Saturday, October 8, 2011

अनुरागी मन - कहानी (भाग 16)

अनुरागी मन - अब तक - भाग 1; भाग 2; भाग 3; भाग 4; भाग 5; भाग 6भाग 7; भाग 8; भाग 9; भाग 10; भाग 11; भाग 12; भाग 13; भाग 14; भाग 15;
पिछले अंकों में आपने पढा:
दादाजी की मृत्यु, एक अप्सरा का छल, पिताजी की कठिनाइयाँ - वीर सिंह पहले ही बहुत उदास थे, फिर पता पता लगा कि उनकी जुड़वाँ बहन जन्मते ही संसार त्याग चुकी थी। ईश्वर पर तो उनका विश्वास डाँवाडोल होने लगा ही था, जीवन भी निस्सार लगने लगा था। ऐसा कोई भी नहीं था जिससे अपने हृदय की पीड़ा कह पाते। तभी अचानक रज्जू भैय्या घर आये और जीवन सम्बन्धी कुछ सूत्र दे गये| ज़रीना खानम के विवाह के अवसर पर झरना के विषय में हुई बड़ी ग़लतफ़हमी सामने आयी जिसने वीर के हृदय को ग्लानि से भर दिया।
अब आगे भाग 16 ...
ज़रीना की शादी के बाद दो दिन तक वीर अपने घर से बाहर नहीं निकले। तीसरे दिन वासिफ़ उनसे मिलने आया। बहुत दिन बाद दो जिगरी दोस्त एक साथ शाम की सैर पर गये। झरना के बारे में बहुत बात हुई। कहानी काफ़ी लम्बी थी। वह सब ईर और फ़त्ते को सुनाकर वीर उन्हें बोर नहीं करना चाहते थे। लेकिन उन्होंने इतना बताया कि झरना का वासिफ़ से कोई रक्त-सम्बन्ध नहीं था। वासिफ़ के दादा झरना फर्शस्ती के पारसी दादा की नई सराय स्थित सम्पत्ति के प्रबन्धक थे। अंग्रेज़ों के समय से ही कई नगरों में उसके परिवार की स्थाई सम्पत्ति थी। नई सराय का पहला पेट्रोल पम्प, बरेली की पहली कत्था फ़ैक्ट्री और अमरोहा के कुछ बाग़ान के अलावा दिल्ली और कानपुर में भी उनका व्यवसाय था। झरना का जन्म केन्या में हुआ था। काफ़ी पहले एक सड़क दुर्घटना में उसके पिता गुज़र चुके थे। अपने पुराने कारकुनों के विश्वास पर व्यवसाय का सारा काम माँ-बेटी ही देखती थीं। झरना और उसकी माँ उसी सिलसिले में हर साल गर्मियों में भारत आते थे। माँ की तबियत बिगड़ने के कारण इस बार वह अकेले ही आयी थी और इसी बीच उनकी मृत्यु के कारण उसे अचानक वापस जाना पड़ा था।

जब वीर घर वापस आये तो माँ पिता के लिये पत्र लिख रही थीं। वीर ने भी महीनों बाद अपने पिता के लिये एक अच्छा सा पत्र लिखकर उसे माँ के पत्र के साथ ही लिफ़ाफे में बन्द किया और नुक्कड़ पर लगी डाकपेटी में डालकर आ गये। माँ खाना लगाने लगीं। वीर ने अपनी ममतामयी माँ को बड़े ध्यान से देखा।

कई मायनों में माँ इस परिवार की क्रांतिकारी बहू थीं। उन्होंने कभी घूंघट नहीं किया न ही पति का नाम लेने में झिझकीं। माँ ने कभी करवाचौथ का व्रत भी नहीं रखा था। वे उसे ज़रूरी नहीं मानती थीं परंतु उन्हें यह अहसास था कि हर साल निर्जला उपवास रखने वाली दादी इस बार अपने उपवास के देवता के बिना अकेली थीं। इसलिये करवाचौथ पर माँ वीर को साथ लेकर दादी से मिलने नई सराय आयीं। शाम का खाना खाकर सास बहू बातें करने लगीं। दादी थोड़ी भाव-विह्वल हो गयीं कि सदा उपवास करने के बाद भी वे विधवा हो गयीं। भरे गले से उन्होंने माँ के विवेक और उनके अन्धविश्वास से बचे रहने की प्रशंसा की।

