Sunday, September 13, 2026

ग़ज़ल: सँवारे क्यों

काम नहीं जो आने वाला, उसको कोई पुकारे क्यों।
बाज़ारों की इस बस्ती में, दिल को कोई निखारे क्यों॥

इस्तेमाल का दौर नया है, भोगें-फेंकें, चलो-टलो, 
पीछे छोड़ा जा सकता जो, उसको कोई सुधारे क्यों॥

जीवन मतलब मनरंजन, खेलें जब तक खेल चले,
टूटे हुए खिलौने पर अब, रंग कोई निखारे क्यों॥

हर नाते की उम्र लिखी है, विज्ञापन की तर्ज़ों पर,
डूबे यदि सम्बंध पुराना, उसको कोई उबारे क्यों॥

जर्जर होते हर रिश्ते को, तन्हा होकर छूटना है,
बीते कल की पगडंडी को, आख़िर कोई निहारे क्यों॥

काँच का झूमर नीचे गिरकर, कब का चकनाचूर हुआ,
बीन-बीन किरचों को उसकी, पागल कोई सँवारे क्यों॥

4 comments:

  1. दुनिया वही जो दिखती है, निराकार को भूल गए
    ऊपर-ऊपर ही भक्ति है, रब को कोई पुकारे क्यों

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  2. वर्तमान हालातों पर लिखी बेहतरीन शायरी, यथार्थवादी लेखन

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