Wednesday, June 29, 2011

शहीदों को तो बख्श दो - भाग 1. भूमिका

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मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं
[एक कब्रिस्तान की दीवार पर पढा था]

शहीदों को श्रद्धांजलि प्रथम दिवस आवरण
1857 के भारत के स्वाधीनता के प्रथम संग्राम से लेकर 1947 में पूर्ण स्वतंत्रता मिलने तक के 90 वर्षों में भारत में बहुत कुछ बदला। आज़ादी से ठीक पहले के संग्राम में बहुत सी धाराएँ बह रही थीं। निश्चित रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारा महात्मा गांधी के नेतृत्व वाली कॉङ्ग्रेस थी जिसने उस समय भारत के जन-जन के अंतर्मन को छुआ था।

मुस्लिम लीग एक और प्रमुख शक्ति थी जिसका एकमेव उद्देश्य भारत को काटकर अलग पाकिस्तान बनाने तक ही सीमित रह गया था। महामना मदन मोहन मालवीय और पंजाब केसरी लाला लाजपत राय जैसे स्वनामधन्य नेताओं के साथ हिन्दू महासभा थी। कई मामलों में एक दूसरे से भिन्न ये तीन प्रमुख दल अपनी विचारधारा और सिद्धांत के मामले में भारत की ज़मीन से जुडे थे और तीनों के ही अपने निष्ठावान अनुगामी थे। विदेशी विचारधारा से प्रभावित कम्युनिस्ट पार्टी भी थी जिसका उद्देश्य विश्व भर में रूस के वैचारिक नेतृत्व वाला कम्युनिस्ट साम्राज्य लाना था मगर कालांतर में वे चीनी, रूसी एवं अन्य हितों वाले अलग अलग गुटों में बंट गये। 1927 की छठी सभा के बाद से उन्होंने ब्रिटिश राज के बजाय कॉंग्रेस पर निशाना साधना शुरू किया। आम जनता तक उनकी पहुँच पहले ही न के बराबर थी लेकिन 1942 में भारत छोडो आन्दोलन का सक्रिय विरोध करने के बाद तो भारत भर में कम्युनिस्टों की खासी फ़ज़ीहत हुई।

राजनैतिक पार्टियों के समांतर एक दूसरी धारा सशस्त्र क्रांतिकारियों की थी जिसमें 1857 के शहीदों के आत्मत्याग की प्रेरणा, आर्यसमाज के उपदेश, गीता के कर्मयोग एवम अन्य अनेक राष्ट्रीय विचारधाराओं का संगम था। अधिकांश क्रांतिकारी शिक्षित बहुभाषी (polyglot) युवा थे, शारीरिक रूप से सक्षम थे और आधुनिक तकनीक और विश्व में हो रहे राजनैतिक परिवर्तनों की जानकारी की चाह रखते थे। भारत के सांस्कृतिक नायकों से प्रेरणा लेने के साथ-साथ वे संसार भर के राष्ट्रीयता आन्दोलनों के बारे में जानने के उत्सुक थे। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन भी इसी धारा का एक संगठन था। पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगतसिंह, अशफाक़ उल्लाह खाँ, बटुकेश्वर दत्त, आदि क्रांतिकारी इसी संगठन के सदस्य थे। इनके अभियान छिपकर हो रहे थे और यहाँ सदस्यता शुल्क जाँनिसारी थी।

अशफ़ाक़ उल्लाह खाँ
(22 अक्टूबर 1900 – 19 दिसम्बर 1927)
कुछ आरज़ू नहीं है बस आरज़ू तो ये है।
रख दे कोई ज़रा सी ख़ाके वतन कफ़न में॥

ऐ पुख़्तकार उल्फ़त, हुशियार डिग न जाना।
मिराज़ आशक़ाँ है, इस दार और रसन में॥

मौत और ज़िन्दगी है दुनिया का सब तमाशा।
फ़रमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रन में॥

