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Saturday, December 13, 2008

बहाना - कविता

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हमसे झगड़ा तो इक बहाना था
आ चुका जितना उसको आना था

वो तो कब से तैयार बैठा था
गोया बेकार सब मनाना था

घर की ईंटें भी ले गया संग में
सिर्फ़ फुटपाथ पर ठिकाना था

जेब सदियों से अपनी खाली थी
मेरा क्या था जो अब गंवाना था

हम थे नाज़ुक मिज़ाज़ पहले से
उसके बस का कहाँ रुलाना था।

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Friday, December 12, 2008

तुम्हारे बगैर - कविता

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ज़िंदा रहे हैं हम
तुम्हारे बगैर भी
गर जिंदगी इक आग के
दरिया का नाम है

ख़्वाबों में मिला करते हैं
तुमसे हमेशा हम
इसके सिवा न हमको तो
कुछ और काम है

तेरी है न मेरी है
दुनिया है यह फानी
हम तो हैं उस जहाँ के
जहाँ तेरा धाम है

पीने की आरजू क्या
हम ख़ाक करेंगे
तेरा जो साथ न हो तो
जीना हराम है।

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Wednesday, December 10, 2008

सौभाग्य - कहानी - अन्तिम कड़ी [भाग ५]

सौभाग्य की अन्तिम कड़ी प्रस्तुत है। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड २
सौभाग्य - खंड ३
सौभाग्य - खंड ४


रणबीर के साथ मेरी शादी पापा के आशीर्वाद से हुई। कोई भी सहेली मेरी शादी में नहीं आयी। सबको यही लगता था कि मैंने आदित्य के साथ अन्याय किया है। किसी को भी मेरे दिल का हाल जानने की फुरसत न थी। मुझे यकीन था कि वह तो आयेगा ही। अरविन्द के द्वारा मेरी ख़बर तो उस तक पहुँचती ही होगी यह मुझे मालूम था। मगर वह भी न आया। उसकी तरफ़ से बस एक बधाई तार आया। बाद में भी उसकी कोई ख़बर न मिली। और कुछ नहीं तो आकर गुस्सा तो कर सकता था। मगर उसने गुस्सा भी नहीं किया और न ही कोई शिकवा। चुपचाप मेरी ज़िंदगी से चला गया। शादी के दो साल बाद करिश्मा पैदा हुयी। दिन, मास और फ़िर वर्ष बीतते गए। करिश्मा स्कूल भी जाने लगी।

पुराने मित्रों में सिर्फ़ अरविंद से कभी-कभार बस स्टॉप पर मुलाक़ात हो जाती थी। बाद में ऐसी ही किसी एक मुलाक़ात में अरविंद ने एक बार बताया कि आदित्य ने निशा से शादी कर ली। आदित्य और निशा - इससे ज्यादा बेमेल रिश्ता मैंने सुना न था। कहाँ आदित्य जैसा देवता आदमी और कहाँ एक नंबर की बदतमीज़ और नकचढ़ी निशा। बदतमीज़ क्यों न होती? चौधरी सुच्चा सिंह की बेटी जो ठहरी। चौधरी सुच्चा सिंह हमारी बिरादरी के सबसे नामी-गिरामी आदमी थे। बड़े-बड़े नेताओं से उठना बैठना था। वजह यह थी कि सारी बिरादरी के वोट उनके इशारे पर ही चलते थे। उनके प्रयासों से ही हम लोगों को आरक्षण मिला था। खानदानी पैसे वाले थे। सारा परिवार पढ़ा-लिखा भी था। कहते हैं कि भगवान सारे सुख किसी को भी नहीं देता है। बस उनके बच्चे ही ख़राब निकले। बड़ा बेटा गुंडागर्दी में पड़ गया। कॉलेज के दिनों में ही किसी हत्याकाण्ड में भी उसका नाम आया था। उसके दोस्तों को सज़ा भी हुई थी। मगर कहते हैं कि चौधरी ने अपने रसूख के बल पर उसको साफ़ बचा लिया था। मुक़दमे के दौरान ही उसे पढ़ने के बहाने इंग्लैंड भिजवा दिया था। अब तो वापस आने से रहा।

आदित्य के दादाजी चौधरी के परिवार के ज्योतिषी थे। चौधरी उनको बहुत मानते थे और कहते थे कि उनकी वजह से ही यह परिवार हमेशा चमका और कितना भी बुरा वक़्त आने पर भी कभी संकट में नहीं पडा। निशा का बचपन से ही आदित्य के घर आना जाना था। आदित्य को भी उसके घर में सभी पसंद करते थे। और निशा भी हमेशा से किसी फौजी अफसर से ही शादी करना चाहती थी। फ़िर भी इस शादी पर मुझे अचम्भा हुआ। निशा ने वह खजाना पा लिया था जो मेरे हाथ से फिसल चुका था। मुझे निशा से रश्क होने लगा। निशा ने ज़रूर पिछले जन्म में कोई बड़ी तपस्या की होगी। उस रात भी मुझे नींद नहीं आयी। वह रात मेरी ज़िंदगी की सबसे लम्बी रात थी।

-x-X-x-

"आँख से यह मोती क्यों गिरा, इसके बारे में, मुझे कुछ बताना चाहती हो?” उसने बिना किसी दृढ़ता के मुझसे पूछा।

पहले भी उसकी हर बात बिना किसी दृढ़ बन्धन के होती थी। मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैं चाहती थी कि वह मुझ पर अपना अधिकार जताए। अगर मैं उसकी बात का जवाब न दूँ तो वह जिद करके मुझसे दोबारा पूछे। अगर कभी वह मुझ पर गुस्सा भी करता तो शायद मुझे अच्छा ही लगता। मगर मेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हुई। उसने कभी भी किसी बात की जिद नहीं की थी। न तो ज़िद करके अपने किसी सवाल का जवाब माँगा और न ही कभी मुझ पर गुस्सा हुआ।

तब मैंने उसके व्यक्तित्व के इस अंग को कभी नहीं सराहा। आज इतने साल बाद पहली बार मैंने उसके व्यवहार के इस बड़प्पन को समझा। पहली बार अपने आप को उसकी बराबरी का परिपक्व पाया। क्या रणबीर की तानाशाही में रहने के कारण ही मैं ऐसा समझ रही हूँ? या फिर मेरी उम्र ने मुझे विकसित किया है। जो भी हो, इतना सच है कि वह आज भी हमेशा जैसा था।

“तुम इतने दिन से मिले क्यों नहीं मुझसे? इतने साल तक मेरी कोई ख़बर नहीं ली? क्या कभी भी दिल्ली आना नहीं होता है?" लाख कोशिश करने पर भी मैं शिकवा किया बिना न रह सकी, "चिट्ठी न सही, फ़ोन तो कर सकते थे कभी?”

