Sunday, September 13, 2026

ग़ज़ल: सँवारे क्यों

काम नहीं जो आने वाला, उसको कोई पुकारे क्यों।
बाज़ारों की इस बस्ती में, दिल को कोई निखारे क्यों॥

इस्तेमाल का दौर नया है, भोगें-फेंकें, चलो-टलो, 
जो पीछे छोड़ा जा सकता है, उसको कोई सुधारे क्यों॥

जीवन मतलब मनरंजन, खेलें जब तक खेल चले,
टूटे हुए खिलौने पर अब, रंग कोई निखारे क्यों॥

हर नाते की उम्र लिखी है, विज्ञापन की तर्ज़ों पर,
डूबे यदि सम्बंध पुराना, उसको कोई उबारे क्यों॥

जर्जर होते हर रिश्ते को, तन्हा होकर छूटना है,
बीत कल की पगडंडी, आख़िर कोई निहारे क्यों॥

काँच का झूमर नीचे गिरकर, कब का चकनाचूर हुआ,
बीन-बीन किरचों को उसकी, पागल कोई सँवारे क्यों॥

Saturday, September 5, 2026

सच: कुछ हाइकु खरे-खरे

1. खरे बोल से तौबा


​कड़वा सच,
सुनाते ही रहते,
सह न पाते।
2. पर उपदेश

​ज़हर सच,
औरों को ही पिलाते,
खुद न पीते।

3. अहंकार

​कहते खरे,
कोई और जो कहे,
लगते खोटे।

4. दर्पण
सच का शीशा,
औरों को दिखाते हैं,
खुद छुपाते।

Tuesday, August 18, 2026

मौन का आधार और संवाद का आकार

मौन के विज्ञान के
विद्वान भी होंगे कहीं,
हम भला कैसे कहें कि
मौन का आधार क्या है।

प्रश्न जब कोई उठे और
उत्तरों की प्यास हो,
दो तटों को जोड़ दे
उस सेतु की ही आस हो।

कोरियन के प्रश्न का,
उत्तर जापानी में मिले,
राह छूटे समझ की जब,
संवाद का आकार क्या है?

जवाब के बदले अगर
चुप्पी ही सहसा आ ढले,
वह कतरनी की तरह
हर एक रिश्ते को छले।

रोकती जो राह को
'स्टॉप साइन' बन गई,
घातक बनी इस चुप्पी का
आखिर सही आधार क्या है?

चुप्पी ही उत्तर है क्या,
या बस उपेक्षा भाव है?
या अहंता से जन्मता
भीतरी कोई घाव है?

प्रश्न को समझे नहीं,
या वक्त माँगा जा रहा,
मौन के इस व्यूह का
सत्य और आगार क्या है?

संवाद ही तो ज़िंदगी का
सहज-सच्चा रूप है,
मौन जब छाया न दे तो
काटती वह धूप है।

जो शब्द की हत्या करे
और अर्थ को ही मेट दे,
उस मौन से बेहतर तो फिर
स्पष्ट एक इनकार है!

हम भला कैसे कहें
क्या मौन ही आधार है?

Sunday, August 16, 2026

संकेन्द्रीय वृत्त

(एक केयरगिवर की गाथा) मेरे जिम्मे थे—

हमारे साझा खाते, साझे ऋण, 
साझे कार्ड, और
हर वित्तीय बोझ 
जिसमें कुछ जाना था।

बिखरी पड़ी हैं
तुम्हारी खूबसूरत तस्वीरें
जिसमें मैं नहीं हूँ;
क्योंकि मैं हमेशा
कैमरे के उस पार खड़ा था।

तुम्हारे हिस्से में था—
एक विचित्र ब्रह्माण्ड,
कई संकेन्द्रीय वृत्तों का घेरा।

केंद्र में तुम,
हर फ्रेम में मुस्कुराते हुए,
चारों ओर के घेरों में
माता‑पिता, भाई‑बहन,
रक्त-सम्बन्धी, प्रशंसक,
दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी,
नितांत अजनबी भी।

बस एक भला मानस था
जिसके लिए मुस्कान नहीं थी
वह जो हर बार
पीछे खड़ा रहता था।

जो धीरे‑धीरे
निरंतर अपमानित होते हुए
पीछे छूट ही गया—
घर-परिवार,
नाते-संस्कार,
नज़र से भी,
याद से भी।