(~ अमर शहीद अशफाक़ उल्लाह खाँ)

जिन क्रांतिकारियों में एक मुसलमान वीर भगवान कृष्ण के गीत गा रहा हो वहाँ आस्तिक-नास्तिक का अंतर तो सोचना भी बेमानी है। इन सभी विराट हृदयों ने बहुत कुछ पढा-गुना था और जो लोग सक्षम थे उन्होंने बहुत कुछ लिखा और अनूदित किया था। पंजाब केसरी और वीर सावरकर द्वारा अलग-अलग समय, स्थान और भाषा में लिखी इतालवी क्रांतिकारी जोसप मेज़िनी1 (Giuseppe Mazzini) की जीवनी इस बात का उदाहरण है कि ठेठ भारतीय विभिन्नता के बीच इन समदर्शियों के उद्देश्य समान थे। इस धारा का जनाधार उतना व्यापक नहीं था जितना कि कांग्रेस का।

मंगल पांडे, चाफ़ेकर2 बन्धु, दुर्गा भाभी, सुखदेव थापर, शिवराम हरि राजगुरू, शिव वर्मा, जतीन्द्र नाथ दास, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, खुदीराम बासु जैसे वीर3 हम भारतीयों के दिल में सदा ही रहेंगे, उनके व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वासों से उनकी महानता में कोई कमी नहीं आने वाली है। वे अपने धार्मिक विश्वास के कारण श्रद्धेय नहीं है बल्कि अपने कर्मों के कारण हैं । यह शहीद किसी भी धर्म या राजनैतिक धारा के हो सकते थे परंतु अधिकांश ने समय-समय पर गांधी जी में अपना विश्वास जताया था। अधिकांश की श्रद्धा अपने-अपने धार्मिक-सांकृतिक ग्रंथों-उपदेशों में भी थी। गीता शायद अकेला ऐसा ग्रंथ है जिससे सर्वाधिक स्वतंत्रता सेनानियों ने प्रेरणा ली। गीता ने सरदार भगतसिंह को भी प्रभावित किया।4

सरदार भगतसिंह
(28 सितम्बर 1907 - 23 मार्च, 1931)
80 दशक के प्रारम्भिक वर्षो से भगतसिंह पर रिसर्च कर रहे उनके सगे भांजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह के अनुसार भगतसिंह पिस्तौल की अपेक्षा पुस्तक के अधिक निकट थे। उनके अनुसार भगतसिंह ने अपने जीवन में केवल एक बार गोली चलाई थी, जिससे सांडर्स की मौत हुई। उनके अनुसार भगतसिंह के आगरा स्थित ठिकाने पर कम से कम 175 पुस्तकों का संग्रह था। चार वर्षो के दौरान उन्होंने इन सारी किताबों का अध्ययन किया था। पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल की तरह उन्हें भी पढ़ने की इतनी आदत थी कि जेल में रहते हुए भी वे अपना समय पठन-पाठन में ही लगाते थे। गिरफ्तारी के बाद दिल्ली की जेल में रहते हुए 27 अप्रैल 1929 को उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर पढ़ने के लिये लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक5 की "गीता रहस्य" मंगवायी थी। उनकी हर बात की तरह यह समाचार भी लाहौर से प्रकाशित होने वाले तत्कालीन अंग्रेजी दैनिक 'द ट्रिब्यून' के 30 अप्रैल 1929 अंक के पृष्ठ संख्या नौ पर "एस. भगत सिंह वांट्स गीता" शीर्षक से छपा था। रिपोर्ट में लिखा गया था कि सरदार भगत सिंह ने अपने पिता को नेपोलियन की जीवनी और लोकमान्य टिळक की गीता की प्रति भेजने के लिए लिखा है। खटकड़ कलाँ (नवांशहर) स्थित शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह संग्रहालय में आर्य बुक डिपो लाहौर से प्रकाशित पं. नृसिंहदेव शास्त्री के भाष्य वाली गीता रखी हुई है जिस पर "भगत सिंह, सेंट्रल जेल, लाहौर" लिखा हुआ है। जेएनयू के मा‌र्क्सवादी प्रो. चमन लाल तक मानते हैं कि संभावना है टिळक की गीता न मिलने पर बाजार में जो गीता मिली, वही उनके पास पहुँचा दी गयी हो। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि शास्त्रीजी के भाष्य वाली गीता उनके पास अलग से रही हो परंतु वे टिळक की गीता टीका भी पढ़ना चाहते हों।

