Thursday, June 9, 2011

अनुरागी मन - कहानी - भाग 13

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अनुरागी मन - अब तक - भाग 1; भाग 2; भाग 3; भाग 4; भाग 5;
भाग 6; भाग 7; भाग 8; भाग 9; भाग 10; भाग 11; भाग 12;
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पिछले अंक में आपने पढा:
वीर की नज़रें झरना से मिलीं। उन्होंने एक झटके से अपनी पतंग की डोर तोडी, सीढी से नीचे सरके, साइकिल उठाई और ताबडतोड पैडल मारते हुए दलबीर इलेक्ट्रिकल्स की उलटी दिशा में दौड लिये, बिना किसी गंतव्य के।
अब आगे भाग 13 ...
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अंग्रेज़ों के ज़माने में सैनिक वाहन चालकों को नैनीताल आदि के पहाड़ी मार्गों पर चलने के लिये तैयार करने के लिये छावनी में ऊंचे नीचे हिलट्रैक मार्ग का निर्माण किया गया था। आज वीर ने उस हिलट्रैक लूप के न जाने कितने चक्कर लगाये थे। रात में जब घर पहुँचे तो काफी थक चुके थे। माँ कमला चाची के साथ बाहर खड़ी उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही थीं। पसीने की गन्ध से माँ को दूर से ही उबकाई आती है इसलिये अन्दर पहुँचते ही वीर नहाने चले गये। बाहर आने तक माँ ने खाना लगा दिया था। दोनों खाना खाने बैठे तो माँ ने बताया, “वासिफ़ के घर से ... झरना आई थी आज ... बहुत प्यारी बच्ची है।”

वीर ने अनमनी सी “हाँ” में सर हिलाया। इसका मतलब है कि झरना ने उनके भागने के बारे में माँ से कुछ नहीं कहा था।

“बता रही थी कि वासिफ़ को मलेरिया हुआ था। तबियत काफी खराब थी। स्कूल भी नहीं गया। उसकी अम्मी तुमसे मिली थीं। बताना चाहती थीं, मगर तुम जल्दी में थे।”

“हाँ, मिली तो थीं। वासिफ़ कैसा है अब?”

“कमज़ोरी बनी हुई है। उसे किताबों की लिस्ट और अब तक के होमवर्क की कॉपियाँ चाहिये। यही बताने यहाँ आयी थी वह।”

“नवीन से कहके भिजा दूंगा, उधर ही रहता है वह।”

“कल हो आते हैं, मैं भी मिल लूंगी उन लोगों से” माँ कुछ उतावली सी दिखीं।

अगले दिन स्कूल में वीर ने किताबों की लिस्ट और तब तक का सारा गृहकार्य वासिफ़ के घर पहुँचाने की हिदायत देकर नवीन को दे दिया। उन्हें अच्छी प्रकार पता था कि इतने भर से उन्हें छुटकारा नहीं मिलने वाला है। अगर माँ का मन है तो वासिफ़ का काम हो जाने के बाद भी वह उन्हें लेकर वहाँ जायेगी ही। घर आते समय वे वासिफ के घर न जाने के सर्वश्रेष्ठ बहाने ढूंढ रहे थे। हाथ मुँह धोकर डरते-डरते माँ के साथ चाय पीने बैठे तो माँ ने बताया कि वे दिन में वासिफ़ के घर हो आयी थीं।

“तुम्हें पूछ रहा था। बहुत कमज़ोर हो गया है।”

“मैंने कॉपियाँ और लिस्ट भिजा दी है।”

“ठीक किया। तुम्हें पता है कि उसकी बहन की शादी है दो महीने में?”

“अच्छा! मुझे नहीं पता” वीर ने अचरज में आंखें फैलाकर कहा। मुहब्बत का इज़हार किसी से और इकरार किसी से। वीर का मन कड़वा सा हो गया।

“बहुत प्यारी बच्ची है। तुम्हारी बहन आज होती तो शायद वैसी ही होती ...” वाक्य पूरा करते-करते माँ का गला भर आया। अब वीर को सचमुच आश्चर्य हुआ।

“मेरी बहन?”

“हाँ बेटा, तुम अकेले नहीं थे। तुम्हारी एक जुड़वां बहन भी थी ... तुमसे बड़ी। एक दिन भी जीवित नहीं रही।”

वीर को समझ नहीं आया कि जिस बहन के बारे में वे अब तक अन्धेरे में थे, उसके अवसान पर क्या कहें। हाँ, यह गुत्थी ज़रूर सुलझ गयी कि उनके जन्मदिन पर माँ उदास क्यों होती है। भगवान पर उनका क्रोध और बढ़ गया। उनकी बहन को जन्मते ही क्यों छीन लिया? माँ-पापा ने कैसे सहा होगा उसका जाना?

“क्या हुआ था उसे? इलाज नहीं हो सकता था? इसके बाद भी आप भगवान को कैसे पूज लेती हैं? गुस्सा नहीं आता क्या?”

“जन्म के समय तुम दोनों ही मृतप्राय थे। तब ज़माना काफ़ी पिछड़ा हुआ था। डॉक्टरों को तो पहले से यह भी पता नहीं था कि मुझे जुड़वां बच्चे होने वाले हैं ...” माँ ने आँख पोंछते हुए कहा, “और भगवान से गुस्सा तो हो ही नहीं सकती थी। वह चाहता तो मेरे दोनों बच्चे छीन सकता था मगर उसने इतना प्यारा बेटा मेरी गोद में जीवित छोड़ दिया न।”

वीर को अचानक माँ पर असीमित दया और प्यार दोनों ही आ गये। परंतु भगवान के प्रति उनका क्रोध कम नहीं हुआ।

[क्रमशः]

10 comments:

  1. हम मानते बेशक न हों, लेकिन भगवान एक बहुत बड़े सेफ़्टी वॉल्व हैं, सुविधानुसार गुस्सा कर लें उन पर, मांग लें कूछ भी, दोष दे दें।
    नई सराय से शुरू हुई कहानी पुराने समय में जाती जा रही है। वीर सिंह का क्या होगा, इंतज़ार करेंगे हम लोग:)

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  2. आत्म -विभोरे कर देती हैं आपकी कहानी अंश -------लय गति सम्यक है
    साधुवाद जी /

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  3. हर बार कुछ नया, पढ़ रहे हैं।

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  4. मगर उसने इतना
    प्यारा बेटा मेरी गोद में-----
    साधुवाद

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  5. अचानक पता चलने वाली कुछ बातें मन में उथल पुथल मचा देती हैं...... नया और रोचक मोड़....

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  6. वीर को समझ नहीं आया कि जिस बहन के बारे में वे अब तक अन्धेरे में थे, उसके अवसान पर क्या कहें।
    ऐसे में...कोई भी प्रतिक्रिया मुश्किल होती है...क्यूंकि इंसान कुछ महसूस ही नहीं कर पाता.
    अगली कड़ी का इंतज़ार....

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  7. काफी अंश पढ़ने से रह गए हैं एक दिन सब एक साथ पढूंगी.

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  8. सुन्दर ...कभी - कभी बहन की याद आ ही जाती है ! उस समय की आह अकथनीय होती है !

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