Tuesday, November 29, 2011

इमरोज़, मेरा दोस्त - लघुकथा

फ़्लाइट आने में अभी देर थी। कुछ देर हवाई अड्डे पर इधर-उधर घूमकर मैं बैगेज क्लेम क्षेत्र में जाकर बैठ गया। फ़ोन पर अपना ईमेल, ब्लॉग आदि देखता रहा। फिर कुछ देर कुछ गेम खेले, विडियो क्लिप देखे। इसके बाद आते जाते यात्रियों को देखने लगा और जब इस सबसे बोर हो गया तो मित्र सूची को आद्योपांत पढकर एक-एक कर उन मित्रों को फ़ोन करना आरम्भ किया जिनसे लम्बे समय से बात नहीं हुई थी।

जब कनवेयर बेल्ट चलनी शुरू हो गयी और कुछ लोग आकर वहाँ इकट्ठे होने लगे तो अन्दाज़ लगाया कि फ़्लाइट आ गयी है। जहाज़ से उतरते समय कई बार अपरिचितों को लेने आये लोगों को अतिथियों के नाम की पट्टियाँ लेकर खड़े देखा था। आज मैं भी यही करने वाला था। इमरोज़ को कभी देखा तो था नहीं। शार्लट के मेरे पड़ोसी तारिक़ भाई का भतीजा है वह। पहली बार लाहौर से बाहर निकला है। लोगों को आता देखकर मैंने इमरोज़ के नाम की तख़्ती सामने कर दी और एस्केलेटर से बैगेज क्लेम की ओर आते जाते हर व्यक्ति को ध्यान से देखता रहा। एकाध लोग दूर से पाकिस्तानी जैसे लगे भी पर पास आते ही यह भ्रम मिटता गया। सामान आता गया और लोग अपने-अपने सूटकेस लेकर जाने भी लगे। न तो किसी ने मेरे हाथ के नामपट्ट पर ध्यान दिया और न ही एक भी यात्री पाकिस्तान से आया हुआ लगा। धीरे-धीरे सभी यात्री अपना-अपना सामान लेकर चले गए। बैगेज क्लेम क्षेत्र में अकेले खड़े हुए मेरे दिमाग़ में आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इमरोज़ के पास चेक इन करने को कोई सामान रहा ही न हो और वह यहाँ आने के बजाय सीधा एयरपोर्ट के बाहर निकल गया हो।

मैं एकदम बाहर की ओर दौड़ा। दरवाज़े पर ही घबराया सा एक आदमी खड़ा था। देखने में उपमहाद्वीप से आया हुआ लग रहा था। इस कदर पाकिस्तानी, या भारतीय कि अगर कोई भी हम दोनों को साथ देखता तो भाई ही समझता। मैंने पूछा, "इमरोज़?"

"अनवार भाई?" उसने मुस्कुराकर कहा।

"आप अनवार ही कह लें, वैसे मेरा नाम ..." जब तक मैं अपना नाम बताता, इमरोज़ ने आगे बढकर मुझे गले लगा लिया। हम दोनों पार्किंग की ओर बढे। उसका पूरा कार्यक्रम तारिक़ भाई ने पहले ही मुझे ईमेल कर दिया था। कॉलेज ने उसका इंतज़ाम डॉउनटाउन के हॉलिडे इन में किया हुआ था। आधी रात होने को आयी थी। पार्किंग पहुँचकर मैंने गाड़ी निकाली और कुछ ही देर में हम अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। ठंड बढने लगी थी। हीटिंग ऑन करते ही गला सूखने का अहसास होने लगा। रास्ते में बातचीत हुई तो पता लगा कि उसने डिनर नहीं किया था। अब तक तो सारे भोजनालय बन्द हो चुके होंगे। अपनी प्यास के साथ मैं इमरोज़ की भूख को भी महसूस कर पा रहा था। डाउनटाउन में तो वैसे भी अन्धेरा घिरने तक वीराना छा जाता है। अगर पहले पता होता कि बाहर निकलने में इतनी देर हो जायेगी तो मैं घर से हम दोनों के लिये कुछ लेकर आ जाता।

जीपीएस में देखने पर पता लगा कि इमरोज़ के होटल के पास ही एक कंवीनियेंस स्टोर 24 घंटे खुला रहता है। होटल में चैकइन कराकर फिर मैं उन्हें लेकर स्टोर में पहुँचा। पता लगा कि वे केवल हलाल खाते हैं, इसलिये केवल शाकाहारी पदार्थ ही लेंगे। मैंने उनके लिये थोड़ा पैक्ड फ़ूड लिया। पूछने पर पता लगा कि फलों के रस उन्हें खास पसन्द नहीं सो उनके लिये कुछ सॉफ़्ट ड्रिंक्स लिये और साथ में अपने सूखते गले के लिये अनार का रस और पानी की एक बोतल।

पैसे चुकाकर मैं स्टोर से बाहर आया तो वे पीछे-पीछे ही चलते रहे। होटल के बाहर सामान की थैली उन्हें पकड़ाते हुए जब तक मैं अपने लिये ली गयी बोतलें निकालने का उपक्रम करता, वे थैली को जकड़कर "अल्लाह हाफ़िज़" कहकर अन्दर जा चुके थे।

