Thursday, February 12, 2009

खाली प्याला - समापन किस्त

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यह कथा मेरे सहकर्मी नीलाम्बक्कम के बारे में है। पिछली कड़ी में आपने पढा कि मेरे अधिकाँश सहकर्मी मेरे आगरा शाखा में आने से खुश नहीं थे। वहाँ बस एक एक अपवाद था, अमर सहाय सब्भरवाल. अमर का बूढा और नीरस अधिकारी नीलाम्बक्कम उस शाखा की सज्जा में कहीं से भी फिट नहीं बैठता था. वह हमेशा चाय पीकर खाली प्याले मेरी मेज़ पर छोड़ देता था. आगे पढिये कि मैंने उसे कैसे झेला। [पहली कड़ी; दूसरी कड़ी; तीसरी कड़ी; चौथी कड़ी]
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मुझे लगता है कि ज़िंदगी से हर दांव हारे हुए उस बेबस इंसान पर आता हुआ मेरा रहम उन खाली प्यालों पर आए हुए मेरे गुस्से से कहीं भारी था।

उस शाखा में मेरा कार्यकाल कब पूरा हो गया, पता ही न चला। मेरा तबादला महाराष्ट्र में सात पर्वतों से घिरे एक सुदूर ग्राम में हो गया था। मेरी विदाई-सभा में सारे सहकर्मियों ने मेरी प्रशंसा में कोई कसर न छोडी। जिन लोगों को आरम्भ में मैं फूटी आँख न सुहाता था जब उन्होंने तारीफ़ के पुल बांधे तो मेरा सीना गर्व से फूल गया। शाखा की ओर से और कुछ लोगों ने व्यक्तिगत रूप से भी मुझे उपहारों से लाद दिया। सभी दिख रहे थे परन्तु नीलाम्बक्कम नदारद था। उस दिन वह छुट्टी पर था। पूछने पर अमर ने बताया कि उसका इकलौता स्वेटर उसे आगरा की ठण्ड से नहीं बचा सका। मैंने नीलाम्बक्कम की अनुपस्थिति के बारे में अधिक ध्यान नहीं दिया। शायद मेरे मन में उसके प्रति दयाभाव से ज़्यादा कुछ भी नहीं था। वैसे भी मैं अपनी नयी शाखा के बारे में बहुत उत्साहित था।

नयी जगह आकर मैं बहुत खुश था। मेरी नयी शाखा बहुत अच्छी थी। गाँव हरी-भरी पहाडियों से घिरी एक सुंदर घाटी में स्थित था। शाखा में कागजी काम तो कम था मगर बाहर घूम-फिरकर करने के लिए कामों की कमी नहीं थी। छोटी सी शाखा थी जिसमें मेरे अलावा केवल पाँच लोग थे। सभी बहुत खुशमिजाज़ और मित्रवत थे, विशेषकर मोहिनी जिसने अपने आप ही मुझे मराठी सिखाने की जिम्मेदारी ले ली थी।

वहाँ रहकर मैंने पहली बार भारत के ग्रामीण विकास में सरकारी बैंकों की महत्त्वपूर्ण भुमिका को करीब से देखा। हमारी शाखा के सहयोग से क्षेत्र के १२ गाँवों की काया पलट हुयी थी। दूध के लिए गाय-भैसें, ईंधन के लिए गोबर गैस, और सिंचाई के लिए सामूहिक जल-संरक्षण परियोजनाओं ने किसानों के जीवन-स्तर को बहुत सुधारा था। इस गाँव में ही पहली बार मैंने गरीबी-रेखा से नीचे रह रहे लोगों को भी बेधड़क बैंक आते-जाते देखा।

पूरा गाँव एक बड़े परिवार की तरह था। हम छः लोग भी इस परिवार का अभिन्न अंग थे। गाँव में किसी न किसी बहाने से आए-दिन दावतें होती रहती थीं। न जाने क्यों, गाँव की हर दावत मांसाहार पर केंद्रित होती थी। जब मोहिनी को मेरी खानपान की सीमाओं का पता लगा तो उसने मुझे इन दावतों से बचाने की जिम्मेदारी भी ले ली। वह मुझे अपने घर ले जाती और कुछ नया पकाकर खिलाती थी। मुझे यह मानना पडेगा की उस गाँव के लोग बहुत ही सहिष्णु और उदार थे। खासकर मोहिनी मेरे प्रति बहुत ही सहनशील थी।

