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Friday, June 28, 2019

ब्राह्मण कौन? - भाग 3

1. मूल प्रश्न जटिल है, उत्तर भी सरल नहीं। यह सही लगता है कि ब्राह्मण और शूद्र दोनों ही बाद की बातें हैं लेकिन प्रकृति में बल, कौशल से पहले है। वर्णाश्रम व्यवस्था से बाहर के समाज देखें तो आज के सभ्य समाज में वे मुख्यतः व्यवसायी हैं, और व्यवसायी बनने से पहले ही योद्धा थे और आज वणिकवृत्ति करते हुये भी वैश्य से अधिक योद्धा ही हैं। यूरोप की विभिन्न ईस्ट इंडिया कम्पनियाँ हों, भारतीय क्षेत्र के राजवंशों के संघर्ष हों, या देवासुर संग्राम जैसे आख्यान, ये सभी उदाहरण आत्मरक्षा से आगे जाकर, आक्रामकता और पराक्रम को नैसर्गिक गुण दर्शाते हैं। गौतम का बुद्ध हो जाना वास्तव में मानव और समाज, दोनों के विकास की प्रक्रिया का अगला चरण है।

2. शक्ति के अनेक रूप हैं, ज्ञान भी एक बड़ी शक्ति है। अविकसित समाज में राजा का शक्तिशाली होना स्वाभाविक है, बल्कि वहाँ शक्ति ही नेतृत्व प्रदाता है। जिस ईख, या गन्ने के लिये गिरमिटिया, फ़ीजी, मॉरिशस से लेकर वेस्ट इंडीज़ तक ले जाये गये उसका ज्ञान सैकड़ों वर्षों तक ईक्ष्वाकुओं का पेटेंट रहा हो यह स्वाभाविक है। वर्ण-व्यवस्था से पहले का राजा ब्रह्म-क्षत्रिय है। उसमें ये दोनों वर्ण हैं, बल्कि कुछ सीमा तक चारों वर्ण समाहित हैं। उसके विश्वस्त भी किसी भी अन्य अविकसित/विकासशील समाज की तरह योद्धा अधिक हैं, वैश्य कम। वैश्यवृत्ति विकास का उपादान भी है, और उत्पाद भी। ब्राह्मण व शूद्र वृत्तियाँ किसी भी अविकसित समाज में अनुपस्थित है। वे दोनों ही विकसित समाजों का नवोन्मेष हैं, और उनकी आवश्यकता भी।
विकास का नैसर्गिक क्रम: क्षत्रिय → वैश्य → शूद्र → ब्राह्मण
3. भारतीय समाज और वर्णाश्रम व्यवस्था के अहिंसा सहित अनेक अद्वितीय/अपूर्व धर्म/लक्षण हैं - ऐसे सारे लक्षण ब्राह्मणत्व का उदय भी दर्शाते हैं, और उसका आधार भी बने हैं। यह धर्म, ये लक्षण ही भारतीय संस्कृति को पश्चिम से, बल्कि सारे संसार से अलग खड़ा करते हैं। ब्राह्मणत्व का सिद्धांत भारतीय संस्कृति का वह बिंदु है जो अन्य किसी भी संस्कृति में नहीं है। दान देना और दान लेना, विशेषकर ब्रह्मदान, जनकल्याण के लिये ज्ञान का विस्तार, पुर के हित के लिये पौरोहित्य, और निरंकुश शासक के लिये संघर्ष का परशु, बनना। सिद्धांततः ब्राह्मणत्व विनम्रता की मूर्ति होते हुये भी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का अडिग आधार है।

4. अहिंसा तो फिर भी आचरण की बात थी, ज्ञान को राजा की बपौती से बाहर निकालकर गुरुकुलों द्वारा, ब्रह्मविद्या द्वारा, वेदों-उपवेदों द्वारा पब्लिक डोमेन में लाने का कार्य करने वाले ब्राह्मण हुये। वे राजाओं में से भी आये होंगे, क्षत्रियों, वैश्यों, और शूद्रों में से भी। बेशक जो पीढ़ी ब्राह्मण हो चुकी है, उसकी संतति का ब्राह्मण होना सरल है। जो परिवार 5,000 वर्षों से शाकाहारी हैं, उनके बच्चों के शाकाहारी होने में कोई चमत्कार नहीं, लेकिन अन्यों का ब्राह्मणत्व उपार्जित है, जिसे सरल करने का कार्य वर्णाश्रम व्यवस्था ने किया। वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना के बाद राजा और मंत्रिमण्डल राजपुरोहित के नेतृत्व में राज्य के हित के लिये मिलकर काम करने लगे लेकिन उससे पहले का काल निश्चित रूप से इन दो संस्थाओं के संघर्ष का भी गवाह रहा है।

5. क्षत्रियत्व मानवों सहित असुरों में भी जन्मजात है, और देवों में भी। ब्राह्मणत्व केवल मानवों में उपस्थित है। लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि ब्राह्मण मानव होते हुये भी देव हो गये हैं। क्यों के उत्तर की खोज हमें ब्राह्मणत्व के दो मूल लक्षणों परमार्थ (स्वार्थ नहीं), तथा दान (लेना भी, देना भी - समन्वय, विकास,  और विस्तार ) की ओर इंगित करती है। याद रहे, दान देवता की मूल प्रवृत्ति है।

6. जंगल प्राकृतिक हैं लेकिन कृषि नैसर्गिक नहीं। हज़ारों वर्ष पहले के भारत की बात छोड़ भी दें तो कुछ सौ साल पहले के - अमेरिका पहुँचे यूरोपीय 'पिलग्रिम' भूखे मरने को थे क्योंकि उन्हें कृषि का कख भी नहीं आता था। व्यवसाय कृषि के विकास से हज़ारों साल पहले भी होता रहा है। अरब और यूरोप के व्यापारी प्राचीन काल से भारत के साथ व्यापार करते रहे हैं, जबकि कृषि के मामले में वे निरक्षर थे। समस्त भारत में कृषि और गौपालन की स्वीकार्यता, उसका ज्ञान, और विस्तार ब्राह्मणों की ही देन है। कृषि और शाकाहार का सामान्य ज्ञान हमें आज वैसा ही सरल और स्वाभाविक लगता है, जैसा मेरे बच्चों का अमेरिका में रहते हुये भी शाकाहारी होना, लेकिन है नहीं। इसके पीछे सहस्रों वर्षों का तप और त्याग है। वेदों को बार बार चोरों के मुँह में हाथ डालकर निकाला गया है ताकि समाज का कल्याण हो। गौदान के द्वारा गौसंवर्धन, दूध, दही, मक्खन, खीर, घी आदि के प्रयोग द्वारा पोषण, गौ को माँ का स्थान देकर भारतीय समाज में इतना सहज बना दिया गया जैसा संसार में और कहीं नहीं हुआ।

7. वर्ण और विशेषकर वर्ण-संकर भारतीय संस्कृति के सर्वाधिक ग़लत समझे गये शब्द हैं। ग्रंथों में जहाँ भी वर्ण-संकर शब्द का प्रयोग हुआ है उसे जाति-संकर कहना न केवल एक भूल है बल्कि महा-अज्ञान है। ऐसा अनर्थ करने वाले यदि शंकराचार्य के पद पर भी बैठे हों तो भी वे भारतीय संस्कृति की आत्मा से दूर हैं। सामान्यजन तो खैर संसार भर में कुछ हद तक जातिवादी होते हैं, और अपने परिवार, वंश, जाति, या राष्ट्र को सर्वश्रेष्ठ मानना कोई नई या अस्वाभाविक बात नहीं है। वर्ण इस जातिगत श्रेष्ठता की काट भी बने और व्यक्ति और समाज के विकास का साधन भी।

7. ब्राह्मणत्व के अनेक कर्तव्यों में से एक दान लेना और दान देना भी है। अपने को अयाचक मानकर, ब्राह्मणों को याचक या हीन कहना निश्चित रूप से एक अब्राह्मण प्रवृत्ति है। अनेक जन्मना ब्राह्मण भी संसार की देखादेखी आजकल परशु को ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते दिखते हैं लेकिन तथ्य यही है कि सत्यनिष्ठा और विनम्रता ब्राह्मणत्व के मूलभूत गुण हैं, और इस बात को न समझने वालों का ब्राह्मणत्व नाममात्र का ही है।

8. किसी को ब्राह्मण कहने का आधार उसके माता पिता का ब्राह्मण होना भी मात्र उतना ही है जितना किसी के क्षत्रिय, वैश्य, सिख, ईसाई, जैन, तुरक, या किसी अन्य वर्ण, जाति, या मज़हब का होना। न उससे तनिक भी कम, न अधिक। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि वर्णाश्रम व्यवस्था के अधोपतन के इस काल में भी भारत में सर्वाधिक अंतरजातीय विवाह ब्राह्मणों में ही मिलेंगे जो इस बात का द्योतक है कि ब्राह्मण जाति के बंधन में उतने नहीं फँसे हुये जितने अन्य समुदाय। वर्ण जन्मना नहीं, जाति नहीं, बल्कि जातिवाद के विरुद्ध हैं, वे जन्मना अहंकार का प्रतिरोध हैं।

... अभी के लिये इतना ही, शेष फिर ...

