगे
    इस मिट्टी में बो जाएँगे!!

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  8. आपने बहुत ही शानदार पोस्ट लिखी है. इस पोस्ट के लिए Ankit Badigar की तरफ से धन्यवाद.

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