[क्रमशः]

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1कार्ल मार्क्स को भारतीय क्रांतिकारियों का आदर्श मेज़िनी सख्त नापसन्द था। एक साक्षात्कार में मार्क्स ने मेज़िनी को कभी न मरने वाला वृद्ध गर्दभ कहकर पुकारा था।
2दामोदर, बालकृष्ण, एवम वासुदेव चाफ़ेकर (Damodar, Balkrishna and Vasudeva Chapekar)
3वीरों की कमी नहीं है इस देश में - सबके नाम यहाँ नहीं हैं परंतु श्रद्धा उन सबके लिये है।
4"Bhagat Singh" by Bhawan Singh Rana (पृ. 129)
5मराठी और हिन्दी की लिपि एक, देवनागरी है लेकिन उच्चारण भेद हैं। लोकमान्य के कुलनाम का वास्तविक मराठी उच्चारण 'टिळक' है।

[प्रथम दिवस आवरण का चित्र अनुराग शर्मा द्वारा :: अन्य चित्र इंटरनैट से विभिन्न स्रोतों से साभार]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* विश्वसनीयता का संकट - हिन्दी ब्लॉगिंग के कुछ अनुभव
* जेल में गीता मांगी थी भगतसिंह ने
* भगवद्गीता से ली थी भगतसिंह ने प्रेरणा?
* वामपंथियों का भगतसिंह पर दावा खोखला
* भगतसिंह - विकिपीडिया
* प्रेरणादायक जीवन-चरित्र

Labels: freedom, revolution, India, faith, atheist, communist, dishonesty, fake, forgery

30 comments:

  1. यहाँ सदस्यता शुल्क जाँनिसारी थी।


    बहुत सुन्दर आलेख ||
    कई सीरीज, पढने की उत्कंठा है आशा है मिलता रहेगा अनवरत ||

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  2. अमृत ज़रूर मिलेगा भारतीय अनवरत!

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  3. बहुत सुन्दर जानकारी डी है आपने.
    रोचक और प्रेरणापूर्ण.
    आपका सद्प्रयास सराहनीय है.
    बहुत बहुत आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.नई पोस्ट जारी की है.

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  4. मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं...
    महान विचार ...
    यहाँ सदस्यता शुल्क जांनिसारी थी ...
    जितना पढ़ें इन्हें ,कम है!

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  5. बहुत कुछ नई जानकारी मिली। बहुत ही अच्छा आलेख।

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  6. आज का यह आलेख पढने के बाद उन शहीदों के प्रति जो जानकारी मिली वह अमूल्य है...
    .
    एक बात इस पोस्ट से अलग:
    जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए!मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!

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  7. यह लेखन श्रृंखलाबद्ध चले तो कितने मिथ और ग्रंथी /ग्रंथियां टूटें !