वह शांति से सुनता रहा।

“मेरी याद नहीं आयी कभी?” मैं बोलती रही।

“यादें कहाँ छूटती हैं? मिला नहीं तो क्या, तुम्हारी एक-एक बात आज भी याद है मुझे।”

“शादी के बाद अपनी मरजी के अलावा और भी बहुत सी बातें होती हैं जिनका ध्यान रखना पड़ता है। और क्या कहूँ, तुम तो ख़ुद ही समझदार हो” उसने सफाई सी दी।

“नहीं, मैं तो बुद्धू हूँ। और यह बात मैं साबित कर चुकी हूँ रणबीर से शादी कर के।”

“मगर तुमने तो अपनी मरजी से शादी की थी?”

“वह मेरा बचपना था। मुझे रणबीर से कभी शादी नहीं करनी चाहिए थी।”

“तो क्या ऋतिक रोशन से?” वह मुस्कुराया, “उसी की फैन थीं न तुम?”

कितने बरस बाद वह निश्छल मुस्कान देखने को मिली थी। मैं अपनी खुशी को शब्दों में बयान नहीं कर सकती।

“नहीं वह तो कुछ भी नहीं है मेरे परफेक्ट मैच के सामने।”

“परफेक्ट मैच? कौन है वह खुशनसीब, ज़रा हम भी तो सुनें? ” वह शरारत से मुस्कुराया।

“तुम, और कौन?” मैंने झूठमूठ गुस्सा दिखाते हुए कहा, “मेरे मुँह से अपनी तारीफ सुनना चाहते हो?”

“…”

“मैंने तुम्हें नहीं पहचाना। बहुत बड़ी गलती की। उसी की सज़ा आज तक भुगत रही हूँ।”

“ऐसा मत कहो प्रीति” उसकी मुस्कान एकदम से गायब हो गयी। एक गहरा विषाद सा उसके चेहरे पर उतर आया। मैंने कभी भी उसे इतना उदास नहीं देखा था। मैं तो यह जानती ही नहीं थी कि वह कभी उदास भी दिख सकता है। मुझे समझ नहीं आया कि वह मेरी बात से आहत क्यों हुआ। मैंने तो उसकी तारीफ़ ही की थी।

“निशा कितनी खुशनसीब है जो उसे तुम जैसा पति मिला” मैं अपनी ही रौ में बोली।

“प्रीति, प्लीज़ ऐसा बिल्कुल मत कहो। यह सच नहीं है” वह ऐसे बोला मानो बहुत पीड़ा में हो। मुझे समझ नहीं आया कि वह इतना असहज क्यों हो रहा था।

“काश मैं निशा की जगह होती।” मेरे मुँह से निकल ही गया, “मैं कभी अपनी किस्मत से लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा सकी। वरना हमारी दुनिया कुछ अलग ही होती।”

“तुम्हें लगता है कि तुम मेरे साथ खुश रहतीं?” वह एक पल को ठिठका फिर बोला, “तुम सोचती हो कि निशा मेरे साथ बहुत खुश है?”

मैं समझी नहीं वह क्या कहना चाह रहा था, वह कुछ उलझी उलझी बातें कर रहा था।

“बिल्कुल भी खुश नहीं थी वह मेरे साथ। या तो झगड़ा करती थी या दिन-रात रोती थी। मैंने एकाध बार मनो-चिकित्सक के पास जाने की बात भी उठाई तो वह और सारा चौधरी परिवार मेरे ख़िलाफ़ भड़क गया कि मैं उनकी बेटी को पागल कर देना चाहता हूँ।”

मैं उसके चेहरे की पीड़ा को स्पष्ट देख पा रही थी मगर नहीं जानती थी कि उसका क्या करूँ।

“प्रीति, यह दुनिया बहुत कठिन है। सही-ग़लत, अच्छे-बुरे को पहचानना आसान नहीं है। हमें सिर्फ़ अपने घाव दिखते हैं। सुंदर-सुंदर कपडों के नीचे दूसरे लोग कितने घाव लेकर जी रहे हैं उसका हमें कतई एहसास नहीं है। इसलिए हमें दूसरों से ईर्ष्या होती है। सच तो यह है कि अपने सारे घावों के बावजूद हम दूसरों से ज़्यादा खुशनसीब हो सकते हैं मगर हमें इस बात का ज़रा सा भी अंदाज़ नहीं होता है।”

मैं उसकी बात ध्यान से सुन रही थी।

“सुख दुःख दोनों हमारे अन्दर ही हैं।”

मुझे उसकी बात कुछ कुछ समझ आने लगी थी।

“पता है हमारी समस्या क्या है?" उसने बहुत प्यार से कहा, मानो किसी बच्चे को समझा रहा हो, “झूठी उम्मीदों में फँसकर हम सच्ची खुशियों को दरकिनार करते रहते हैं।”

“…”

“अपूर्णता जीवन की कमी नहीं बल्कि उसका असली मतलब है। जीवन एक खोज है, एक सफर है। जीवन मंजिल नहीं है, यही जीवन की सुन्दरता है। मौत सम्पूर्ण हो सकती है परन्तु जीवन अधूरा ही होता है।”

“…”

“आधा-अधूरा जो भी मिले उसे अपनाना सीखना होगा। छोटी छोटी खुशियाँ ही हमें बड़ा बनती हैं जबकि बड़ी बड़ी उम्मीदें हमें छोटा कर देती हैं।"

“…”

“याद रखना कि अगर तुम्हारी शादी रणबीर से न हुई होती तो तुम्हें करिश्मा नही मिलती। अपने सौभाग्य को पहचानो, तभी खुशी मिलेगी।”