बहुत कुछ हुआ
समय-समय पर
डायरियाँ चीती गईं, 
तो लेखन गया, 
तस्वीरें पोती गईं, 
चित्रकला गई, 
फोटो काटे गए 
तो फोटोग्राफी बुझ गई, 
पौधे मारे जाने से,
बागवानी की आत्मा सिधार गई, 
‘कान‑पकाना’ कहकर
गायन रोका गया
इस प्रकार
गुनगुनाना भी शांत हो गया।

मेरा अस्तित्व ही नहीं
मेरी उपस्थिति भी
किसी अपराध की तरह
मिटाई जाती रही, 
धीरे-धीरे, लेकिन सतत।

इलेक्ट्रॉनिक्स कैश हुए, 
कलेक्टबल्स ट्रैश हुए, 
एक्सेसरीज़ दान में गईं— 
मित्रों-परिवारों से मिले
और दो चोरियों से बचे
उन सभी उपहारों को
जिन पर किसी का नाम था
एक-एक कर
किस अनाम प्रेत ने उठाया,
कभी पता न चला।

शिकायतों के चलते
दस घर बदलने पड़े
दशक बीतते-बीतते —
क्योंकि कोई घर कभी
मायके से दूर,
कोई परिजनों से कटा हुआ,
कभी मित्रों से बिछड़ा हुआ था।

कभी पड़ोसी बुरे,
कभी मोहल्ला ग़लत,
कभी शहर, तो कभी देश—  
दो बार तो मंज़िल ही ग़लत निकली।

किसी घर में धूप कम थी,  
किसी में चाँदनी अधिक थी।  
कमी अलग-अलग होते हुए भी,
समानता एक ही रही—
हर शिफ़्टिंग मुझे अकेले ही करनी पड़ी।

सामान बाँधना, छाँटना,  
भरना, ढोना, उतारना, खोलना,  
सफ़ाई करना— सब अकेले ही किया
जैसे सारा जीवन, अकेले ही जिया।
तुम कभी साथ थीं ही नहीं
क्योंकि तुम्हारे अन्य सामाजिक फ़र्ज़
अधिक ज़रूरी लगे थे, हर बार, लगातार।

वक़्त गुज़रता गया
आशा धूमिल होती रही
परंतु मैं मिटा नहीं,
न भूत हुआ,
यदा कदा सामने लाया जाता रहा
जब सुरक्षा चाहिए होती,
या संकट में सहारा,
जब पैसों की ज़रूरत होती,
या किसी महफ़िल तक जाने को
चालक नहीं मिलता था,
या एक सर चाहिये होता था
खानदानी मूर्खता से हुई
हानियों का ठीकरा फोड़ने को।

तुम्हारे खाते जुड़े रहे
तुम्हारे अपने रक्त‑सम्बन्धों से
गौरव, अपनी जाति से
द्वेष मुझसे, मेरे हितैषियों से।

तुम्हारे उत्सव सजते रहे
तुम्हारे मित्र‑मंडल के लिए
और मैं—
मैं बस कभी‑कभार
तुम्हें वहाँ छोड़ आता था,
जहाँ मैं स्वयं
कभी आमंत्रित नहीं था।

धीरे‑धीरे
मैं मिटता गया—
तुम्हारे जीवन से,
अपने जीवन से,
सार्वजनिक पटल से,
अपने लोगों से,
अपने मित्रों से,
और उन सबकी दृष्टि से
जो सच में मेरी परवाह करते थे,
गाहे-बगाहे तारीफ़ भी।

और यह सब होते हुए भी,
मैं दशकों साथ चलता रहा था
अपने उस सबसे बड़े शत्रु के
जिसने कभी नहीं गँवाया
एक भी अवसर मुझे निशाना बनाने का
दिल दुखाने का
मेरे विकेट उखाड़ने का
मेरे खिलाफ़ गोल करने का
मुझे अपमानित
और बदनाम करने का
अपनी सखियों में
उनके पतियों में
यारों में, दिलदारों में
यहाँ तक कि
मुहल्ले के दुकानदारों में।

चीड़ और चांद

(चित्र व शब्द: अनुराग शर्मा)

चीड़ की इन ऊँची शाखों पर
शाम ने टांग दी है, 
अपनी अंतिम साँस
जैसे कोई ख़त,
जिसे लिखकर डाक में डाल दिया हो,
पर मंज़िल तक पहुँचना अभी बाक़ी हो।

