Thursday, August 6, 2009

माँ - एक कविता

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माँ कितना बतलाती हो तुम
क्यूं इतना समझाती हो तुम

बेटे की ममता में विह्वल
क्यूं इतना घबराती हो तुम

लड्डू समझ निगल जायेंगे
कीडा समझ मसल जायेंगे

जैसे नन्हा बालक हूँ मैं
सिंहों में मृग शावक हूँ मैं

माना थोडा कच्चा हूँ मैं
पर भोला और सच्चा हूँ मैं

सच की राह नहीं है मेला
चल सकता मैं सदा अकेला

कांटे सभी हटा सकता हूँ
बंधन सभी छुडा सकता हूँ

उसके ऊपर तेरा आशिष
अमृत में बदले सारा विष

माँ कितना बतलाती हो तुम
बस ममता बरसाती हो तुम

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39 comments:

  1. अनुराग भाई. बहुत पसंद आई ये कविता. अलग रंग लिए .... बहुत बढ़िया है.

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  2. पसंद आई ,सुंदर कविता.

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  3. अनुराग जी।
    माँ पर इतनी सरल, सहज और सुन्दर
    कविता।
    आपको बहुत-बहुत बधाई।

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  4. जीवन की सच्चाई के रंग
    आपकी कविता के संग


    बहुत बढ़िया...
    लिखते रहिए..

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  5. बहुत सुंदर कविता. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  6. बहुत सुन्दर और सरल अभिव्यक्ति है मा के लिये जितनी भी भावनायें व्यक्त कर लें सदा कम जान पडती हैं ये कविता लाजवाब है मा के लिये कुछ पंह्तियां----
    माँ की ममता ब्रह्मण्ड से विशाल है
    माँ की ममता की नहीं कोई मिसाल है
    माँ की ममता गीता कुरान है
    मे की ममता वेद पुराण है----- आभार

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  7. सच की राह नहीं है मेला
    चलना सदा पड़ेगा अकेला

    -बेहतरीन रचना...भा गई भाई!!

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  8. वाह!
    सुन्दर और सच्ची कविता।
    बधाई।

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  9. उसके ऊपर तेरा आशिष
    अमृत में बदले सारा विष


    ऐसा ही होता है माँ का प्यार व आशीर्वाद !!
    सुन्दर !!

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  10. मां तो मां है।इतना बडा होने के बाद आज भी जब वो हर मामले मे सीख देती है ओ ऐसा लगता है समय का पहिया उल्टा घूम गया है।हम उंगली पकड कर चलने वाले बच्चे ही होते है मां के लिये चाहे कितने भी बड़े हो जाये।बहुत सुन्दर अनुराग भाई।

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  11. सच में बहुत सुंदर कविता है . हर बच्चे को पढ़वानी चाहिए .

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  12. हों हम किसी भी उम्र में माँ की ज़रुरत होती ही है...
    मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में.
    बहुत ही सुंदर कविता...सीधी-सरल भाषा में सीधी-सरल बात..
    अच्छा लगा पढ़ कर ..

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  13. माँ कितना बतलाती हो तुम
    क्यूं इतना समझाती हो तुम
    माँ तो बतलायेगी ही; माँ तो समझाएगी ही
    बहुत खूबसूरत

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  14. माँ - एक शब्द पूरा ब्रह्माण्ड समेटे हुए -- और सरल् मन से लिखी सहज सुन्दर कविता बहुत पसंद आयी अनुराग भाई

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  15. anuraag ji , aapki ye kavita man ko choo gayi ... maa par kitna bhi likha jaaye wo kam hai ... aapko itni acchi rachna ke liye main dil se badhai deta hoon ..

    regards

    vijay

    pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

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  16. ALAG RANG MEIN RANGI HAI AAPKI KAVITA.....DARASAL MAA TO HOTI HI AISI HAI....BAHOOT HI SUNDAR KAVITA HAI..

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  17. 'उसके ऊपर तेरा आशिष
    अमृत में बदले सारा विष'
    -माँ के इसी आशीष के बल पर बड़े बड़े संकट टल जाते हैं.

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  18. माँ तो शब्द् ही अपने आप में पूरी नज़्म है...

    तमाम तारिफ़ों से परे अनुराग जी और ब्लौग का नया रंग-रूप खूब फ़ब रहा है..

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  19. सच की राह नहीं है मेला
    चलना सदा पड़ेगा अकेला
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    "चल अकेला चल अकेला" याद आ जाती है बरबस!

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  20. वाह ... बढिया कविता है | माँ की बात ही निराली है |

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  21. bahut hi sundar bhav wali marmsparshi kavita .maa ko tassli deti hui, uski fikr ko hatati bhi .

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  22. माँ का स्नेह बेटे के लिए और बेटे का माँ के लिए....दोनों को ही बड़े prabhavi dhang से ukera है आपने.......marmsparshi इस रचना से मन को baha ले जाने के लिए बहुत बहुत aabhar ..........

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  23. सुंदर कविता.

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  24. बहुत सुंदर कविता.बधाई।

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  25. बहुत सुंदर कविता ..बधाई।

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  26. वाह! आनंद आ गया। लगा जैसे कभी मैने भी यही सब कहना चाहा था..

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  27. उसके ऊपर तेरा आशिष
    अमृत में बदले सारा विष
    bahut sundar ..

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  28. बहुत ही प्यारी और मासूम कविता माँ के लिये ।

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  29. सीधे सच्चे शब्दों से सजी ुत्तम कविता।

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