“निशा साथ में आयी है? ” मैंने पूछा, “क्या मैं उससे मिल सकती हूँ?” सोचती थी कि शायद मैं उसे अहसास दिला पाऊँ कि वह किस हीरे की बेक़द्री कर रही है।

उसके चेहरे पर अजब सी उदास मुस्कान कौंधी और वह कुछ शब्द ढूँढता हुआ सा लगा।

“निशा ने यह शादी सिर्फ़ अपने माता-पिता से विद्रोह करने के लिए की थी। उसने कई बार पुलिस बुलाई थी मुझ पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर। मैं दहेज़ विरोधी एक्ट में जेल भी गया। कुछ तो पुलिस-रिकार्ड की वजह से और काफी कुछ ससुर जी के प्रभाव की वजह से नौसेना ने डिसऑनरेब्ल डिस्चार्ज देकर निकालने की कोशिश की मगर बाद में आरोप साबित नहीं हो पाये और आखिरकार मुझे बहाल किया। आज उसी सिलसिले में मुख्यालय आया था।”

“हे भगवान्! कब हुआ था यह सब? ” मुझे निशा पर बेहिसाब गुस्सा आ रहा था।

“कुछ साल पहले” उसने मुस्कुराते हुए कहा मानो कुछ हुआ ही न हो, “अब तो हमारा तलाक़ हुए भी एक साल हो चुका है।”

हम सोना-रूपा के सामने खड़े थे। मेरी भूख मर चुकी थी।

[समाप्त]

सौभाग्य - कहानी [भाग ४]

सौभाग्य की चौथी कड़ी प्रस्तुत है। पहले सोचा था कि इस कहानी की एक कड़ी प्रतिदिन लिखने का प्रयास करूंगा। उम्मीद थी कि आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक और बड़ी कड़ी। बाद की टिप्पणियों से पता लगा कि कड़ियों में देरी आखरने लगी है, सो सुबह शाम एक-एक कड़ी लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड २
सौभाग्य - खंड ३


वह तो स्वभाव से ही निडर था। कभी भी किसी की परवाह नहीं करता था। मगर मुझे तो घर में सबका ही ख्याल रखना था। दीदी ने माँ-बाप की इच्छा के विरुद्ध घर त्यागकर दूसरी जाति में शादी की थी। एक साल बाद भाई ने भी घर में सबके बहुत मना करने के बाद भी लड़-झगड़ कर एक निम्न कोटि के परिवार में विवाह कर लिया। पापा ने उसी दिन उसको अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया और मुझसे वचन ले लिया कि मैं अपनी मर्जी से शादी नहीं करूंगी। इस बात को बहुत समय हो गया था। पापा ने दीदी और भइया को वापस स्वीकार भी कर लिया था। मुझे लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है। ऊपर से आदित्य का प्यार। मैं तो पापा को दिए इस वचन को पूरी तरह भूल भी गयी थी।

एक दिन मैंने पापा को आदित्य के बारे में सब कुछ सच-सच बता दिया। उसी क्षण मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गयी। पापा का वह भयानक रूप मैं कभी भूल नहीं सकती। उस समय रात के ग्यारह बज रहे थे। उन्होंने उसी वक्त मुझे घर से निकल जाने को कहा। मैंने बहुत समझाने की कोशिश की मगर उन पर तो जैसे भूत सा सवार था। अब याद करके भी आश्चर्य होता है कि हमेशा अपनी शर्तों पर जीने वाले दीदी और भय्या भी इस बार पापा की ही तरफदारी कर रहे थे।

दीदी और भय्या ने अपनी बातों से मुझे बार-बार यह यकीन भी दिलाया कि अपने दोनों बड़े बच्चों द्वारा अपनी मर्जी से विवाह कर लेने की वजह से माँ-पापा पहले ही बहुत टूट चुके हैं। अगर मैं भी उनकी इच्छा का ख्याल नहीं करूंगी तो वे लोग गुस्से में न जाने क्या कर बैठें। अगर कुछ उलटा-सीधा हो गया तो घर का कोई भी सदस्य मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।

पापा के गुस्से के अलावा मुझे एक और बात का भी डर था। वह था हमारी जातियों का। आदित्य एक सुसंस्कृत ब्राह्मण परिवार से था और मुझे कॉलेज में प्रवेश भी आरक्षित कोटा में मिला था। दीदी हमेशा कहती थी, "यह पण्डे-पुजारी बड़े ही दोगले होते हैं। जिस दिन भी उसे तेरी जाति का पता लगेगा, दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देगा।” हालांकि मुझे यकीन था कि आदित्य ऐसा लड़का नहीं था मगर वक्त की धार किसने देखी है। अगर वह कभी भी दुनिया के बहकावे में आ जाता तो मैं तो कहीं की भी न रहती।

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मैंने उसे फ़ोन करके सारी बात बताई और कहा कि मैं पापा का दिल नहीं तोड़ सकती हूँ।

"तुम मुझे भूल जाओ हमेशा के लिए। समझो मैं मर गयी।”

मुझे लगा कि वह कहेगा, "तुम्हारे लिए मैं सारी उम्र कुँवारा रहूँगा।” मगर उसने ऐसा कुछ नहीं कहा।

"ऐसा कैसे हो सकता है? तुम उनकी बेटी हो प्रॉपर्टी नही। नहीं मानते तो न मानें। हम उनके बिना ही शादी करेंगे।"

"उनके बिना? अभी तो शादी हुई भी नहीं है, तुम पहले ही मुझे अपने परिवार से अलग करना चाहते हो?" मुझे उसकी बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी।

"नहीं, मैं उनकी और इन्सल्ट नहीं कर सकती” शायद मैं बहुत कमज़ोर थी - या शायद मैं दीदी-भैय्या की तरह स्वार्थी नहीं होना चाहती थी। कारण जो भी हो, मैं उसी समय यह समझ गयी थी कि मैं अपने परिवारजनों को नाराज़ नहीं कर पाऊँगी।

“शायद हमारा साथ बस यहाँ तक ही था। आज से हमारा रिश्ता ख़त्म।” मैंने जैसे-तैसे कहा।