चांद आज
कुछ ज़्यादा ही नीचे झुक आया है,
शायद ची‌ड़ की सुइयों में
अपनी ही कोई पुरानी ख़ुशबू ढूँढने।

हवा ने
दोनों के बीच
एक धीमी‑सी सरगोशी छेड़ दी है।
पता नहीं किसकी बात है,
पर सारी रात
पत्ते उसे दोहराते रहे हैं।

कभी‑कभी लगता है
चीड़ और चांद
दो पुराने दोस्त हैं।
एक ज़मीन पर टिक कर ऊँचा उठता है,
दूसरा गगन में रहकर
थोड़ा‑थोड़ा नीचे उतरता है।

... और इन दोनों के बीच
की ख़ामोशी ही
असल कहानी है।

Sunday, April 26, 2026

हिंदी ग़ज़ल: अनुराग शर्मा

द्वार प्रेम के खुले हुए हों, बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।

साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने हैं वे सभी निशाँ जो, रंजो-ग़म, विस्मय के हों।

कहा जो तुमने, सच ही होगा, छल शब्दों में होगा क्यों,
रिश्ते वही टिकेंगे जग में, जो प्रीति और विनय के हों।

तुमने थामा हाथ हमारा, युग तक यह विश्वास रहे, 
टूटन कैसी, रिश्ते जो हों, निष्ठा और आश्रय के हों।

फूल वही खिलते उपवन में, जिनकी रहे सलामत जड़,
झूठ की नींव गिरा दी जाये, भवन सभी विजय के हों।

Friday, March 20, 2026

🌙ग़ज़ल - तुम्हारे हैं

Happy New Year 5128 📅 "रौद्र" नामक संवत्सर पर सबको शुभकामनाएँ 🙏 *श्री शालिवाहन शक 1948, युगाब्द 5128, संवत 2083 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, गुढीपड़वा, नवरात्रि व हिंदू नववर्ष पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभेच्छा* 🌹

सबको कुछ इस तरह दुलारे हैं,
जैसे वे सब भी उनको प्यारे हैं।

चोट दिल की कहाँ सम्हालेंगे,
हम तो बस दर्द के सहारे हैं।

रात भर ख़ुद से बात करते हैं,
दिन में ख़ामोशियों के मारे हैं।

ज़िंदगी इक अजीब सौदा है,
हमने बस क़र्ज़ ही उतारे हैं।

कोई मंज़िल न, कोई रस्ता है,
हम तो गुज़रे हुए नज़ारे हैं।

कल की उम्मीद नहीं बाकी है,
आज भी आस पर गुज़ारे हैं।

तुम गए तब से रातें काली हैं,
चंदा है न गगन में तारे हैं।

हम तो दिन-रात इतना कहते हैं,
तुम भी कह दो कभी "तुम्हारे हैं!"
***

Thursday, March 5, 2026

लेखक को जानिये - अनुराग शर्मा के साक्षात्कार और वार्ताएँ

प्रकाशित साक्षात्कार-वार्ता, कथन-वाचन शृंखला में कुछ और साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत हैं।

विडियो साक्षात्कार - Video Interviews

आभार पूजा अनिल 
(किस्साटेल के लिये अनुराग शर्मा और पूजा अनिल की वार्ता हाफ़-सेंचुरी, आधी सदी का क़िस्सा पर )
https://www.facebook.com/share/v/172nDdavMp/
आभार विनीता तिवारी (सेतु के दस वर्षों पर अनुराग शर्मा और विनीता तिवारी की वार्ता)


आभार रचना श्रीवास्तव (शशि पाधा जी की पुस्तक कही-अनकही पर चर्चा)

आभार वैश्विक हिंदी परिवार - उतरी अमेरिका (प्रस्तोता: आस्था नवल)

Saturday, February 14, 2026

कविता: साक्षात्कार

कविता एक उल्लास है, पर्व है, होली सा
तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।

एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ,
नव-वसंत की खुलती कोंपलों जैसे,
शरच्चंद्र में गिरते परिपक्व पत्तों से,
अमृत चांदनी के अनावृत आकाश में।

कठोर निस्तब्ध शीत में,
या नवतपे की दहकती धूप में,
मॉनसून की सोंधी मिट्टी के कम्पन में,
मैं तुम्हें हर रूप में स्वीकारना चाहता हूँ।