सम्बंधित कड़ी: ब्राह्मण कौन? भाग 1

Sunday, June 16, 2019

ब्राह्मण कौन 2 (उपजातियाँ, गोत्र, प्रवर, और घर)

रेखाचित्र: अनुराग शर्मा
जीवन में अब तक दो बार मेरी जाति पूछी गयी है, दोनों बार ही अमेरिका में, अभारतीय समुदाय के, ईसाई मतावलम्बी व्यक्तियों द्वारा। भारत में जाति के आधार पर मेरे साथ भेदभाव भी हुए हैं, और अपमानित करने के प्रयास भी, लेकिन जाति शायद मेरे नाम या माथे पर पहले ही दिखती रही सो उसके बारे में कोई सीधा प्रश्न कभी नहीं किया गया। हाँ, छ्द्मरूपों में वे प्रश्न लगातार किये जाते रहे हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय संस्कृति के विरोध में कई बार अनेक मिथ्या कथनों को सार्वभौमिक सत्य की तरह प्रस्तुत किये जाते भी देखता हूँ। यही प्रवृत्तियाँ इस लेख का कारक बनीं। इसमें मेरा कुछ नहीं है - परम्परा को जैसा देखा, समझा सामने है, ताकि आप भी सत्य-असत्य में भेद कर अपना निर्णय आप कर सकें। यह लेख वृहद और विविध भारतीय परम्परा को ध्यान में रखते मुख्यतः रुहेलखण्ड क्षेत्र की साढ़े-तीन घर की सनाढ़्य परम्परा को आधार मानकर लिखा गया है। सम्भव है भविष्य के किसी लेख में अन्य समूहों, वर्गों आदि की प्रामाणिक जानकारी भी दी जाये।

भारत में ही नहीं, कबीले और जातियाँ संसार भर में पाये जाते रहे हैं। कोई समूह अपने रंग के आधार पर खुद को श्रेष्ठ मानता था, कोई अपनी क्रूरता के आधार पर, तो कोई अपनी समृद्धि के आधार पर। अपने जैसे समूह में मिलना, और स्वयं को अपने से भिन्न लगने वालों से श्रेष्ठ समझना कुछ हद तक स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति कई मायनों में क्रांतिकारी रही है। भारतीय समाज के अनूठे विचारों में से एक वर्णाश्रम व्यवस्था भी थी। जन्मजात विश्वव्यापी श्रेष्ठता की धारणाओं को नकारकर, जाति के बजाय कर्म और शालीनता को महत्व देना वर्ण व्यवस्था का आधार है।

पितृसत्ता तो संसार भर में सामान्य थी, केरल के नायर समुदाय में मातृकुल आज भी मान्य है। लेकिन भारतीय संस्कृति ने जन्म या रक्त के सम्बंध से कहीं ऊपर उठकर गोत्र द्वारा गुरुकुल से जुड़ने जैसी अपूर्व धारणा की नींव रखी। शास्त्रीय परम्परानुसार, भगवान राम का वंश इक्ष्वाकु, कुल रघुकुल, परंतु गोत्र वसिष्ठ है। किसी भी गुरुकुल के शिष्यों का गोत्र सामान्यतः उस गुरुकुल के संस्थापक के नाम पर होता था और सगोत्रियों को सगे-सम्बंधियों की तरह माना जाता था। इसी कारण उनमें विवाह सम्बन्ध प्रतिबंधित थे। अंतर्गोत्रीय विवाह दो भिन्न गुरुकुलों के बीच सेतु बनकर ज्ञान के आदान-प्रदान का कार्य भी करते थे। जब सारा संसार लगभग जंगली जीवन जीता था तब इतने बड़े देश को दुग्ध और शाकाहार आधारित स्वस्थ पोषण जैसी जानकारी, दशमलव गणित, और खगोलशास्त्र जैसे विज्ञान, शर्करा जैसा बहूपयोगी उत्पाद, हीरक-खनन जैसा अद्वितीय और अपूर्व कार्य, जातिवादी अहंकार और फ़िरकापरस्ती की जगह कर्म-आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था जैसे सिद्धांत देने में गोत्र व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

मूल गोत्र सप्तर्षियों के नाम पर रहे। बाद के ऋषि सामान्यतः प्रवर के रूप में मान्य हुये लेकिन सम्भव है कि कुछ क्षेत्रों में वे गोत्र-प्रवर्त्तक भी मान लिये गये हों। गोत्रों के कुछ सामान्य उदाहरण पराशर, वसिष्ठ, भरद्वाज, कश्यप आदि हैं। कहीं पढ़ा था कि काशी में 47 गोत्र ऋषियों के मंदिर ज्ञात हैं। काशी में और अन्यत्र ऐसे अधिक मंदिर भी हो सकते हैं, लेकिन मुझे उसकी जानकारी नहीं है।

गोत्र का उपसमूह है प्रवर। कई प्रवरों का एक गोत्र होता है, एक गोत्र में कई प्रवर हो सकते हैं। प्रवर गोत्र के प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद में आने वाले ऋषियों की ओर संकेत करते हैं। प्रवर उन ऋषियों के नाम पर बने हैं जिन्होंने मूल गोत्र-प्रवर्त्तक ऋषि की मान्यताओं का प्रसार किया। एक गोत्र में प्रवर कितने भी हो सकते हैं, नहीं भी होते हैं। जिन गोत्रों में आगे कोई अन्य प्रवर्त्तक ऋषि नहीं हुआ वहाँ प्रवर नहीं है। सनाढ्य ब्राह्मण समुदाय केे साढे-तीन घर का अर्द्ध भाग (साढ़े) इन्हीं प्रवरहीन गोत्रों का प्रतीक है।

गोत्र से इतर एक अन्य विभाजन क्षेत्र का भी है। सागरतट से दूर उत्तरभारतीय ब्राह्मण गौड़ तथा तटीय क्षेत्र के ब्राह्मण द्रविड़ कहलाये। द्रविड़ का उद्भव द्रव से हो सकता है, जिससे उनके तटीय क्षेत्रों में निवास के साथ-साथ समृद्धि का संकेत भी मिलता है। जातिवादी गोरे शासकों द्वारा आर्यन रेस तथा आर्य-द्रविड़ संघर्ष जैसी मिथ्या मान्यताओं की स्थापना उनकी अपनी स्वार्थसिद्धि के पथ में स्वाभाविक होते हुये भी पूर्णतः निराधार है।

गौड़ क्षेत्र के ब्राह्मणों को गौड़, सारस्वत, कान्यकुब्ज, मैथिल, उत्कल, सरयूपारीण, गुर्जर, देशस्थ, कोंकणस्थ आदि अनेक वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। इसी प्रकार द्रविड़ ब्राह्मणों को तैलंग, अय्यर, अयंगार, नम्बूदरी, आदि अनेक खण्डों में विभक्त किया जा सकता है। लेकिन इनके अतिरिक्त सनाढ्य जैसे कुछ समूह आज भी क्षेत्रीय नाम से मुक्त हैं। कश्मीरी ब्राह्मण जैसे कुछ क्षेत्रीय नाम बाद में बने हुये भी लगते हैं।