मुझे लगा वह झगड़ा करेगा, मुझे बुरा भला कहेगा, वह रूठेगा, मैं मनाऊंगी। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। उसने चुपचाप फ़ोन रख दिया। उस दिन के बाद मैंने जब भी उसका नम्बर मिलाने की कोशिश की उसने फ़ोन कभी उठाया ही नहीं।

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दो हफ्ते बाद हम सुनीता के घर में मिले। उसने बताया कि उसने नौसेना की नौकरी स्वीकार कर ली थी और वह उस दिन ही मुम्बई जा रहा था।

“चिट्ठी लिखोगे न?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“इतनी तो लिखीं, कभी किसी का जवाब तक नहीं आया। और फिर अब चिट्ठी लिखने की कोई वजह भी तो नहीं बची है।”

वह सच ही तो कह रहा था। मैंने कभी भी उसके लिखे नोट का जवाब नहीं दिया था। सोचती थी कि वह कभी भी बुरा नहीं मानेगा। उस दिन मैं सारी रात रोती रही। दीदी मुझे दिलासा दिलाते हुए कहती रही, “अच्छा ही हुआ उसका यह पलायनवादी रूप शादी से पहले ही दिख गया, शादी के बाद तुझे अकेला छोड़कर चल देता तो क्या करती?”

भाभी ने भी समझाया, “सच्चा प्यार करने वाले इस तरह मझधार में छोड़कर नहीं चल देते हैं।”

किताबों में, किस्से-कहानियों में भी हमेशा जन्म-जन्मान्तर के साथ के बारे में ही पढ़ा था। मैं उसके जाने पर यकीन नहीं कर पा रही थी। मुझे उस पर अपने से भी ज्यादा विश्वास था। मुझे लगता था कि मैं चाहे कुछ भी करूँ, वह कभी भी मुझे छोड़कर नहीं जायेगा।

वह दिन और आज का दिन। वह मेरी ज़िंदगी से ऐसा गया कि बहुत कोशिश करने पर भी पता ही न चला कि कहाँ है, कैसा है और किस हाल में है। मैंने भी धीरे धीरे ज़िंदगी की सच्चाई को स्वीकार कर लिया। कभी किसी को यह अहसास नहीं होने दिया कि मेरे दिल के किसी कोने में वह आज भी रहता है, हँसता है, गुनगुनाता है, और कविता भी करता है।

[क्रमशः]

Tuesday, December 9, 2008

सौभाग्य - कहानी [भाग 3]

प्रतिदिन इस कहानी की एक कड़ी लिखने का प्रयास करूंगा। आशा है आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक बड़ी कड़ी। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है:
सौभाग्य - खंड १
सौभाग्य - खंड 2


फोन पर उसकी आवाज़ क्या सुनी, मानो मैं किसी टाइम मशीन में चली गयी। अपने जीवन में से कितनी भूली-बिसरी पुरानी यादें जैसे अब तक जबरन बंद रखी गयी खिड़कियों से उड़कर मेरे मन-मन्दिर में मंडराने लगीं। याद आए वे दिन जब हर पल आशा से बंधा था। मुझे हर रोज़ सुबह होने का इंतज़ार रहता था - ताकि उससे मिल सकूँ। उसके संग की खुशबू को बरसों बाद फ़िर से महसूस किया तो चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

कॉलेज में वह सब का चहेता था। मैं भी किसी से कम नहीं थी। वह खिलाड़ी था तो मैं पढाकू थी। मैं बहुत हाज़िर-जवाब थी जबकि वह चुप सा था। और भी बहुत से अन्तर थे हमारे बीच में। मसलन हम लोग खाते-पीते घर से थे जबकि उसका परिवार बड़ी मुश्किल से ही निम्न-मध्य वर्ग में गिना जाने लायक था। उसके पास अपनी साइकिल भी नहीं थी जबकि मुझे कॉलेज छोड़ने ड्राइवर आता था। हालांकि, बाद में मैंने जिद करके बस से आना-जाना शुरू कर दिया था। अब सोचती हूँ तो यह सपने जैसा लगता है कि इतने भेद के बावजूद हम दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे के रंग में रंग गए। जान-पहचान कब नज़दीकी में बदली, पता ही न लगा। मेरी सहेलियाँ शाम होते ही मुझे अकेला छोड़ देती थीं ताकि मैं उसके साथ समय बिता सकूँ। सुनयना तो हमेशा ही उसका नाम मेरे साथ जोड़कर कुछ न कुछ चुहल करती रहती। कॉलेज में सबको यकीन था कि हम शादी करेंगे ही।

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हम दोनों करोल बाग में एक छोटे से होटल में बैठे थे। मैं अपने परिवार की एल्बम ले गयी थी। वह एक-एक फोटो को बड़े ध्यान से देख रहा था। टेढ़े मेढ़े फोटो को एल्बम से निकालकर फिर वापस व्यवस्था से लगा देता। पापा के फोटो को उसने बिना बताये ही पहचान लिया।

"यह तो एक प्यारी से बच्ची के पापा ही हैं? ..."

“दिल कर रहा है कि अभी चरण छूकर आशीर्वाद ले लो, है न?”

हम दोनों ही खुलकर इतना हँसे कि आसपास की टेबल पर बैठे लोग मुड़कर हमें देखने लगे।
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मुझसे विदा लेना उसे कभी अच्छा नहीं लगता था। पर उस दिन वह कुछ ज़्यादा ही भावुक हो रहा था।

"थोडी देर और रुक जाओ न" उसने विनती की।

"आखरी बस निकल गयी तो फ़िर घर कैसे जाऊंगी?"