हृदय की मखमली तहों के नीचे दुबके,
तुम्हारे सत्य से मिलना चाहता हूँ,
जो आँखों की झिलमिलाहट में  जब-तब,
प्रश्न, कभी प्रतिप्रश्न बनकर उभरता है।

सत्य जो किसी दर्पण में  दिखता नहीं,
किसी मंच पर कभी चमकता नहीं,
रंगीला सा, पर छिपा शर्मीला सा,
कृत्रिम आवरणों की भीतों के पीछे।

उस जीवंत नारी से मिलना चाहता हूँ,
जो रस्मों को नहीं, स्वयं को निभाये,
जिसकी मुस्कान में अभिनय नहीं,  
मन निश्छल छलक-छलक जाये।

और जब वह अपने समूचे ऋत,
अलंकारहीन, निर्मल रूप में साक्षात हो,
तो मुझे भी यथावत देखे, पहचान सके,
बस इतना ही चाहता हूँ।

क्योंकि साक्षात सत्य को हम,
उतना ही अनुभूत कर सकते हैं,
जितना सत्य हम अपने भीतर
पल्लवित कर सके हों।

Monday, December 29, 2025

छोड़कर हमको प्रिये - हिंदी ग़ज़ल

छोड़कर हमको प्रिये, ताउम्र पछताओगी तुम
दिल हमारा तोड़कर, रहने कहाँ जाओगी तुम।

फूल से चेहरे पे आँसू का लगा जैसे हुज़ूम,
आईने में देखकर, खुद से ही घबराओगी तुम।

प्रेम की ख़ुशबू हमारे, बसती थी हर साँस में,
दौलतों में ढूँढती, उसको कहाँ जाओगी तुम।

रात की वीरानगी में याद कर करके मुझे,
नाम मेरा लेके फिर, चुपचाप रो जाओगी तुम।

हम तो इस वीराँ गली की धूल में मिल जाएंगे,
लौट आओ भी कभी, पर न हमें पाओगी तुम।

बच गया अनुराग, थोड़ा गर तुम्हारे पास भी,
ज़िक्र आयेगा जहाँ भी, चौंक सी जाओगी तुम॥

Thursday, November 27, 2025

❤️ जीवन को भरपूर जिया, खुश हो कर हर पल ❤️

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

बचपन से तूफ़ानी लहरों में उतरने लगा था,
घबराया जब भँवर में जीवन ठहरने लगा था।
लहरें दुश्मन, तैरना आता नहीं, डूबने को आया,
उस बहाव से ही, मैंने जीने का प्रण अपनाया।

रातों जागकर भी कोई किताब रास न आई, 
ठोकरें खूब लगीं, सफलता पास न आई।
शाला में पिछड़ा, मिला असफलता का उपहार,
अपनों की आँखों में देखी, निराशा और हार। 

दोस्तों पर विश्वास कर धन भी लुटाया,
बुद्ध संसार ने जमकर मुझे बुद्धू बनाया।
साँप-सियारों के जंगलराज में कोई कैसे रहे?
फिर भी रखा दिल साफ़, ज़माना जो चाहे कहे।

बेइंतहा मोहब्बत कर जब आँख बंद की थी, 
प्रेमिल कसमें खानेवालों ने ही विषपुटी दे दी थी। 
तकिया भीगता है, जब यादों की बाढ़ आती है,
आँसू नहीं गिनता, लेकिन पीड़ा भी कुछ सिखाती है।

जब-जब चैकमेट मिली, तब-तब अहंकार टूटा था,
शतरंज के राजा ने जाना, जीत का हर दाँव झूठा था।
कै़रम में रानी नहीं आती, पर फ़ाउल हो जाता है,
फिर भी मुस्कुराकर, मन अगली बाज़ी में लग जाता है।

जानता हूँ ये सब हार नहीं हैं, ये मेरी जीवन शैली हैं,
फटे-पुराने पत्ते पाकर, हारने वाली बाज़ियाँ खेली हैं।
जीतकर भी अपनों और आदर्शों के लिये जीवन हारा है,
मीरा-सुकरात ने भी तो विष, अमृत समझ स्वीकारा है॥

Sunday, November 23, 2025

ग़ज़ल: आईना मारा गया 🪞

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

दोनों दिल ऐसे मिले, दिल का गिला सारा गया
ये जग हमारा हो गया, मेरा-तिरा सारा गया॥

तेरी वफ़ा ने छू लिया तो ज़ख़्म सारे भर गये
इक तेरे आने से मेरा दर्द-ए-दिल सारा गया॥