घर पहुँचा तो रात बहुत बीत चुकी थी। गला अभी भी सूख रहा था बल्कि अब तो भूख भी लगने लगी थी। थकान के कारण रसोई में जाकर खाना खोजने का समय नहीं था, बनाने की तो बात ही दूर है। वैसे भी सुबह होने में कुछ ही घंटे बाकी थे। 6 बजे का अलार्म लगाकर सोने चला गया। रात भर सो न सका, पेट में चूहे कूदते रहे। सुबह उठने तक सपने में भाँति-भाँति के उपवास रख चुका था। जल्दी-जल्दी तैयार होकर सेरियल खाया और इमरोज़ को साथ लेने के लिये उनके होटल की ओर चल पड़ा।

इमरोज़ जी होटल की लॉबी में तैयार बैठे थे। मेरी नमस्ते के जवाब में मेरे हाथ में बिस्कुट का एक पैकेट और रस की बोतल पकड़ाते हुए रूआँसे स्वर में बोले, "आपका जूस तो मेरे पास ही रह गया था। आपको रास्ते में प्यास लगी होगी, यह सोचकर मैं तो रात भर सो ही न सका।"

30 नवम्बर 2011: कोलकाता विश्व विद्यालय में आगंतुक प्रवक्ता और विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन का १७६ वां जन्मदिन
[समाप्त]

34 comments:

  1. कभी-कभी एक छोटा सा एहसास भी बहुत कुछ दे जाता है और सिखा भी देता है !

    ReplyDelete
  2. मानवता के साझे दर्द !

    ReplyDelete
  3. मानवता के साझे दर्द !

    ReplyDelete
  4. संवेदनशीलता की एक मिशाल है इस कहानी में... बेहद सुन्दर

    ReplyDelete
  5. दुनिया कैसी भी हो, मेरा मानना है कि कहानियाँ मीठी होनी चाहिए, और लोग भी।
    :)

    ReplyDelete
  6. सुन्दर प्रस्तुति ||

    ReplyDelete
  7. ओह...हाउ स्वीट!! :)

    ReplyDelete
  8. आपका पानी तो मेरे पास ही रह गया था। कहीं आपको रास्ते में प्यास न लगी हो, यह सोचकर मैं तो रात भर सो ही न सका।"
    ek ne kaha ek ne maani guru kahe dono hai gyani......

    jai baba banaras.....

    ReplyDelete
  9. कई बार हम वह देखते हैं जो वास्‍तव में होता नहीं है।

    ReplyDelete
  10. छोटी छोटी बातें बड़ा संकेत दे जाती हैं।

    ReplyDelete
  11. मानवता किसी भौगोलिक पहचान की मोहताज़ नहीं... सच सी कथा...

    ReplyDelete
  12. सो ही न सका! ओह!

    ReplyDelete
  13. शर्मा जी , यह तो लघु कथा कम , हकीकत ज्यादा लग रही है ।
    मासूमियत झलक रही है कथा में ।

    ReplyDelete
  14. किसी के साथ हुआ जरा सा अन्याय, निंद खोने के लिए पर्याप्त होता है। जब सम्वेदनशील हृदय हो हमारे पास।
    विनम्र प्रस्तुति!! आभार

    ReplyDelete
  15. एक स्माइली देने का मन कर रहा है.. अनवर भाई!!

    ReplyDelete
  16. आम जीवन में उपस्थित संवेदनशील सोच को लिए कहानी ...पढ़कर बाद अच्छा लगा ....

    ReplyDelete
  17. कथा अच्छी है , इंसानी फिक्रों से भरपूर ! इमरोज ने अनवार भाई को नाम बताने का मौक़ा तक नहीं दिया :)

    और कमरे में घुसते ही उन्हें हडबडी से विदा किया ये सब तो समझा कि नवागंतुक की मनः स्थिति क्या रही होगी जो यह सब घटा !

    अगर नमस्ते के बाद भी उनका रूहांसापन बरकरार रहा हो तो मुझे बेहद खुशी होगी और मैं इंसानी फिक्रों से भरपूर वाली अपनी बात पर टिका रहूँगा :)

    ReplyDelete
  18. अनवर भाई ! जय राम जी की !
    यह संवेदनशीलता है जो हमें एक दूसरे के समीप लाती है ....
    वैसे इस घटना से एक बात जो सामने आयी वह यह कि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी लोग एक जैसे ही हैं .......मतलब, "हग रे भालू छापे छाप" ...बस्तर में हड़बडिया लोगों के लिए यही मुहावरा स्तेमाल किया जाता है.

    ReplyDelete
  19. आह!
    कितना अपना-सा लगा यह वाकया।

    ReplyDelete
  20. समान परिस्थितियों में पले बढे लोगों के एहसासों में ऐसी समानता असंभव भी नहीं !

    ReplyDelete
  21. सुबह उठने तक सपने में भाँति-भाँति के उपवास रख चुका था।

    वाह! उपवास भी भाँति भाँति के.
    आपका संस्मरण रोचक और जानकारी पूर्ण लगा.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

    ReplyDelete
  22. आपकी लघुकथा पर मुझे अविनाश भाई की टिप्पणी सबसे अच्छी लगी दुनिया कैसी भी हो, मेरा मानना है कि कहानियाँ मीठी होनी चाहिए और लोग भी

    ReplyDelete
  23. मासूम सी स्वीट स्टोरी...

    ReplyDelete
  24. संवेदना के धरातल पर सभी जुड़े हुए हैं!
    सुन्दर कहानी!

    ReplyDelete
  25. महसूस कर ले मेरे दर्द को कोई,
    दवा हो जाता है मेरी, यह अहसास

    ReplyDelete
  26. @मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

    राकेश जी,
    आपके ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी दिख नहीं रही है।

    ReplyDelete
  27. बेहद सुन्दर कथा

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।