बड़े भाई से लम्बी बातचीत करने के बाद काफी देर तक छोटे भाई से भी फ़ोन पर बात हुई। ये दोनों भाई जम्मू में हमारे मकान मालिक के बेटे हैं। इन्टरनेट पर मेरे बचपन के बारे में एक आलेख पढ़कर बड़े भाई ने ईमेल से संपर्क किया, फ़ोन नंबर का आदान-प्रदान हुआ और आज उनतालीस साल (39) बाद हम लोग फिर से एक दूसरे से मुखातिब हुए। इत्तेफाक से इसी हफ्ते उसी शहर के एक सहपाठी से भी पैंतीस साल बाद बात हुई। उस बातचीत में थोड़ी निराशा हुई क्योंकि सहपाठी ठीक से पहचान भी नहीं सका। लेकिन इन भाइयों की याददाश्त और उत्साह ने निराशा के उस अंश को पूरी तरह से धो डाला।
फ़ोन रखकर हम लोग अपना सामान कार में सेट किया और निकल पड़े धन्यवाद दिवस (Thanksgiving Day) की अपनी 600 मील लम्बी यात्रा पर। पिट्सबर्ग के पहाड़ी परिदृश्य अक्सर ही जम्मू में बिताये मेरे बचपन की याद दिलाते हैं। जगमगाते जुगनुओं से लेकर हरे-भरे खड्डों तक सब कुछ वैसा ही है। आगे चल रही वैन का नंबर है JKT 3646। जम्मू में होने का अहसास और वास्तविक लगने लगता है। गति सीमा 70 मील है मगर अधिक चौकसी और भीड़ के कारण कोई भी गाड़ी 80 से ऊपर नहीं चल रही है। जहाँ तहाँ किसी न किसी वाहन को सड़क किनारे रोके हुए लाल-नीली बत्ती चमकाती पुलिस दिख रही है। वाजिब है, धन्यवाद दिवस की लम्बी छुट्टी अमेरिका का सबसे लंबा सप्ताहांत होता है। इस समय सड़क परिवहन भी अपने चरम पर होता है और दुर्घटनाएँ भी खूब होती हैं। जम्मू की यह गाडी तेज़ लेन में होकर भी सुस्त है, रास्ता नहीं दे रही है। मुझे दिल्ली के अपने बारह साल पुराने शांत मित्र फक्कड़ साहब याद आते हैं। यातायात की परवाह न करके वे अपने बजाज पर खरामा-खरामा सफ़र करते थे। मगर रहते थे हमेशा सड़क के तेज़ दायें सिरे पर। हमेशा पीछे से ठोंके जाते थे।
आधा मार्ग बीतने पर एक जगह रुककर हमने रात्रि भोजन कर लिया है। भोजन की खुमारी भी छाने लगी है। घर से निकलने में देर हो गयी थी मगर मैं अभी भी चुस्त हूँ और एक ही सिटिंग में सफ़र पूरा कर सकता हूँ। पत्नी को बैठे -बैठे बेचैनी होने लगी है सो रुकने को कहती हैं। होटल के स्वागत पर बैठी महिला दो बार अलग अलग तरह से पूछती है कि मैं डॉक्टर तो नहीं। जब उसे पक्का यकीन हो जाता है कि मैं नहीं हूँ तो झेंपती सी कहती है कि कई भारतीय लोग डॉक्टर होते हैं और अगर वह रसीद में उनके नाम से पहले यह विशेषण न लिखे तो वे खफा हो जाते हैं, बस इसलिए मुझसे पूछा। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं अगर डॉक्टर होता तो भी ध्यान नहीं देता मगर कह नहीं पाता क्योंकि कोई कान में चीखता है, "तभी तो हो नहीं।" देखता हूँ तो पचीस साल पुराने सहकर्मी जनरंजन सरकार मुस्कराते हैं। जब भी मैं किसी परिवर्तन का ज़िक्र करता था, वे कहते थे कि यह काम नेताओं और अफसरों का है इसलिए कभी नहीं होगा। मैं कहता था कि यदि मैं नेता और अफसर होता तो ज़रूर करता। और जवाब में वे कहते थे, "इसीलिए तो तुम दोनों में से कुछ भी नहीं हो।" मेरे कुछ भी न होने की बात सही थी इसलिए उनसे कुछ कह नहीं सका हाँ एक बार इतना ज़रूर कहा कि वे अगर अपने बेटे का नाम भारत रखें तो भारत सरकार पर बेहतर नियंत्रण रख सकेंगे।
होटलकर्मी अगली सुबह के मुफ्त नाश्ते का समय बताने लगती है और मैं पच्चीस साल पुराने भारत सरकार के समय से निकलकर 2009 में आ जाता हूँ।
जम्मू के गरनों का स्वाद अभी भी याद है |
आधा मार्ग बीतने पर एक जगह रुककर हमने रात्रि भोजन कर लिया है। भोजन की खुमारी भी छाने लगी है। घर से निकलने में देर हो गयी थी मगर मैं अभी भी चुस्त हूँ और एक ही सिटिंग में सफ़र पूरा कर सकता हूँ। पत्नी को बैठे -बैठे बेचैनी होने लगी है सो रुकने को कहती हैं। होटल के स्वागत पर बैठी महिला दो बार अलग अलग तरह से पूछती है कि मैं डॉक्टर तो नहीं। जब उसे पक्का यकीन हो जाता है कि मैं नहीं हूँ तो झेंपती सी कहती है कि कई भारतीय लोग डॉक्टर होते हैं और अगर वह रसीद में उनके नाम से पहले यह विशेषण न लिखे तो वे खफा हो जाते हैं, बस इसलिए मुझसे पूछा। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं अगर डॉक्टर होता तो भी ध्यान नहीं देता मगर कह नहीं पाता क्योंकि कोई कान में चीखता है, "तभी तो हो नहीं।" देखता हूँ तो पचीस साल पुराने सहकर्मी जनरंजन सरकार मुस्कराते हैं। जब भी मैं किसी परिवर्तन का ज़िक्र करता था, वे कहते थे कि यह काम नेताओं और अफसरों का है इसलिए कभी नहीं होगा। मैं कहता था कि यदि मैं नेता और अफसर होता तो ज़रूर करता। और जवाब में वे कहते थे, "इसीलिए तो तुम दोनों में से कुछ भी नहीं हो।" मेरे कुछ भी न होने की बात सही थी इसलिए उनसे कुछ कह नहीं सका हाँ एक बार इतना ज़रूर कहा कि वे अगर अपने बेटे का नाम भारत रखें तो भारत सरकार पर बेहतर नियंत्रण रख सकेंगे।
होटलकर्मी अगली सुबह के मुफ्त नाश्ते का समय बताने लगती है और मैं पच्चीस साल पुराने भारत सरकार के समय से निकलकर 2009 में आ जाता हूँ।
ऐसी टाइम मशीन से आप सकुशल लौट आये ?