माँ और दादी अभी भी बातें कर रहे थे परंतु बातों का रुख आस-पड़ोस के ताज़ा समाचार की ओर मुड़ चुका था। वीर उठकर छत पर आये और फिर छज्जे पर खड़े होकर बाहर का नज़ारा करने लगे। लजाती-शर्माती नववधू से लेकर वयोवृद्ध महिलायें तक आज नखशिख तक गहनों में सजी दिख रही थीं। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के विपरीत नई सराय और आसपास के क्षेत्रों में अविवाहितायें भी करवा चौथ का व्रत रखती थीं। मान्यता यह थी कि उनका पति तो उनसे पहले ही कहीं जन्म ले चुका है सो उपवास होना ही चाहिये। वीर को ख्याल आया कि उनकी बहन यदि जीवित होती तो माँ की तरह वह भी शायद ऐसा उपवास नहीं करती। अनदेखी बहन की याद आने पर भी आज वे उदास नहीं थे, अपने अन्दर आये इस परिवर्तन का श्रेय वे अपने डायरी लेखन को दे सकते थे।

ये तूने क्या किया वीर?
आजकल वे उदास कम ही होते थे लेकिन झरना के प्रति अपने दुर्व्यवहार के कारण एक ग्लानि सी उन्हें घेरे रहती थी। बिना माँ-बाप की एक निश्छल बेटी। न जाने कब मिलेगी और कब वे अपने कृत्यों की क्षमा मांग सकेंगे। सोचते-सोचते कब अन्धेरा घिर आया, और कब चांद खिला, उन्हें पता ही न लगा। वे हटकर अन्दर जाने को हुए ही थे कि देखा सामने मैदान में एकत्रित महिलाओं से अलग हटकर खड़ी एक लड़की चन्द्रमा को अर्ध्य देने के बाद उनकी ओर मुड़कर उन्हें झुककर प्रणाम कर रही थी।

ध्यान से देखने पर पता लगा कि वह पड़ोस की शरारती निक्की ही थी। वीर जी शर्मा गये और झटके से मुड़कर अन्दर आ गये। तीनों जन ने साथ बैठकर खाना खाया। माँ और दादी को रसोई में छोड़कर वीरसिंह सोने चले। सोने से पहले उन्होंने डायरी में आज की घटनाओं को विस्तार से लिखा। वे समझ नहीं पाये कि निक्की को उनके बारे में भ्रम कैसे पैदा हुआ। उन्होंने तो सदा उसे अपनी बहन जैसा ही माना था और वैसा ही व्यवहार किया था।

सुबह जब किसी ने माथे पर हाथ रखा तो उनकी आँख खुली। चाय लेकर अपने सिरहाने खड़ी निक्की को देखकर उनके माथे पर बल पड़ गये। अपने शब्दों को संवारते हुए उन्होंने धीरे से कहा, "तुम्हें तकलीफ़ करने की क्या ज़रूरत थी? माँ और दादी कहाँ हैं?"

"क्यों? यह भी तो मेरा ही घर है? अपने घर के काम में तकलीफ़ कैसी? वैसे काम में लगी हैं दोनों? पूरे घर की धुलाई हो रही है।"

प्याला हाथ में थमाकर निक्की सामने ही कुर्सी पर बैठ गयी।

"कल रात क्या कर रही थी?" वीर ने अपनी आवाज़ को यथासंभव संयत रखते हुए पूछा।

"आपने देख लिया था?" निक्की ने लजाते हुए पूछा।

"हम नई सराय के कुँवर जी हैं, यहाँ हमसे कुछ भी छिप नहीं सकता है।"

"तब तो आपको पता होना चाहिये कि हमने अपना वर चुन लिया है" निक्की ने अपने बिन्दास अन्दाज़ में कहा।

"ज़रा सी तो हो, अभी पढने-लिखने की उम्र है तुम्हारी।"

"आपसे बस छह मास छोटी हूँ, 17 की हो चुकी हूँ मैं, कोई बच्ची नहीं हूँ।"