जाति व्यवस्था के विपरीत वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी लेकिन कालांतर में वह भी लगभग जाति की समरूप ही हो गयी। विवाह सम्बंध के मामलों में अधिकांश समूह अन्य समूहों से अलग होये। चीन-जापान आदि अनेक देशों में कुलनाम बदलना आज भी कानून के विरुद्ध है लेकिन भारत में कुलनामों के विषय में कोई कानून न होना अपने समूह के बाहर के अपरिचितों के वास्तविक वर्ण के प्रति अविश्वास का कारण भी बना और अपनी-अपनी परम्पराओं को बाह्य आक्रमणों से बचाये-बनाये रखने का एकमात्र साधन भी।

सात्विक भोजन (प्याज़-लहसुन आदि गंधक वनस्पति रहित शाकाहार व दुग्ध उत्पाद मात्र) के प्रति सनाढ्य ब्राह्मणों का अटूट आग्रह अन्य ब्राह्मण समूहों विशेषकर कान्यकुब्ज समूह से उनके अलगाव का कारण बना। गोत्र-प्रवर के वर्गीकरण के अनुसार सनाढ्य ब्राह्मण समुदाय स्वयं भी दो उपवर्गों दसघर और साढ़े-तीन घर में बँट गया। जहाँ दसघर कुल 10 गोत्रों का समूह था वहीं साढ़े तीन घर में दो प्रकार के गोत्र थे, पहले वे जिनके हर गोत्र में तीन अल्ल (शासन, प्रवर या कुलनाम) हैं, और दूसरे वे जिनमें कोई प्रवर नहीं। तीन प्रवर वाले गोत्रों का एक उदाहरण पाराशर गोत्र है जिसमें तीन कुलनाम पाण्डेय, पाराशरी, व त्रिगुणायत पाये जाते हैं तथा एकल-प्रवर वाले गोत्र का उदाहरण च्यवन है जिनका कुलनाम कष्टहा (तद्भव कटिहा) है। सांख्यधर (तद्भव शंखधार) कुलनाम भी भी साढ़े-तीन घर के सनाढ्यों के एकल-प्रवर कुल का एक उदाहरण है। साढ़े-तीन घर में प्रयुक्त अर्थ इन्हीं एकल-प्रवर कुलों के प्रतीक हैं।

गोत्र के सामान्य नियमों के अनुसार दसघर के गोत्र एक-दूसरे में विवाह सम्बंध बनाते रहे हैं। परम्परानुसार उनकी कन्याओं का विवाह साढ़े-तीन घर के वरों के साथ हो सकता था, यद्यपि उसके विलोम से सामान्यतः बचा जाता था, लेकिन पूर्ण मनाही जैसी स्थिति नहीं थी। हाँ ये दोनों ही वर्ग अन्य ब्राह्मण या अब्राह्मण समूहों में विवाह नहीं करते थे। मुख्य बाधा खानपान की पवित्रता की अवधारणा ही थी। स्नान के बिना या चप्पल आदि पहनकर रसोई में प्रवेश प्रतिबंधित था। दिन का भोजन कच्चा अर्थात, दाल, भात, रोटी, सलाद आदि होता था जबकि शाम का भोजन पक्का अर्थात पूरी, पराँठे, सब्ज़ी (तली हुई) आदि होते थे। इनके सामान्य व्यवसायों में कथावाचन, वैद्यकी, ज्योतिष, व पौरोहित्य भी थे। पौरोहित्य व्यवसाय के कारण इनका खानपान सभी हिंदू जातियों में होता था। लेकिन उसमें पका खाना और कच्चा खाना के नियम थे जिसके अनुसार दाल, चावल, रोटी आदि जैसे बिना-तले पदार्थ घर से बाहर के पके नहीं खाये जाते थे। पवित्रता का ध्यान रखते हुए फलाहार, तथा पक्का खाना आवश्यकतानुसार बाहर की रसोई का भी खाया जा सकता था। इनके हाथ के बनाये हुए कच्चे भोजन सहित सभी सामग्री सभी जातियों और धर्मों में भोज्यपदार्थ के लिये समान रूप से विश्वसनीय और स्वीकार्य थी। शायद इसी कारण यह समुदाय भोजन, मिष्ठान्न आदि के व्यवसाय से भी जुड़ा रहा है। खाना पकाने वाले कर्मी को महाराज कहने का रिवाज़ भी इनके इस व्यवसाय से ही आया है क्योंकि इस समुदाय के व्यक्तियों को आदर से 'पण्डित जी महाराज', पण्डितजी, या महाराज कहने की प्रथा है। इसीलिये कुछ क्षेत्रों में रसोइये को ही महाराज कहा जाने लगा।

नमस्कार के लिये सामान्यतः पण्डित जी पालागन या दण्डवत महाराज जैसे सम्बोधन सामान्य थे। मुझे याद है कि बरेली में मेरे मुस्लिम अध्यापक भी मुझे पण्डित जी महाराज कहकर ही बुलाते थे।

अधिकांश सनाढ्य अपने नाम में अपनी अल्ल/अल्ह (कुलनाम) का प्रयोग करते हैं, कुछ सामान्य ब्राह्मण नाम 'शर्मा' का भी प्रयोग करते हैं और कोई-कोई अपने गोत्र का। उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, मुख्य न्यायाधीश रामस्वरूप पाठक, केंद्रीय विद्यालय संगठन के मुख्य आयुक्त श्री रमेश चंद्र शर्मा आदि इस समुदाय के ही हैं। कुछ कुलनामों का प्रयोग इसलिये नहीं किया जाता था क्योंकि वे अन्य समुदायों के कुछ अन्य कुलनामों से मिलते-जुलते होने के कारण सुनने वाले को भ्रमित कर सकते थे। उदाहरण के लिये सनाढ्य शब्द को ही कुलनाम में प्रयुक्त नहीं किया जाता था क्योंकि वह अब्राह्मण जाति सनौढ़िया से भ्रमित कर सकता था। इसी प्रकार कष्टहा, या कटिहा कुलनाम वाले सामान्यतः शर्मा लिखते थे ताकि उन्हें कट्ट्या महाब्राह्मण न समझ लिया जाये। ज्ञातव्य है कि महाब्राह्मण हिंदुओं का अंतिम संस्कार कराने वाले ब्राह्मण वर्ग के लिये रूढ़ नाम है जो श्मशान में अंतिम संस्कार कराने के कारण सामान्य पूजा-पाठ से अलग हो गये थे, और सामान्य व्यवहार में लगभग अब्राह्मण जैसे ही समझे जाने लगे थे। सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक स्थिति में भी कट्ट्या समुदाय देश के सर्वाधिक पिछड़े वर्गों में से एक है। आर वी रसैल (R. V. Russell) ने भी अपने अज्ञान के कारण ही 'The Tribes and Castes of the Central Provinces of India - Volume II' में जब साढ़े-तीन घर के सनाढ्यों को एक बार महाब्राह्मणों में विवाहित (*Further, it is said that the Three-and-a-half group were once made to intermarry with the degraded Kataha or Maha-Brahmans, who are funeral priests.) बताया है तो उसका कारण कष्टहा तथा कट्ट्या को समान समझने का भ्रम ही है।
सनेन तपसा वेदेन च सना निरंतरमाढ्य: पूर्ण सनाढ्य:
साढ़े-तीन घर के कई कुलनाम दसघर के कुलनामों के समान होते हुए भी अलग हैं। इसी प्रकार दसघर के अधिकांश कुलनाम कान्यकुब्ज या गौड़ ब्राह्मणों के समान होते हुए भी वास्तव में उनसे भिन्न हैं। महाराष्ट्र से नेपाल तक पाया जाने वाला पाण्डेय कुलनाम अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग ब्राह्मण समूहों का प्रतिनिधित्व करता है। सनाढ्यों के मिश्र में ही भेद हैं। इसी प्रकार साढ़े-तीन घर के पाठक दसघर के पाठकों से भिन्न हैं।

