Thursday, May 23, 2013

सच्चे फांसी चढ़दे वेक्खे - कहानी

दुकानदार - इस राजनेता की आत्मकथा में 25% सच है और 25% झूठ ...
ग्राहक - और बाकी 50 प्रतिशत?
दुकानदार - जी, 50% की छूट 
बैंक में हड़बड़ी मची हुई थी। संसद में सवाल उठ गए थे। मामा-भांजावाद के जमाने में नेताओं पर आरोप लगाना तो कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार आरोप ऐसे वित्तमंत्री पर लगा था जो अपनी शफ़्फाक वेषभूषा के कारण मिस्टर "आलमोस्ट" क्लीन कहलाता था। आलमोस्ट शब्द कुछ मतकटे पत्रकारों ने जोड़ा था जिनकी छुट्टी के निर्देश उनके अखबार के मालिकों को पहुँच चुके थे। बाकी सारा देश मिस्टर शफ़्फाक की सुपर रिन सफेदी की चमकार बचाने में जुट गया था।

सरकारी बैंक था सो सामाजिक बैंकिंग की ज़िम्मेदारी में गर्दन तक डूबा हुआ था। सरकारी महकमों और प्रसिद्धि को आतुर राजनेताओं द्वारा जल्दबाज़ी में बनाई गई किस्म-किस्म की अधकचरी योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी ऐसे बैंकों पर ही थी। एक रहस्य की बात बताऊँ, चुनावों के नतीजे उम्मीदवार के बाहुबल, सांप्रदायिक भावना-भड़काव, पार्टी की दारू-पत्ती वितरण क्षमता के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर करते थे कि इलाके की बैंक शाखा ने कितने छुटभइयों को खुश किया है।

पैसे बांटने की नीति सरकारी अधिकारी और नेता बनाते थे लेकिन उसे वापस वसूलने की ज़िम्मेदारी तो बैंक के शाखा स्तर के कर्मचारियों (भारतीय बैंकिंग की भाषा के विपरीत इस कथा में "कर्मचारी" शब्द में अधिकारी भी शामिल हैं) के सिर पर टूटती थी। पुराने वित्तमंत्री आस्तिक थे सो जब कोई त्योहार आता था, अपने लगाए लोन-मेले में अपनी पार्टी और अपनी जाति के अमीरों में बांटे गए पैसे को लोन-माफी-मेला लगाकर वापसी की परेशानी से मुक्त करा देते थे। लेकिन "आस्तिक" दिखना नए मंत्री जी के गतिमान व्यक्तित्व और शफ़्फाक वेषभूषा के विपरीत था। उनके मंत्रित्व कल में बैंक-कर्मियों की मुसीबतें कई गुना बढ़ गईं क्योंकि नए लोन-मेलों के बाद की नियमित लोन-माफी की घोषणा होना बंद हो गया। बेचारे बैंककर्मियों को इतनी तनख्वाह भी नहीं मिलती थी कि चन्दा करके देश के ऋण-धनी उद्योगपतियों के कर्जे खुद ही चुका दें।

बैंकर दुखी थे। मामला गड़बड़ था। वित्तमंत्री ने न जाने किस धुन में आकर सरकारी बैंकों  की घाटे में जाने की प्रवृत्ति पर एक धांसू बयान दिया था और लगातार हो रहे घाटे पर कड़ाई से पेश आने की घोषणा कर डाली। जोश में उन्होने घाटे वाले खाते बंद करने पर बैंकरों को पुरस्कृत करने की स्कीम भी घोषित कर दी। इधर नेता का मुस्कराता हुआ चेहरा टीवी पर दिखा और उधर कुछ सरफिरे पत्रकारों की टोली ने बैंक का पैसा डकारकर कान में तेल डालकर सो जाने वाले उस नगरसेठ के उन दो खातों की जानकारी अपने अखबार में छाप दी जो संयोग से नेताजी का मौसेरा भाई होता था।

विदेश में अर्थशास्त्र पढे मंत्री जी को बैंकों के घाटे के कारणों जैसे कि बैंकों की सामाजिक-ज़िम्मेदारी, उन पर लादी गई सरकारी योजनाओं की अपरिपक्वता, नेताओं और शाखाओं की अधिकता, स्टाफ और संसाधनों की कमी, क़ानूनों की ढिलाई और बहुबलियों का दबदबा आदि के बारे में जानकारी तो रही होगी लेकिन शायद उन्हें अपने भाई भतीजों के स्थानीय अखबारों पर असर की कमी के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी। अखबार का मामला सुलट तो गया लेकिन साढ़े चार  साल से हाशिये पर बैठे विपक्ष के हाथ ऐसा ब्रह्मास्त्र लग गया जिसका फूटना ज़रूरी था।
 
संसद में प्रश्न उठा। सरकारी अमला हरकत में आ गया। पत्रकारों की नौकरी चली गई। एक के अध्यापक पिता नगर पालिका के प्राइमरी स्कूल में गबन करने के आरोप में स्थानीय चौकी में धर लिए गए। दूसरे की पत्नी पर अज्ञात गुंडों ने तेज़ाब फेंक दिया। नेताजी के भाई ने उसी अखबार में अपने देशप्रेम और वित्तीय प्रतिबद्धता के बारे में पूरे पेज का विज्ञापन एक हफ्ते तक 50% छूट पर छपवाया।

बैंक के ऊपर भाईसाहब के घाटे में गए दोनों ऋणों को तीन दिन में बंद करने का आदेश आ गया। जब बैंक-प्रमुख की झाड़ फोन के कान से टपकी तो शाखा प्रमुख अपने केबिन में सावधान मुद्रा में खड़े होकर रोने लगे। उसी वक़्त प्रभु जी प्रकट हुए। बेशकीमती सूट में अंदर आए भाईसाहब के साथ आए सभी लोग महंगी वेषभूषा में थे। उनके दल के पीछे एक और दल था जो इस बैंक के कर्मियों जैसा ही सहमा और थका-हारा दीख रहा था।