रात की तन्हाई में, इक चाँद, कुछ तारे भी थे
तेरे उजाले में मगर, उनका नशा सारा गया॥

इश्क़ के कूचे में हमने, नाम जब तेरा लिया
ग़मज़दा अपना फ़साना, लम्हों में सारा गया॥

रहने की, तेरे दिल के कोने में, लगन ऐसी जगी
हम जहाँ भी रहते थे, वाँ का पता सारा गया॥

बदसूरती पर मेरी जिसको, न ज़रा भी नाज़ था
तेरी नज़र को देखकर, वो आईना सारा गया॥

मैं यहाँ कुछ कर सकूँ, थोड़ी जगह मुझको भी दे
खुद को साबित करने में, मैं सारा का सारा गया॥
***

Saturday, November 8, 2025

लेखक को जानिये - अनुराग शर्मा के कुछ और साक्षात्कार

प्रकाशित साक्षात्कार-वार्ता, कथन-वाचन शृंखला में कुछ और साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत हैं।

विडियो साक्षात्कार - Video Interviews


आभार अशोक व्यास (आईटीवी ग़ोल्ड ITV Gold)

आभार मुक्ता सिंह-ज़ॉक्की (ईकल्पना पत्रिका eKalpana)

Friday, October 17, 2025

उलटबाँसी सूरज की

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

सुबह के सूरज की तो 
शान ही अलग है
ऊँचे लम्बे पेड़ों पर

शाम की बुढ़ाती धूप भी
देर तक रहती है मेहरबान
उपेक्षित करके छोटे पौधों को

यह भी कमाल है कि
छोटे पौधे बढ़ सकते थे
काश! धूप उन तक पहुँच पाती।

Wednesday, September 17, 2025

कहानी: आशा

"मेरी लघुकथाएँ" से साभार

- अनुराग शर्मा


सोमवार का दिन वैसे ही मुश्किल होता है, ऊपर से पहली तारीख़। अपने-अपने खाते से तनख्वाह के पैसे निकालने वाले फ़ैक्ट्री मज़दूरों से बैंक भरा रहा। बाद में कैश गिनना, बंडल बनाना, कटे-फ़टे नोटों को बही में लिखकर अलग करने आदि में सरदर्द हो गया। वापस घर के लिये निकलने में थोड़ी देर हो गई थी। लेकिन जून महीने की दिल्ली तो रात में भी किसी भट्टी की तरह सुलगती है। अपना खटारा स्कूटर लिये मैं घर की ओर निकला तो यूँ ही हाइवे पर चाय के एक खोखे पर नज़र पड़ी और दिल किया कि रुककर एक कप चाय पी जाये।

“सलाम बरमा जी।” दुकानदार ने मुझे देखकर अपने दायें हाथ से माथा झटका तो मुझे लगा कि बैंक का कोई ग्राहक होगा इसलिये मेरा नाम जानता है।
“देक्खा बरमा जी, बताओ तो सही, मैंने कैसे पैचाणा आपको?”
“बैंक में देखा होगा ... एक कप चाय दो, एकदम कड़क।“
“एक चाय लगा बाबूजी को, पेशल मेहमानों वाली, दुकान के खाते में” कारीगर को चाय का ऑर्डर देकर वह फिर मुझसे मुखातिब हुआ, “बाऊजी, मैंने आपकी किताब्बें पढ़ी हैं। आप तो सब कुछ मेरेई बारे में लिखते हैं।”
अब चौंकने की बारी मेरी थी, “तुम्हारे बारे में? यह कैसे भला?”
“वह नई सराय वाली कहानी मेरी है, हुँआ के ही तौ हैं हम ... और वो ‘दुरंत’ कहानी में जब सम्पादक अपने नौकर से ‘ओ खब्बीस ...’ कहता है, वो भी तो मेराई डायलॉग है।” इतना कहकर वह ज़ोर से चिल्लाया, “ओ खब्बीस ...”
न जाने कहाँ से एक मरियल से लड़के ने आकर डरते-डरते नरमी से पूछा, “बुलाया मालिक?”
“ना ना, वोई तो मैं बरमा जी को समझा रिया था ... अब तू जा, अपना काम कर,” फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, “देख लिया आपने? सौ फीसदी मेराई डायलॉग है जे।”
उसके पास मेरी चोरी का सबूत था, मैं क्या कहता? वह बोलता रहा, मैं सुनता रहा।
“और वह ... गधा वाली कहानी में ... खलनायक का नाम ... लित्तू, वह भी मेरा ही रख लिया ...”
“गधा नहीं भई, गदा, गदा वाली कहानी। मैंने तो बहुत सोच समझकर ऐसा नाम रखा था जो किसी का न हो ... लित्तू भाई
“हाँ हाँ, वोई। नाम किसी का न हो का क्या मतलब है? मैं सामने बैठा तो हूँ, लितू परसाद। ऊपर बोर्ड नहीं देखा क्या? एल परसाद टी स्टाल। जे हूबहू मेरा ही नाम है।”
“माफ़ करना भाई, पता नहीं था।”
“माफ़ी किस बात की साहेब? वो देखिये… सामने रखी हैं आपकी किताबें। हर कहानी खुद पढ़ी है, खाली टेम में कभी-कभी एकाध पन्ना पढ़कर गिराकों को भी सुना देता हूँ। आपने तो अपनी कहानियों में जगह देकर मुझ जैसे ग़रीब चायवाले को मशहूर कर दिया। आपके लिये चाय मट्ठी बिस्कुट, सब मुफ़्त है इस दुकान में। जब चाहे आ जायें, जो चाहें, पियें खाएँ।”
मेरा सरदर्द काफ़ूर हो चुका था अपने नये पाठक से मिलकर। मैंने उठकर उसे गले लगा लिया। हिंदी कहानी के पाठक का जीवित होना मेरे लिये आशाजनक था।