"अच्छा!" वीर का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया, न जाने क्यों वे निक्की को 10-12 साल का ही समझते थे।

" तो सुना दो अपने वरदान का राज़ ..." वीर आगत का सामना करने की तैयारी कर रहे थे।

"मेरा चन्द्रमा तो कल चन्द्रमा निकलने के साथ ही आपके दरवाज़े के साथ आकर खड़ा हो गया था।"

"अरे वाह! कौन है वह?" वीर की वाणी का उल्लास छिपाये न छिपा।

"मंगल ... मिश्र अंकल का बेटा। बहुत अच्छा लड़का है। पढाकू है। और आपकी तो बहुत इज़्ज़त करता है। ... मतलब, आपकी इज़्ज़त तो सभी करते हैं, ... मैं भी करती हूँ।"

"अच्छा! तो यह बात है।" वीर प्रसन्न थे फिर भी एक उलझन थी, " ... अब यह बताओ कि वह पत्र क्यों लिखा था मुझे?"

"कौन सा?" निक्की सोच में पड़ गयी।

"वही जो पिछली बार मेरे बरेली जाते हुए दिया था तुमने।"

"अच्छा वो! धत्! मैं आपको क्यों लिखने लगी वैसा पत्र?" वह चुन्नी दांत से काटने लगी, "वह तो झरना जी ने आपको दिया था जब वे यहाँ आयी थीं, दादाजी की ग़मी में।"

"उसने दिया था? तुम सच बोल रही हो?" वीर को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।

"हाँ भैया, उन्होंने तो आपको ही दिया था लेकिन तब आप होश में कहाँ थे। नीचे गिरा दिया था। मैंने ही उठाया और अपने पास रख लिया था ताकि किसी के हाथ न पड़े।"

"हे राम!"

"झरना जी बहुत अच्छी हैं भैया, लाखों में एक। आप दोनों की जोड़ी बहुत सुन्दर है। वे आपकी दीवानी हैं, उन्हें निराश मत कीजियेगा।"

वीर का दिल फिर बैठ गया। उनकी आँखों के सामने क्या-क्या होता रहा और वे कुछ भी देख नहीं पाये!

[क्रमशः]

Friday, October 7, 2011

अनुरागी मन - कहानी (भाग 15)

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अनुरागी मन - अब तक - भाग 1; भाग 2; भाग 3; भाग 4; भाग 5; भाग 6;
भाग 7; भाग 8; भाग 9; भाग 10; भाग 11; भाग 12; भाग 13; भाग 14;
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पिछले अंकों में आपने पढा:
दादाजी की मृत्यु, एक अप्सरा का छल, पिताजी की कठिनाइयाँ - वीर सिंह पहले ही बहुत उदास थे ... और अब यह नई बात पता पता लगी कि उनकी जुड़वाँ बहन जन्मते ही संसार त्याग चुकी थी। ईश्वर पर तो उनका विश्वास डाँवाडोल होने लगा ही था, जीवन भी निस्सार लगने लगा था। ऐसा कोई भी नहीं था जिससे अपने हृदय की पीड़ा कह पाते। तभी अचानक रज्जू भैय्या घर आये और जीवन सम्बन्धी कुछ सूत्र दे गये
अब आगे भाग 15 ...
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डायरी लिखने की सलाह जम गयी। रज्जू भैया की सलाह द्वारा वीर ने अनजाने ही अपने जीवन का अवलोकन आरम्भ कर दिया था। डायरी के पन्नों में वे अपने जीवन को साक्षीभाव से देखने लगे थे। वीर ने अपने मन के सभी भाव कागज़ पर उकेर दिये। कुछ घाव भरने लगे थे, कुछ बिल्कुल सूख गये थे। दादाजी का जाना, पिताजी का कठिन जीवन, दादी का अकेलापन, बहन की मृत्यु, सारे ग़म मानो डायरी के पन्नों में आते ही सिकुड़ गये। टीसते थे परंतु अब खुले ज़ख्मों से रक्त नहीं बह रहा था सिवाय एक जगह के। झरना की याद, उसका प्रेममय व्यवहार, और उसकी बातें अब भी उनका हृदय छलनी कर जाती थीं। लाख सोचने पर भी वे समझ नहीं पाते थे कि उनके जीवन से इतना बड़ा खिलवाड़ कैसे हो गया। एक वाग्दत्ता उनकी भावनाओं के साथ क्यों खेलती रही? उनकी पीड़ा उनकी कविताओं में निखरकर आ रही थी जो कि अब स्थानीय पत्र में छपने भी लगी थीं। दिल दुखता तो था मगर अब तक वे इतना सम्भल चुके थे कि यदि झरना सामने पड़ जाती तो अपने दिल की हलचल को सबसे छिपाकर ऊपर से सामान्य व्यवहार कर सकते थे।