"काश हम लोग हमेशा साथ रह पाते" उसने एक ठंडी आह भरते हुए कहा।

"भूल जाओ, पापा इस शादी के लिए कभी भी तैयार नहीं होंगे", मैंने चुटकी ली। मुझे क्या पता था कि मेरा यह मजाक ही एक दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच बन जायेगा।
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हम दोनों पार्क में बैठे थे। वह मेरे बालों से खेल रहा था। पता ही न चला कब अँधेरा हो चला था। अचानक ही मुझे पापा का रौद्र रूप याद आया। "क्या समय है?" मैंने पूछा।

"मुझे क्या पता, मैं तो घड़ी नहीं बांधता हूँ।”

"हाँ वह तो दहेज़ में मिलेगी ही" मैंने छींटा कसा।

"मेरा दहेज़ में विश्वास नहीं है" उसे मेरी बात अच्छी नहीं लगी थी।

"रहने दो, पण्डितों को तो बस लेना ही लेना आता है।"

कहने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मैं यह सोच ही रही थी कि उसकी आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हुई।

"क्या चल रहा है प्रीति जी? सब ठीक तो है? करिश्मा का क्या हाल है? पढाई में तो अपनी माँ की तरह ही होशियार होगी? राइट?"

उसके मुँह से "जी" सुनकर अजीब सा लगा। शायद मुझे सहज करना चाहता था। मैंने भी संयत दिखने का पूरा प्रयास किया लेकिन अपनी सारी शक्ति लगाकर भी मैं उसके किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकी। गला और आँख दोनों ही भर आए।

उसने भी दोबारा नहीं पूछा। उसने अपनी नज़रें भी नीची कर लीं ताकि मैं चुपचाप छलक आया एक आँसू पोंछ सकूँ। मुझे अच्छा लगा। वह आज भी वैसा ही कोमल ह्रदय है। हमेशा ही दूसरों को पूरा मौका देता है सर्वश्रेष्ठ दिखने का।

मेरे उत्तर का इंतज़ार किए बिना उसने अपने आप ही कहा, "लंच टाइम हो रहा है, सोना रूपा में चलते हैं। तुम्हें पसंद भी है।”

हम दोनों जल्दी से बाहर निकले। लंच में मूड ख़राब हो जाने की वजह से मैं भूखी तो थी ही। मगर उसके साथ होने की बात ही और थी। मेरे कदम कुछ अधिक ही तेज़ चल रहे थे। आज बहुत सालों के बाद वह मेरे साथ चल रहा था। बिल्कुल वैसे ही जैसे शादी से पहले हम लोग घूमा करते थे।

[क्रमशः]

सौभाग्य - कहानी [भाग २]

काफी दिनों से इस कहानी का प्लाट दिमाग में घुमड़ रहा था। पर किसी न किसी कारणवश लिखना शुरू न कर सका। अब प्रतिदिन इस कहानी की एक कड़ी लिखने का प्रयास करूंगा। आशा है आपको पसंद आयेगी। आपका सुझाव है कि कड़ी थोड़ी और बड़ी हो, सो हाज़िर है एक बड़ी कड़ी। अब तक की कथा यहाँ उपलब्ध है: सौभाग्य - खंड १

दफ्तर पहुँचते-पहुँचते साढ़े दस बज ही गए थे। चीफ मैनेजर दरवाज़े पर ही खड़ा था। बुड्ढे को कोई और काम तो है नहीं। बीच में खड़ा होकर सुकुमार कन्याओं को ताकता रहता है। मुझे देखते ही अजब सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर नाचने लगी। घिन आती है मुझे उसकी मुस्कराहट से। न मुँह में दाँत न पेट में आँत। खिजाब लगाकर कामदेव बनने की कोशिश करता है। सींग कटाने से बैल बछड़ा थोड़े ही हो जाएगा।

"तो आ गयीं आप, मुझे लगा छुट्टी पर हैं आज भी।” बुड्ढे ने हमेशा की तरह ताना मारा। बदतमीज़ कहीं का!

फ्यूचरटेक वाला जैन मेरे पहुँचने से पहले ही मेरी सीट पर पहुँच गया, "मैडम मेरी बिल पहले डिसकाउंट कर दीजिये, नहीं तो पार्टी कानूनी कार्रवाई शुरू कर देगी।” यह आदमी हमेशा कानूनी कार्रवाई की ही धमकी देता रहता है। इतना ही डर है तो अकाउंट में पहले से पैसा रखा करो ना। सबने सर पर चढ़ा रखा है। मंत्री जी का साला जो ठहरा। सारे अकाउंट ऊपर से ही तैयार होकर आते हैं हमारे पास तो साइन करने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता है। जल्दी जल्दी उसका काम किया। दोपहर तक फ्यूचरटेक का खाता फिर से ओवर हो गया।

लंच करने बैठी तो पहले ही कौर में दाँत के नीचे कंकर आ गया। खाने का सारा मज़ा किरकिरा हो गया। तब तक राम बाबू आ गया। यह हमारा चपरासी है। चीफ मेनेजर से कम बदतमीज़ नही है। उससे कम समझता भी नहीं है अपने को। पढ़ा लिखा नहीं है। पढ़ाई की क़सर फैशनेबल कपडों से पूरी करने की कोशिश में लगा रहता है। है तो चपरासी ही और शायद सारी उम्र चपरासी ही रहे लेकिन खूबसूरती में अपने को ऋतिक रोशन से ज़्यादा सुंदर समझता है। हमेशा कुछ न कुछ कमेंट करता रहेगा। मेरी तरफ़ बढ़ा तभी मैं समझ गई कुछ बकवास करने वाला है। और ठीक वही हुआ।

उसने अपना बड़ा सा मुँह खोला, "मैडम आप न जींस में बहुत अच्छी लगती हैं, रोजाना ही जींस पहनकर आया करिये। एकदम टिप-टॉप लगेंगी।”

मुझे इतना गुस्सा आया कि उसी वक्त खाने की प्लेट छोड़कर उठ गयी।

वापस अपनी सीट पर आयी ही थी कि फ़ोन घनघनाया। 

"क्या प्रीति मैडम से बात कर सकता हूँ?" पूरे दिन में पहली बार किसी ने इतनी सभ्यता से बात की थी। अच्छा लगा। आवाज़ भी अच्छी लगी, कुछ हद तक जानी पहचानी भी।

"मैडम आपसे एक जानकारी चाहिए थी।”

"हाँ, पूछिए", पूरे दिन में अब मैं पहली बार सामान्य होने लगी थी।

"क्या आप किसी आदित्य रंजन को जानती हैं?"

