Friday, April 16, 2021

प्रेम के हैं रूप कितने (अनुराग शर्मा)

तोड़ता भी, जोड़ता भी, मोड़ता भी प्रेम है,
मेल को है आतुर और छोड़ता भी प्रेम है॥

एकल वार्ता और काव्यपाठ, साढ़े सात मिनट की ऑडियो क्लिप
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काव्य तरंग || असीम विस्तार



8 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-04-2021) को चर्चा मंच   "ककड़ी खाने को करता मन"  (चर्चा अंक-4040)  पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
    --

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  3. वाह ! एक से बढ़कर एक पंक्तियाँ, हर कोई उस पार जाना चाहता है !

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  4. veerujan.blogspot.com

    प्रेम के हैं रूप कितने (अनुराग शर्मा)


    तोड़ता भी, जोड़ता भी, मोड़ता भी प्रेम है,
    मेल को है आतुर और छोड़ता भी प्रेम है॥
    एक नदी के दो किनारे लोग ना खुश ,
    हर कोई उस पार जाना चाहता है।
    दुश्मनों का प्यार पाना चाहता है ,
    हाथ पे सरसों उगाना चाहता है।
    कौन जाने फिर मनाने आ ही जाओ ,
    दिल हमारा रूठ जाना चाहता है।
    पूरा ग़ज़ल कुञ्ज है यह एकल रचना ,चर्चा मंच की ग़ज़लों का तेवर देखते ही बनता है।

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