Saturday, June 12, 2010

एक अंतर-राष्ट्रीय वाहन

भारत में भले ही कुछ नगरों के प्रशासन को रिक्शे और रिक्शा चालक अपनी शान में गुस्ताखी लग रहे हों परन्तु अमेरिका के कुछ शहरों में रिक्शा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. यहाँ प्रस्तुत हैं दो बड़े नगरों न्यू योर्क व वाशिंगटन डीसी से रिक्शा के चित्र:


श्री रत्न सिंह शेखावत जी ने बैट्री चलित रिक्शा के बारे में सुन्दर आलेख लिखा है, ज़रूर देखिये.


सभी चित्र अनुराग शर्मा द्वारा
[Rickshaw in USA: Photos of by Anurag Sharma]

28 comments:

  1. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

    ReplyDelete
  2. बढियां -क्या शान है ?

    ReplyDelete
  3. भारत, इस क्षेत्र में अमरीका की ऐसी मदद कर सकता है कि वह भी क्या याद करेगा... रिक्शों और रिक्शेवालों का एक बार आयात चालू कर के तो देखे.. न चार दिन में ही पूरे अमरीका को चांदनी चौक न बना दिया तो :)

    ReplyDelete
  4. @काजल कुमार
    क्या बात कही है - ऐसे ही कोई कार्तूनिस्त नही बन जाता है.

    ReplyDelete
  5. हम जिस अच्छाई को बुराई जान छोड़ देते हैं उसे बाकी दुनिया उचित सम्मान देती है..

    ReplyDelete
  6. मनोरंजन और मजबूरी...कितना अंतर है...मजा आया देखकर.

    ReplyDelete
  7. रिक्षा भारत की मजबूरी और जरूरत है, अमरीका के लिए मौज का सामान।

    ReplyDelete
  8. @ काजल कुमार
    क्या खूब कही !
    इस टिप्पणी के विषय को ले कर एक हास्य व्यंग्य लिखा जा सकता है। अपना मूड आजकल दूसरा है, सतीश पंचम को कोंचता हूँ।

    ReplyDelete
  9. भारत में तो रिक्शा आवागमन का एक साधन है. अमेरिका में संभवतः यह मनोरंजन का साधन होगा. जैसे भारत के अनेक शहरों में अब तांगा मनोरंजन का साधन है.

    ReplyDelete
  10. Bahot umda lekh.......
    Vastav me Bharat ke pas vo sab tarike hai jisse wah sukhi rah sake kintu dekha-dekhi galat kar baithta hai......ab dekhiyega ricsa ko USA ne achha kaha hai to bhart wale bhi sochna suru karenge..

    ReplyDelete
  11. सही बात है मैने भी सैन्फ्राँसिसको मे देखे थे। वहाँ कई लोग बस मौज मस्ती और शौक के लिये ही इन पर घूमते हैं। चित्र बहुत अच्छे लगे

    ReplyDelete
  12. सर जी, इको फ़्रेंडली होने के कारण, सस्ता और सुलभ होने के कारण रिक्शा आकर्षित तो बहुत करता है, पर अपन बहुत अवायड करते हैं इस पर सवारी करना। आदमी का आदमी को ढोना रुचता नहीं है, हां जब कभी जाना पड़े तो मोल भाव नहीं करते, बस।

    ReplyDelete
  13. प्रदूषण रहित तो है ही, मानव के ऊपर सवारी और गति की बात छोड़ दी जाये तो.

    ReplyDelete

  14. जो यहाँ पेट पालने की मज़बूरी है,
    वो वहाँ दिखावे का भोगविलास ?
    यहाँ के गरीब तबके की आजीविका..
    वहाँ महज़ एक पर्यटन आकर्षण !
    अब तो हमारे बच्चे भी फटी जीन्स पहनने को ’इट्ज़ ऍ हैपेनिंग थिं’ में शुमार करने लगे हैं ।

    मॉडरेशन है ?

    ReplyDelete
  15. सादर वन्दे !
    काजल कुमार जी से सहमत ! अमेरिका एक बार मौका दे रिक्शा ही बदल देगा भारत अमरीका के सम्बन्ध को फिर सारे समझौतों पर हम हस्ताक्षर करवाएंगे वह भी अपनी शर्तों पर ..........
    मजा आया इस जानकारी को पढ़कर |
    रत्नेश त्रिपाठी

    ReplyDelete
  16. 'मजबूरी' और 'मस्‍ती' का कारण जनसंख्‍श तो नहीं?

    चित्रो के मामले मे तो आप 'प्रोफेशनल' हैं।

    ReplyDelete
  17. चलिये इसी में खुश रहते हैं कुछ दिन ।

    ReplyDelete
  18. प्रदूषण रहित तो है ही, मानव के ऊपर सवारी और गति की बात छोड़ दी जाये तो.

    @ हमारे यहाँ तो आजकल बेटरी से चलने वाले रिक्शा आ गए जो प्रदूषण मुक्त तो है ही साथ इन पर सवारी कर मानव के ऊपर सवारी के पाप से भी बचा जा सकता है गति भी ठीक ठाक है |
    बैटरी से चलने वाले रिक्शा

    ReplyDelete
  19. haha ...
    ये सही चीज सामने लायी आपने
    अब तांगे का नंबर कब है :-)

    ReplyDelete
  20. वाकई अंतर्राष्ट्रीय है... पर हमारे राष्ट्रीय लोग समझ पायें तब ना ....

    ReplyDelete
  21. @Ratan Singh Shekhawat
    धन्यवाद! आपके आलेख का लिंक मैने पोस्ट में जोड दिया है.

    ReplyDelete
  22. @ गिरिजेश राव
    लंडन में रह्ने वाले भारतीयों पर अबू का एक बहुत पुराना कार्टून रखा था मेरे पास. शायद अभी भी दिल्ली में हो.

    ReplyDelete
  23. @मो सम कौन ? said...
    सर जी, इको फ़्रेंडली होने के कारण, सस्ता और सुलभ होने के कारण रिक्शा आकर्षित तो बहुत करता है, पर अपन बहुत अवायड करते हैं इस पर सवारी करना। आदमी का आदमी को ढोना रुचता नहीं है,

    मुझे इस मेहनत मे कोई बुराई नही दिखती है. मैं विकल्प न होने की दशा मे इसे सपोर्ट ही करूंगा.

    ReplyDelete
  24. अमेरिका में रिक्‍शा आ जाए तो मजा ही आ जाए। अभी घर में कैद होकर रह जाते हैं फिर तो चमन से बाते होंगी।

    ReplyDelete
  25. मैं बर्लिन गया था। वहां भी कुछ जगहों को घूमने के लिये रिक्शे चलते हैं। लेकिन वे अपने देश या अमेरिका में चलने वाले रिक्शों से फर्क हैं।

    ReplyDelete

मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।