सनाढ्यों में प्रचलित कुछ कुलनाम
साढ़े-तीन घर: मिश्र (गोत्र: कश्यप), पाठक (गोत्र: कश्यप), पाण्डेय (गोत्र: पाराशर), कटिहा (गोत्र: च्यवन), पाराशरी (गोत्र: पाराशर), त्रिगुणायत (गोत्र: पाराशर), शंखधार (गोत्र: अगस्त्य),
दसघर: मिश्र, पाठक (गोत्र: भरद्वाज), उपाध्याय, चतुर्वेदी


विषय विस्तृत है, इस पर प्रकाशित प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। अधिकांश उपलब्ध जानकारी अपने-अपने क्षेत्र या कुल को औरों से श्रेष्ठ बताने के पूर्वाग्रह से युक्त, तथ्यहीन, और असत्य है। अंतर्जाल पर उपलब्ध जानकारी में अनेक ऊलजलूल कहानियाँ कट-पेस्ट करके दोहरायी गयी हैं। इसके अतिरिक्त नई पीढ़ी के बच्चे अपने गोत्र-प्रवर-समूह आदि की जानकारी से वंचित भी हैं। इस आलेख का उद्देश्य लुप्त हो रही जानकारी को लिपिबद्ध करना है। लेखक का विश्वास किसी भी जाति को उच्च या निम्न न मानते हुये प्राणिमात्र की उन्नति की भारतीय अवधारणा में है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।



Thursday, September 27, 2018

स्वप्न का अर्थ

नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे की पिछली कड़ियाँ
भाग 1; भाग 2; भाग 3भाग 4; भाग 5भाग 6; भाग 7;
सत्याभास (कहानी); किशोर चौधरी के नाम (पत्र)


सपने सबको आते हैं। सपने न आने का एक ही अर्थ है, सपना भूल जाना। और सपने देखने का अर्थ भी एक ही है, सपने के बीच नींद खुल जाना। स्वप्न वह दृश्यावली नहीं है जो आपने देखी, स्वप्न वह कहानी है जो एकसाथ घटती बीसियों ऊलजलूल घटनाओं को बलपूर्वक एक क्रम में बांधकर तारतम्य बिठाने के लिये आपके मस्तिष्क ने गढ़ी है।
पिछली कड़ियों में हमने स्वप्न को समझने के प्रयास के साथ-साथ मानव मस्तिष्क द्वारा तार्किकता बनाये रखने के लिये खेले जाने वाले कुछ अतार्किक खेलों का अध्ययन किया था। अब, इन्हीं तथ्यों के प्रकाश में कुछ स्वप्नों की सरल व्याख्या प्रस्तुत है। आज का स्वप्न सम्बन्धी प्रश्न -

स्वप्न: मैं सपने में जो भी काम करना शुरु करता हूँ वह कभी भी सम्पन्न नहीं हो पाता। क्या कोई मित्र इसकी व्याख्या या अर्थ समझा सकता है? ऐसा लगभग 20-25 साल से तो अवश्य ही घटित हो रहा है।

व्याख्या: सर्वप्रथम, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आपका स्वप्न वह नहीं जो आपने नींद में अनुभव किया, बल्कि उस अनुभव में से जितने अंश याद रह गये, स्वप्न उन अंशों से बुनी हुई तार्किक कथा मात्र है। इनमें से अनेक अंश एक दूसरे से पूर्णतः असम्बद्ध हो सकते हैं।

यदि आप स्वप्न में अक्सर कोई न कोई कार्य आरम्भ कर रहे होते हैं तो इसका सरल अर्थ यही है कि आपके मानकों के अनुसार आपके कार्य अभी अपूर्ण हैं। स्वप्न में उनका सम्पन्न न हो पाना भी यही दर्शाता है कि अभी आप अपने उद्देश्य को पूर्ण मानने की स्थिति में नहीं हैं।

सुझाव: मेरी सलाह यही है कि आप एक नई नोटबुक लेकर अपने जीवन के अपूर्ण/ पेंडिंग कार्यों की सूची बनाएँ, और उन कार्यों से सम्बंधित समस्त जानकारी, जैसे कार्य का महत्व, लागत, समय, बाधाएँ, सहयोगी, आदि को एकत्र करके उनकी परियोजना बनाकर कार्य करें। इससे दोहरा लाभ होगा। सम्पन्न होते जा रहे कार्यों की सूची सदा उपलब्ध होगी, और अपूर्ण कार्यों की वर्तमान स्थिति और सम्भावित अवधि अद्यतन रहेगी।
- अनुराग शर्मा

[क्रमशः]

Sunday, July 1, 2018

ब्लागिंग दिवस पर - बच्चे मन के सच्चे

The kids I have met were logical. They gained wisdom as they grew up. - Anurag Sharma

बच्चे सदा तार्किक होते हैं, बड़े होकर वे सही या ग़लत, पूरे या अधूरे निष्कर्ष निकालने लगते हैं।  - अनुराग शर्मा


एक मामले में मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ। वह यह कि बचपन से अब तक विभिन्न भूमिकाओं में मैं सदा बच्चों से घिरा रहा हूँ। जहाँ मेरा बचपन बीता, उत्तर-प्रदेश के मध्यम आकार के नगर के उस मध्य-वर्गीय आस-पड़ोस में तो हर प्रकार के बच्चे थे ही, अपना विस्तृत परिवार भी ऐसा था कि मेरे नौकरी आरम्भ करने के काफ़ी बाद तक भी मेरे आसपास बच्चे रहा करते थे। बाद में भी ऐसे बहाने सामने आते रहे जब कभी बाल-नाटिका आदि पर काम करते हुए या हिंदी पढ़ाने के लिये बच्चों से सम्पर्क बना रहा। मुझे बच्चे अच्छे लगते हैं लेकिन हमारा प्रेम पारस्परिक रहा, क्योंकि बच्चे भी अपनी इच्छा से मेरे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते रहे हैं। अपनी समस्याओं का हल निकालने की भागीदारी के लिये वे मुझे बड़ों की महत्वपूर्ण बैठकों में से खींच-खींचकर भी बाहर ले जाते रहे हैं।

बच्चे स्वभाव से ही उल्लासमय और उत्साही होते हैं। जिन भाग्यशाली बच्चों को अच्छा परिवेश और संस्कार मिले, उन्हें मैंने आत्मानुशासित और विनम्र भी पाया है। जहाँ अनुभवी और शिक्षित बड़ों के कुतर्क कई बार निराश करते हैं वहीं बच्चों को  मैंने *सदा-सर्वदा* स्मार्ट पाया है। उनकी नैसर्गिक हाज़िरजवाबी, अनूठा दृष्टिकोण, और कुशाग्र तार्किकता मुझे अचम्भित करती रही है। यही तार्किकता कई बार होठों पर बरबस ही हँसी ले आती है। कहीं और, बच्चों की चर्चा चलने पर यूँ ही कुछ उदाहरण याद आ गये तो सोचा लिख डालूँ, ताकि बाद में पढ़कर मुस्कुरा सकूँ।

कोई बात समझाने पर नई-नई अंग्रेज़ी सीख रहा एक बच्चा 'आई डोंट' (I don't) कहता था। कुछ ही समय में यह पता लग गया कि उसके 'आई डोंट' (I don't) का अभिप्राय वास्तव में आई नो (I know) होता था। थोड़ी सी पूछताछ के बाद बाल-मन की तार्किकता स्पष्ट हो गई जब बच्चे ने निम्न समीकरणों द्वारा अपनी बात समझाई -

1. आई डोंट नो = मैं नहीं जानता हूँ
2. नो = नहीं
3. आई डोंट नो = मैं नहीं जानता हूँ

खाते पीते घर की एक तीन-चार वर्षीय बच्ची से किसी ने पूछा कि बड़े होकर वह क्या बनेगी। बच्ची का अनपेक्षित उत्तर था, "बोझ बनूंगी।"

बदायूँ के हरप्रसाद मंदिर के बाहर प्रसाद की कतार में खड़ा एक बच्चा अपनी माँ को ज्ञान दे रहा था, "यह हरप्रसाद का मंदिर इसलिये हैं क्योंकि वे हर किसी को प्रसाद देते हैं।"