उस सभ्य आवाज़ ने आदित्य कहा तो मेरा सारा शरीर एकबारगी पुलकित सा हो गया। यह नाम सुनने को मेरे कान तरस रहे थे। और मेरे होंठ भी पिछले दस सालों में कितनी बार अस्फुट स्वरों में यह नाम बोलते रहते थे। वही गंभीर स्वर, वही मिठास और वही शालीनता, मुझे यह पहचानने में एक पल भी नहीं लगा कि यह आदित्य ही है।

"बदमाश, कहाँ हो तुम?" बस यही वाक्य ठीक से निकला। गला काँपने लगा था।

"कहाँ खो गए थे तुम? पता भी है मैं किस हाल में हूँ? कितनी अकेली और उदास हूँ?" कहते कहते मेरी रुलाई फ़ूट पड़ी।

"मैं काम से नौसेना मुख्यालय आया था। पुरानी यादें ढूँढने कनोट प्लेस आया तो अरविंद मिल गया। उस से तुम्हारा सब हाल मिला। उसी ने तुम्हारा नंबर दिया और बताया कि तुम्हारी ब्रांच नजदीक ही है। सुनो… प्लीज़ रो मत। मैं पाँच मिनट में आ रहा हूँ।”

उसे आज भी मेरा इतना ख्याल है, यह जानकर अच्छा लगा। वह आज भी उतना ही भला था, उसकी आवाज़ में आज भी वही शान्ति थी जिसे मैं अब तक मिस करती रही थी।

[क्रमशः]

Monday, December 8, 2008

सौभाग्य - कहानी [भाग १]

कब से बिस्तर पर लेते हुए मैं सिर्फ़ करवटें बदल रही थी। नींद तो मानो कोसों दूर थी। करिश्मा को सोते हुए देखा। कितनी प्यारी लग रही थी। इतने जालिम बाप की इतनी प्यारी बच्ची। सचमुच कुदरत का करिश्मा है। इसीलिए मैंने इसका यह नाम रखा। इसके बाप का बस चलता तो कोई पुराने ज़माने का बहनजी जैसा नाम ही रख देते। सारी उम्र जिल्लत सहनी पड़ती मेरी बच्ची को। ख़ुद मैं भी तो रोज़ एक नरक से गुज़रती हूँ। कितना भी भुलाना चाहूँ, हर रात को दिन भर की तल्ख़ बातें याद आती रहती हैं। आज की ही बात लो, कितनी छोटी सी बात पर कितना उखड़ गए थे।

"टिकेट बुक कराया?"
"हाँ!"
"तुमने तो 8500 कहा था। अब ये 12000 कहाँ से हो गए?"
 चुप्पी।
"और ये सप्ताह के बीच में, इतवार का टिकेट क्यों नहीं लिया?"
चुप्पी।
"चार दिन का नुकसान करा दिया? चार दिन की कीमत पता है तुम्हें?"
चुप्पी।

इतना ही ख्याल है तो ख़ुद क्यों नहीं कर लिया। माना मैं पूरे हफ्ते से छुट्टी पर हूँ। इसका मतलब यह तो नहीं कि एक नौकरानी की तरह इस आदमी का हर काम करती रहूँ। अपने मायके में तो मैंने कभी खाना भी नहीं बनाया। हर काम के लिए नौकर-चाकर थे। इनको तो यह भी पसंद नहीं। कितनी बार ताना देकर कहते हैं कि रिश्वत की शान-शौकत के सामने तो मैं भूखा रहना ही पसंद करूँगा। तो रहो भूखे, मुझे और मेरे बच्चे को तो हमारा पूरा हक दो। उसके बाद जो चाहे करो। मैंने क्या-क्या कहना चाहा मगर पिछले कड़वे अनुभवों के कारण मन मारकर चुप ही रही। सोचते सोचते पता नहीं कब नींद आ गई। सुबह उठी तो सर दर्द के मारे फटा जा रहा था। आखिरी छुट्टी भी आज खत्म हो गई। पैर पटक कर दफ्तर के लिए निकलना ही पड़ा। हमेशा ऐसा ही होता है। ज़बरदस्ती कर के अपने को उठाती हूँ तब भी बस छूट जाती है। आखिरकार टैक्सी करनी पड़ी। और ये दिल्ली के टैक्सी वाले। ये तो लगता है माँ के पेट से ही गुंडे बनकर पैदा हुए थे। कोई लाज-लिहाज़ नही। अकेली औरत देखकर तो कुछ ज़्यादा ही इतराने लगते हैं।

Saturday, December 6, 2008

आग मिले - कविता

टूटे हैं तार सब सितारों के
गीत बनता नहीं न राग मिले

दिल है सूना मैं फिर भी जिंदा हूँ
ज़िंदगी का कोई सुराग मिले

खुशियाँ रूठी हैं जबसे तुम रूठे
वापसी हो तो फिर बहार मिले

दिल में बैराग सा उफनता रहा
तुम जो आओ तो अनुराग मिले

लाश मेरी ये जल नहीं सकती
बर्फ पिघले तो थोड़ी आग मिले।

(~अनुराग शर्मा)

Saturday, November 22, 2008

ज़माने की बातें - कविता

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जो करते थे सारे
ज़माने की बातें

वो करते हैं अब
दिल दुखाने की बातें

मेरे साथ होते जो
थकते नहीं थे

वो करते कभी अब
न आने की बातें

है सब कुछ हमारा
था जिनका यह दावा

वो करते हैं सब कुछ
छिपाने की बातें

ग़मे दिल को अपने
मना लूंगा आख़िर

मैं कैसे भुलाऊँ
ज़माने की बातें।

Tuesday, November 11, 2008

जीवन - कविता

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सुरीला तेरे जैसा या
कंटीला मेरे जैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

कभी गऊ सा सीधा सादा
कभी मरखना भैंसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

जी पाते न मर पाते
कुछ साँप छछूंदर जैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

मानव का मोल रहा क्या है
अब सबका सब कुछ पैसा है
जाने यह जीवन कैसा है?

