Thursday, June 2, 2011

अनुरागी मन - कहानी - भाग 11

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पिछली कडियाँ - भाग 1; भाग 2; भाग 3; भाग 4;
भाग 5; भाग 6; भाग 7; भाग 8; भाग 9; भाग 10
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अपनी छुट्टी पूरी होते ही पिताजी तो वापस चले गये। परन्तु वीर और उनकी माँ छुट्टी भर नई सराय में ही रहे। दादी अकेली ज़रूर हुई थीं परंतु उनका जज़्बा बना हुआ था। अकेले में शायद रो लेती हों, मगर बहू और पोते के सामने कभी कमज़ोर नहीं दिखीं। पुत्तू और लखना भी सदा की भांति आते रहे और निक्की भी। स्कूल खुलने से पहले वीर को भी अपने घर जाना था। पहले पिताजी और अब माँ ने दादी को समझाने का प्रयत्न किया कि वे भी अपने पोते और बहू के साथ ही चलें परंतु दादी तो किसी भी कीमत पर नई सराय छोड़ने को तैयार ही नहीं थीं। वीर के चलने का दिन आया। वीर अपनी अटैचियाँ बांधे तैयार खड़े थे। माँ और दादी दोनों सजल नेत्रों से एक दूसरे के गले लगाकर रो रही थीं।

उसी समय कहीं से निक्की वहाँ आ गयी। कहीं से वीर की भौतिकी की पुस्तक ढूंढकर लाई थी। वीर ने पुस्तक हाथ में ली। लगभग उसी समय माँ ने विदा लेकर उन्हें चलने को कहा। लखना पहले ही इक्का ले आया था। इक्के में चुपचाप बैठे वे दोनों बस अड्डे जा रहे थे। माँ ने अचानक कहा, “क्या दिया निक्की ने तुम्हें?”

“मेरी किताब। और क्या?”

“किताब के साथ वह लिफाफा क्या है? तुम दूर ही रहना, पढाई में बिल्कुल ध्यान नहीं है इस लड़की का।”

वीर ने हाथ में पकड़ी किताब को देखा। उसमें से वाकई एक पत्र सा झांक रहा था। वीर ने उसे वापस पुस्तक में समेट लिया। क्या हो गया है उन्हें? माँ को इतनी दूर से दिखने वाला लिफाफा उन्हें क्यों नहीं दिखा? और क्या हो गया है माँ को जो निक्की को नापसन्द करने लगी हैं। इतनी प्यारी लड़की है। विशेषकर वीर के प्रति इतनी दयालु है। सारे रास्ते माँ-बेटे में बस नाम भर की ही बात-चीत हुई। घर पहुँचकर माँ काम में लग गईं और वीर अपने कमरे में जाकर लिफाफा खोलकर अन्दर का पत्र पढने लगे। सुन्दर अक्षरों में स्पष्ट अंग्रेज़ी में लिखा था, बिना किसी लाग-लपेट के।

प्रिय वीर,

तुम्हारी पीड़ा का अनुमान है मुझे। तुम्हें शायद विश्वास न हो मगर अब मैं अपने से अधिक तुम्हें पहचानने लगी हूँ। मुझे पूरा अहसास है कि तुम पर क्या बीत रही है। काश! मैं एक जादुई परी होती और तुम्हारा दर्द कम कर सकती। यदि मैं तुम्हारे किसी भी काम आ सकी तो अपने को धन्य समझूंगी। अभी तो तुम यहीं हो और मैं अभी से तुम्हारी कमी महसूस करने लगी हूँ। मुझे पता नहीं मुझे क्या हुआ है। शायद तुम्हें पता हो। अगर हो तो मुझे मिलकर बताना ...

केवल तुम्हारी ...


पागल लड़की! वीर के दिल में अजीब सा कुछ हुआ। कलेजे में भीतर तक अच्छा लगा कि किसी को उनकी तकलीफ़ का अहसास है। निक्की की हिम्मत पर हंसी भी आई। उसके भविष्य के बारे में सोचकर दु:ख भी हुआ। माँ शायद ठीक ही कहती हैं। निक्की का ध्यान पढाई से हट चुका है। अभी है ही कितनी बड़ी? 10-12 साल की ही होगी शायद।

[क्रमशः]

19 comments:

  1. मां की नजर वास्तव में बहुत तेज होती है, सब कुछ जान जाती है...

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  2. maa to man kee bate bhi jan leti hai kintu ladkiyon kee bhi ye bat hai ki ve kisi ke man kee vyatha ka aasani se andaza laga leti hain aur usse sahaj bhav se jud bhi jati hain.sundar kahani...

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  3. युवामन का हृदयप्रवाह।

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  4. नारी पुरुष के मन तक सहज पहुँच जाती है, फिर माँ तो माँ है

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  5. सायने मां बाप बच्चो को झट से ताड जाते हे, सब कुछ जानकार भी अनजान बने रहते हे, सुंदर कहानी, धन्य्वाद

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  6. माँ सब कुछ जान जाती हैं.प्रेमवश आँखें मूंदे रहे वो बात अलग है.

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  7. बारह साल की लड़की...और इतने प्यारे भाव....देवदास की पारो भी शायद इतनी हो बड़ी थी,तब
    अच्छी लगी कड़ी..

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  8. .....अनंत... कथा अनंता।

    कोई फ़रियाद, कोई फ़रमाईश रंग तो लाई लेकिन नतीजा फ़िर वही, क्रमश:। हमारा इंतज़ार भी जारी रहेगा सिरीमान जी।

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  9. सुंदर कहानी| धन्य्वाद|

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  10. अभी-अभी आपकी लघु कथा पढी है। उसके ठीक बाद, धारावाहिक का यह अंश पढने में मन नहीं लगा। बस इतना ही कि अपने पाठकों के धैर्य की परीक्षा लेने में आपको मजा आने लगा है।

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  11. अब यह उपन्यास का आयोजन अनुष्ठान हो चला

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  12. @अब यह उपन्यास का आयोजन अनुष्ठान हो चला
    विश्व का सबसे छोटा उपन्यास?

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  13. पिछले भाग नहीं पढ पाये है सर जी । छोटे मियां लघुकथा पढने से रह गई थी सो आज पढली ।

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  14. जिज्ञासा जगाती दिलचस्प कहानी...

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  15. वीरसिंह जी उठ गए बीमारी से , गनीमत है ...

    बारह साल की लड़की में इतना प्रेम और साहस ...हम तो आज की पीढ़ी से बचपना छीन जाने की शिकायत करते थे ...

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  16. बेहद उत्कृष्ट रचना है यह. आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें

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