अन्यत्र एक पुरोहित जी के भोले बच्चे ने अपने तर्क से दो पल में संसार की सबसे बड़ी समस्या का समाधान करते हुए बताया कि लक्ष्मी ही सत्य हैं। लक्ष्मीनारायण ही सत्यनारायण हैं। दोनों में से नारायण हटाने के बाद निष्कर्ष लक्ष्मी = सत्य हो जाता है। तुरत समझ में आ गया कि सत्यमेव जयते के आदर्श वाक्य वाले देश में हर मुद्दे पर धनपति ही क्यों विजयी होते हैं।

दो वर्षीय अपराजिता ने अपना नाम अप्पा-जिता बताते हुए जब अपने माता पिता का नाम मम्मा-जिता और पप्पा-जिता बताया तो उन्होंने उल्लेख किया कि जिस प्रकार अप्पा का वास्तिक नाम अप्पाजिता होता है उसी प्रकार उनके मम्मा-पप्पा के नाम भी मम्मा-जिता और पप्पा-जिता होने चाहिये, नामकरण का यही तरीका है।

लगभग उसी वय की एक बच्ची ने बताया कि बच्चों के पाँव नहीं होते हैं। वे बाद में उग आते हैं। अपनी बात बताने के लिये उन्होंने डीवीडी चलाकर एक फ़िल्म का वह दृश्य दिखाया जिसमें अस्पताल में चिकित्सक कपड़ों में लिपटा नवजात शिशु पिता को सौंप रहे थे। जब मैंने कहा कि उस बच्चे के पाँव हैं लेकिन कपड़े में ढँके होने के कारण नहीं दिख रहे तो जवाब था कि पाँव होते तो बच्चे शुरू से ही चलते-फिरते नज़र आते। बड़े होने पर जब उनके पाँव उग जाते हैं, तब वे चलना आरम्भ करते हैं।

एक बच्चे को मेहमाँनवाज़ी के वक्त किसी अन्य द्वारा स्नैक्स लेना पसंद नहीं था। उनका प्रिय वाक्य था, "मैं आपे-आप खा लूंगा।" अर्थात, वयस्क हर मामले में टांग अड़ाते हैं, कम से कम, खाने-पीने के काम में मुझे आत्मनिर्भर समझा जाये।

सड़क चलते समय गिर जाने पर किसी रोते हुए घायल बच्चे का फ़ुटपाथ को थपथपाकर, "सॉरी साइडवॉक" कहना भला किसका दिल नहीं जीत लेगा। यह बात अलग है कि स्कूल के पहले दिन, घर वापस आने पर उस बच्चे का पहला वाक्य था, आई कैन डू व्हाट आई वांट टु डू (मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ)।

मेरे विचार से बालमन की सम्भावनाओं से अपरिचित होना दुखद है। बच्चों से सम्पर्क का अवसर मिलने पर भी इन गुणों का अनुभव न कर पाना अति-दुखद है। और इन सबसे आगे, किसी भी स्थिति में बाल-मन की असीम सम्भावनाओं पर अविश्वास करना दुर्भाग्यपूर्ण है। आइये, इस ब्लॉगिंग दिवस पर किसी बच्चे से दोस्ती की जाये।

Friday, September 22, 2017

प्रेम का धन

प्रेमधन

प्रेम भी एक प्रकार का धन ही है। बल्कि सच कहूँ तो इसका व्यवहार वित्त जैसा ही है। किसी के पास प्रेम की भावना का बाहुल्य है, और किसी के पास रत्ती भर भी प्रेम नहीं होता। अधिकांश लोग इन दोनों स्थितियों के बीच में कहीं खड़े, बैठे, या पड़े होते हैं। जिस प्रकार हर निर्धन भिखारी नहीं होता, उसी प्रकार अधिकांश प्रेमहीन लोग भी समुचित चिंतन, प्रयास, श्रम, और भाग्य से गुज़ारे भर का प्रेम कमा ही लेते हैं। और जिस प्रकार लोग धन देकर अपनी भौतिक ज़रूरतें पूरी करते हैं,  उसी प्रकार प्रेम देकर अपनी मानसिक आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं। प्रेम एक भावनात्मक धन है और आपके भावनात्मक जीवन में इसका योगदान महत्वपूर्ण है। आइये, कुछ उदाहरणों के साथ समझें प्रेम के वित्त-सरीखे व्यवहार को।

प्रेम और अधिकार

ध्यान रहे कि अधिकार की भावना प्रेम नहीं होती। सच पूछिये तो ममत्व की भावना भी कुछ सीमा तक प्रेम नहीं है। उदाहरण के लिये, जो माता-पिता अपने बच्चों की शादी उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर, अपनी मर्ज़ी से करना चाहते हैं, वे बच्चों पर अपनी सम्पत्ति की तरह अधिकार तो मानते हैं, लेकिन उस भावना को प्रेम नहीं कहा जा सकता। प्रेम में प्रसन्नता तो है, लेकिन वह प्रसन्नता दूसरे की प्रसन्नता में निहित है। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो आप उसे प्रसन्न देखना चाहते हैं। और उसकी प्रसन्नता के लिये आप कुछ भी करने को तैयार रहेंगे। सामान्य सम्बंधों में प्रेम और अधिकार की भावनाएँ एक साथ भी न्यूनाधिक मात्रा में पायी जाती हैं।

प्रेम धनाढ्य या कंगाल

जिसके पास पैसा नहीं है, वह सामान्यतः उसे खर्च नहीं कर सकता। ठीक उसी तरह जिसके पास संतोषजनक प्रेमभावना नहीं है, वह दूसरों को प्रेम नहीं दे पाता है। यदि आपके मन में यह भावना घर कर जाये कि आपको समुचित प्यार नहीं मिला तो आप किसी अन्य व्यक्ति को प्यार नहीं दे पायेंगे। प्यार कुढ़ते हुए नहीं होता, न बदले की भावना से ही किसी से प्यार किया जा सकता है। प्रेममय समाज, प्रेममय परिवार, और प्रेममय व्यक्ति किसी धनाढ्य समाज, परिवार या व्यक्ति के जैसे ही प्रेमधन को देने में सक्षम हैं। लेकिन दुर्भावना से ग्रस्त व्यक्ति किसी को प्रेम कैसे कर पायेगा। साथ ही यदि आप अपने को दलित, वंचित, और सताया हुआ ही मान बैठे हैं तो प्रेमधन के नाम पर आपकी थैली में कानी कौड़ी ही मिलेगी। इस स्थिति में आप प्रेम की पाई खर्च नहीं कर पायेंगे।

प्रेम का लेनदेन, उधारी और निवेश 

प्रेम का खाता भी किसी बैंक खाते जैसा ही है। जितनी अधिक राशि जमा है उतनी का ही उपयोग हो सकता है। और यह राशि प्रेम-व्यवहार के आधार पर घट-बढ़ भी सकती है। मेरे दादाजी कहते थे कि 'मिलना-मिलाना, आना-जाना, खाना-खिलाना' आपसी प्रेम बनाये रखने में सहायक सिद्ध होता है।

जिनके साथ आप प्रेम प्रदर्शित करते हैं, यदि वे लगातार आपको दुत्कारते रहें तो उनपर आपके प्रेमधन का खर्च उसकी प्राप्य भावना के मूल्य से अधिक है। ऐसे में एक सामान्य सम्भावना यह है कि आप कुछ समय बाद इस सौदे में लगातार हो रहे घाटे को पहचानकर इस व्यवहार को बंद कर देंगे। रिश्ते की गर्माहट आमतौर पर इसी तरह कम होती है, और अधिकांश मैत्रियाँ अक्सर इसी कारण से टूटती हैं।

एक और सम्भावना यह भी है कि आपके पास इतना पैसा है कि आप किसी सत्कार्य की तरह इस व्यवहार को चलाते रहें। चूंकि स्वार्थ से बचना कठिन है, इसलिये इकतरफ़ा प्रेम को जारी रखने की यह दूसरी सम्भावना सामान्यतः, रक्त सम्बंधों या वैवाहिक सम्बंध से बाहर दुर्लभ ही होती है। इस सम्बंध में मेरा प्रिय कथन है:
इक दाता है इक पाता है, तो हर रिश्ता निभ टिक जाता है

