An Indian in Pittsburgh - पिट्सबर्ग में एक भारतीय

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारमनसानां तु वसुधैव कुटुंबकम्

गीता प्रवचन (विनोबा)

तुम्हारे बिना

Wednesday, August 27, 2008
जब हम
चल रहे थे
साथ साथ
एकाकीपन की
कल्पना भी
कर जाती थी
उदास
आज
मैं निस्संग़
तय कर चुका हूँ
असीम दूरियाँ
स्वयं
जलता हुआ सा
एक कृत्रिम
विश्वास लिये
मैं मृतप्राय सा
जीवन का
एहसास लिये
चलता जा रहा हूँ
तुम्हारे बिना।

20 टिप्पणियाँ:

  1. Udan Tashtari said...

    बहुत खूब!! वाह!

    August 27, 2008 10:02 PM  

  2. P. C. Rampuria said...

    जीवन का
    एहसास लिये
    चलता जा रहा हूँ
    तुम्हारे बिना।


    के बात सै मित्र ? इतनी उदासी क्यूँकर आई ?
    कोई गोरी कै चक्कर मै त नी आग्या सै म्हारा
    मित्र ! भाई बचकै ज़रा ! और ठीक सै नी मान्या
    त भाभी नै भी बताणा पडैगा ! :)

    सुंदर शब्द रचना ! बधाई !

    August 27, 2008 10:07 PM  

  3. madhupriya said...

    बेहद उम्दा और गहराई को छूती हुई रचना !
    शुभकामनाएं !

    August 27, 2008 10:25 PM  

  4. दीपक तिवारी said...

    आज मैं निस्संग़
    तय कर चुका हूँ
    असीम दूरियाँ

    दोस्त लगता है - कहीं चोट खा गए हो |
    तिवारी साहब भी खा चुके हैं | हम अनुभव
    से कह रहे हैं | पर भाव व्यक्त करने में सफल
    रहे हैं आप | शुभकामनाएं |
    - तिवारी साहब

    August 27, 2008 10:29 PM  

  5. दिनेशराय द्विवेदी said...

    कहाँ जा रहे हैं, हमें छोड़ कर?

    August 27, 2008 10:45 PM  

  6. makrand said...

    दिल के बेहद करीब | बहुत उम्दा रचना |

    August 27, 2008 10:51 PM  

  7. fundebaj said...

    सुभान-अल्लाह ... क्या हो रिया है ये ?
    मिजाज बदले बदले से हैं ? ? ?

    August 27, 2008 10:55 PM  

  8. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

    नाउम्मीदी बढ़ गयी है इस कदर, आरजू की आरजू होने लगी.
    बंधु लोग, मैं सही सलामत हूँ, कई डैडलाइंस से जूझ रहा था इसलिए दिमागी कसरत से बचने के लिए किशोरावस्था में लिखी एक पुरानी याद सामने रख दी थी. बस इतना ही - आपकी चिंताएं और शुभकामनाये पढ़कर अच्छा लगा!

    August 27, 2008 11:02 PM  

  9. Anil Pusadkar said...

    shukra hai mamla purana hai,purana bas mamla hi rahe rog purana na nikal jaye.bahut sunder,badhai

    August 27, 2008 11:56 PM  

  10. P. C. Rampuria said...

    चलिए तसल्ली हुई ! पर कुछ बात भी
    हो तो बता दीजियेगा ! वादा रहा ,
    अगर पहली ही गलती हुई तो भाभी जी
    को नही बताएँगे ! :) वैसे आपने ये तो
    कबूल ही लिया है की किशोरावस्था में ये
    गलती कर चुके हैं !
    अब उसको याद भी नही करिएगा वरना
    नतीजा तिवारी साहब से जान लीजियेगा !
    इनकी काफी दुर्गति पन्डताइन कर चुकी हैं ! :)
    क्यों तिवारी महाराज ?

    August 28, 2008 12:06 AM  

  11. रंजना [रंजू भाटिया] said...

    बहुत सुंदर जी ..कभी कभी पुरानी यादों के पन्नो में से कुछ लिखना बहुत अच्छा लगता है .आपकी यह याद पसंद आई

    August 28, 2008 12:27 AM  

  12. विक्रांत बेशर्मा said...

    बहुत अच्छी रचना है अनुराग जी !!!!!!!!!!

    August 28, 2008 5:32 AM  

  13. शोभा said...

    चल रहे थे
    साथ साथ
    एकाकीपन की
    कल्पना भी
    कर जाती थी
    रचना भले ही पुरानी हो पर भावनाएँ तो वही रहती हैं और विशेष परिस्थिति में पुनः जग जाती हैं। बधाई स्वीकारें।

    August 28, 2008 6:50 AM  

  14. नीरज गोस्वामी said...

    डेड लाइन के चक्कर में ख़ुद को डेड न करें बंधू...निराशा पूर्ण लेकिन फ़िर भी शब्द और भाव के लिहाज से उत्तम रचना...अगली पोस्ट एक मुस्कुराती रचना की होनी चाहिए...इन्तेजार रहेगा.
    नीरज

    August 28, 2008 9:14 AM  

  15. दीपक तिवारी said...

    अरे भाई ताऊ रामपुरिया जी आप क्यों
    हमारे पीछे पड़े हो ! अब ये क्या जरुरी है की
    पन्डताइअन जो मेरे साथ करेगी वो सबको बताया
    ही जाय ! अरे हमारी पन्डताइन है दो चार धर भी
    दिए तो पराई थोड़ी ही है ! आप भी तो ताई से हमेशा लट्ठ खाते रहते हो ! हम किसी को बताते हैं क्या ? आप ख़ुद ही चिल्लाते फिरते हो ! आप तो नंगे नबाव हो रहे हो ! अब हमारी तो ढकी रहने दो ! :)

    August 28, 2008 9:26 AM  

  16. Nitish Raj said...

    वाह बहुत खूब बहुत ही बढ़िया। उत्तम...अति सुंदर।।।।

    August 28, 2008 9:35 AM  

  17. अनुराग said...

    kya baat hai.....aaj udaas hai....

    August 28, 2008 10:12 AM  

  18. अशोक पाण्डेय said...

    भाई यहां तो पूरे घाघ श्रोता हैं, हमारे प्रिय कवि को सफाई देना पड़ गया :)
    कविता अच्‍छी है, आगे की कथा भी सुनने को मिलेगी क्‍या :)

    August 28, 2008 12:08 PM  

  19. दीपक said...

    मृतप्राय सा
    जीवन का
    एहसास लिये
    चलता जा रहा हूँ
    तुम्हारे बिना।

    भ‍इ वाह क्या बात है

    August 28, 2008 3:20 PM  

  20. Lavanyam - Antarman said...

    गहरे विषाद के भाव और उपर दोस्तोँ की चुहलबाजी !
    ..चलिये, समय को,
    " Fast Forward " ..
    कर दीजिये :)
    ..
    - लावण्या

    August 28, 2008 9:38 PM  

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