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Thursday, September 27, 2018

स्वप्न का अर्थ

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे की पिछली कड़ियाँ
भाग 1; भाग 2; भाग 3भाग 4; भाग 5भाग 6; भाग 7;
सत्याभास (कहानी); किशोर चौधरी के नाम (पत्र)


सपने सबको आते हैं। सपने न आने का एक ही अर्थ है, सपना भूल जाना। और सपने देखने का अर्थ भी एक ही है, सपने के बीच नींद खुल जाना। स्वप्न वह दृश्यावली नहीं है जो आपने देखी, स्वप्न वह कहानी है जो एकसाथ घटती बीसियों ऊलजलूल घटनाओं को बलपूर्वक एक क्रम में बांधकर तारतम्य बिठाने के लिये आपके मस्तिष्क ने गढ़ी है।
पिछली कड़ियों में हमने स्वप्न को समझने के प्रयास के साथ-साथ मानव मस्तिष्क द्वारा तार्किकता बनाये रखने के लिये खेले जाने वाले कुछ अतार्किक खेलों का अध्ययन किया था। अब, इन्हीं तथ्यों के प्रकाश में कुछ स्वप्नों की सरल व्याख्या प्रस्तुत है। आज का स्वप्न सम्बन्धी प्रश्न -

स्वप्न: मैं सपने में जो भी काम करना शुरु करता हूँ वह कभी भी सम्पन्न नहीं हो पाता। क्या कोई मित्र इसकी व्याख्या या अर्थ समझा सकता है? ऐसा लगभग 20-25 साल से तो अवश्य ही घटित हो रहा है।

व्याख्या: सर्वप्रथम, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आपका स्वप्न वह नहीं जो आपने नींद में अनुभव किया, बल्कि उस अनुभव में से जितने अंश याद रह गये, स्वप्न उन अंशों से बुनी हुई तार्किक कथा मात्र है। इनमें से अनेक अंश एक दूसरे से पूर्णतः असम्बद्ध हो सकते हैं।

यदि आप स्वप्न में अक्सर कोई न कोई कार्य आरम्भ कर रहे होते हैं तो इसका सरल अर्थ यही है कि आपके मानकों के अनुसार आपके कार्य अभी अपूर्ण हैं। स्वप्न में उनका सम्पन्न न हो पाना भी यही दर्शाता है कि अभी आप अपने उद्देश्य को पूर्ण मानने की स्थिति में नहीं हैं।

सुझाव: मेरी सलाह यही है कि आप एक नई नोटबुक लेकर अपने जीवन के अपूर्ण/ पेंडिंग कार्यों की सूची बनाएँ, और उन कार्यों से सम्बंधित समस्त जानकारी, जैसे कार्य का महत्व, लागत, समय, बाधाएँ, सहयोगी, आदि को एकत्र करके उनकी परियोजना बनाकर कार्य करें। इससे दोहरा लाभ होगा। सम्पन्न होते जा रहे कार्यों की सूची सदा उपलब्ध होगी, और अपूर्ण कार्यों की वर्तमान स्थिति और सम्भावित अवधि अद्यतन रहेगी।
- अनुराग शर्मा

[क्रमशः]

Monday, September 3, 2018

कहानी: सत्याभास

आइये मिलकर उद्घाटित करें सपनों के रहस्यों को. पिछली कड़ियों के लिए कृपया निम्न को क्लिक करें: खंड [1]खंड [2]खंड [3]खंड [4]खंड [5]खंड [6]; खंड [7]और अब आज की कड़ी में, एक कहानी

वीरान जगह पर बने उस पुराने महलनुमा घर के विशाल आंगन में पड़ी चारपाई पर दुखी सा बैठा हुआ मैं सोच रहा था कि यूरोप के इस अनजान पहाड़ी जंगल के बीचोंबीच स्थित ऐसी भुतहा सी जगह में घर लेने की बात मैंने सोची ही क्यों। और अगर सोची भी तो घर देखे बिना ही बात नक्की क्यों कर दी। चूंकि इस घर की हमारी खरीद इसे देखे बिना ही ऑनलाइन तथा फ़ोन पर हुई थी इसलिये हमारी प्रॉपर्टी एजेंट आज यहाँ आकर हमें अपने इस नये खरीदे ऐतिहासिक भवन का टूर कराने वाली थी।

थकाने वाली कठिन यात्रा करके मैं सपत्नीक यहाँ पहुँचा था। पास के नगर में रहने वाले पुराने पर्वतारोही मित्र को पहले ही संदेश देकर यहाँ बुला लिया था। प्रॉपर्टी एजेंट का इंतज़ार करते-करते पत्नी को तो नींद भी आ गई थी सो वे अंदर जाकर सो गई थीं और मैं मित्र के साथ पीली पुती पुरानी दीवारों से घिरे आंगन के एक कोने में पड़ी मूंज की चारपाई पर बैठा बात कर रहा था। मित्र उस क्षेत्र का इतिहास बता रहा था। एक रेखाचित्र दिखाकर उसने समझाया कि प्राचीनकाल में किस प्रकार सेना विपक्षी किले से ऊपर की पहाड़ियों से मलमूत्र के ढेर बहाना शुरू करती थी। गंदगी आती देख किले के सैनिक ऊपर के पहाड़ी स्रोत से किले को आते पेयजल की आपूर्ति दूषित होने से बचाने जाते थे और वहाँ पहले से ही रणनीतिक ठिकानों पर छिपे शत्रुपक्ष द्वारा घेरकर मार दिये जाते थे।

झुटपुटा होने लगा है। घर में बिजली नहीं है। बड़े से आंगन के एक तरफ़ घर का बरामदा और फिर उसके पीछे बहुत से कमरे हैं। उस बरामदे के विपरीत दिशा में बाहर का दरवाज़ा और चबूतरे से नीचे उतरती हुई सीढ़ियाँ हैं। जंगली रात की नीरव शांति में वहीं दूर नीचे से इस मकान की एजेंट की आवाज़ सुनाई देती है। अभी वह दिखती नहीं है। उसकी आवाज़ सुनते ही कुछ सकपकाया सा मित्र बड़ी जल्दबाज़ी में मुझसे विदा लेकर लगभग भागता हुआ सा घर से बाहर निकल जाता है।

उसकी इस हरकत से आश्चर्यचकित मैं, अपने वर्तमान घर की गरमाहट याद करके सोचता हूँ कि अच्छा-भला घर होने के बावजूद ऐसे बेहूदे घर के लिये हमने हाँ की ही क्यों? आंगन की शेष दो दिशाओं में बिना दरवाज़ों के अनेक प्राचीन दर हैं, बारादरियों जैसे, जिनकी गहराई का अंधेरे के कारण मुझे अंदाज़ नहीं लग पा रहा। मेरी सतर्क बुद्धि उन्हें सुरक्षा का खतरा मानकर मन ही मन यह तय कर रही है कि सुबह उठते ही मेरा पहला काम उन्हें बंद कराने का होना चाहिये।