दुल्हन आ चुकी थी
दो महीने कब बीत गये पता ही न चला। माँ ने वीर को याद दिलाया कि आज ज़रीना की शादी का दिन था। दोनों तैयार होकर वासिफ़ के घर पहुँच गये। सब लोग अच्छी प्रकार से मिले। माँ महिलाओं के बीच ग़ुम हो गयीं जबकि वीर को वासिफ़ अपने साथ ले गया। ऊपर से संयत दिखने का प्रयास करते हुए वीर को यह डर नहीं था कि क्या वे सचमुच अपनी अप्सरा को किसी और का होते हुए देख पायेंगे। उन्हें अपने ऊपर इतना भरोसा तो था ही। लेकिन वे यह अवश्य देखना चाहते थे कि अपने विवाह के समय उन्हें उपस्थित पाकर झरना कितना सामान्य रह पाती है। वीर को अब तक पता नहीं था कि अलग-अलग सम्प्रदायों में विवाह के रिवाज़ कितने अलग होते हैं। घरातियों के साथ मिलकर वीर ने भी गुलाब की पंखुड़ियाँ बिछाकर बारात का स्वागत किया। दूल्हे और बरातियों को हार पहनाये गये और सेहरे पढे गये। कुछ लोगों ने दूल्हे को घेरकर उसके ऊपर चादर से एक छत्र सा बनाया और उसके आसन तक ले आये। दुल्हन भी सामने आ चुकी थी परंतु अभी उसका चेहरा फूलों के सेहरे के पीछे छिपा हुआ था। जल्दी ही सब अतिथियों ने भी अपने आसन ग्रहण कर लिये। निकाह पढा जाने से पहले वासिफ़ की अम्मी ने दुल्हन का सेहरा किनारे करते हुए उसका गाल चूमा तो वीर को मानो झटका सा लगा। वह झरना नहीं थी। उन्हें झरना के साथ पहले दिन हुआ अपना सम्वाद याद आया।

“वासिफ की छोटी बहन हैं आप?”

“नहीं”

“तो बड़ी हैं क्या?”

“नहीं”

हे राम! वे इतनी स्पष्ट बात का अर्थ भी नहीं समझ सके थे। इसका मतलब यह कि झरना वासिफ़ की बहन नहीं है। भगवान भी उनके साथ कैसा मज़ाक करता रहा और वे पहचान भी न सके। वीर, यह क्या कर दिया तूने? किसी के अनुरागी मन को अपवित्र समझा और आक्षेप लगाये। झरना और ज़रीना अलग-अलग हैं यह विचार मन में आते ही उन्होंने लड़कियों की दिशा में खोजना शुरू किया मगर झरना यदि वहाँ होती तो उस भीड़ में भी सबसे अलग दमक रही होती। शायद उन्हें देखकर स्वयं ही उनके पास चली आई होती।

विवाह की रस्म चल ही रही थीं कि वासिफ़ उनके पास आकर कान में कुछ फुसफुसाया। उन्होंने उसकी बात को अनसुना करके पूछा, "झरना कहाँ है?"

"झरना? वह तो कब की चली गयी। जाने से पहले तुम्हारे घर गयी तो थी मिलने। बताया नहीं क्या?"

"क्या? वह मेरे घर बताने आयी थी? यह सब क्या हो गया?"

"हाँ, मैं साथ आ रहा था पर वह अकेले ही जाना चाहती थी। चल क्या रहा है तुम लोगों के बीच?"