गाँव में रहते हुए भी अमर के साथ मेरा पत्र-व्यवहार जारी रहा। एक दिन शाखा में उसका ट्रंक-कॉल आया। पता लगा कि आगरा में काम करते हुए जब एक दिन मैंने अपने खाते से पैसे निकाले तो मेरा चेक गलती से किसी ग्राहक के खाते में घटा दिया गया था। बाद में जब विदाई पर मैंने अपना खाता बंद करके बचा हुआ पैसा निकाला तो बैलेंस शून्य होने के बजाय असलियत में ऋण में बदल गया था। जब उस ग्राहक ने अपने खाते में पैसा कम पाया तो गलती का पता लगा।

मैं चिंतित हुआ। इतने दिनों के प्रशिक्षण में मैं यह जान चुका था कि किसी कर्मचारी के बचत खाते में किसी भी कारण से उधार हो जाना एक बहुत ही गंभीर त्रुटि थी जिसकी सज़ा निलंबन तक हो सकती थी। लेकिन साथ ही मुझे आगरा शाखा में अपनी लोकप्रियता का ध्यान आया। मुझे विदाई भाषण में कहे हुए शब्द भी कान में मधुर संगीत की झंकृत हुए। मेरी आंखों के सामने ऐसा चित्र साकार हुआ जिसमें कई सहकर्मी मेरे खाते में पैसा डालने के लिए एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे थे। मैं यह जानने को उत्सुक था कि अंततः मेरे मित्रों में से कौन सफल हुआ। आख़िर मेरा मधुर व्यवहार और मेरी लोकप्रियता बेकार थोड़े ही जाने वाली थी।

"कोई आगे नहीं आया ..." अमर ने कहा, "... कुछ लोग तो मामले को तुंरत ही ऊपर रिपोर्ट कराना चाहते थे।"

"यह कल के लड़के समझते क्या हैं अपने को?"

"अफसर बन गए तौ बैंक खरीद ली क्या इन्ने?"

"क़ानून सबके लिए बराबर है। रिपोर्ट करो।"

अमर ने बताया कि उपरोक्त जुमले मेरे कई "नज़दीकी" मित्रों ने उछाले थे। उसकी बातें सुनकर मैं सन्न रह गया। हे भगवान्! कितने झूठे थे वे पढ़े-लिखे, सुसंस्कृत लोग। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि दोस्ती का दम भरने वाले वे लोग मेरी अनुपस्थिति में ऐसा व्यवहार करेंगे। मैं अपने भविष्य को दांव पर लगा देख पा रहा था। एक छोटी सी भूल मेरा आगे का करियर चौपट कर सकती थी।

"फ़िर क्या हुआ? क्या उन्होंने ऊपर रिपोर्ट किया? मेरे सामने क्या रास्ता है अब?" मुझे पता था कि अमर के खाते में कभी भी इतना पैसा नहीं होता था कि वह इस मामले में मेरी सहायता कर सका हो।

"जल्दी बताओ, मैं क्या करुँ?" मैंने उद्विग्न होकर पूछा।

"बेफिक्र रहो ..." अमर ने मुझे दिलासा देकर कहा, "नीलाम्बक्कम ने ज़रूरी रक़म अपने खाते से चुपचाप तुम्हारे खाते में ट्रांसफर कर दी।"

अमर ने बताया कि नीलाम्बक्कम तो यह भी चाहता था कि मुझे इस बात का पता ही न लगे लेकिन अमर ने सोचा कि मुझे बताना चाहिए।

"इस दुनिया में अच्छे लोगों के साथ कभी भी बुरा नहीं होना चाहिए" अमर ने मेरे बारे में नीलाम्बक्कम के शब्द दोहराए तो कृतज्ञता से मेरा दिल भर आया।

मैंने रात भर सोचकर नीलाम्बक्कम को एक सुंदर सा "धन्यवाद" पत्र लिखा और पैसों के साथ भेज दिया। नीलाम्बक्कम की और से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। मुझे पता भी नहीं कि आज वह कहाँ है मगर मेरी शुभकामनाएं हमेशा उसके और अशोक के साथ हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर ने उनके सब सपने ज़रूर साकार किए होंगे। सच्चाई के प्रति मेरे विश्वास को आज भी बनाए रखने में नीलाम्बक्कम जैसे लोगों का बहुत योगदान है।