कई बार प्यार में उधारी भी होती है, जब आप किसी की निरंतर बेरुखी के बावज़ूद एक परिवर्तन-बिंदु (threshold point) की आशा में एकतरफ़ा प्यार लुटाते रहते हैं। यदि निर्धारित समय में वह परिवर्तन बिंदु आपकी दृष्टि-सीमा में नहीं दिखता तो आप अपना प्रेम समेटकर दूसरी ओर निकल लेते हैं। कभी-कभी इसका उलटा भी होता है जब परिवर्तन बिंदु न आने की वजह आपके प्रेम के योगदान की कमी होती है, और प्रेम को समुचित मात्रा तक बढ़ाकर अपना वांछित सरलता से पाया जा सकता है।

हर प्रेममय कर्म, प्रेम के खाते में एक जमापर्ची की तरह होता है जो प्रेम की वृद्धि करता है। उसी प्रकार हर द्वेषपूर्ण कर्म उस खाते से थोड़ा सा प्रेम कम करता जाता है। आपसी बेरुखी को दण्ड या सर्विस चार्ज जैसा माना जा सकता है।


प्रेमिल विडम्बना

प्रेमधन से हीन लोग अक्सर इतने आत्मकेंद्रित होते हैं कि प्रेममय व्यवहार या व्यक्ति को देख नहीं पाते। जिस प्रकार आर्थिक व्यवहार में हर शिकायत जायज़ नहीं होती उसी तरह दो व्यक्तियों के रिश्ते में दूसरी ओर से प्रेम न मिलने की शिकायत करने वाला व्यक्ति खुद भी रिश्ते में प्रेम-वंचना का ज़िम्मेदार हो सकता है। नवविवाहितों को मेरी सलाह यही है कि जब भी आप अपने जीवन-साथी की शिकायत किसी तीसरे व्यक्ति से करें तो जीवन-साथी की उपस्थिति में करें ताकि वह सिक्के का दूसरा पक्ष सामने रख सके जिसे देखने से शायद आप वंचित रहे हों।
प्रेमधन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि कंजूस अक्सर दानवीर की शिकायत लगा रहा होता है।

प्रेम निवेश

जैसे धन का निवेश अच्छा या बुरा परिणाम देता है, ठीक वैसे ही आप जिससे प्यार करते हैं, उसके गुण-दुर्गुण आपकी भावनात्मक उन्नति या पतन के कारक बन सकते हैं। कई बार अंधाधुंध निवेश किसी बुरे निवेश को बचा लेता है। लेकिन सामान्यतः बुरे निवेश में हुए घाटे को बट्टे-खाते में डालकर वहाँ से बच निकलना ही बेहतर उपाय है। इसी प्रकार प्रेम भी सोच-समझकर सही व्यक्ति से कीजिये और ग़लती होने की स्थिति में अपनी हानि को न्यूनतम करने का प्रयास करते हुए बंधन से बाहर आने में ही बुद्धिमता है। ऐसे कई झटके खाने वाले प्रेम-निर्धन का दिवाला पिट जाना एक सामान्य घटना है। लेकिन यह भी सच है कि धन की ही तरह आपके अंतर का प्रेम जितना अधिक होगा, दूसरी ओर से अपेक्षित परिणाम न आने पर भी आपके प्रेम की निरंतरता बने रहने की सम्भावना उतनी ही अधिक है।

निवेश की गुणवत्ता के अलावा उसकी व्यापकता भी वित्त और प्रेम में समान होती है। जिस प्रकार धन सम्पदा की बहुलता के अनुपात में व्यक्ति फेरी लगाने से लेकर वैश्विक संस्थान चलाने तक के विभिन्न स्तरों में से कहीं हो सकता है उसी प्रकार बड़े प्रेम धनाढ्य का निवेश एक व्यक्ति से बढ़कर, एक समूह, समाज या संसार के लिये हो सकता है।

धरोहर बनाम स्व-अर्जित प्रेमभाव

कई परिवार, समुदाय, राष्ट्र या समाज विपन्न होने के कारण उनकी संतति भी विपन्न होती है क्योंकि परिवेश में धन होता ही नहीं। वित्त की कमी, प्राकृतिक धन यथा हरीतिमा, जल, वनस्पति, खनिज आदि की अनुपलब्धता के साथ पुरुषार्थ धन यथा  कृषि, उद्योग, विपणन आदि की कमी के कारण धन विरासत में उपलब्ध नहीं होता। ऐसे समाज में जहाँ बहुतेरे लोग विपन्न ही मर जाते हैं, कोई एकाध अपवाद स्वयम्भू धनाढ्य बनने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वित्त की यही सामाजिक स्थिति प्रेम के बारे में भी सत्य है। कई समुदायों में क्रोध, हिंसा, शिकायत आदि जैसी प्रेम-निर्धनता किसी विरासत की तरह सर्व-व्याप्त है और वे स्वाभाविक प्रेम की धरोहर से वंचित हैं। उन्हें पता ही नहीं कि प्रेम क्या है और प्रेममय समाज वांछित क्यों है।  ऐसे अभागे समुदाय में प्रेममय बनना कठिन तो है परंतु असम्भव नहीं।

आध्यात्मिक उन्नति के साथ ही प्रेम-धन का विस्तार होता जाता है। हम भारतीयों के लिये प्रेम की हज़ारों वर्ष से निरंतर बनी हुई सामाजिक धरोहर गर्व का विषय है। सर्वे भवंतु सुखिनः, और वसुधैव कुटुम्बकम की स्थितियाँ इस भारत की पारम्परिक विचारधारा की प्रेममय स्थिति में स्वाभाविक हैं।  गीता के अनुसार:
विद्याविनयसपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी, शुनिचैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:

प्रेम में भ्रष्टाचार

जैसे हमारे आस-पास आर्थिक मामलों में भ्रष्ट आचरण या बेईमानी करने वाले दिखते हैं, उसी प्रकार के अनैतिक लोग प्रेम और अन्य भावनात्मक मामलों में भी भ्रष्ट आचरण करते दिख सकते हैं। यह भ्रष्टाचार प्रेम नहीं है, बल्कि अनैतिक रूप से प्रेम या उससे निरूपित भावनात्मक संतोष चुराने का प्रयास है और आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह ही ग़लत है। ऐसे आचरण के कई रूप हो सकते हैं। जिस प्रकार किसी वेतनभोगी कर्मी द्वारा अपने कार्य की  ज़िम्मेदारियों का निर्वहन न करना ग़लत है उसी प्रकार जिस सम्बंध में प्रेम की अपेक्षा हो वहाँ प्रेम न रखना भी अपने उत्तरदायित्व को न निभाने के कारण अनैतिक आचरण ही है - रिश्ते में बेईमानी। इसी प्रकार जैसे किसी और का धन अनधिकार उठा लेना अनैतिक है वैसे ही किसी अनिच्छुक या असम्बंधित से प्रेम की अपेक्षा भी ग़लत है। और उसके लिये दवाब डालना वैसा ही ग़लत है जैसे भिक्षा के मुकाबले चोरी, और  चोरी के मुकाबले डकैती। अनैतिकता और अपराध की सीमा कई बार बहुत बारीक होती है इसलिये यह ध्यान रहे कि आर्थिक दुराचार की तरह ही कुछ आचरण आपराधिक रूप में परिभाषित न होते हुए भी अनैतिक हो सकते हैं।

राग, द्वेष, कड़वाहट, असंतोष

असंतोष प्रेम का बड़ा शत्रु है। साथ ही कड़वाहट या द्वेष भी प्रेम का शत्रु है। प्रेम रहे न रहे, जीवन में द्वेष के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये। आपका ज़ोर अपने जीवन में प्रेम की भावना की उन्नति की ओर रहे तो बहुत अच्छी बात है। विद्याधन की तरह प्रेमधन भी बाँटने से बढ़ता है। प्रेम का आधिक्य आपको भावनात्मक रूप से शक्तिशाली बनाता है। सबसे प्रेम कीजिये और सही प्रत्युत्तर न मिलने पर न्यूट्रल भले हो जायें, द्वेष को पनपने मत दीजिये।

बहुतेरे अनपढ़ बाबा किस्म के लोग राग, द्वेष को एक ही लाठी से हाँकते दिखते हैं। उनके झांसे में मत आइये और यह ध्यान रखिये कि राग और द्वेष में आकाश-पाताल का अंतर है। सुर, ताल, राग, अनुराग सभी सात्विक हैं जबकि द्वेष, ईर्ष्या, घृणा आदि एक अलग ही वर्ग की विकृतियाँ हैं।

भावनात्मक संतुलन

वित्तीय संतुलन की तरह ही आपके जीवन में भावनात्मक संतुलन बनाने में प्रेम, संतोष, सहनशीलता आदि सद्गुणों का अत्यधिक महत्व है। इन्हें बनाये रखिये। भावनात्मक परिपक्वता की सहायता से शांतचित्त रहते हुए अपना जीवन व्यवहार सम्भालिये और प्रसन्न रहिये।

जो होनी थी वह हो के रही, अब अनहोनी का होना क्या
जब किस्मत थी भरपूर मिला, अब प्यार नहीं तो रोना क्या


शुभकामनाएँ!