वे कुछ कह पाते इसके पहले कोई वासिफ़ को पकड़कर उसे अपने साथ ले गया।

ज़रीना का विवाह भली प्रकार सम्पन्न हुआ। उस दिन वासिफ़ से फिर उनकी मुलाक़ात नहीं हो सकी। माँ के साथ वे अपने घर पहुँचे। वीर रात भर अपनी डायरी में बहुत कुछ लिखते रहे। लिखने से कहीं अधिक पढ़ा भी डायरी के पिछले पन्नों से। जितना पढ़ते जाते उनका दिल उतना ही पिघलता जाता। कितना दोष दिया उन्होंने झरना को ... उन अपराधों के लिये जो उसने कभी किये ही नहीं। सच है कि पिछले दिनों वे बहुत कठिनाइयों से गुज़रे थे लेकिन उसमें झरना का कोई दोष नहीं था। झरना पर अविश्वास करके न केवल उन्होंने अपनी कठिनाइयाँ बढाईं बल्कि अपनी अप्सरा का दिल ... अप्सरा का दिल कैसे तोड़ते रहे वे? वीर का हृदय ग्लानि से भर गया। कमरे की हर बत्ती जल रही थी मगर उनके दिल में घना अन्धेरा था। रोशनी कैसे आये? अपनी ग़लतियों का प्रायश्चित कैसे हो? झरना है कहाँ? कब मिलेगी? कैसे मिलेगी?

[क्रमशः]

Wednesday, October 5, 2011

श्रद्धेय वीरांगना दुर्गा भाभी के जन्मदिन पर

आप सभी को दशहरा के अवसर पर हार्दिक मंगलकामनायें!
एक शताब्दी से थोडा पहले जब 7 अक्टूबर 1907 को इलाहाबाद कलक्ट्रेट के नाज़िर पण्डित बांके बिहारी नागर के शहजादपुर ग्राम ज़िला कौशाम्बी स्थित घर में एक सुकुमार कन्या का जन्म हुआ तब किसी ने शायद ही सोचा होगा कि वह बडी होकर भारत में ब्रिटिश राज की ईंट से ईंट बजाने का साहस करेगी और क्रांतिकारियों के बीच आयरन लेडी के नाम से पहचान बनायेगी। बच्ची का नाम दुर्गावती रखा गया। नन्ही दुर्गावती के नाना पं. महेश प्रसाद भट्ट जालौन में थानेदार और दादा पं. शिवशंकर शहजादपुर के जमींदार थे। दस महीने में ही उनकी माँ की असमय मृत्यु हो जाने के बाद वैराग्‍योन्‍मुख पिता ने उन्हें आगरा में उनके चाचा-चाची को सौंपकर सन्न्यास की राह ली।

1918 में आगरा निवासी श्री शिवचरण नागर वोहरा के पुत्र श्री भगवती चरण वोहरा के साथ परिणय के समय 11 वर्षीया दुर्गा पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण कर चुकी थीं। समस्त वोहरा परिवार स्वतंत्र भारत के सपने में पूर्णतया सराबोर था। जन-जागृति और शिक्षा के महत्व को समझने वाली दुर्गा ने खादी अपनाते हुए अपनी पढाई जारी रखी और समय आने पर प्रभाकर की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1925 में उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम शचीन्द्रनाथ रखा गया।