[समाप्त]

18 comments:

  1. मैंने रात भर सोचकर नीलाम्बक्कम को एक सुंदर सा "धन्यवाद" पत्र लिखा और पैसों के साथ भेज दिया. नीलाम्बक्कम की और से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया. मुझे पता भी नहीं कि आज वह कहाँ है मगर मेरी शुभकामनाएं हमेशा उसके और अशोक के साथ हैं
    समापन किस्त ने नीलाम्बक्कम जी का जो व्यक्तित्व उभर कर सामने आई उसने उन की सारी जिन्दगी की हार को जीत में बदल दिया.....बहुत रोचक और सुंदर..."

    Regards

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  2. हम तो पहले ही समझे बैठे थे कि ये मद्रासी ही कभी काम आएगा. सुंदर संस्मरण. आभार.

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  3. बहुत सुन्दर चित्र. नीलाम्बक्कम जी ने सचमुच अपना फर्ज निभाया.

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  4. बढ़िया समापन, नीलाम्बक्कम के व्यक्तित्व में उत्सुकता तो हो ही गई थी. लेकिन इस घटना ने कैसे अविस्मरनीय बना दिया होगा नीलाम्बक्कम को, ये तो आसानी से महसूस किया जा सकता है. आपके बारे में ताउजी के ब्लॉग पर बढ़ा. बड़ा अच्छा लगा.

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  5. Man bhar aaya.....bahut bahut sundar katha/sansmaran....bahut hi..

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  6. "इस दुनिया में अच्छे लोगों के साथ कभी भी बुरा नहीं होना चाहिए" अमर ने मेरे बारे में नीलाम्बक्कम के शब्द दोहराए तो कृतज्ञता से मेरा दिल भर आया.

    बहुत सुंदर संस्मरण रहा. उपरोक्त वाक्य सही मे बहुत बडी शिक्षा देता है. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  7. अत्‍यन्‍त भावाकुल कर देने वाला समापन। मन भर आया। काश, प्रत्‍ये व्‍यक्ति नीलाम्बक्कम हो जाए।
    'नेकी कर दरिया में डाल' इसी को कहते हैं। ऐसे ही लोगों के दम पर धरती टिकी हुई है।
    आपने सुन्‍दर वर्णन किया-बिलकुल लोक कथा की तरह।

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  8. पूरी कहानी एक साथ ही पढ़ी। बहुत ही श्रेष्‍ठ कहानी है। हम अक्‍सर अपने ही मित्रों से विरोध के स्‍वर सुनते हैं। बधाई।

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  9. बेहतरीन शब्द-चित्र के लिये बधाई....

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  10. बहुत रोचक कथा रही..नीलाम्बक्कम जी ने प्रभावित किया. सारी कहानियों का लिन्क लगा कर उम्दा कार्य किया.

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  11. क्‍या आपने तय ही कर रखा है कि हर एक कहानी सुनाने के बाद टैक्‍स के रुप में आंसू ही वसूले जाएं। बहुत सीधी, सच्‍ची, मार्मिक और प्रेरक कहानी। धन्‍यवाद।

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  12. बहुत सशक्त और बेहतरीन रचना।

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  13. मदरसी बाबू को मेरा सलाम, बहुत सुंदर लगा.
    धन्यवाद

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  14. रोचक पोस्ट रही.

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  15. शुक्रिया स्‍मार्ट इंडियन जी,
    यह कहानी उन नैतिक मूल्‍यों/मार्ग पर चलना सिखाती हैं जिसकी आज हमारे समाज को सबसे ज्‍यादा जरुरत है।

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  16. किसी भी कहानी में अंत तक रोचकता बनाये रखना एक उपलब्धि है,
    और यह आप लगभग हर कथा में हासिल कर लेते हैं ।
    बड़ी बात यह कि, यह संदेशविहीन भी नहीं होता !
    साधुवाद !

    And.. You rightly deserve this tag 'Smart Indian ',
    really, no kidding..
    Hats off to your pen.

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  17. aaj phli baar aapko padha.kisi mitra ne ek link diya jaha aapki kavitaein thi aur waha se aapki kahaniyon tak pahunch gai...bahut hi sundar.aapko blog follow kar rahi hu taki bhavishya me bhi aur kavitaein,kahaniyan padh saku aur aapka purana likha bhi khangal saku

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