ReplyDeleteबधाई!!!!!!!!!!!!!!!!
वैसे ऐसी खट्टी -मीठी यादें हों तो हमरा तो टाइम मशीन से निकलने का मन ही ना करे!!!
@ "तभी तो हो नहीं." देखता हूँ तो पचीस साल पुराने सहकर्मी जनरंजन सरकार मुस्कराते हैं. जब भी मैं किसी परिवर्तन का ज़िक्र करता था, वे कहते थे कि यह काम नेताओं और अफसरों का है इसलिए कभी नहीं होगा. मैं कहता था कि यदि मैं नेता और अफसर होता तो ज़रूर करता. और जवाब में वे कहते थे, "इसीलिए तो तुम दोनों में से कुछ भी नहीं हो."
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दुखती रग पर हाथ रख गए भैया और मुझे कहते हैं कि लिखने से दर्द कम नहीं होता !
टाइम मशीन का नाम सुन कर आज शाम आये एक फोन की याद आई। सत्रह साल पहले रिटायर्ड रेलवे बोर्ड के एक सदस्य का फोन था। हम सत्रह साल पहले के अपने संस्मरणों पर बतियाने लगे। अन्त में वे बोले - जीडी, मैं तो आजकल पास्ट में ही जीता हूं। मेरा प्रेजेण्ट और फ्यूचर में जीना तो बेयर मिनिमम है।
ReplyDeleteपता नहीं क्यों आपकी पोस्ट पढ़ उनकी फिर याद हो आई!
बढ़िया संस्मरण है।
ReplyDeleteबधाई!
ऐसे हिचकोले खाते हिंडोले पर हम रोज सवारी करते हैं...बहुत अच्छा लगा पढ़कर.
ReplyDeleteबहुत ही लाजवाब आलेख. शुभकामनाएं.
ReplyDeleteरामराम.
बहुत अच्छा लगा आप का यह संस्मरण.
ReplyDeleteधन्यवाद
स्मृति गली हरी भरी !
ReplyDeletePata nahi kyon,30 kee umra tak dhyaan sirf aage ke samay par laga rahta hai aur uske baad jaise jaise aage badhte jaao man peechhe rahne me hee sukoon paata hai....
ReplyDeleteTHANKS GIVING AUR AAPKE PURAANI YAADON KA SAFAR JAAN KAS ACHAA LAGA ... TIME MACHINE KA SAFAR LAJAWAAB HAI ...
ReplyDeleteटाइम मशीन अगर होती तो ......... रोज़ ही बचपन मे पहुच जाते
ReplyDeleteऐसा होता है मेरी भी आज बचपन के एक मित्र से बात हुई ।
ReplyDeleteशब्द बहुत बारीक हैं कन्त्रोल प्लुस दबा कर देखा चला नहीं अगर रात मे आपकी पोस्ट पढनी होती तो असुविधा होती है। संस्मरण बहुत रोचक लगा ।शुभकामनायें
ReplyDelete"तभी तो तुम दोनों नहीं हो.."
ReplyDeleteहा हा
रोचक संस्मरण अनुराग जी और उतनी ही खूबसूरत शैली भी । नंबर प्लेट का jkt होना मुझे भी चौंका गया।
इस टाइम-मशीन पर अपने साथ हमें भी ले चलने का शुक्रिया!
बढिया संस्मरण.
ReplyDeleteटाईम मशिन की बात क्या खूब कही!!
ReplyDeleteआपके लेखन शैली का कायल हूं. जीवंतता का वो माहौल बनता है, कि हम भी ट्रांसपोर्ट हो जाते हैं उस समय के स्लोट में और जुगाली करने लगते हैं, उन स्मृति क्षणों की...
जब कभी अपने गाँव जाता हूँ .. परिजन लोग कहते हैं मैं गाँव और परिजनों को भूल गया हूँ .... उन्हें बता नहीं पाता की मैं तो सप्ताह मैं कम से कम एक बार गाँव सपने मैं सजीव हो उठता है ... |
ReplyDeleteहर प्रवासी अपने दिल मैं, मन मैं अपने वतन की याद को संजोये रहता है .... और ये याद पीड़ा भी देती है पर इस याद को अपने दिल से निकालता नहीं ...
आपके सुन्दर वर्णन ने याद फिर ताजा कर दी ...