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| कैसा होता है प्यार? जीत के सब बस हार |
सीमा तुम जकड़े थीं मुझको
अपनी कोमल बाँहों में
भूल के सुधबुध खोया था मैं
सपनीली राहों में
छल कैसा सच्चा सा था वह
जाने कैसे उबर सका
सत्य अनावृत देखा मैंने
अब तक था जो दबा ढंका
सीमा में सिमटा मैं अब तक
था कितना संकीर्ण हुआ
अज्ञ रहा जब तक असीम ने
मुझको नहीं छुआ।
सीमित होने के अपने सुख और दुःख हैं !
ReplyDeleteअनुराग जी ,अपने ब्लॉग की सेटिंग ठीक कर लो...इस पोस्ट को पढ़ लें !
ReplyDeletehttp://primarykamaster.blogspot.com/2012/01/blog-post_12.html
जी आभार!
ReplyDeleteउत्तर भी वहीँ दीजिये महाराज :-)
Deleteशुभकामनायें !
उत्तर पहले दे दिया। सैटिंग बाद में बदली, क्योंकि एक कारण से मैं रुकने की सोच रहा था।
Deletekhoobsurat kavita
ReplyDeleteसुन्दर कविता ..गहरे अर्थ..
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
kalamdaan.blogspot.com
बह्त ही सुन्दर कथन!!
ReplyDeleteअज्ञ रहा जब तक असीम ने
मुझको नहीं छुआ।
दायरों से निकलकर ही अनंत की खोज की जा सकती है..सुन्दर.
ReplyDeleteसुन्दर रचना. किसी ने बताया की दो 0 (शून्य) से मिलकर 8 बनता है .8 दिशाए हैं.
ReplyDeleteसुब्रामणियन जी, आभार! दो शून्य मिलकर अनंत (∞) का चिंन्ह भी बनता है।
Deletebahut sundar prtyutar...
Deleteअज्ञ रहा जब तक असीम ने
ReplyDeleteमुझको नहीं छुआ...
सुन्दर !
सीमाओं से घिरे हुये जाने कितने जीवन तड़पे हैं।
ReplyDeleteयह कौन वाली सीमा है?
ReplyDeleteअसीम फलक को छूते हुए भी न जाने क्यों सीमा में बंधना अच्छा लगता है ..
ReplyDelete:)
Deleteअसीम का अनुबोध संतृप्त करने में सक्षम है
ReplyDeleteप्यारी और प्रेरणास्पद रचना ..
खूब-सूरत प्रस्तुति |
ReplyDeleteबहुत-बहुत बधाई ||
अज्ञ रहा जब तक असीम ने
ReplyDeleteमुझको नहीं छुआ।
सीमा में रहकर सोच भी सीमित हो जाती है....सुन्दर कविता
sundar rachna..
ReplyDeleteआज हम भी सुब्रमनियन जी और आपके संवाद के साथ :)
ReplyDeleteसीमा में रहने से ज्ञान भी सीमित रह ही जाता है ।
ReplyDeleteअज्ञ रहा जब तक असीम ने
ReplyDeleteमुझको नहीं छुआ।
bahut sundar ....
बहुत बढ़िया!
ReplyDeleteलोहड़ी पर्व की बधाई और शुभकामनाएँ!
सीमाओं का आलिंगन और असीम का चुम्बन... बहुत खूब!!
ReplyDeleteप्रेम की कोई सीमा नहीं होती और निश्चल पेम में कुछ दबा-ढंका नहीं होता॥
ReplyDeleteबिहारी से शुरू करके कबीर तक ले गए हो गुरु |
ReplyDeleteसीमा में असीम का बोध...परम-अवस्था!!!
ReplyDelete'स्व' के 'सर्व' में परिवर्तित हो जाने की एक अनुभूति।
ReplyDeleteइस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - लोहडी़ और मकर सक्रांति की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाये - ब्लॉग बुलेटिन
ReplyDeleteआभार शिवम जी!
Deleteस्वस्थ, सुखद अनुभूति। बहुत खूब।
ReplyDeleteलगता है कोई उच्चाटन की दशा है :)
ReplyDelete:)
ReplyDeleteसीमानुराग! सीमा का अनुराग! :)
ReplyDeleteन, असीमानन्द!
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