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  8. @सलिल भाई के लिए ...
    आप भी इन दिनों शहीदी रुख अख्तियार किये हुए हैं ...
    इसी तेवर को बनाए रखिये :)

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  9. मुझे इस लेख का इन्तजार था |
    इस पोस्ट के लिंक को अपनी पोस्ट से जोड़ रहा हूँ |

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  10. .इस आलेख को पढ़ कर राहत मिली..
    मैं स्वयँ ही ऎसे आलेख पर कार्य कर रहा हूँ,
    ज्ञान की कुछ पोथियाँ चबाते और मुँह से उसका झाग यहाँ वहाँ बिखराते हुये विचरते बछड़ों को पालने वालों के लिये यह जानकारी शायद कुछ काम की हो । क्राँतिकारी का कोई धर्म नहीं होता.. उसका पहला धर्म देशभक्ति ही है । स्वाधीनता सँग्राम की क्राँति मेरा प्रिय विषय है... और यदि हम बारीकी से देखें.. तो हमारे देश का कोई भी क्राँतिकारी उन्मादी ( जैसा कि लोग समझते हैं ).... कोई भी क्राँतिकारी उन्मादी नहीं बल्कि तर्कशील अध्येता रहे हैं ।
    वह धर्मोन्मादी तो कभी से भी नहीं रहे, नमाज़ी अशफ़ाक़ और जनेऊधारी बिस्मिल के एक थाली में खाने का जिक्र स्वयँ बिस्मिल और शिव वर्मा ने किया है । उन्हें किसी धर्म या ग्रँथ विशेष से जोड़ने वालों ने देश का बड़ा अनर्थ किया है ! वस्तुतः क्राँति और बदलाव के आन्दोलनों को धर्म के सँकीर्ण नज़रिये से देखने वालों ने ही देश के विभाजन की बुनियाद डाल दी थी ( वतनपरस्त अल्लामा इ्क़बाल का रातोरात मौलाना इकबाल में बदल जाने के कारणों का किस्सा कौन नहीं जानता ? )
    आस्तिकता को हिन्दू-ईश्वर , मलेच्छ-ईश्वर से जोड़ कर या मोक्ष और कयामत के इँसाफ़ से जोड़ कर देखने पढ़ने गुनने वालों पर तरस आता है । यह कैसा आत्म-ध्रुवीकरण है... क्या हमारी आस्तिकता देश और मातृभूमि के लिये नहीं हो सकती ?

    N.B.
    आगामी टिप्पणियाँ यदि मेल से करूँ तो ?
    पाठकों के मध्य त्वरित प्रतिक्रिया ( उग्र ही सही ) और परिसँवाद से रास्ते का मॉडरेशन से गुज़रना वस्तुतः एक अवरोध ( वैचारिक स्पीड-ब्रेकर ) है ।

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  11. bahut jankari bhara aalekh aur shahidon ko hamara naman

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  12. सही कहा क्रांतिकारियों का कोई धर्म नहीं होता है देश भक्ति ही उनका पहला धर्म और विचार होता है किन्तु एक ब्लॉग पढ़ा था जहा ये कहने का प्रयास किया जा रहा था की भगत सिंह नास्तिक नहीं आस्तिक थे और आस्तिक होने के कारण ही देश भक्त थे | हम अभी तो फिर भी आजादी से जुड़े कई क्रन्तिकारियो को याद करते है पर मुझे नहीं लगता है की हमारे बाद वाली पीढ़िया आजादी के आन्दोलन से जुड़े कुछ खास नेताओ के आलावा किसी अन्य को जान पायेगी सरकारों का रवैया ही ऐसा है बस जनता एक ही खानदान को याद रखे उनकी तो यही चाहत है |

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  13. उन वीरो में जोश था कुछ कर जाने का , आज कल होश है लूट लेने का ! बहुत सुन्दर यादे ! वीरो को नमन

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  14. न जाने किसने खड़ी कर दी यह दीवाल हम सबके बीच।

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  15. यह तो संग्रहनीय पोस्ट बन गयी मेरे लिए,बहुत सुंदर,जारी रखें,आभार.

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  16. @मैं स्वयँ ही ऎसे आलेख पर कार्य कर रहा हूँ....