(7 अक्टूबर सन् 1907 -15 अक्टूबर सन् 1999) 
चौरी-चौरा काण्ड के बाद असहयोग आन्दोलन की वापसी हुई और देशभक्तों के एक वर्ग ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम के साथ-साथ फ़्रांस, अमेरिका और रूस की क्रांति से प्रेरणा लेकर सशस्त्र क्रांति का स्वप्न देखा। उन दिनों विदेश में रहकर हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की रणनीति बनाने में जुटे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी लाला हरदयाल ने क्रांतिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल को पत्र लिखकर शचीन्द्र नाथ सान्याल व यदु गोपाल मुखर्जी से मिलकर नयी पार्टी तैयार करने की सलाह दी। पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने इलाहाबाद में शचीन्द्र नाथ सान्याल के घर पर पार्टी का प्रारूप बनाया और इस प्रकार मिलकर आइरिश रिपब्लिकन आर्मी की तर्ज़ पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (एचआरए) का गठन हुया जिसकी प्रथम कार्यकारिणी सभा 3 अक्तूबर 1924 को कानपुर में हुई जिसमें "बिस्मिल" के नेतृत्व में शचीन्द्र नाथ सान्याल, योगेन्द्र शुक्ल, योगेश चन्द्र चटर्जी, ठाकुर रोशन सिंह तथा राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी आदि कई प्रमुख सदस्य शामिल हुए। कुछ ही समय में अशफ़ाक़ उल्लाह खाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त जैसे नामचीन एचआरए से जुड गये। काकोरी काण्ड के बाद एच.आर.ए. के अनेक प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में एच.आर.ए. अपने नये नाम एच.ऐस.आर.ए. (हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन/आर्मी) से पुनरुज्जीवित हुई। दुर्गाभाभी, सुशीला दीदी, भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा का सम्बन्ध भी इस संस्था से रहा।

माता-पिता के साथ शचीन्द्रनाथ
मेरठ षडयंत्र काण्ड में भगवतीचरण वोहरा के नाम वारंट निकलने पर वे पत्नी दुर्गादेवी के साथ लाहौर चले गये जहाँ वे दोनों ही भारत नौजवान सभा में सम्मिलित रहे। यहीं पर भारत नौजवान सभा ने तत्वावधान में भगवतीचरण वोहरा की बहन सुशीला देवी "दीदी" तथा अब तक "भाभी" नाम से प्रसिद्ध दुर्गादेवी ने करतार सिंह के शहीदी दिवस पर अपने खून से एक चित्र बनाया था।

सॉंडर्स की हत्या के अगले दिन 18 दिसम्बर 1928 को वे ही लाहौर स्टेशन पर उपस्थित 500 पुलिसकर्मियों को चकमा देकर हैट पहने भगत सिंह को अपने साथ रेलमार्ग से सुरक्षित कलकत्ता लेकर गयीं। राजगुरू ने उनके नौकर का वेश धरा और कोई मुसीबत आने पर रक्षा हेतु चन्द्रशेखर आज़ाद तृतीय श्रेणी के डब्बे में साधु बनकर भजन गाते चले। लखनऊ स्टेशन से राजगुरू ने वोहरा जी को उनके आगमन का तार भेजा जो कि सुशीला दीदी के साथ कलकत्ता में स्टेशन पर आ गये। वहाँ भगतसिंह अपने नये वेश में कॉंग्रेस के अधिवेशन में गये और गांधी, नेहरू और बोस जैसे नेताओं को निकट से देखा। भगतसिंह का सबसे प्रसिद्ध (हैट वाला) चित्र उन्हीं दिनों कलकत्ता में लिया गया।

भगतसिंह की गिरफ़्तारी के बाद आज़ाद के पास उस स्तर का कोई साथी नहीं रहा गया था जो उनकी कमी को पूरा कर सके। यह अभाव आज़ाद को हर कदम पर खल रहा था। अब आज़ाद और भगवतीचरण एक दूसरे के पूरक बन गए। ~शिव वर्मा
महान क्रांतिकारी दुर्गाभाभी
वोहरा दम्पत्ति लाहौर में क्रांतिकारियों के संरक्षक जैसे थे। जहाँ भगवतीचरण एक पिता की तरह उनके खर्च और दिशानिर्देश का ख्याल रखते थे वहीं दुर्गा भाभी एक नेत्री और माँ की तरह उनका निर्देशन करतीं और अनिर्णय की स्थिति में उनके लिये राह चुनतीं।

भगवतीचरण वोहरा की सहायता से चन्द्रशेखर आज़ाद ने पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में हुए सेंट्रल असेम्बली बम काण्ड में क़ैद क्रांतिकारियों को छुडाने के लिये जेल को बम से उडाने की योजना पर काम आरम्भ किया। इसी बम की तैयारी और परीक्षण के समय रावी नदी के तट पर सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन की आंखों के सामने 28 मई 1930 को वोहरा जी की अकालमृत्यु हो गयी। उस आसन्न मृत्यु के समय मुस्कुराते हुए उन्होंने विश्वनाथ से कहा कि अगर मेरी जगह तुम दोनों को कुछ हो जाता तो मैं भैया (आज़ाद) को क्या मुँह दिखाता?