Sunday, September 10, 2017

अनुरागी मन

नवीं कक्षा में था तो रसायनशास्त्र के प्रवक्ता मु. यामीन अंसारी ने कहा कि छात्र संघ में कनिष्ठ उपाध्यक्ष के लिये नामांकन भर दो। उन्होंने बताया कि उस पद के लिये पात्रता कक्षा 9 तक की ही है। शायद इसीलिये उस दिन अंतिम तिथि होने के बावजूद, तब तक कोई नामांकन नहीं आया था। मुझे राजनीति में जाने की कोई इच्छा वैसे भी नहीं थी। ऊपर से मेरे जैसा शांत व्यक्ति ज़ोर-जबर के नक्कारखाने के लिये शायद ही उपयुक्त होता। तीसरी बात यह भी थी कि नामांकन के लिये दस रुपये शुल्क था, जो उस समय मेरे पास नहीं था। अंसारी साहब शुल्क अपनी जेब से देने को भी तैयार थे परंतु मैं अनिच्छुक ही रहा।

अंतिम तिथि निकल गई। उस वर्ष का छात्रसंघ कनिष्ठ उपाध्यक्ष के बिना ही बना क्योंकि मैंने उस पद पर निर्विरोध चुने जाने का अवसर छोड़ दिया था। अगले वर्ष से छात्रसंघ के चुनावों पर प्रतिबंध लग गया और सभी तत्कालीन पदाधिकारी जोकि 12वीं के ही छात्र थे, परीक्षा पास करके विद्यालय से बाहर चले गये। मैं तीन और साल वहीं था। अंसारी साहब ने एकाध बार मज़ाक में कहा भी कि यदि उस दिन मैंने पर्चा भर दिया होता तो चार साल मैं छात्रसंघ पर एकछत्र राज्य करता।

नवीं कक्षा में ही जीवविज्ञान की प्रयोगशाला में जब ताज़े कटे हुए मेंढ़कों को धड़कते दिल के साथ क्रूरता से एक गड्ढे में फेंके जाते देखा तो सभ्य-समाज में सर्व-स्वीकृत निर्दयता ने दिल को बहुत चोट पहुँचाई। आज शायद सुनने में अजीब लगे लेकिन यह सच है कि उस समय तक मैं यही समझता था कि प्रयोगशाला में डाइसेक्ट किये हुए प्राणियों को सर्जरी द्वारा पहले जैसा स्वस्थ बनाकर वापस प्रकृति में छोड़ दिया जाता होगा। जीवविज्ञान के साथ मानसिक रूप से उसी समय अपना तलाक़ हो गया लेकिन हाईस्कूल तक जैसे-तैसे साथ निभाया और फिर गणित-विज्ञान समूह की दिशा पकड़ी।

तब से अब तक जीवन में कई ऐसे अवसर आये जब मौके हाथ से छूटे, या कहूँ कि छूटने दिये गये। जब किसी को आत्मविश्वास के साथ यह कहते सुनता हूँ कि उसने परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाया तो अच्छा लगता है क्योंकि मैंने शायद इस दिशा में कभी कोई खास श्रम नहीं किया। हाँ, जीवन में जो कुछ सामने आता गया उसके सदुपयोग पर थोड़ा बहुत विचार अवश्य किया। लेकिन वहाँ भी कोई जल्दबाज़ी कभी नहीं की।

एक दफ़ा एक बस यात्रा में जेब कट गई। दो-चार सौ रुपयों के साथ-साथ परिचय-पत्र भी चला गया, जिसकी सामान्यतः आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी। वैसे भी परिचयपत्र में चित्र के साथ अपने और संस्थान के नाम के अलावा काम की कोई जानकारी नहीं थी। न कार्यालय का नाम था और न ही पदनाम। दोबारा बनवाने का शुल्क भी लगता था और उसके लिये एक दूसरे कार्यालय में अर्ज़ी देने भी जाना पड़ता, जिसकी काम ने कभी फ़ुर्सत ही नहीं दी, सो टलता रहा।

जब नौकरी छोड़ने की नौबत आई तो नियमानुसार इस्तीफ़े के साथ परिचयपत्र भी जमा कराना था। नया परिचयपत्र बनवाने के लिये अगले सप्ताह का मुहूर्त निकालकर प्रबंधक जी को बता दिया गया। अगले हफ़्ते जब निकलने ही वाले थे तब उस दिन की अंतर-विभागीय डाक आ गई। और डाक में पत्रों के ऊपर ही मेरा परिचयपत्र भी पड़ा हुआ था जिसे कुछ साल पहले किसी जेबकतरे ने कहीं फेंका होगा और किसी भलेमानस ने शायद किसी मेलबॉक्स में डाल दिया होगा जोकि बरसों बाद किसी डाकिये को नज़र आया होगा और एक दफ़्तर से दूसरे में पहुँचते हुए आखिर मेरे पास आ गया।

यह तो एक सरल सा उदाहरण था लेकिन कई उदाहरण तो इतने जटिल संयोग के उदाहरण हैं कि लगता है मानो एक लम्बी परियोजना बनाकर उन्हें गढ़ा गया हो। सौ बात की एक बात यह कि ज़िंदगी अपने साथ बहाकर ले जाती रही लेकिन फिर भी रही अपने प्रति दयालु ही। तरबूज सौ बार छुरों पर गिरा लेकिन हर बार हाथ-पाँव झाड़कर उठ खड़ा हुआ।

पाँच साल की उम्र में एक नहर के तेज़ बहाव में बहकर मर ही जाता लेकिन बचा लिया गया। उसी समय तैरना सीखने का प्रण लिया। सीखने का कोई साधन ही नहीं था। न प्रशिक्षक, न तरण ताल। सो कुछ साल यूँ ही बीतने के बाद, अंततः, बिना पानी के ही तैराकी सीखने का निश्चय किया। जब पहली बार तरण-ताल देखने को मिला तब तक बिना पानी और बिना प्रशिक्षक के कामचलाऊ तैराकी सीख चुका था।

मरने के भी कई मौके आये और सीखने के भी। आलसी जीव, मृत्यु से भी बचकर निकलते रहे और सीखना भी अपने हिसाब से करते गये। हर काम सदा तसल्ली बख्श तो किया मगर किया भरपूर तसल्ली के साथ, बिना किसी जल्दबाज़ी के। बारहवीं के बाद जब सारे मित्र अभियांत्रिकी में जा रहे थे तब मैं उस उम्र में मिल सकने वाली एकमात्र नौकरी के लिये अर्ज़ियाँ भरकर जीवन की शुरुआत करने को तैयार था। अलबत्ता साथ में बेमन से ही सही बीएससी में प्रवेश भी ले लिया था।

बीएससी की फ़ाइनल परीक्षा के दौरान ही जीवन में पहली बार सीरियसली पढ़ाई करने का प्रण ले लिया। तय किया कि एमएससी गणित में की जायेगी। ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा में प्रवेश लेने से पहले ही सारी किताबें खरीदी हों। लेकिन एमएससी में आवेदन से पहले ही नौकरी शुरू करनी पड़ी।