प्रॉपर्टी एजेंट भीतर आ गई है। उससे फ़ोन पर पहले बात हो चुकी है लेकिन भेंट का यह पहला अवसर होगा। अंधेरे में उसका चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता, तो भी उसका बड़ा अजीब सा चश्मा और एक मर्दाना सा विग उसे रहस्यमयी बना रहा है। मेरे शक़्क़ी दिल को ऐसा लगता है जैसे वह अपनी पहचान छिपाने का प्रयास कर रही हो। पत्नी उसके स्वागत में बरामदे से बाहर आती है। पत्नी उससे इस जगह और घर के वीरान होने की शिकायत करती है तो वह पत्नी को समझाती है कि इस घर में हैलोवीन के पर्व पर ‘स्पूकी नाइट’ का खेल मज़े से खेला जा सकता है। एजेंट पत्नी को अपने फ़ोन पर इन्स्टाल्ड स्पूकी ऐप दिखाती है जिसे त्रिविमीय प्रोजेक्टर से जोड़ा जा सकता है। वे दोनों बातें करने लगते हैं। मैं उसकी बात सुनना तो चाहता हूँ लेकिन दिन भर की यात्रा और काम की थकान के कारण मुझे बहुत नींद आ रही है। न चाहते हुए भी सर भारी हो रहा है और आँखें मुंदने लगी हैं। लेकिन एजेंट द्वारा चलाई जा रही ‘स्पूकी ऐप’ की दर्दनाक और भयावह आवाज़ें सुन पा रहा हूँ। पत्नी की आवाज़ सुनाई देती है, “अरे ये सब तो एकदम सचमुच के भूत जैसे लग रहे हैं। आभासी होकर भी इतने वास्तविक!” मैं आँख खोलकर देखने की कोशिश करता हूँ लेकिन तब तक एप्प बंद हो चुकी है। मैं एजेंट को एक बार फिर से ऐप चलाने को कहता हूँ, ताकि मैं ठीक से देख और समझ सकूँ लेकिन वह कहती है कि एक प्रीव्यू चल चुकने के बाद अब इसे खरीदने के बाद ही चलाया जा सकता है। वह पत्नी को ऐप की खरीद के सारे डिटेल दे देती है।

एजेंट ने पत्नी को घर का नक्शा दिखाया। नक्शा देखकर पत्नी कहने लगी कि जब इस जंगल में जगह की कोई कमी नहीं थी तो फिर ठीक कब्रिस्तान के ऊपर ही घर बनाने की क्या ज़रूरत थी? यह सुनते ही मैंने नक्शा अपने हाथ में लेकर ध्यान से देखा। उसमें घर के ठीक नीचे एक के ऊपर एक सैकड़ों कब्रों की कई परतें बनी हुई दिखाई दीं। मुझे लगा कि यह तो बुरे फँसे। मैंने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन एजेंट ने कुछ ऐसी नज़रों से मुझे देखा कि तीन-चार बार प्रयास करने पर भी किसी भयावह सपने की तरह मेरे सूखे गले से आवाज़ बाहर नहीं आ सकी। एजेंट को इशारे से घर दिखाने को कहा तो वह मुख्य भवन के बरामदे और बेडरूम की ओर जाने के बजाय उजाड़ बारादरी की ओर चल पड़ी। घर में बिजली नहीं थी। रात भी या तो कृष्णपक्ष की थी या फिर आकाश में घने बादल थे। हम तीनों में किसी के पास भी कोई टॉर्च या लैम्प आदि नहीं था लेकिन फिर भी किसी हल्की सी रोशनी में कुछ दूर तक का दिखाई दे रहा था।

पत्नी अब वहाँ नहीं है, मैं इधर-उधर देखता हूँ और उसे पास न पाकर उसके बारे में एजेंट से पूछना चाहता हूँ। लेकिन उसने अपने ठण्डे, हड़ियल हाथ से मेरी कलाई कुछ ऐसे पकड़ ली है कि मैं कुछ कह नहीं पाता। वह मेरे साथ चल रही है लेकिन मैं उसे देख नहीं सकता हूँ। मेरे पूछे बिना ही वह समझ जाती है कि मैं उसके अदृश्य होने का कारण जानना चाहता हूँ। तब वह मेरे सर से चिपका तकिया दिखाती है जो उसके लिये मेरी दृष्टिबाधा बन रहा था। तकिये पर ध्यान जाते ही मुझे लगता है जैसे मैं तब नींद में ही था और सोते-सोते, तकिये पर सिर रखे हुए ही उसके साथ चल रहा था।

बीच में कई भयावह बातें हुईं, जिनका ज़िक्र यहाँ निरर्थक है। मैं इस विषय में पत्नी से कुछ बात करना चाहता था पर वह तब भी मुझे नहीं दिखी। शायद वह मुख्य भवन में, बरामदे के पीछे वाले कमरों के अंदर ही कहीं थी। एजेंट ने घर की एक दीवार दिखाते हुए उस पर पुते रंग का कोई अंग्रेज़ी या लैटिन नाम बताया। स्पष्ट कर दूँ कि उस परदेस में हम लोगों की समस्त वार्ता अंग्रेज़ी में ही चल रही थी। घुप्प अंधेरे में मुझे न तो दीवार ठीक से दिखी, और न ही अंग्रेज़ी में कहा वह रंग समझ आया। मैं उससे उस रंग के नाम का अर्थ पूछता हूँ तो हिंदी का वाक्य सुनाई दिया, 'अरे बैंगनी रंग, और क्या?' मैं अचम्भित हो उठा कि एक अनजान देश में अनजान जाति की महिला अचानक स्पष्ट हिंदी कैसे बोलने लगी। तब मैंने चौकन्ने होकर पूछा, “यह कौन बोला? हिंदी में किसने कहा?” तभी अचानक से सामने दिखने लगी एक सुंदर युवती ने कहा, “आई वर्क्ड विथ एन इंडियन फैमिली। वे बेंगाली थे, मैंने वहीं हिंदी सीखी।" सब कुछ स्पष्ट सा दिखने लगा। रोशनी का स्रोत कहीं नहीं दिखा लेकिन देखा कि वहाँ सब कुछ हल्का सा प्रकाशित था। कुछ कमरे थे, और उन कमरों के आगे और भी कमरे थे, शायद बुरी तरह पकी काली ककैया ईंट के। लड़की के पास ही एक और लड़की खड़ी थी, इस लड़की से थो‌ड़ी सी बड़ी। छोटी लड़की ने बड़ी लड़की को इंगित करके कहा, “इसी ने मेरा खून कर दिया था।”

अब मुझे स्पष्ट होने लगता है कि मैं किसी गड़बड़झाले में फँस चुका हूँ। प्रॉपर्टी एजेंट सहित वे सभी शायद भूत थे। दृष्टि कुछ और साफ़ हुई है। आगे के कमरों में काले सूट-बूट, चिमनी हैट और सफ़ेद दस्ताने पहने कई लोग स्ट्रेचर जैसे लेकर जा रहे हैं। उनका केवल चेहरा खुला है। चेहरा आम इंसानों जैसा न होकर अस्थिमात्र है। हम उनसे कुछ इस तरह घिर गये हैं कि उनके साथ ही चलना पड़ रहा है। वे अचानक दीवार में बने खुले दरवाज़े से बाहर निकलकर दरवाज़े के बाहर दीवार से लगी बिना रेलिंग की खुली सीढ़ियों से चलकर कई मंज़िल नीचे बने खुले बड़े आंगन, या अंटिया की ओर जाने लगते हैं। कुछ लोग हमारे आगे हैं कुछ पीछे।

मैं उनकी असलियत जानने को उत्सुक हूँ। एक बार साहस करके उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिये ‘हरि ॐ’ कहता हूँ तो मेरे आगे वाला व्यक्ति अपना मुख मेरी ओर मोड़कर बिना सामने देखे आराम से सीढ़ी उतरते हुए मुँह पर उंगली रखकर श्श्श कहकर मुझे कुछ दिखाते हुए कहता है, “आवाज़ से उनके ध्यान में बाधा पहुँचेगी।” मैं देखता हूँ कि हर सीढ़ी के समांतर, हवा में ही लामाओं की तरह पद्मासन में बैठे हुए कई कंकाल, काले कपड़ों में ऐसे लिपटे हुए हैं कि उनकी केवल खोपड़ी दिख रही है हैं। मेरी आवाज़ सुनकर उनमें से कई अपना-अपना मुँह घुमाकर मेरी ओर करते हैं और अपनी तरेरने वाली नज़र से आँखों के गड्ढे मुझ पर केंद्रित कर देते हैं। उनकी नज़रों की उपेक्षा कर मैंने एक बार और अधिक ज़ोर से ‘हरि ॐ’ कहा, और मेरी नींद खुल गयी।