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Sunday, November 9, 2008

साथ तुम्हारा - कविता

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साथ तुम्हारा होता तो
यह बोझिल रस्ता हँसत़े हँसते
कट ही जाता

हार तुम्हारी बाहों का
मेरी ग्रीवा में पडता तो
दुख थोड़ा तो घट ही जाता

हँसता रहता कभी न रोता
साहस सहज न खोता
पास तुम्हें हरदम जो पाता

कभी जिसे अपना सरबस सौंपा था तुमने
आज वही मैं पछतावे में झुलस रहा हूँ
तुम मिलते तो क्षमादान तो पा ही जाता

यह बोझिल रस्ता हँसते हँसते
कट ही जाता।

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Thursday, November 6, 2008

आलस्य

छह बोले तो सात है, सात कहें तो आठ
कभी समय पर चले नहीं, ऐसे अपने ठाठ


ऐसे अपने ठाठ, कभी मजबूरी होवे
तो भी राम भरोसे लंबी तान के सोवें


सोते से जो कोई मूरख कभी जगा दे
पछतायेंगे उसके तो दादे परदादे

दादे तो अपने भी समझा समझा हारे
ख़ुद ही हार गए हमसे आख़िर बेचारे

(अनुराग शर्मा)

Saturday, October 25, 2008

तुम बिन - एक कविता

वक्त तुम बिन कभी गुज़रता नहीं
बोझ कांधे से ज्यों उतरता नही

शहर सुनसान सा लगे है मुझे
आपका जिक्र कोई करता नहीं

दिल तो पत्थर सा हो गया या रब
मौत के नाम से भी डरता नहीं

चिन दिया आपने दीवारों में
कैसा बदबख्त हूँ कि मरता नहीं

वक्त के सामने हुआ बेबस
लाख रोका मगर ठहरता नहीं।

(अनुराग शर्मा)


* आवाज़ पर आज सुनें अक्टूबर २००८ का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन
** आवाज़ पर सुनें प्रेमचंद की कहानी "आधार"

Saturday, October 18, 2008

सत्यमेव जयते - एक कविता

सच कड़वा है कहने वाले,
न जानें सच क्या होता है।

सच मीठा भी हो सकता है,
क्या जाने जो बस रोता है।

दोषारोप लगें कितने, सच
सिसकता है न रोता है।

सच तनकर चलते रहता है,
जब झूठ फिसलता होता है।

सच वैतरणी भी तरता है,
जहाँ झूठ लगाता गोता है।

सच की छाया तरसेगा ही
जो बीज झूठ के बोता है।


न तत्व वचन सत्यं, न तत्व वचनं मृषा ।
यद्भूत हितमत्यन्तम् तत्सयमिति कथ्यते॥
(महाभारत)
अर्थ: बात को ज्यों को त्यों कह देना सत्य नहीं है और न असत्य है। जिसमें प्रणियों का अधिक हित होता है, वही सत्य है।

Friday, October 17, 2008

बिखरा मन

(अनुराग शर्मा)

जब तुम्हें दिया तो अक्षत था
सम्पूर्ण चूर्ण बिखरा है मन

भूकंप हुआ धरती खिसकी
क्षण भर में बिखर गया जीवन

घर सारा ही तुम ले के गए
कुछ तिनके ही बस फेंक गए

उनको ही चुनता रहता हूँ
बीते पल बुनता रहता हूँ।

Monday, October 13, 2008

रहने दो - कविता

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कुछेक दिन और
यूँ ही मुझे
अकेले रहने दो

न तुम कुछ कहो
और न मुझे ही
कुछ कहने दो

इतनी मुद्दत तक
अकेले ही सब कुछ
सहा है मैंने

बचे दो चार दिन भी
ढीठ बनकर
मुझे ही सहने दो

कुछेक दिन और
यूँ ही मुझे
अकेले रहने दो

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Saturday, October 11, 2008

सुनें प्रेमचंद की कालजयी रचनाएं

कोई विरला ही होगा जो मुंशी प्रेमचंद का नाम न जानता हो। हिन्दी साहित्य जगत में वे एक चमकते सूर्य की तरह हैं। आवाज़ (हिन्दयुग्म) के सौजन्य से अब आप उनकी कालजयी रचनाओं को घर बैठे अपने कम्प्युटर पर सुन सकते हैं। आवाज़ की शृंखला सुनो कहानी में हर शनिवार को प्रेमचंद की एक नयी कहानी का पॉडकास्ट किया जाता है जिसे आप अपनी सुविधानुसार कभी भी सुन सकते हैं। इन कहानियों को को स्वर दिये हैं शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह एवं अनुराग शर्मा ने।

अभी तक प्रकाशित कुछ ऑडियो कथाओं के लिंक यहाँ हैं:

* सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'आख़िरी तोहफ़ा'
* कहानीः प्रेमचंद की कहानी 'पर्वत-यात्रा'
* प्रेमचंद की अमर कहानी "ईदगाह" ( ईद विशेषांक )
* कहानीः प्रेमचंद की कहानी 'अमृत' का पॉडकास्ट
* प्रेमचंद की कहानी 'अपनी करनी' का पॉडकास्ट
* कहानीः शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रेमचंद की कहानी 'प्रेरणा'
* प्रेमचंद की कहानी 'अनाथ लड़की' का पॉडकास्ट
* कहानीः प्रेमचंद की 'अंधेर'
* अन्य बहुत सी कहानियाँ

तो फ़िर देर किस बात की है? ऊपर दिए गए लिंक्स पर क्लिक करिए और आनंद उठाईये अपनी प्रिय रचनाओं का। अधिकाँश कहानियों को विभिन्न फॉर्मेट में डाउनलोड करने की सुविधा भी है ताकि आप बाद में उसे अपने कंप्युटर, आईपॉड या एम् पी थ्री प्लेयर द्वारा बार बार सुन सकें या CD बना सकें।

Thursday, October 9, 2008

खोया पाया - कविता

कितना खोया कितना पाया,
उसका क्या हिसाब करें हम?

दर्पण पर जो धूल जमा है,
उसको कैसे साफ करें हम?

सपने भी अपने भी बिछड़े,
कब तक यह संताप करें हम?