शहीदत्रयी की फ़ांसी की घोषणा के विरोधस्वरूप दुर्गा भाभी ने स्वामीराम, सुखदेवराज और एक अन्य साथी के साथ मिलकर एक कार में मुम्बई के लेमिंगटन रोड थाने पर हमला करके कई गोरे पुलिस अधिकारियों को ढेर कर दिया। पुलिस को यह कल्पना भी न थी कि ऐसे आक्रमण में एक महिला भी शामिल थी। उनके धोखे में मुम्बई पुलिस ने बडे बाल वाले बहुत से युवकों को पूछताछ के लिये बन्दी बनाया था। बाद में मुम्बई गोलीकांड में उनको तीन वर्ष की सजा भी हुई थी।

भगवती चरण (नागर) वोहरा
4 जुलाई 1904 - 28 मई 1930
अडयार (तमिलनाडु) में मॉंटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लेने के बाद से ही वे भारत में इस पद्धति के प्रवर्तकों में से एक थीं। सन 1940 से ही उन्होंने उत्तर भारत के पहले मॉंटेसरी स्कूल की स्थापना के प्रयास आरम्भ किये और लखनऊ छावनी स्थित एक घर में पाँच छात्रों के साथ इसका श्रीगणेश किया। उनके इस विनम्र प्रयास की परिणति के रूप में आजादी के बाद 7 फ़रवरी 1957 को पण्डित नेहरू ने लखनऊ मॉंटेसरी सोसाइटी के अपने भवन की नीँव रखी। संस्था की प्रबन्ध समिति में कुछ राजनीतिकों के साथ आचार्य नरेन्द्र देव, यशपाल, और शिव वर्मा भी थे। 1983 तक दुर्गा भाभी इस संस्था की मुख्य प्रबन्धक रहीं। तत्पश्चात वे मृत्युपर्यंत अपने पुत्र शचीन्द्रनाथ के साथ गाजियाबाद में रहीं और शिक्षणकार्य करती रहीं। त्याग की परम्परा की संरक्षक दुर्गा भाभी ने लखनऊ छोडते समय अपना निवास-स्थल भी संस्थान को दान कर दिया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा राजनीति में आने के अनुरोध को उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। पंजाब सरकार द्वारा 51 हजार रुपए भेंट किए जाने पर भाभी ने उन्हें अस्वीकार करते हुए अनुरोध किया कि उस पैसे से शहीदों का एक बड़ा स्मारक बनाया जाए जिससे भारत की स्वतंत्रता के क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का अध्ययन और अध्यापन हो सके क्योंकि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचय की आवश्यकता है।

92 वर्ष की आयु में 15 अक्टूबर सन् 1999 को गाजियाबाद में में रहते हुए उनका देहावसान हुआ। वोहरा दम्पत्ति जैसे क्रांतिकारियों ने अपना सर्वस्व हमारे राष्ट्र पर, हम पर न्योछावर करते हुए एक क्षण को भी कुछ विचारा नहीं। आज जब उनके पुत्र शचीन्द्रनाथ वोहरा भी हमारे बीच नहीं हैं, हमें यह अवश्य सोचना चाहिये कि हमने उन देशभक्तों के लिये, उनके सपनों के लिये, और अपने देश के लिये अब तक क्या किया है और आगे क्या करने की योजना है ।

सात अक्टूबर को दुर्गा भाभी के जन्मदिन पर उन्हें शत-शत नमन!

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* आजादी का अनोखा सपना बुना था दुर्गा भाभी ने
* Durga bhabhi: A forgotten revolutionary
* अमर क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा
* हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन का घोषणा पत्र
शहीदों को तो बख्श दो
* महान क्रांतिकारी थे भगवती चरण वोहरा
जेल में गीता मांगी थी भगतसिंह ने
महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर "आज़ाद"
जिन्होंने समाजवादी गणतंत्र का स्वप्न देखा
काकोरी काण्ड
* Lucknow Montessori Inter College
Revolutionary movement for Indian independence