हे भगवान, यह कैसा स्वप्न था। अब मैं आभासी जगत से वापस यथार्थ में आ तो गया था लेकिन आँखें जल रही थीं, खोलने में भी कठिनाई हो रही थी। मैं मुँह धोने के लिये स्नानागार में जाता हूँ। बत्ती जलाकर शीशे में देखता हूँ तो मेरे कंधे के पीछे से कोई मुस्कुराता हुआ दिखता है। मेरे ठीक पीछे हवा में टंगा हुआ कंकाल काले कपड़ों में पद्मासन लगाये हुए ही, मुझे देखकर हँसता है।

“तुम कौन हो?” मैं कहना चाहता हूँ, परंतु आवाज़ नहीं निकलती। गला घुट सा गया है। चिल्लाता हूँ तो हाथ मसहरी के हैडबोर्ड से टकराता है। अब मैं सचमुच जग गया हूँ, तकिया मेरी गर्दन से चिपका हुआ है। और पसीने से लथपथ अपने बिस्तर पर पड़ा हूँ। पंखा चल रहा है लेकिन हवा मुझ तक नहीं आ रही। पंखे से उल्टा लटका हुआ कंकाल मुझे एकटक देख रहा है।

Friday, April 2, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [7]

सपना एक क्षणिक पागलपन है जबकि पागलपन एक लंबा सपना है.
~आर्थर स्कोपेन्हौर (१७८८-१८६०)


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इस शृंखला को मैं जितना आगे बढ़ रहा हूँ, आपकी रोचक टिप्पणियों और जानकारी से लिखने का मज़ा बढ़ता जा रहा है.

स्वप्न में, देजा व्यू में बल्कि हमारे दिमाग में समय उस तरह एक रेखा में नहीं चलता है जैसे हम उसे मानते आये हैं. हाथ से नाक छूने के पिछले एक उदाहरण (संवेदी देरी) में और "ब्रेन टाइम" आलेख में हमने देखा कि काल की रैखिक गति की परिकल्पना का काल बीत चुका है. इसके अलावा दीवार की खिड़की में शीशा ढूंढना या चोरों की प्रकृति के बारे में विचार जैसे कार्यों में कोई इन्द्रियारोपित सीमाएं भी नहीं हैं इसलिए वे सारे कार्य एक अल्पांश में एक साथ प्रसंस्कृत हो सकते हैं. इसी रोशनी में, पिछली बार के सपने के बारे में आपका अंदाज़ सही है. यह सपना दरवाज़े पर क़दमों की आहट से शुरू हुआ और दरवाजा खुलने के साथ ख़त्म हो गया. कुल समय दो या तीन  पल.


स्वप्न और सृजनशीलता
पिछली कड़ियों में गिरिजेश राव ने चुटकी ली थी कि सपना देखने का सम्बन्ध कल्पनाशीलता से है. तो उनके बहाने आज का रहस्योद्घाटन - गोरा सपना भैस बराबर. मतलब यह कि सपने गाय भैंस और अन्य (स्तनधारी) प्राणियों को भी वैसे ही आते हैं जैसे हम मनुष्यों को. अब जरा बताइये कि बुद्धू घोसी की भैंस कितनी शायरी करती है या नत्थू कुम्हार का गधा अब तक कितने घोडे पेंट कर चुका है? मतलब यह कि सपने न देखने का (या भूल जाने का) कल्पनाशीलता पर बुरा असर नहीं पडता है. स्वप्न के अनेकों सिद्धांतों में से एक के अनुसार स्वप्न (देखकर) भूल जाना आपके दिमाग (और कल्पनाशीलता) को दुरुस्त रखता है.

"लाल लकड़ी के चालीस लट्ठे" नामक त्रिविमीय कलाकृति का चित्र अनुराग शर्मा द्वारा खींचा (और पलटा) गया [Forty redwood logs - photograph taken and put upside down by Anurag Sharma]

[क्रमशः]

Friday, February 19, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [6]

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अलार्म से पहले उठना - मेरा अवलोकन
प्रतिदिन एक ही समय पर उठने की बात और है. मगर हर दिन के अलग-अलग अलार्म से कुछ क्षण पहले उठने का अजूबा? आज सुबह मेरे उठने के पल भर बाद मेरे सेलफोन का छह बजे का अलार्म बजने लगा. मैंने तुरंत उसे बंद किया और देखा कि फ़ोन में छह बजकर दो मिनट हो चुके थे. मतलब यह कि अलार्म बजने से उसके बंद होने तक 2 मिनट से अधिक (और 3 से कम) गुज़र चुके थे जो मेरे अंदाज़े के एक पल से कहीं अधिक है. स्पष्ट है कि मैं अलार्म के दो मिनट तक बजते रहने के बाद उठा था मगर मेरे दिमाग को या तो इसका कतई भान नहीं था या फिर सोने और जागृति के बीच के पल में ऐन्द्रिक (श्रवण) अनुभूति ग्रहण करने में कोई रुकावट आई थी. और मैं इसी भ्रम में जीता रहा हूँ कि अलार्म मेरे जागने के बाद बजता है. पुरानी अनालॉग टाइमपीस घड़ी में यह संवेदी देरी पहचानना आसान नहीं है खासकर जब आप उठकर जल्दी से अपनी रेल, बस या जहाज़ पकड़ने की फ़िक्र में हों. मगर आजकल डिजिटल घड़ियों ने यह काम आसान कर दिया है. समीर जी और मुसाफिर भाई, अगली बार बारीकी से समय ज़रूर चेक करिये.

एक किस्सा
आधी रात में कुछ खड़खड़ होती है और आँख खुल जाती है. देखता हूँ कि बैठक में पड़े सोफे पर सो रहा हूँ. हल्का सा आश्चर्य भी होता है, फिर याद आता है कि शाम को ज़्यादा थक गया था. सामने की दीवार पर बहुत बड़ी (लगभग 5x12 वर्ग फुट) आयताकार खिड़की है. यहाँ आमतौर पर खिडकियों, दरवाजों के बाहर लोहे की सलाख या लकड़ी की किवाड़ आदि नहीं होते हैं. खिड़की में से चांदनी छनकर अन्दर आ रही है. आसमान बहुत साफ़ है. तारे झिलमिला रहे हैं और चौदहवीं का चांद बहुत सुन्दर दिखाई दे रहा है. रात में भी खिड़की इतनी साफ़ है कि मुझे लगता है मानो उसमें शीशा हो ही नहीं. मैं ध्यान से देखता हूँ तो पाता हूँ कि शीशा सचमुच नहीं है. मतलब यह कि खिड़की के नाम पर बस दीवार में एक बड़ा सा खाली छिद्र है.

अब मुझे खड़खड़ की उस आवाज़ की फ़िक्र होती है जिसकी वजह से मेरी आँख खुली थी. मैं साँस रोककर सुनता हूँ, कुछ नहीं है, मुझे पुलिस अधिकारी फूफाजी की बात याद आती है कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली बातों से उलट असली ज़िन्दगी में चोरी-चकारी जैसे व्यवसाय को अपनाने वाले लोग काफी काहिल और लालची किस्म के लोग होते हैं. यदि उन्हें ज़मीन पर ही कुछ चुराने को मिल जाए तो वे एक मंजिल भी नहीं चढ़ते. अगर खिड़की खुली मिल जाए तो वे ताला तोड़ने की ज़हमत नहीं करते.