नश्वर सृष्टि नष्ट हुई तो,
नूतन जग निर्माण करें हम।

भूल चूक और लेना-देना,
कर्ज-उधारी माफ़ करें हम।

बीती बातें छोड़ें और अब,
आगत का सम्मान करें हम॥


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Friday, September 26, 2008

पतझड़



निष्ठुर ठंडी काली रातें
रिसते घाव रुलाती रातें।

फूल पात सब बीती बातें
सूने दिन और रीती रातें।

मुरझाया कुम्हलाया तन-मन
उजड़ी सेज कंटीली रातें।

मिलन बिछोहा सब झूठा था
सत्य भयानक हैैं ये रातें।

फटी पुरानी यादें लाकर
पैबन्दों को बिछाती रातें।

सूखे पत्ते सूनी शाखें
पतझड़ में सताती रातें।।


(रेखाचित्र: अनुराग शर्मा)

Tuesday, September 23, 2008

गरजपाल की चिट्ठी [गतांक से आगे]

[अब तक की कथा पढने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें]

समय बीतता गया। अहसान अली और शीशपाल का जोश भी काफी हद तक ठंडा पड़ गया। हाँ, गरजपाल बिल्कुल भी नहीं बदले। न तो उन्होंने किसी सहकर्मी से दोस्ती की और न ही चिट्ठी लिखने का राज़ किसी से बांटा। ज़्यादातर लोग गरजपाल के बिना ही खाना खाने के आदी हो गए। इसी बीच सुनने में आया कि गरजपाल का तबादला उनके गाँव के नज़दीक के दफ्तर में हो गया है। किसी को कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा। पड़ता भी कैसे? गरजपाल की कभी किसी से नज़दीकी ही नहीं रही। पता ही न चला कब उनके जाने का दिन भी आ गया। दफ्तर में सभी जाने वालों के लिए एक अनौपचारिक सा विदाई समारोह करने का रिवाज़ था। सो तैयारियां हुईं। उपहार भी लाये गए और भाषण भी लिखे गए। नत्थूलाल एंड कंपनी तो कभी भी साथ बैठकर खाना न खाने की वजह से गरजपाल को विदाई पार्टी देने के पक्ष में ही नहीं थे। मगर हमारे प्रबंधक महोदय जी अड़ गए कि पार्टी नहीं होगी और उपहार नहीं आयेंगे तो "मन्नै के मिलेगा?"

आखिरकार प्रबंधक महोदय की बात ही चली। विदाई समारोह भी हुआ और उसमें गरजपाल किसी शर्माती दुल्हन की तरह ही शरीक हुए। काफी भाषण और झूठी तारीफें झेलनी पड़ीं। जहां कुछ लोगों ने उनकी शान में कसीदे पढ़े, वहीं कुछेक ने दबी जुबान से उनके खाना साथ में न खाने की आदत पर शिकवा भी किया। ज़्यादातर लोगों ने दबी-ढँकी आवाज़ में गरजपाल की चिट्ठी का ज़िक्र भी कर डाला। इधर किसी की जुबान पर चिट्ठी का नाम आता और उधर गरजपाल जी का चेहरा सुर्ख हो जाता। एहसान अली ने एक "लिखे जो ख़त तुझे" गाया तो सखाराम ने खतो-किताबत पर मुम्बईया अंदाज़ में एक टूटा-फूटा शेर पढा। समारोह की शोभा तो गयाराम जी बने जिन्होंने एक पंजाबी गीत गाया जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह होता:


मीठे प्रिय परदेस चले
दूजा मीत बनाना नहीं
याद हमारी जब भी आए
ख़त लिखते शर्माना नहीं
चिट्ठी लिखें, डाक में डालें
गैर के हाथ थमाना नहीं
जीते रहे तो फिर मिलेंगे
मरे तो दिल से भुलाना नहीं।

तुर्रा यह कि हर भाषण, शेर, ग़ज़ल या गीत में गरजपाल की चिट्ठी ज़रूर छिपी बैठी थी। मानो यह गरजपाल की विदाई न होकर उनकी चिट्ठियों का मर्सिया पढा जा रहा हो। सबके बाद में गरजपाल जी ने भी दो शब्द कहे। आश्चर्य हुआ जब उन्होंने हमें बहुत अच्छा मित्र बताया और आशा प्रकट की कि उनकी मैत्री हमसे यूँ ही बनी रहेगी। अंत में प्रबंधक महोदय ने उन्हें सारे कर्मचारियों की ओर से (अपना कमीशन काटकर) एक बेशकीमती पेन, कुछ खूबसूरत पत्र पैड और बहुत से रंग-बिरंगे लिफाफे उपहार में दिए। यूँ समझिये कि पूरा डाकखाना ही दे दिया सिवाय एक डाकिये और डाक टिकटों के।

अगले दिन के लंच में कोई मज़ा ही न था। शीशपाल तो दफ्तर ही न आया था। एहसान अली को बड़ा अफ़सोस था कि गरजपाल की जासूसी में कुछ बड़ी कमी रह ही गयी। वरना तो इतने दिनों में वासंती की असलियत खुल ही जाती। दो-चार दिनों में सब कुछ सामान्य होने लगा। गरजपाल तो हमारे दिमाग से लगभग उतर ही चुके थे कि दफ्तर की डाक में कई रंग-बिरंगे लिफाफे दिखाई पड़े। एहसान अली की आँखे मारे खुशी के उल्लू की तरह गोल हो गयीं। वे चिट्ठियों को उठा पाते उससे पहले ही शीशपाल ने उन्हें लपक लिया। हमें लगा कि अब तो गरजपाल की चिट्ठी का भेद खुला ही समझो। मगर ऐसा हुआ नहीं। लिफाफों पर लिखी इबारत को पढा तो पता लगा कि दफ्तर के हर आदमी के नाम से एक-एक चिट्ठी थी। भेजने वाले कोई और नहीं गरजपाल जी ही थे। उन्होंने हमारी दोस्ती का धन्यवाद भेजा था और लिखा था कि नयी जगह बहुत बोर है और वे हम सब के साथ को बहुत मिस करते हैं। वह दिन और आज का दिन, हर रोज़ गरजपाल की एक न एक चिट्ठी किसी न किसी कर्मचारी के नाम एक रंगीन लिफाफे में आयी हुई होती है। शायद लंच का आधा घंटा वह खाना खाने के बजाय हमारे लिए पत्र-लेखन में ही बिताते हैं।