Thursday, August 6, 2009

माँ - एक कविता

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माँ कितना बतलाती हो तुम
क्यूँ इतना समझाती हो तुम

बेटे की ममता में विह्वल
क्यों इतना घबराती हो तुम

लड्डू समझ निगल जायेंगे
कीड़ा समझ मसल जायेंगे

जैसे नन्हा बालक हूँ मैं
सिंहों में मृग शावक हूँ मैं

माना थोड़ा कच्चा हूँ मैं
पर भोला और सच्चा हूँ मैं

सच की राह नहीं है मेला
चल सकता मैं सदा अकेला

काँटे सभी हटा सकता हूँ
बंधन सभी छुड़ा सकता हूँ

उसके ऊपर तेरा आशिष
अमृत में बदले सारा विष

माँ कितना बतलाती हो तुम
बस ममता बरसाती हो तुम

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Sunday, August 2, 2009

यह बच्चा कैसा बच्चा है

आज तो हम को पागल कह लो पत्थर फेंको तंज़ करो
इश्क़ की बाज़ी खेल नहीं है खेलोगे तो हारोगे (इब्ने इंशा)

वैसे तो अब तक दुनिया में इतने कवि हुए हैं की हम सब अपने-अपने प्रिय कवि आपस में बाँट लें तो भी शायद कोई कवि दोहराया न जाय। मगर इनमें से भी कुछ ऐसे हैं जो औरों से बहुत अलग हैं। मुझे तो नए पुराने बहुत से कवि और गीतकार पसंद हैं। बहुत ज़्यादा पढने का दावा तो नहीं कर सकता हूँ, लेकिन जो भी थोड़ा बहुत पढ़ा सुना है वह भी अच्छे लेखन को समझने के लिए बहुत है। इब्ने-इंशा की यह कविता मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक हैं। आपने शायद पहले भी पढी हो फ़िर भी भावनाएं बांटने के लोभ से बच नहीं सका। ।
सीधे मन को आन दबोचे, मीठी बातें सुन्दर लोग
मीर नज़ीर कबीर औ' इंशा सब का एक घराना हो
यह बच्चा काला-काला सा
यह काला सा मटियाला सा
यह बच्चा भूखा-भूखा सा
यह बच्चा सूखा-सूखा सा
यह बच्चा किसका बच्चा है

जो रेत पे तन्हा बैठा है
न उसके पेट में रोटी है
न उसके तन पर कपड़ा है
ना उसके सिर पर टोपी है
ना उसके पैर में जूता है
ना उसके पास खिलौना है
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना उसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
न उसकी जेब में धेला है
ना उसके हाथ में पैसा है
ना उसके अम्मी-अब्बू हैं
ना उसकी आपा-खाला है
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

यह सहरा कैसा सहरा है
न इस सहरा में बादल है
न इस सहरा में बरखा है
न इस सहरा में बोली है
न इस सहरा में खोशा है
न इस सहरा में सब्जा है
न इस सहरा में साया है
यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का साया है

यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है

यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किस की दुनिया है
इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्जा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटारियाँ है
कहीं महफ़िल है कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाजार सजे
यह रेशम है यह दीबा है

यहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूँ धान मुहय्या है
कहीं दौलत के संदूक भरे
हां तांबा सोना रूपया है
तुम जो मांगो सो हाजिर है
तुम जो चाहो सो मिलता है

इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है
यह किस धरती के टुकड़े हैं
यह किस दुनिया का हिस्सा है

हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
यह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बंदे हैं
सब बंदों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फर्क नहीं
इस धरती पर हक सबका है

यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहाँ बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
क्या मुश्किल है हो सकता है
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है
इस बच्चे को कोई गोद में ले
इंसान जो अब तक जिंदा है
फ़िर देखें कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है

इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है वो सब का है
सब अपने हैं कोई गैर नहीं
हर चीज में सबका साझा है
जो बढ़ता है जो उगता है
यह दाना है या मेवा है
जो कपड़ा है जो कंबल है
जो चांदी है जो सोना है
वह सारा इस बच्चे का है
जो तेरा है जो मेरा है

यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा सबका बच्चा है।

* संबन्धित कड़ियाँ *
इब्न ए इंशा के जन्मदिन पर

Saturday, August 1, 2009

छुरपी के महादेव

कुछ अधिक नहीं तो भी कोई बीसेक साल तो हो ही गए होंगे छुरपी देखे हुए। लेकिन आज भी उसका रंग-रूप और स्वाद वैसे ही याद है जैसे कि अभी-अभी उसका रसास्वादन किया हो। अपने सिक्किम और लद्दाख के (सामान्यतः मांसाहारी) मित्रों से जब पहली बार छुरपी खाने को मिली तो मन में यह बात ज़रूर आयी कि सुपारी जैसी कड़क मगर दूध की रंगत वाला यह पदार्थ भोज्य है भी कि नहीं। मगर मित्र तो वही होते हैं जो विश्वसनीय हों। मेरे पूछने से पहले ही उन्होंने बताया कि छुरपी हिमालय के अतिशय ठंडे इलाकों में याक या चौरी के दूघ से बनाई जाती है। पहाडों पर पाए जाने वाले याक और चौरी के दूध का लगभग ११ प्रतिशत भाग ठोस होता है। उससे बनने वाला पनीर जैसा पदार्थ छुरपी पत्थर सा कड़क होता है।

बाद में भारत-तिब्बत-नेपाल सीमा पर महाकाली अंचल के नए बने मित्र ने बताया कि कूर्मांचल के ऊंचे इलाकों में भी छुरपी का प्रचलन है। अपनी अगली ग्राम-यात्रा से आने पर जब उसने छुरपी लाकर दी तो मैंने देखा कि यह छुरपी धवल न होकर कुछ-कुछ पीले-भूरे रंग की थी मगर स्वादिष्ट और कड़क वैसी ही थी।

जब छुरपी, याक और पहाड़ की बात चल ही पडी है तो बताता चलूँ कि पिछले दिनों कुछ अलग सा" में बिजलेश्वर महादेव के बारे में एक लेख पढा, अच्छा लगा। टिप्पणियाँ पढने पर पाया कि पाठकों और लेखक दोनों ही को बिजली महादेव का शिवलिंग पत्थर और मक्खन से बना होने पर शंका है। छुरपी से पूर्व-परिचित होने के कारण मुझे इस विषय में तनिक भी शंका नहीं है कि दुग्ध-उत्पाद को पत्थर सा कडा किया जा सकता है। कोई आर्श्चय नहीं कि छुरपी का प्रयोग करके एक मजबूत शिवलिंग बनाया जाता है। यही बिजलेश्वर महादेव के शिवलिंग का रहस्य है।

घर से दूर होने के कारण यहाँ मेरे पास छुरपी पाने का कोई साधन नहीं है इसलिए उसका चित्र उपलब्ध न करा पाने का अफ़सोस है। परन्तु उत्सुक पाठकों के लिए छुरपी के बारे में (बहुत थोड़ी) जानकारी यहाँ है और अगर अंग्रेजी में देखना चाहें तो बिजलेश्वर महादेव पर मेरा एक पुराना संक्षिप्त लेख यहाँ है: Bijli Mahadev