उनकी बात याद आते ही मुझे इस तथ्य का संतोष होता है कि मेरा अपार्टमेन्ट पाँचवीं मंजिल पर है. फिर भी ऐसा क्यों लगता है जैसे कि सोफे के पीछे दो क़दमों की आवाज़ आयी थी? मैं फिर से सोचता हूँ, तब याद आता है कि पाँचवीं मंजिल पर तो पिछ्ला अपार्टमेन्ट था, यह वाला तो ग्राउंड फ्लोर पर ही है. मुझे अपनी इस बेवकूफी पर ताज्जुब होता है. अब मैं बिलकुल चौकन्ना होकर लेटा हूँ. आँख नाक कान सब खुले हैं. तभी...

तभी सामने का दरवाज़ा खुलता है. इसके साथ ही मैं एक क्षण गँवाए बिना "कौन है?" चिल्लाता हुआ चादर फेंककर दरवाज़े तक पहुँच जाता हूँ. देखता हूँ कि दरवाज़े पर श्रीमती जी खड़ी हैं. ताला उन्होंने अपनी चाबी से खोला था. कल रात हम सब उनकी बहन का जन्मदिन मना रहे थे. मेरा कुछ काम रह गया था सो मैं जल्दी वापस आ गया था और काम पूरा करके बाहर सोफ़े पर ही सो गया था. वे रुक गयी थीं और अभी वापस आयी थीं. पत्नी से पूछता हूँ कि क्या उन्होंने मुझे कुछ कहते सुना, उनका जवाब नकारात्मक है. बताने की ज़रूरत नहीं कि मेरे चादर फेंकने से पहले तक की हर बात एक स्वप्न का हिस्सा थी. सुबह हो चुकी थी और सोफा के सामने वाली दीवार पर कोई खिड़की नहीं थी.

स्वप्न को गतिमान करने में माहौल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. उपरोक्त स्वप्न पूरी तरह मेरी पत्नी के क़दमों की आवाज़ और दरवाज़ा खोलने के प्रयत्न से संचालित था. फूफाजी से चोरों के विषय में मेरी कोई बात कभी नहीं हुई थी. यह विचार मेरे दिमाग में ठीक उसी तरह आया जैसे कि जागृत अवस्था में आया होता. मगर ख़ास बात यह है कि यह विचार किसी बीती हुई घटना पर आधारित न होकर उसी समय की परिस्थिति की प्रतिक्रया स्वरूप बना था. हाँ स्वप्न में यह दुविधा ज़रूर थी कि अपार्टमेन्ट किस मंजिल पर है क्योंकि मैं अतीत में विभिन्न मंजिलों पर रह चुका था. वैसे यह वाला अपार्टमेन्ट पाँचवीं मंजिल पर ही था.

यह सपना किसी सामान्य सपने जैसा ही है मगर यहाँ इस विशेष सपने का ज़िक्र करना मैं बहुत ज़रूरी समझता हूँ क्योंकि यह सपना कई महत्त्वपूर्ण बातें बता रहा है. क्या आप अंदाज़ लगा सकते हैं इतना विस्तृत सपना देखने में मुझे कितनी देर लगी होगी और क्यों?

[क्रमशः]

Thursday, February 18, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [5]

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स्वप्न के बारे में आगे बात करने से पहले जल्दी से हमारे दिमाग द्वारा हमारे साथ अक्सर लिए जाने वाले कुछ पंगों पर एक नज़र डालते चलें.

अलार्म से पहले उठना
हम सभी ने अनुभव किया होगा जब हम सोने से पहले अलार्म लगाते हैं और सुबह को उससे पहले ही उठ जाते हैं. यदि आप रोज़ एक ही समय का अलार्म लगाते हैं तो आपकी जैव-घड़ी उस समय की अभ्यस्त हो चुकी है. जिन्हें काम के सिलसिले में अलग-अलग जगहों की यात्राएँ करनी पड़ती हैं उनको हर बार अलग-अलग समय का अलार्म लगाना पड़ता है. मेरे साथ ऐसा होता था और मेरी जैव-घड़ी को किसी भी अलार्म के समय के बारे में जानने या उसका अभ्यस्त होने का कोई तरीका नहीं था. फिर भी मैं लगभग हमेशा ही अलार्म से कुछ क्षण पहले उठ जाता था. अलार्म मेरे सामने बजता था और मैं आश्चर्य करता था कि मेरी जैव घड़ी को आज के समय के बारे में कैसे पता लगा. काफी खोजा, पूछा, पढ़ा परन्तु इसका स्पष्टीकरण मुझे नहीं मिला. क्या आपके साथ ऐसा हुआ है? अगली कड़ी में मैं अपना अवलोकन सामने रखता हूँ.

संज्ञानात्मक मतभेद
संज्ञानात्मक मतभेद (Cognitive dissonance) एक ऐसी दर्दनाक स्थिति है जिसमें विपरीत-धर्मी विचार एकसाथ उपस्थित होते हैं. कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन का विषाद इसका उदाहरण हो सकता है. कोई और अच्छा उदाहरण ध्यान में नहीं आ रहा है. एक सतही उदाहरण की कोशिश करता हूँ जहां एक अहिंसक व्यक्ति जल्लाद की नौकरी करता है और वह अपराधी को फाँसी चढाते वक्त, "हुक्म है सरकार का, मैं बेक़सूर हूँ" कहकर आराम से घर आकर भोजन कर पाता है क्योंकि उसके मानस में यह बात पक्की है कि फाँसी का कृत्य सरकार के आदेश से और मृतक के अपराध से तय हुआ है न कि उस जल्लाद के वहाँ होने से. हमारा मस्तिष्क भी उस जल्लाद की तरह हमें संज्ञानात्मक मतभेद से बचाने का भरसक प्रयत्न करता रहता है और उसके लिए भ्रम बनाता रहता है. नतीजा यह कि कई बार हमें चीज़ें वास्तविकता से भिन्न दिखती हैं.

देजा व्यू
बहुत से लोगों ने जीवन में कभी न कभी ऐसा महसूस किया है कि जो कुछ घट रहा है वह पहले घट चुका है. कई बार तो यह अनुभव इतना अलौकिक होता है कि आप काफी देर तक पहले से यह सोच पाते हैं कि इस घटना का अगला एक्ट क्या होगा. सब कुछ एक नाटक की तरह घटता जाता है. इस घटना को देजा वू या देजा व्यू (Déjà vu फ्रेंच = पहले देखा हुआ) कहते हैं. देजा व्यू में हम जिस प्रकार से वर्तमान को अतीत में हो चुका पाते हैं वह मुझे एक तरह से एक भविष्यवक्ता स्वप्न की विपरीत (या पूरक) अवधारणा जैसी लगती है. मेरे एक अमरीकी सहकर्मी लगभग हर मास देजा व्यू का अनुभव करते हैं जबकि मुझे इसका अनुभव बचपन में सिर्फ एक बार एक प्रियजन की मृत्यु के समय हुआ था.

देजा व्यू होता है इस पर वैज्ञानिकों में कोई असहमति नहीं है. इसकी व्याख्या करने के प्रयास भी हुए हैं. उनका ज़िक्र करने से पहले एक छोटा सा प्रयोग करते हैं. आप अपने हाथ से अपनी नाक को छुएँ और बताएँ कि पहले आपका हाथ नाक से छुआ या नाक हाथ से? आप कहेंगे कि दोनों एक साथ छुए. बात सच है. दोनों एक साथ छुए हैं और आपके दिमाग ने भी यही बात आपको बिलकुल सच-सच बताई. ख़ास बात यह हुई कि सच को सच जैसा दिखाने के लिए दिमाग ने आपसे एक छोटा सा धोखा किया. आपकी नाक के स्पर्श का संकेत दिमाग तक काफी पहले पहुँच गया था मगर उसने यह राज़ आपको तब तक नहीं बताया जब तक कि उसे वही संकेत आपके हाथ से नहीं मिला. ताकि आप कहीं इस संज्ञानात्मक मतभेद में न पड़ जाएँ कि नाक पहले छुई और हाथ बाद में. इस प्रकार जिस अनुभव को आप रियलटाइम समझते हैं उन सबको आपका दिमाग कुछ देर रोककर, उनमें से सारी विसंगतियाँ हटाकर फिर आपको सौंपता है. इस घटना को संवेदी देरी (Sensory delay) कहते हैं.

