Tuesday, August 12, 2008

अनजाने लोग

(अनुराग शर्मा)



मेरे घर में मैं नहीं हूँ
बैठे हैं अनजाने लोग

मैं हूँ इक गुमनाम यहाँ
पर ये हैं जाने-माने लोग

दुख में स्वजन साथ नहीं हैं
पर हैं बिन पहचाने लोग

झूठी हमदर्दी के बहाने
आए दिल को जलाने लोग

उसका जिक्र किये जाते हैं
मेरे दिल की न जानें लोग।
 

13 comments:

  1. ऐसे भाव रखने वाले हर पोस्ट के साथ मैं सही निर्णय नही कर पा रहा हू..... इसे अच्छा कहू या बुरा..... ये बुरा है तो हमलोग भी इमानदारी से प्रयास नही कर रहे हैं उनसे मिलने की....

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  2. आप की रचना पढ़ कर जगजीत सिंह जी की गयी ग़ज़ल
    "आए हैं समझाने लोग
    हैं कितने दीवाने लोग
    वक्त पे काम नहीं आते
    ये जाने पहचाने लोग"
    याद आगयी...आपकी रचना कमाल की है...बहुत खूब.
    नीरज

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  3. झूठी हमदर्दी के बहाने
    आए दिल को जलाने लोग

    उसका जिक्र किये जाते हैं
    मेरे दिल की न जानें लोग।

    आज कल के माहोल में ढली यह सही लगी मुझे ..नीरज जी ने सही कहा वह गजल मुझे भी याद आ गई इसको पढ़ कर

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  4. घर में मैं नहीं हूँ
    बैठे हैं अनजाने लोग
    दुख में स्वजन साथ नहीं हैं
    पर हैं बिन पहचाने लोग
    झूठी हमदर्दी के बहाने
    आए दिल को जलाने लोग
    उसका जिक्र किये जाते हैं
    मेरे दिल की न जानें लोग। ,


    भई पूरी की पूरी कविता इतनी शानदार है की मुझे
    तो मेरे प्रिय सतसैया ही याद आ रहे हैं ! मित्र आप
    तो रोज एक तीर ऐसा ही मारा करो ! बहुत बहुत
    शुभकामनाएं और धन्यवाद !

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  5. बढ़िया रचना है...छोटी किंतु अपनी बात कहने में समर्थ.

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  6. मेरे घर में मैं नहीं हूँ
    बैठे हैं अनजाने लोग
    बहुत सुन्दर रचना, सच हे जब सच्ची हमदर्दी नहो,प्यार ना हॊ तो ऎसा ही लगता हे,आप ने छोटी सी कविता मे बहुत बडी बात कह दी.धन्यवाद

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  7. झूठी हमदर्दी के बहाने
    आए दिल को जलाने लोग

    उसका जिक्र किये जाते हैं
    मेरे दिल की न जानें लोग।


    सब लोगो ने पहले से ही बहुत कुछ कह दिया है......बस दिल से लिखिए..ओर मस्त रहिये.....

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  8. katu satya ko sundar shabdon me kaha aapne.

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  9. अगली कविता में आप के दिल की कहिएगा। हम बैठे हैं जानने को।

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  10. वाह!!
    बहुत खूब!!

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  11. कविता बहुत अच्छी है...
    कई दिनों से कुछ गद्य पढने में नही आया आपका... कब लिखेंगे?

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  12. झूठी हमदर्दी के बहाने
    आए दिल को जलाने लोग

    उसका जिक्र किये जाते हैं
    मेरे दिल की न जानें लोग।

    बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

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