Wednesday, December 9, 2009

भय - एक कविता

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बच रहा था आप सबसे

कल तलक सहमा हुआ

अब बड़ा महफूज़ हूँ मैं

कब्र में आने के बाद


मौत का अब डर भी यारों

हो गया काफूर है

ज़िंदगी की बात ही क्या

ज़िंदगी जाने के बाद

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Friday, November 27, 2009

कुछ पल - टाइम मशीन में

बड़े भाई से लम्बी बातचीत करने के बाद काफी देर तक छोटे भाई से भी फ़ोन पर बात हुई। ये  दोनों भाई जम्मू में हमारे मकान मालिक के बेटे हैं। इन्टरनेट पर मेरे बचपन के बारे में एक आलेख पढ़कर बड़े भाई ने ईमेल से संपर्क किया, फ़ोन नंबर का आदान-प्रदान हुआ और आज उनतालीस साल (39) बाद हम लोग फिर से एक दूसरे से मुखातिब हुए। इत्तेफाक से इसी हफ्ते उसी शहर के एक सहपाठी से भी पैंतीस साल बाद बात हुई। उस बातचीत में थोड़ी निराशा हुई क्योंकि सहपाठी ठीक से पहचान भी नहीं सका।  लेकिन इन भाइयों की याददाश्त और उत्साह ने निराशा के उस अंश को पूरी तरह से धो डाला।

जम्मू के गरनों का स्वाद अभी भी याद है
फ़ोन रखकर हम लोग अपना सामान कार में सेट किया और निकल पड़े धन्यवाद दिवस (Thanksgiving Day) की अपनी 600 मील लम्बी यात्रा पर। पिट्सबर्ग के पहाड़ी परिदृश्य अक्सर ही जम्मू में बिताये मेरे बचपन की याद दिलाते हैं। जगमगाते जुगनुओं से लेकर हरे-भरे खड्डों तक सब कुछ वैसा ही है। आगे चल रही वैन का नंबर है JKT 3646। जम्मू में होने का अहसास और वास्तविक लगने लगता है। गति सीमा 70 मील है मगर अधिक चौकसी और भीड़ के कारण कोई भी गाड़ी 80 से ऊपर नहीं चल रही है। जहाँ तहाँ किसी न किसी वाहन को सड़क किनारे रोके हुए लाल-नीली बत्ती चमकाती पुलिस दिख रही है। वाजिब है, धन्यवाद दिवस की लम्बी छुट्टी अमेरिका का सबसे लंबा सप्ताहांत होता है। इस समय सड़क परिवहन भी अपने चरम पर होता है और दुर्घटनाएँ भी खूब होती हैं। जम्मू की यह गाडी तेज़ लेन में होकर भी सुस्त है, रास्ता नहीं दे रही है। मुझे दिल्ली के अपने बारह साल पुराने शांत मित्र फक्कड़ साहब याद आते हैं। यातायात की परवाह न करके वे अपने बजाज पर खरामा-खरामा सफ़र करते थे। मगर रहते थे हमेशा सड़क के तेज़ दायें सिरे पर। हमेशा पीछे से ठोंके जाते थे।

आधा मार्ग बीतने पर एक जगह रुककर हमने रात्रि भोजन कर लिया है। भोजन की खुमारी भी छाने लगी है। घर से निकलने में देर हो गयी थी मगर मैं अभी भी चुस्त हूँ और एक ही सिटिंग में सफ़र पूरा कर सकता हूँ। पत्नी को बैठे -बैठे बेचैनी होने लगी है सो रुकने को कहती हैं। होटल के स्वागत पर बैठी महिला दो बार अलग अलग तरह से पूछती है कि मैं डॉक्टर तो नहीं। जब उसे पक्का यकीन हो जाता है कि मैं नहीं हूँ तो झेंपती सी कहती है कि कई भारतीय लोग डॉक्टर होते हैं और अगर वह रसीद में उनके नाम से पहले यह विशेषण न लिखे तो वे खफा हो जाते हैं, बस इसलिए मुझसे पूछा। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं अगर डॉक्टर होता तो भी ध्यान नहीं देता मगर कह नहीं पाता क्योंकि कोई कान में चीखता है, "तभी तो हो नहीं।" देखता हूँ तो पचीस साल पुराने सहकर्मी जनरंजन सरकार मुस्कराते हैं। जब भी मैं किसी परिवर्तन का ज़िक्र करता था, वे कहते थे कि यह काम नेताओं और अफसरों का है इसलिए कभी नहीं होगा। मैं कहता था कि यदि मैं नेता और अफसर होता तो ज़रूर करता। और जवाब में वे कहते थे, "इसीलिए तो तुम दोनों में से कुछ भी नहीं हो।" मेरे कुछ भी न होने की बात सही थी इसलिए उनसे कुछ कह नहीं सका हाँ एक बार इतना ज़रूर कहा कि वे अगर अपने बेटे का नाम भारत रखें तो भारत सरकार पर बेहतर नियंत्रण रख सकेंगे।

होटलकर्मी अगली सुबह के मुफ्त नाश्ते का समय बताने लगती है और मैं पच्चीस साल पुराने भारत सरकार के समय से निकलकर 2009 में आ जाता हूँ।

Sunday, November 8, 2009

सर्वे भवन्तु सुखिनः

नौ नवम्बर १९८९ - आज से बीस साल पहले घटी इस घटना ने साम्यवाद, कम्युनिज्म, मर्क्सिज्म और तानाशाही आदि टूटे वादों की कब्र में आखिरी कील सी ठोक दी थी. जब जर्मनी के नागरिकों ने साम्यवाद के दमन की प्रतीक बर्लिन की दीवार को तोड़कर साम्यवादियों के चंगुल को पूर्णतया नकार दिया था तब से आज तक की दुनिया बहुत बदल चुकी है. ऐसा नहीं कि बर्लिन की दीवार टूटने से सारी दुनिया में बन्दूक्वाद और तानाशाही का सफाया हो गया हो. ऐसा भी नहीं है कि इससे दुनिया की गरीबी या बीमारी जैसी समस्यायें समाप्त हो गयी हों. क्यूबा के नागरिक आज भी कम्युनिस्ट प्रशासन में भयंकर गरीबी में जीने को अभिशप्त हैं. तिब्बत के बौद्ध हों, चीन के वीघर((Uyghur: ئۇيغۇر) मुसलमान हों या पाकिस्तानी सिख, इंसानियत का एक बहुत बड़ा भाग आज भी अत्याचारी तानाशाहों के खूनी पंजों तले कुचला जा रहा है .


बर्लिन दीवार का पतन


जजिया और दमन के शिकार पाकिस्तान के सिख


माओवादियों के सताए वीघर मुसलमान