जब कभी किसी कारणवश (थकान, चुस्ती या कुछ और?) संवेदी देरी का काम गड़बड़ा जाता है तो हमें देजा व्यू जैसे अजीबोगरीब अनुभव होते हैं. हाथ का सन्देश मिलने पर नाक का सन्देश याद आता है और मन कहता है कि यह घटना पहले हो चुकी है.संवेदी देरी के सन्दर्भ में विस्तार से जानने के इच्छुक डेविड ईगलमैन (David M. Eagleman) का अंग्रेज़ी में लिखा लेख "ब्रेन टाइम" पढ़ सकते हैं.

इन्द्रियारोपित सीमाएँ (Sensory limitations)
अगर कभी आपको दो तीन लोगों से एक साथ अलग अलग विषय पर बात करनी पडी हो तब आपने देखा होगा कि आपके कथन उन्हें भ्रमित कर सकते हैं क्योंकि आपका दिमाग भले ही सारी बातचीत आराम से कर पाए आपका मुँह तो एक समय में एक ही व्यक्ति से बात कर सकता है. बोलते समय जब आपके मन में विचार बहुत तेज़ी से आते हैं तो आप हकलाने लगते हैं. यह मुख की सीमा है. ऐसी ही सीमा आँखों, हाथ, पाँव आदि शरीर के सभी अंगों और इन्द्रियों की हैं. हम कुछ ही क्षणों में अपने मन में एक पूरा आलेख बना लेते हैं मगर इन्हीं इन्द्रियारोपित सीमाओं के कारण उसे ब्लॉग पर ठीक-ठाक रूप में लिखने में लंबा समय लगता है.

स्वप्न - कितना याद रहा
स्वप्न में हम इन सब इन्द्रियारोपित सीमाओं से मुक्त होकर असीमित छवियों को एक साथ अनुभव कर सकते हैं, अनेकों लोगों से एक साथ घंटों बात कर सकते हैं, मीलों चल सकते हैं, और अपने जीवन में अब तक घटे सारे महत्वपूर्ण क्षणों को एक साथ देख सकते हैं. मतलब यह कि एक नन्हे से समयांतराल का स्वप्न आपको वह सब दे सकता है जो वास्तविकता में आप लम्बे समय तक नहीं कर सकते हैं. जागने पर आप यह सब भूल जाते हैं. [क्यों भूलते हैं इस पर भी बात करेंगे, मगर बाद में.] लेकिन अगर आप स्वप्न के दौरान जग जाते हैं तो यह लंबा (जागृत समय के अनुपात में) अनुभव न तो पूरी तरह याद रह सकता है और न ही हम इसके संज्ञानात्मक मतभेद झेल सकते हैं. इसलिए जहाँ तक संभव होता है हमारा मस्तिष्क समांतर घटी अनेक असम्बद्ध घटनाओं में से याद रहे अंशों को क्रम में आगे-पीछे जोड़कर यथासंभव एक तार्किक सी कहानी बनाता है. आम तौर पर हमारा सपना वह सब नहीं है जो हमने देखा बल्कि उसके सारांश रूप बची हुयी यह कहानी ही होता है.

अगली कड़ी में अलार्म से ठीक पहले की जागृति का मेरा अनुभव, व्याख्या और एक रोचक स्वप्न पर विचार.
[क्रमशः]

Wednesday, February 17, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [4]

आइये मिलकर उद्घाटित करें सपनों के रहस्यों को. पिछली कड़ियों के लिए कृपया निम्न को क्लिक करें: खंड [1] खंड [2] खंड [3]

स्वप्नों के कारण पर विचार करने से पहले आइये हम स्वप्न के कारकों और इसकी संरचना पर एक नज़र डालते चलें. देखें कि क्या इसमें अतीत की छवियों के अलावा भी कुछ है? [कम्प्यूटर विज्ञान के छात्रों को "कूड़ा डाला कूड़ा पाया" (GIGO) याद होगा] या फिर स्वप्न में कोई सन्देश छिपा है?

जहाँ तक मैंने समझा (और मुझे भी गलत होने का पूरा अधिकार है) स्वप्न एक वाहन चलाने जैसा है जिसमें आप वाहन में पहले से भरी मशीनरी, शक्ति, ईंधन आदि पूरा उपयोग करते हुए अपने संचालन प्रशिक्षण और अनुभव का पूरा लाभ उठाते हैं. अभिप्राय यह कि आपके अनुभव, आपके मस्तिष्क में एकत्रित विभिन्न यादें, कथन, घटनाएँ, छवियाँ आदि स्वप्न को कच्चा मसाला प्रदान करते हैं. दिमाग में बेतरतीब पड़े इन टुकड़ों को जोड़कर एक रहस्यमय कैनवास बनता है जिसमें आपकी चेतना रियल टाइम में तार्किक पैबंद का स्पर्श देती चलती है. इस सब के अलावा एक बात और है और वह है आपके अनुभव, यादों, नियंत्रण या संज्ञान से बाहर के एक तत्व की मौजूदगी. स्पष्ट कहें तो बाहरी परिवेश के प्रभाव से पैदा हुई इंटर एक्टिविटी. मतलब यह कि स्वप्न इंटरएक्टिव होते हैं. सपने का वाहन चलाते समय आपको राह में पड़ने वाले गड्ढों, अवरोधों, यातायात और संकेतों का ध्यान भी रखना पड़ता है क्योंकि यह सब आपके स्वप्न की दिशा को रीयल टाइम में बदल रहे होते हैं. ठीक वैसे ही जैसे वाहन चलाते समय सड़क पर अचानक सामने आता हुआ जुलूस आपका मार्ग बदल देता है.

मसलन यह कि जब आप स्वप्न देख रहे हैं और कोई कमरे की बत्ती जला दे तो आपके स्वप्न में सूर्योदय हो सकता है या अँधेरे जंगल में किसी जीप की हैडलाईट आपकी आँखों पर पड़ती है. सोते हुए व्यक्ति को सुई चुभने से स्वप्न में छुरा घोंपे जाने का अनुभव हो सकता है. ऐसे उदाहरण हैं जब लोग सपने में शेर से लड़े और जागने पर अपने आप को चूहे या किसी अन्य प्राणी द्वारा कुतरा हुआ पाया. आप स्वप्न देख रहे हैं और उसी समय टीवी पर कोई वृत्तचित्र आ रहा है तो आपका स्वप्न उस वृत्तचित्र के विषय, संवाद और संगीत से प्रभावित हो सकता है बल्कि अक्सर होता ही है. अकेले रहने वालों के मुकाबले संयुक्त परिवारों में या छात्रावास में रहने वालों के स्वप्न अधिक गत्यात्मक होते हैं क्योंकि नींद के समय उनका परिवेश अधिक गतिमान है. इसी तरह दिन की झपकी के सपने ज़्यादा रंगीन होते हैं क्योंकि आसपास का प्रकाश हमारी रंग महसूसने की क्षमता बढ़ा देता है.