    आदरणीय अमर जी ,
    वाह, क्या बात है , आपके आलेख का इन्तजार रहेगा , जैसे आपकी टिप्पणियों का रहता है :)

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  17. बहुत अच्छी जानकारी दी आप ने, बचपन मे पिता जी मुझे इन सभी शहिदो की जीवनिया पढने को दिया करते थे, ओर इन की खुब कहानियां सुनाते थे,

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  18. बहुत अच्छा आलेख व अच्छी जानकारी है...
    किन्तु मैं शीर्षक से थोडा कन्फ्यूज़ हूँ...
    कृपया मार्गदर्शन करें...

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  19. अनुराग जी - धन्यवाद इस लेख के लिए ... | आपके लेखन में पठन की जो महक है - वह आपके पोस्ट्स को बहुत वजन देती है ...| थैंक्स .. :) ... और आपने जो लिखा है " मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं " ... सच है | सोचना यह है कि जीवित लोगों को यह बात - बार बार - याद क्यों दिलानी पड़ती है ....

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  20. अनुराग जी,

    यह नास्तिकों का पुराना शगल है। जैसे ही कोई तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है छपाक से कह उठेगें, "क्रान्तिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता। अन्यथा वर्ना गढ गढ के देंगे कि फलां फलां क्रांति कारी नास्तिक थे…॥
    जैसे क्रांतिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता ठीक वैसे ही क्रांतिकारी (मां के) कभी भी नास्तिक नहीं होते।

    यह तो आपकी तरह कोई कोई ही प्रमाण लाता है। अन्यथा इनको तो कुछ और ही सिद्ध करना है।

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  21. सत्य और सुन्दर.

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  22. भगत सिंह के बारे में कुछ् स्थिति स्पष्ट हुई। धन्यवाद।

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  23. भगतसिंह पर बहुत ही कम जानकारी उपलब्‍ध है। ऐसे आलेख उनके वास्‍तविक स्‍वरूप को सामने लाऍंगे।

    स्‍तुत्‍य प्रयास और प्रस्‍तुति।

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  24. तब क्रान्तिकारिओं का धर्म नही होता था वो सब के लिये लडते मरते थे लेकिन आज क्रान्तिकारी धर्म के नाम से जाने जाते हैं। एक दूसरे धर्म के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेहादिओं को आतंकवादिओं को क्रान्तिकारी सम्बोधन दिया जाता है। बेहतरीन पोस्ट। इसे जारी रखें। धन्यवाद।

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  25. ऐसे व्यक्तित्वों को समग्रता में न देखकर सिर्फ़ आस्तिक\नास्तिक\हिन्दु\मुस्लिम\बंगाली\पंजाबी के दायरे में देखना या तो सरासर भोलापन है या सरासर कुटिलता। उनके जीवन का उद्देश्य, उनके द्वारा उद्देश्य प्राप्ति के लिये चुकाई गई निस्वार्थ कीमत हमारे लिये उन्हें सिर्फ़ श्रद्धेय बनाते हैं फ़िर वे चाहे किसी भी धर्म, जाति, प्रांत या विचारधारा से प्रभावित हों।
    अगली कडि़यों का इंतजार है।

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  26. शुक्रवार को आपकी रचना "चर्चा-मंच" पर है ||
    आइये ----
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  27. प्रसन्न हूँ जान कर कि ये आप लिख रहे हैं, प्रतीक्षारत।

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  28. आज इस ब्लॉग पे पहली बार आया...और यकीं मानिये अब आता ही रहूँगा...और जितनी पोस्ट अभी पढ़ सकता हूँ अभी...बाकि कल...पर पढूंगा ज़रूर..
    ये वो तथ्य हैं जो बहुत लोगो को नहीं पता हैं...आप लिखते रहिये...इस ज्ञान कि गंगा का रसास्वादन जीवनदायी है...

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  29. आज के दिन महान क्रांतिकारियों , भगतसिंह जी , राजगुरु जी , और सुखदेव जी को नमन

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मॉडरेशन की छन्नी में केवल बुरा इरादा अटकेगा। बाकी सब जस का तस! अपवाद की स्थिति में प्रकाशन से पहले टिप्पणीकार से मंत्रणा करने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जाएगा।