डील तय हो चुकी थी। भाईसाहब ने एक खाता तो मूल-सूद-जुर्माना-हर्जाना मिलाकर फुल पेमेंट करके ऑन द स्पॉट ही बंद करा दिया। इस मेहरबानी के बदले में बैंक ने उनका दूसरा खाता बैंक प्रमुख और वित्त मंत्रालय प्रमुख के मूक समझौते के अनुसार सरकारी बट्टे-खाते में डालकर माफ करने की ज़िम्मेदारी निभाई। शाखा-प्रमुख को बैंक के दो बड़े नॉन-परफोरमिंग असेट्स के कुशल प्रबंधन के बदले में प्रोन्नति का उपहार मिला और अन्य कर्मियों को मंत्रालय की ताज़ा मॉरल-बूस्टर योजना के तहत सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी नकद पुरस्कार। मौसेरे भाई के तथाकथित अनियमितताओं वाले दोनों खातों के बंद हो जाने के बाद मंत्री जी ने भरी संसद में सिर उठाकर बयान देते हुए विपक्ष को निरुत्तर कर दिया।

एक मिनट, इस कहानी का सबसे प्रमुख भाग तो छूट ही गया। दरअसल एक और व्यक्ति को भी प्रोन्नति पुरस्कार मिला। भाईसाहब के साथ बैंक में पहुंचे थके-हारे दल का प्रमुख नगर के ही एक दूसरे सरकारी बैंक का शाखा-प्रमुख था। उसे नगर में उद्योग-विकास के लिए ऋण शिरोमणि का पुरस्कार मिला। भाई साहब के बंद हुए खाते का पूरा भुगतान करने के लिए उसकी शाखा ने ही उन्हें एक नया लोन दिया था।
[समाप्त]

21 comments:

  1. कहानी सच्ची और व्यापक लग रही है ...

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  2. उन दिनों को याद कर मन खट्टा हो गया. बडी मुसीबत में हम भी रहे हैं. बेंकों की तो बडी बुरी हालत रही.

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  3. इस कथा-कहानी के किस्सा में चोर और जीवन चक्र, नैतिकता बस बैंक में बंद, भारत -भ्रष्टाचार सा ही सत्य है - सार्थक है, और यही साहित्य है.

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  4. हो भी रहा है यही | यह असमर्थ है |

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  5. ऋण शिरोमणि का पुरस्कार प्राप्त होता ही उसे जो इन मामलों का चेंपियन हो. ले दे कर मुझे तो अब यह लग रहा है कि यह रिन की सुपर सफ़ेद चमत्कार क्या बरकरार रह सकेगी?

    रामराम.

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  6. दयानिधिMay 24, 2013 at 8:07 AM

    धन्य है ऐसे देश के निवासी।

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अरुणिमा सिन्हा को सलाम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. चार पांच साल बाद इतिहास फ़िर से खुद को दोहरायेगा। नया तब तक पुराना और खराब हो गया होगा, उसे कोई नया तारणहार मिलेगा और कई प्रोमोशन होंगे।

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  9. बहुत मेहनत और टैलेंट चाहिए इतना कुछ करने के लिए। सबके बस का नहीं :)

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  10. बहुत मेहनत और टैलेंट चाहिए इतना कुछ करने के लिए। सबके बस का नहीं :)

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  11. एक रिटायर्ड बैंक आफिसर से अभी किसी पूर्व वित्त मंत्री की कहानी भी इत्तफाक से सुनी शायद जनार्दन रेड्डी नाम था, मंत्रियों की कहानियाँ बिल्कुल एक ही स्वरूप की होती हैं।

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    1. उनका अभिप्राय लोनमेला-फेम वाले जनार्दन पुजारी से रहा होगा

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  12. मात्र 25 प्रतिशत सच! हो ही नहीं सकता। कदापि नहीं हो सकता। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि नेता जी की आत्मकथा में पूरे एक सौ प्रतिशत सच है। भारत में विकास का अद्भुत सत्य है यह। प्रकट किंतु अनुद्घाटित सत्य है। क्रोधकारक किंतु स्वीकार्य सत्य है यह। मैं चीख-चीख कर कहना चाहता हूँ मैं ऐसे सत्यों को रोज घटित होते देख रहा हूँ। कोई शासकीय सेवक जब अपनी तथाकथित कर्तव्यनिष्ठा के कारण नौकरी से हाथ धो बैठता है तो वह अगले ही दिन लोकप्रिय राजनेता या धांसू पत्रकार के रूप में अवतरित हो जाता है। उसकी पहले वाली आत्मा का ट्रांसफ़र हो जाता है। अभी तक जैसे-तैसे जीने वाला वह व्यक्ति मात्र तीन साल में करोड़ों की सम्पत्ति का स्वामी बन जाता है .....और यहाँ तक कि मुख्य मंत्री का सबसे प्रिय व्यक्ति बन जाता है। यह विकास नहीं तो और क्या है ?

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  13. इसके बाद भी हम शांतचित्त सहिष्णु है

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  14. हम तो छूट का ही आनन्द ले रहे हैं।

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  15. माया बोली, और दाग!! दाग तो ढूंढते रह जाओगे :)

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  16. बहुत ही शानदार। कंजूसी और देर बिलकुल मत कीजिए। अपने सुस्‍मरणों की श्रृंखला फौरन शुरु कर दीजिए। मुमकिन, आपकी यह श्रृंखला कुछ बैंकों की कुछ शाखाओं का 'एनपीए' कम करने में काम आ जाए।

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