अभिषेक ओझा जी ने कहा, "पहले सपने बहुत आते थे... हर रात. अब बहुत कम. ऐसा क्यों?"
ख़ास संभावना यह है कि शायद अब आपकी नींद में बाहरी व्यवधान पहले से कम हैं. हमने पीछे देखा कि जागृति के क्षण वाला सपना याद रहने की संभावना सर्वाधिक है. होता यह है कि जब हमारी नींद स्वप्न देखते हुए टूट जाती है तभी हमें याद रहता है कि सपना देखा था वरना नहीं. मतलब यह कि भरपूर नींद कमाई तो समझो सपना गँवाया.

दूसरा [कम महत्वपूर्ण] कयास यह कि अब नींद के बीच में कोई और बत्ती जलाता-बुझाता नहीं, रेडियो ऑन-ऑफ नहीं करता और न ही सुबह पढने के लिए जगाता है इसलिए परिवेश-जन्य घटनाएँ कम हैं जिनके याद रहने की संभावना ज़्यादा होती है क्योंकि वह सिर्फ अवचेतन की एक हल्की छवि न होकर इन्द्रियों का ताज़ा अनुभव होता है.

अभी तक की कड़ियों का एक त्वरित सिंहावलोकन:
  • स्वप्न नींद के किसी भी भाग में आ सकते हैं
  • स्वप्न पूर्णतया आभासी होते हैं और उन्हें सांसारिक नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं होती
  • स्वप्न को नियंत्रित करना संभव है.
  • स्वप्न किसी फिल्म की तरह न होकर विडियो गेम की तरह होते हैं.
  • निद्रा स्थल का परिवेश रीयल टाइम में आपके स्वप्न को बदलता चलता है
  • हमें अक्सर वही सपने याद रहते हैं जिनके दौरान हम जग गए हों

स्वप्न और नींद पर आगे बात करने से पहले हम दिमाग की कुछ उलटबांसियों पर विचार करेंगे.

[कृपया बताइये कि इंटरएक्टिव और रीयल टाइम की हिन्दी क्या है?]
[क्रमशः]

Tuesday, February 16, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [3]

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आइये, आगे बढ़ने से पहले पिछली कड़ियों की कुछ टिप्पणियों पर एक नज़र डालते चलते हैं.

डॉ. अरविन्द मिश्र ने कहा:
मैं स्वप्न देखता हूँ तो ज्यादातर स्वप्न में भी यह बात स्पष्ट रहती है कि स्वप्न देख रहा हूँ -मगर सबसे रोचक बात यह कि ऐसे दृश्य आते हैं वे कदापि विश्वसनीय नही हो सकते हैं मगर इस समानांतर अनुभूति के बाद भी कि वे महज स्वप्न है -सच ही लगते हैं -ताज्जुब!

लवली कुमारी जी ने कहा:
कई बार ऐसी परिस्थितियां आती है कि हम एक ही सपने को अलग-अलग भाग करके देखते हैं (किसी धारावाहिक के पार्ट की तरह ) ..इस पर भी प्रकाश डालिए.
मैं सपने पसंद न आने पर बदल लेती थी...इस पर भी..और आप सिर्फ अनुभव और निष्कर्ष लिख रहे हैं विश्लेषण और कारण के साथ पूरे प्रोसेस पर लिखिए..वरना रहस्यमयी धुंध घटने जगह गहरी होगी.


गिरिजेश राव ने कहा:
मुझे सपने बहुत कम आते हैं या यूँ कहें कम याद रहते हैं।

समय ने कहा:
जागने के बाद अवचेतन के क्रियाकलाप जो स्मृतिपटल पर दर्ज़ रह जाते है, उन्हें ही हम स्वप्न की अवधारणा से पुकारते हैं। गहरी नींद यानि गहरी अचेतनता में हुए कार्यकलाप स्मृतिपटल पर दर्ज़ नहीं होते और मनुष्य सोचता है कि उसे स्वप्न नहीं आये।

डॉ .अनुराग ने कहा:
सपने देखने वालो की नींद पूरी नहीं मानी जाती क्यूंकि उसे आर इ एम् स्लीप बोलते है

और अब चर्चा
सतही तौर पर पहले तीनों प्रश्न अलग अलग लगते हैं मगर गहराई में जाने पर इनका कारण एक ही मुद्दे पर संकेंद्रित हो जाता है. कैसे? यह हम इस शृंखला की अंतिम कड़ी में देखेंगे. तब तक हमें कुछ और पहलुओं पर ध्यान देने की ज़रुरत है ताकि शृंखला पूरी होने तक सारे महत्वपूर्ण मुद्दे तय हो जाएँ.

समय जी की टिप्पणी में गिरिजेश राव की निद्रा के स्वप्नविहीन (नींद हमारी, ख्वाब कहाँ रे?) होने का कारण व्यक्त है मगर इस कथन से एक नया सवाल यह उठता है कि यदि स्वप्न बना ही पिछले अनुभवों और तात्कालिक कारकों से होता है तो जो दृश्य स्वप्न में दिखे थे उनके जागृति में याद रहने की संभावना तो रहनी ही चाहिए, मगर अक्सर ऐसा होता नहीं है. ज़रा अंदाज़ लगाकर इसके संभावित कारण बताइये न!

डॉ. अनुराग की बात को समझने के लिए नींद के विभिन्न पदों (stages) की एक त्वरित समीक्षा कर लेते हैं. नींद को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है:
1. तीव्र-चक्षुगति रहित (NREM = Non-Rapid Eye Movement) नींद
2. तीव्र-चक्षुगति (REM = Rapid Eye Movement) नींद

इनमें भी पहले वाली नींद के चार पद हैं जिन्हें हम 1, 2, 3, 4 कह सकते हैं. जब एक औसत व्यक्ति आठ घंटे की नींद लेता है तो वह तीव्र-चक्षुगति-रहित नींद के पद 1 से शुरूआत करता है और फिर 1 → २ → 3 → 4 → 3 → 2 → 1 तक आकर फिर तीव्र-चक्षुगति नींद में चला जाता है और लगभग 10 मिनट तक तीव्र-चक्षुगति नींद में रहने के बाद फिर तीव्र-चक्षुगति रहित नींद के पद 1, 2, 3, 4, 3, 2, 1 आ जाते हैं. कुल नींद में लगभग पाँच बार तीव्र-चक्षुगति नींद आती है और उसकी अवधि हर बार बढ़ती जाती है. पाँचवीं (और अंतिम) बार की तीव्र-चक्षुगति रहित नींद 20 से 40 मिनट तक होती है और उसके बाद आँख खुल जाती है.

पहले ऐसा समझा जाता था कि स्वप्न केवल तीव्र-चक्षुगति नींद में ही आते हैं मगर अब विशेषज्ञ जानते हैं कि स्वप्न नींद में कभी भी आते हैं. हाँ तीव्र-चक्षुगति रहित नींद में हमारा दिमाग चिंतन की अवस्था में होता है इसलिए स्वप्न पर बेहतर नियंत्रण रख सकता है. ज़रुरत हो तो उन्हें बदल भी सकता है. तीव्र-चक्षुगति नींद में हमारा शरीर अल्पकालीन पक्षाघात जैसी अवस्था में होता है और इस अवस्था के स्वप्न में मांसपेशीय गतियों की प्रतीति पूर्णतया काल्पनिक होती है. जागृति के ठीक पहले की (अंतिम) तीव्र-चक्षुगति नींद के स्वप्न याद रहने की संभावना सर्वाधिक होती है. याद रखिये कि यह बातें तभी पूर्णतया सच हो सकती हैं जब आपकी नींद बिलकुल टेक्स्ट बुक के हिसाब से हो.

अंत में,  कार्तिकेय मिश्र की 'विनम्र जिद':
कृपया अगली कड़ी में ईडन के प्रयोग के कुछ बोधगम्य दृष्टांत दें, या कम से कम उनके लिंक तो दे ही दें! जितना अभी तक ढूँढा मैनें, कुछ खास जँचा नहीं...