Sunday, September 14, 2025

चिमनी और चंदा

चिमनी से निकला धुआँ, चंदा सा आकार,
आँख से मानो बह चलीं, यादें बारंबार।

जैसे तूने छोड़ी थीं, ये राहें उस दिन मौन,
वैसे ही चुप चाँदनी, कहे-सुने अब कौन।

नीला अम्बर ओढ़ के, तेरा रूप रचे,
तेरे बिन भी चाँद है, फिर भी मन न बचे।

धूप नहीं, पर शरच्चंद्र से रोशन होती रात,
धवल शांत हो सुन रही, जैसे तेरी बात।

छेड़ रही हैं बदलियाँ, चंदा लेता ओट।
जैसे तेरी गुदगुदी, दिल पर लगती चोट।

Friday, September 12, 2025

प्रहरी की यात्रा - 2

ज़मीन पर नहीं खड़े, जो नभ में उड़े हैं,
साथियों, जीवनसाथियों से भी छले गये हैं,
द्वेष, उपेक्षा और तिरस्कार के तेल में,
जिनके निर्मल हृदय, सतत तले गये हैं।

अनुरोध, सुझाव, सलाह सब धूल हुए,
चिंतन और विश्वास से बनाई योजनाएँ
क्रूरता से तोड़ी, निर्ममता से बिखेरी गईं,
अविश्वास से हारीं, प्रेम की सब कामनाएँ।

कानाफूसी, अफ़वाहें, फिर उपहास हुआ,
कड़वी बातें, घातें, काँटे, भाले खूब चुभे,
स्वजन दूर, घर सूने और द्वार खामोश हुए,
सूनेपन से सूने मन की आशा को तुषार मिला।

संघर्ष और विजय नज़रअंदाज़ होते रहे,
अपवाद बस वही एक शिरोमणि कवच था,
महानायक के उस अंतिम सम्मान में भी,
आदर नहीं, बीमे की रकम का लालच था।

इस कठिन राह पर चलने वाला हर कोई,
जिसने कृतघ्नता का फल जान देकर चुकाया,
उनका मूल्य अवर्णनीय है, चुका नहीं सकते,
माणिक, रत्न, अशर्फ़ी देकर भी रहे बकाया।

Saturday, September 6, 2025

प्रहरी की यात्रा - 1

सूरज उगना भूल गया था,
सन्नाटा चीखों से टूट गया था,
वहाँ गया था वह, कर्तव्य निभाने, 
न सम्मान ढूंढने, न लाभ कमाने।

सज्जन, सैनिक, योद्धा, वह अधिकारी,
जिसकी प्रतिज्ञा थी मौन, लेकिन भारी,
धूसरित राहों में, अनसुनी आहों में,
जहाँ साहस के सिवा मार्गदर्शक कोई न था।

न ताज चाहा, न कवि-वंदना, न वाहवाही,
हिंसा झेली, देखी दुश्मन की आवाजाही।
जहाँ आतंक विष बेलों सा फैला रहा,
और सत्य बारूद के नीचे कुचला रहा।

