Tuesday, January 14, 2014

एक उदास नज़्म

(अनुराग शर्मा)

यह नज़्म या कविता जो भी कहें, लंबे समय से ड्राफ्ट मोड में रखी थी, इस उम्मीद में कि कभी पूरी होगी, अधूरी ही सही, अंधेर से देर भली ... 



एक देश वो जिसमें रहता है
एक देश जो उसमें रहता है

एक देश उसे अपनाता है
एक देश वो छोड़ के आता है

इस देश में अबला नारी है
नारी ही क्यों दुखियारी है

ये देश भरा दुखियारों से
बेघर और बंजारों से

ये इक सोने का बकरा है
ये नामा, गल्ला, वक्रा है

इस देश की बात पुरानी है
नानी की लम्बी कहानी है

उस किस्से में न राजा है
न ही सुन्दर इक रानी है

हाँ देओ-दानव मिलते हैं
दिन में सडकों पर फिरते हैं

रिश्वत का राज चलाते हैं
वे जनता को धमकाते हैं

दिन रात वे ढंग बदलते हैं
गिरगिट से रंग बदलते हैं

कभी धर्म का राग सुनाते हैं
नफरत की बीन बजाते हैं

वे मुल्ला हैं हर मस्जिद में
वे काबिज़ हैं हर मजलिस में

बंदूक है उनके हाथों में
है खून लगा उन दांतों में

उन दाँतो से बचना होगा
इक रक्षक को रचना होगा
   उस देश में एक निठारी है
जहां रक्खी एक कटारी है

जहां खून सनी दीवारें हैं
मासूमों की चीत्कारें हैं

कितने बच्चों को मारा था
मानव दानव से हारा था

कोई उन बच्चों को खाता था
शैतान भी तब शरमाता था

न उनका कोई ईश्वर है
न उनका कोई अल्ला था

न उनका एक पुरोहित है
न उनका कोई मुल्ला था

न उनका कोई वक़्फ़ा था
न उनकी कोई छुट्टी थी

जिस मिट्टी से वे उपजे थे
उन हाथों में बस मिट्टी थी

वे बच्चे थे मजदूरों के
बेबस और मजबूरों के

जो रोज़ के रोज़ कमाते थे
तब जाके रोटी खाते थे

संसार का भार बंधे सर में
तब कहीं जले चूल्हा घर में

वे बच्चों को तो बचा न सके
दुनियादारी सिखला न सके

हमें उनके घाव नहीं दिखते
हम कैंडल मार्च नहीं करते

हम सब्र उन्हें सिखलाते हैं
और प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं
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29 comments:


  1. मार्मिक -
    कटु सत्य
    सटीक प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  2. पता नहीं कितने समय तक यह रचना ड्राफ्ट में पड़ी रही, लेकिन कुछ भी नहीं बदला.. यही विडम्बना है इस देश की.. उम्मीद है कि इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!!
    बहुत सुन्दर!!

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  3. आपकी इस मार्मिक रचना को पढ़कर बस इतनाही कहूँगी
    हे परम पिता परमेश्वर
    यदि
    दुःख इतना ही
    रचना था तो
    मुझे संवेदनशील
    क्यों इतना बनाया
    तेरी इस
    असंवेदनशील
    दुनिया में …

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  4. बहुत सवेदनशील नज़्म है. दुखती रग पर हाथ रख दिया.

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  5. बेहद सुन्दर !!!
    दिल के नर्म हिस्सों को कुरेदती रचना....
    इतने दिनों आपने यूँही वंचित रखा हमें इसे पढने से.

    सादर
    अनु

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  6. नया प्रयोग है . बढिया है .

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  7. कालक्रम का दस्तावेज

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  8. संसार का भार बंधे सर में
    तब कहीं जले चूल्हा घर में.........................ऐसे लगा जैसे आपके दुख-दर्द को मैं भी वैसा ही महसूस कर रहा हूँ जैसा आपने किया। जानसाध कवितावली।

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  9. हर रात के बाद सुबहा आती है
    अँधेरी रात बहुत डराती है ।

    जब गहरा सबसे अंधियारा है
    समझो उस ओर उजियारा है

    वो सुबहा जल्द ही आएगी
    सब ओर खुशहाली छाएगी

    बच्चे सब शिक्षा पायेंगे
    जीवन उज्ज्वन बन जायेंगे

    ढूंढ लेंगे सही रास्ता हम सब मिल के
    घाव सारे भर जायेंगे दिले के।

    सब्र रखो दोस्त कुछ धैर्य धरो
    इस निराशा के दलदल से निकलो ....

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  10. आज का सच, सच की कविता।

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  11. बहुत उदास नज़्म है।

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  12. आधी रात को,जलसा होगा,दावत भूत पिशाचों की !
    बड़े दिनों के बाद आज , इस जंगल में , नर आये हैं !

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  13. यथार्थ हमेशा उदास ही होता है शायद.

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  14. यथार्थ हमेशा उदास ही होता है शायद.

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  15. बस पाठ पढ़ाते हैं पढ़ते नहीं हैं।

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  16. देश और देशवासियों के हालातों पर मार्मिक चित्रण।
    बदले सब यहाँ बेहतर दिशा में , उम्मीद रखनी होगी !

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  17. यथार्थ तो यही है।

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  18. इन कटु शब्दों को बहर में ढालना आसान भी कहाँ रहा होगा ...
    यथार्थ है आज का ....

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  19. सत्य का यथारूप दिखाती रचना।

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  20. बढ़िया, शुरू के दोहे तो बहुत अच्छे हैं।

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  21. ढूंढ लेंगे सही रास्ता हम सब मिल के
    घाव सारे भर जायेंगे दिले के।
    ..................बहुत सवेदनशील नज़्म है

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  22. कितना कुछ कहती है आपकी यह रचना. देर भले लगी हो आपके ड्राफ्ट को पूरा होने में लेकिन जोरदार आवाज़ बनकर आई है यह रचना.

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