कार्तिकेय की टिप्पणी के बाद जब मैंने ढूंढना शुरू किया तो उनकी कठिनाई समझ में आई. स्वप्न पर अंतरजाल में इतनी सामग्री है कि अपने काम की चीज़ ढूंढना असंभव सा ही लगता है. अंग्रेज़ी में कुछ हलकी फुल्की कड़ियाँ रखने की धृष्टता कर रहा हूँ. बाद में यदि संभव हुआ तो सूची अद्यतन कर दूंगा:

लूसिड ड्रीम्स (लाबर्ग)
लूसिड ड्रीम्स प्रश्नोत्तरी
स्वप्न अध्ययन

[क्रमशः]

Monday, February 15, 2010

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [2]

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे - 1

आगे बढ़ने से पहले, बीस-तीस साल पहले "मधु मुस्कान" में पढी एक कहानी आपसे साझा करना चाहता हूँ. मेरी आधी-अधूरी याद के अनुसार उसमें एक खिलाड़ी लाइलाज कोमा में चला जाता है. मगर चिकित्सक उसे फिर से खडा करके कुशल खिलाड़ी बना देते हैं. वह अपनी प्रगति से बड़ा खुश है और इस बात से बिलकुल बेखबर भी कि यह नया जीवन चिकित्सकों द्वारा उसके लगभग निर्जीव शरीर में स्पंदित एक स्वप्न भर ही है. [यदि किसी को लेखक/लेखिका के बारे में जानकारी हो तो कृपया साझा करें.]

कभी-कभी सत्य बिलकुल अविश्वसनीय होता है. इसी तरह अक्सर सपने उपरोक्त खिलाड़ी के सपने की तरह बिलकुल सच जैसे होते हैं खासकर खुशहाल लोगों के सपने. ऐसा समय आता है जब स्वप्न और सच्चाई में फर्क करना कठिन होता है. कोई लोग च्यूंटी काटकर देख लेते हैं, यदि दर्द न हो तो सपना है वरना सच. मेरे बचपन में यह ट्रिक हमेशा कामयाब रही. मज़े की बात यह है कि इसकी ज़रुरत सिर्फ सपने में ही पडी. [हाल की एक घटना को छोड़कर - उसके बारे में फिर कभी]

पुराने ज़माने में डेटाक्वेस्ट या उसकी सहयोगी पत्रिका में कृत्रिम बुद्धि पर सुगत मित्र की एक शृंखला आयी थी जिसमें स्वप्न के एक विशिष्ट लक्षण का ज़िक्र था - वह था स्वप्न का पूर्ण आभासी होना. जैसा मुझे याद पड़ता है उन्होंने इसे सिक्कों के एक उदाहरण से समझाया था. मान लीजिये आप स्वप्न में कुछ सिक्के लिए बैठे हैं. तो उन्हें दो-तीन बार गिनिये, हर बार उनकी संख्या अलग होगी. हो सकता है कि अचानक ही आपको मुट्ठी एकदम खाली भी मिले. [जो लोग सुगत मित्र से परिचित नहीं हैं उनसे मेरा अनुरोध है कि उनके होल इन द वाल प्रयोग के बारे में ज़रूर पढ़ें]

सपनों की दुनिया के पीछे सच का ठोस धरातल नहीं होता है. बच्चों के बस मैं बैठते ही बस की जगह पर एक हाथी हो सकता है (क्यों होता है इसके लिए थोड़ा इंतज़ार करना पडेगा) सच तो यह है कि प्रकृति के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन सपनों को सत्य से अलग कर सकने में बहुत सहायक होता है.

उपरोक्त विचार का विस्तार करें तो वही बात सामने आती है कि स्वप्न की दुनिया सच्चाई की दुनिया जैसी निश्चित और नियमबद्ध नहीं है. लेकिन चुटकी काटने की विधि और सुगत मित्र के कथन में एक और महत्वपूर्ण तथ्य छिपा है जो कि स्वप्न-वार्ता में अक्सर छूट जाता है, वह यह कि स्वप्न अवचेतन का अनियंत्रित प्रलाप मात्र नहीं है. कई स्वप्नों को आप नियंत्रित कर सकते हैं. आप उनकी चुटकी काट सकते हैं, दुबारा गिनती कर सकते हैं या दिशा-परिवर्तन कर सकते हैं.

बचपन के सपनों में यदि मेरा सामना किसी खल से होता था और मैं उसके पास कोई हथियार पाता था तो मैं "अरे यह तो सपना है" मन्त्र बोलकर या तो उससे बेहतर हथियार अपने हाथ में ले लेता था या बिना चोट खाए आराम से उस हथियार का मुकाबला कर लेता था. इसका मतलब यह नहीं है कि स्वप्न में दौड़ने पर आप हाँफेंगे नहीं इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जब आप हाँफने लगें तो "अरे यह तो सपना है" इतना ध्यान में आते ही फिर आपको हाँफने, दौड़ने की ज़रुरत ही नहीं बचेगी. आप उड़कर या अदृश्य होकर आराम से गंतव्य तक पहुँच सकेंगे यहाँ मैं दिवास्वप्न की बात नहीं कर रहा हूँ. अगले स्वप्न में आप भी करके देखिये.

डच मनोचिकित्सक फ्रेडरिक फान ईडन (Frederik van Eeden) ने इस प्रकार के स्वप्न के लिए lucid dream शब्द-युग्म दिया था. इस पर बहुत खोजें, अध्ययन और चिकित्सकीय प्रयोग (क्लिनिकल ट्रायल्स) हो चुके हैं. जो लोग विस्तार से जानना चाहते हैं उन्हें अंतरजाल पर ही काफी सामग्री मिल सकती है प्रकाशनों की तो बात ही क्या है.

तो इस कड़ी में हमने देखा कि -
1. स्वप्न आभासी होता है और प्रकृति के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन कर सकता है.
2. वास्तविकता के मुकाबले स्वप्न को उसके आभासी रूप से पहचाना जा सकता है.
3. स्वप्न अनियंत्रित ही रहे, यह ज़रूरी नहीं है. स्वप्न को चेतना द्वारा निर्देशित किया जा सकता है

अगली कड़ी में हम देखेंगे कि स्वप्न सिर्फ भूत के अनुभव, चेतन के निर्देश या हमारी आकांक्षाओं और भावनाओं पर ही आधारित नहीं हैं बल्कि सितारों से आगे जहाँ और भी हैं.
पिट्सबर्ग के फर्स्ट इंग्लिश एवंजेलिकल लुथरण चर्च की 1888 में बनी इमारत 
First English Lutheran Evangelical Church of Pittsburgh
[Photo by Anurag Sharma - चित्र अनुराग शर्मा]
[क्रमशः]

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे [1]

लगता है कि एक विनम्र निवेदन लगाना ही पडेगा - मनोविज्ञान, तंत्र-तंत्रिका विज्ञान, स्वप्न-विज्ञान, ..., इन किसी की कक्षा में नहीं बैठा कभी. जीव विज्ञान भी व्यक्तिगत कारणों से हाई स्कूल के बाद छोड़ दिया था. सिर्फ जिज्ञासु हूँ. इस शृंखला के बहाने स्वप्न के रहस्यों के कुछ टुकड़ों में अपने अनुभवों का पैबंद लगाने की कोशिश कर रहा हूँ. शृंखला पूर्ण होने तक आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों से कुछ नया ज़रूर सीख सकूंगा, ऐसी आशा है.

सपनों की दुनिया बहुत रोचक है और आश्चर्यजनक भी। इस पर बहुत साहित्य बिखरा हुआ है मगर अधिकांश लेखन ऐसा है जो पर्दा हटाने के बजाय इसे और भी रहस्यमय बना देता है। किशोर चौधरी के नाम अपने पत्र में मैंने स्वप्न-जगत के बारे में अपनी जानकारी और अनुभव के आधार पर कुछ लिखने की इच्छा प्रकट की थी। यह लिखने की इच्छा बरसों से मन में थी मगर हाय समयाभाव...