बगावत जंगल में फुसफुसाती थी,
कट्टरता लहू बहाने को उकसाती थी,
मुण्डों के आसन के तानाशाहों से,
निर्भीक, वह लड़ता रहा, वर्षों तक।

उसका यौवन, एक दीपक अंधेरे में,
मार्गदर्शक रहा, मौत के घेरे में।
हर धड़कन एक प्रहरी की ताल,
हर श्वास एक चुनौती भरा सवाल।

उसने अपना जीवन अर्पित किया
राष्ट्र, मानवता, और परिवार के लिए।
वह लड़ा, कभी झुका नहीं,
वह बहा, कहीं रुका नहीं।

एक टांग पहाड़ों में छूट गई,
आँख, संगीन से टूट गई,
दो हाथ जो मानवता के रक्षक थे,
एक काँपता है, दूसरा नहीं रहा।

जिस कान ने कप्तान की पुकार सुनी,
अब उसमें भूतों की गूँज बची है।
सीने में अब भी युद्ध चलता है,
वह बेबस, अब जंजीरों से बँधा है।

न पेंशन, न बचत की छाया,
सिर्फ खाली कमरों की माया।
अपने नगर में, घर में, बेगाना है,
हर द्वार, व्यक्ति के लिये अनजाना है।

नये अभियान पर भेजा गया
शयनकक्ष से हटाकर बैठक में,
फिर बैठक से भण्डार में,
भण्डार से तहखाने की यात्रा अधूरी थी।

तहखाने से गराज तक,
गराज से फ़ुटपाथ तक,
फ़ुटपाथ से बेघर-शरणालय तक,
यात्रा चली,  सरकारी अस्पताल के बाहर, मृत्यु तक।

नायक मिट गया, कृतघ्न जगत की रीत में,
वह उड़ा, धुआँ बनकर, बेनामी चिता से।
न बिगुल, न ध्वज, न सलामी, अंतिम आहुति में,
मौन दाह, शांत श्मशान, साक्षी - एकल महाब्राह्मण।

Saturday, August 9, 2025

बड़ी क़यामत छोटों की

क़द, रुतबे, या दौलत से
लोग छोटे नहीं होते,
छोटे लोग 
दिल के छोटे होते हैं।

उनकी हर रेवड़ी 
उनके मुँह तक पहुँचती है
उनकी हर दौड़
उनके महल पर रुकती है।

हर काम लेन-देन होता है
जिसमें लेन तो लेन है ही
हर देन भी उम्मीद होती है
एक बड़े लेन की।

छोटे लोग बात भी करते हैं
तो केवल अपने बारे में
उनकी दुनिया वे ही हैं
और अपना ब्रह्माण्ड भी वही।

वे याद दिलाते हैं
आपको टोककर
अपने उस काम की 
जो आपने अभी किया नहीं।

क्योंकि आप मसरूफ़ थे
भीतर तक धँसे हुए थे 
दूसरे कामों के ढेर में
जो सब के सब उन्हीं के थे।
 
लेन-देन उनकी ज़िंदगी है, पर
उन्हें नहीं कोई लेना-देना 
आपकी ज़िंदगी से
क्योंकि आप इंसान नहीं हैं।

उनके लिये आप एक सौदा हैं
पटे तो ठीक
नहीं तो कई और हैं ठौर
मोल-भाव करने को।

मुनाफ़े का सौदा करना
उन्हें खूब आता है
ज़िंदगी भर वही किया है
वही करेंगे क़यामत तक।

Monday, March 31, 2025

खालीपन

नये पहाड़ चढ़ते हैं
सपाट पगडंडियों से 
जो थक चुके हैं
नये व्यंजन पकाते है वे
जो पुरानों से पक चुके हैं
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जो खुश हैं यथास्थिति से
उन्हें कुछ कमी नहीं
वे कभी उकताते नहीं
नया कुछ बनाते नहीं
ज़रूरत ही पाते नहीं।
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खालीपन, बंजारापन
अकुलाहट,  आवारापन
शैतान का घर नहीं
सरस्वती का वास है
नवनिर्माण की आस है।
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बोरियत उदासी नहीं
चयन का अभाव नहीं
उनसे उकताहट है
वर्तमान विकल्पों से कहीं आगे
एक नये क्षितिज की चाहत है।
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