कोई नहीं, जब आँख खुले तब सवेरा। अथ आरम्बिक्कलामा! पहले कुछ उदाहरण...

1960 का दशक, जम्मू...
एक साधु एकतारे पर गाता हुआ जा रहा है... बीच बीच में यदृच्छया कुछ भी बोल देता है. एक वाक्य पर मेरा ध्यान जाता है जब वह कहता है, अपना सपना किसी को मत बताना... पूछने पर भी कारण नहीं बताता।

1980 का दशक, बदायूँ...
कई दिनों से अजीब-अजीब से सपने आ रहे हैं... खासकर जबसे आगरा, सीकरी, मथुरा, वृन्दावन से लौटा हूँ। ऊँचे नीचे पहाडी रास्ते। सब घरों की छतें ढलवाँ। सामने से देखो तो हर भवन त्रिकोण जैसा लगे। यह मैदान तो कब्रिस्तान सा दिखता है, ढेरों क्रॉस लगे हैं। ... और यह लम्बी काली अर्ध-वृत्त जैसी सुरंग, छत पर पाइपों का एक जाल सुरंग के एक सिरे से दूसरे तक जा रहा है। दूसरे सिरे पर बना द्वार चौकोर है। उस छोर तक पहुँचते ही सूर्य का आँखें चौंधियाने वाला प्रकाश दिखता है। बहुत सुन्दर नगर, खुशनुमा बाज़ार। पहला अपरिचित सामने पड़ते ही मुस्कराकर स्वागत करता है।

आँख खुलते ही मैं सपने को सरल रेखाचित्रों सहित डायरी में लिख लेता हूँ पंद्रह साल बाद पिट्सबर्ग में मैं उन सब चिन्हों को वास्तविक पाता हूँ।

2000 का दशक, पिट्सबर्ग...
श्याम नारायण चौधरी सिर्फ एक सफ़ेद तौलिया लपेटे मेरे सामने खड़े हैं शायद नहाने जा रहे हैं। उनसे मेरा रक्त-सम्बन्ध नहीं है मगर माँ के लिए वे ताऊ जी हैं सो मेरे नानाजी। जूनियर हाई स्कूल में कई साल तक वे ही स्कूटर से मुझे स्कूल छोड़ते रहे थे। मैं कुछ पूछ पाता इससे पहले ही आँख खुलती है। दो दिन बाद माँ से बात होने पर पता लगता है कि अब वे दिवंगत हैं।

और भी कई सपने हैं मगर यहाँ पर उतना ही लिखना ठीक है जितना समयानुकूल है। मेरे सारे ब्लॉग-लेखों की तरह ही इस शृंखला का भी कोई नियमित प्रारूप नहीं बनाया है। जो कुछ ध्यान में आता रहेगा लिखता रहूँगा। आपकी टिप्पणियाँ भी दिशा-निर्देश देती रहेंगी, ऐसी आशा है। सपनों के अलावा दुसरे सम्बंधित तथ्य भी बीच-बीच में आ सकते हैं। अगली कड़ी से कुछ ठोस जानकारी सामने आने लगेगी।

सपनों पर पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है - हिन्दी ब्लॉग पर भी। लेकिन पढ़ने पर पता लगता है कि उनमें से अधिकतर सुनी सुनाई दोहराई बातें हैं और अधिकांश निराधार भी। यह कोई साइंस-ब्लॉगिंग है, इस भ्रम में मैं नहीं हूँ मगर अंधविश्वास से यथासंभव दूर हटने की कोशिश ज़रूर है।
स्वप्न में देखी टनल वास्तव में दिखी 15 वर्ष बाद
[Photo by Anurag Sharma - चित्र अनुराग शर्मा]
[क्रमशः]

Tuesday, December 15, 2009

किशोर चौधरी के नाम...

प्रिय किशोर,

हम सभी को रोचक सपने आते रहे हैं, कभी-कभार कुछ याद भी रह जाता है और अक्सर सब भूल ही जाते हैं. कभी-कभी तो भूल जाने की प्रक्रिया याद रखने से पहले ही हो जाती है. मगर आपने उसे याद रखा और इतनी कुशलता से हम तक पहुँचाया, इसके लिये आभार. इस सपने में बहुत से सन्देश हैं जिन पर कभी व्यक्तिगत रूप से बात करेंगे.

सबसे पहले तो अपने पैर के आईठाण को निकलवाइये. मेरे ख्याल से तो कोई चर्मरोग विशेषज्ञ उसे कुछ मिनटों में ही निकाल सकता है. डॉ अनुराग आर्य बेहतर बता सकते हैं.

आपके पिताजी के बारे में जानकार दुःख हुआ. परिजनों का जाना - विशेषकर माता या पिता का - ऐसा विषय है जिस पर कोई कितना कुछ भी कहे या लिखे, उस क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती है. जीवन फिर भी चलता है. भविष्य के लिए नहीं बल्कि भूत के सपनों को साकार करने के लिए. पुरखों की आशा को, उनके जीवन की ज्योति को अगली पीढ़ियों के सहारे पुष्ट करने के लिए. ज़रा सोचिये कि आपकी माताजी को उनकी कमी कितनी गहराई से महसूस होती होगी. उनके दर्द को समझकर जो भी सहायता कर सकते हैं करिये.

प्रियजनों का जाना बहुत दुखद है. इसके कारण हममें से बहुत लोग अस्थायी रूप से अवसादग्रस्त हो जाते हैं. इसका इलाज़ संभव है. चिकित्सा के साथ-साथ दिनचर्या में परिवर्तन भी लाभप्रद है. अगर आसानी से संभव हो तो आकाशवाणी की अपनी शिफ्ट दिन की कराने का प्रयास करो. संभव हो तो आधे घंटे का व्यायाम अपनी दिनचर्या में जोड़ लो. मित्रों से मिलते रहो, खासकर जीवट वाले मित्रों से.

सबको खुश रख पाना संभव नहीं है. इसका प्रयास भी आसान नहीं है. बहुत दम चाहिए. कोशिश यह करो कि अपनी और से सब ठीक हो आगे प्रभु की (और उनकी) मर्जी.

नाराज़ होकर ब्लॉग छोड़ने (और उसका ऐलान करने) की बात मुझे कभी समझ नहीं आयी. फिर भी इतना ही कहूंगा कि स्वतंत्र समाज में सबको अपनी मर्जी से चलने का हक है जब तक कि उनका कृत्य उन्हें और अन्य लोगों और परिवेश को कोई हानि न पहुँचाए.

शुभाकांक्षी
अनुराग.

पुनश्च: अगर में यह न बताऊँ कि तुम्हारा आज का लिखा मन को छू गया है तो यह पत्र अधूरा ही रह जाएगा. ऐसे ही लिखते रहो. बहुत लोगों को तुम्हारे लिखे का इंतज़ार रहता है.

[किशोर चौधरी एक समर्थ ब्लोगर हैं. उनकी पोस्ट "दोस्तों ब्लॉग छोड़ कर मत जाओ, कौन लिखेगा कि वक्त ऐसा क्यों है?" पर टिप्पणी लिखने बैठा तो पूरी पोस्ट ही बन गयी. टिप्पणी बक्से की अपनी शब्द सीमा है, इसलिए पोस्ट बनाकर यहाँ रख रहा हूँ. बहुत लम्बे समय से सपनों के बारे में एक शृंखला लिखने की सोच रहा था, किशोर की पोस्ट ने मुझे एक बार फिर उसके बारे में याद दिलाया है. जल्दी ही शुरू करूंगा.]