बिल्कुल एक जैसी तीन नौकरियों के लिये एप्लाई किया था। एक का ऑफ़र बहुत बाद में आया। लेकिन जिन दो में पहले बुलाया गया उनमें से दिल्ली वाली का साक्षात्कार देने नहीं गया क्योंकि परिवार की राय घर के पास, यानी रुहेलखण्ड में रहने की थी। परीक्षा परिणाम में प्रदेश के पहले पाँच में नाम था। किसे खबर थी कि उत्तरप्रदेश का बोर्ड ही मुझे दिल्ली पोस्टिंग दे देगा। दिल्ली तो दे नहीं सकते थे मगर उन्होंने नोएडा भेज दिया। केवल एक उस निर्णय के बहाने घर-गाँव, रुहेलखण्ड ऐसा छूटा कि दोबारा वहाँ रहने का सुयोग बना ही नहीं।

 मित्रों से पिछड़ने की बात तो मन में क्या आनी थी, अपने पैरों पर खड़े होने का संतोष अवश्य था। इत्तेफ़ाक़ से उसी समय पिताजी देश भर के दुर्गमतम क्षेत्रों की अपनी ड्यूटी से छुटकारा पाकर सीआरपीएफ़ के दिल्ली स्थित केंद्र झाड़ौदा कलाँ में आये, सो हम भी उनके सरकारी निवास में फ़िट हो लिये। दफ्तर से घर खासा दूर था तो रोज़ाना 6-7 घंटे का कम्यूट होता था। रूट ऐसा था कि बसों में बैठना तो दूर, चढ़ना और उतरना भी आसान न था। एक दिन बहन की सहेलियों ने उसे बताया कि हमारे घर कोई मेहमान आया हुआ है। वह मेहमान मैं ही था क्योंकि मैं घर से इतना बाहर रहता था कि आस-पड़ोस के बहुत से लोगों को घर में मेरे अस्तित्व के बारे में जानकारी ही नहीं थी।

मेरे दिल्ली आने पर एमएससी की गणित की किताबें बदायूँ के तालाबंद घर में रखी रह गईं क्योंकि नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखने के प्रयास में निराशा हाथ लगी। विश्वविद्यालय वालों ने स्नातकोत्तर में प्रवेश इस आधार पर नहीं दिया कि एमएससी न तो प्राइवेट ही हो सकती है और न ही उसके लिये सायंकालीन या सप्ताहांत कक्षा की कोई व्यवस्था है। इस बाधा का कारण पूछने पर विज्ञान के कोर्स में प्रयोगशाला की अनिवार्यता का तर्क दिया गया। गणित में प्रयोगशाला नहीं थी लेकिन अधिकार के आगे तर्क की क्या बिसात। सो जिस ज़माने में तथागत अवतार तुलसी बिना प्रयोगशाला देखे, बिना अनिवार्यता पूरी किये हुए बीएससी और एमएससी की परीक्षा देकर सरकारी खर्चे पर नोबल पुरस्कार विजेताओं से मिलवाने ले जाये जा रहे थे, हमारे रोहिलखण्ड (अब ज्योतिबा फुले) विश्वविद्यालय ने हमें नौकरी के साथ गणित में स्नातकोत्तर करने से मना कर दिया। 6-7 घण्टे के दैनिक कम्यूट, पूरे दिन की नौकरी के अलावा डोमिसाइल सर्टिफ़िकेट आदि के सरकारी जंजालों के कारण हम भी चुप लगाकर बैठ गये। भला हो विदेश-प्रवास का कि यह स्नातकोत्तर भी बाद में पूरा हुआ, यद्यपि हुआ गणित के बिना।

उस बीच में उपेक्षा के कारण टूटते-फ़ूटते पुश्तैनी घर की छत गिरने के बाद जब उसे बेचने के लिये गये तो एमएससी गणित की सभी किताबें बिना छत के कमरे की बिना दरवाज़ों की अलमारी में तला ऊपर रखी थीं। लगभग गली हुई हालत में भी सबसे ऊपर की किताब का मुखपृष्ठ पठनीय था। मानो हँस रहा हो, "ज़िंदगी प्लैन करने चले थे? अब मत करना"

नौएडा से झाड़ौदा तक की उस दैनिक भागदौड़ में बैंक के परिवीक्षाधीन अधिकारी की परीक्षा दी, एक बार फिर पहले पाँच में चुनाव हुआ। देश भर से चुने गये 135 से अधिक अधिकारियों में मैं सबसे कमउम्र था। कुछ वर्ष बाद बैंक ने कम्प्यूटरीकरण की इन-हाउस टीम के लिये जब देशव्यापी परीक्षा द्वारा युवा अधिकारियों को चुनना शुरू किया तो बैंकिंग में रहते हुए सूचना प्रौद्योगिकी, परियोजना प्रबंधन आदि की शिक्षा और अनुभव का अवसर मिला जो अब तक साथ चल रहा है।

पढ़ने लिखने का शौक पुराना था। सम्वाद-वाद-विवाद में पुरस्कार पाना स्कूल में ही शुरू हो गया था। 13-14 साल की आयु में सोचा था कि बड़े होने पर बरेली-बदायूँ मार्ग पर हरियाली के बीच बनाये आधुनिक फ़ार्महाउस से प्रकाशन का व्यवसाय चलाया जायेगा। अनुराग प्रकाशन का उन्हीं दिनों का डिज़ाइन किया लोगो और एकाध नमूना पुस्तकें भी शायद अल्मारी में अभी भी पड़ी हों। माचिस की डिब्बी के आकार की 'मैचबुक्स' का विचार भी तभी-कभी दिमाग़ में कौंधा था। खैर बरेली के दर्शन तो फिर भी हो जाते हैं, बदायूँ तो एकदम से ही पराया हो गया। नसीब अपना-अपना ...  

लेखन-प्रकाशन के सपने देखते हुए, लगभग उन्हीं दिनों में कई कहानियाँ लिख डाली थीं। 1983-84 में एक कहानी का प्लॉट मन में था। 3-4 पन्नों की कहानी बोल-बोलकर कई बार टाइप करवाई लेकिन हिंदी टंकण में हर बार अनेक ग़लतियाँ रह जाती थीं। दशकों बाद जब ब्लॉग पर उसे अनुरागी मन के नाम से धारावाहिक लिखना शुरू किया तो इस बीच के अनेक अनुभवों और उपलब्ध समय ने कथानक को पहले से अधिक रोचक बना दिया था। ब्लॉग नियमित पढ़ने वाले मित्रों को कहानी पसंद आई लेकिन अंतिम कड़ी पर कुछ मित्रों ने उसके दुखांत होने पर शिकायत भी की। कविहृदय मित्र देवेंद्र पाण्डेय ने तो कथा के दुखांत को मेरे पश्चिम में रहने का प्रभाव ही बता दिया। जबकि सच यह है कि कहानी का अंत 1984 में भी यही था। इसमें पूर्व-पश्चिम का कोई चक्कर नहीं था, यूँ ही सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर ही दी जाय।

देवेन्द्र पाण्डेय October 27, 2011 at 4:18 AM
मूड खराब कर दिया आपने तो। ऐसे अंत की उम्मीद नहीं थी। छुट्ठी निकालकर इतमिनान से पढ़ने बैठा था। शेख चिल्ली के मजार से जो उम्मीद बंधी थी यहां आकर तहस-नहस हो गई। ऐसे भी भला कोई अंत करता है! इतनी जल्दी क्या थी? अंततः समाप्त। यह भी कोई बात हुई। ... ... ... पश्चिम में रहकर यही अंत करने की भावना जगी? 
मेरे जीवन की लम्बी यात्रा के अनुरागी मन से ही सम्बंधित एक अल्पांश, जब इस कथा संग्रह को मॉरिशस के महात्मा गांधी संस्थान द्वारा भोपाल में हुए 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में स्थापित किये गये द्वैवार्षिक 'आप्रवासी हिंदी साहित्य सृजन संस्थान' का प्रथम विजेता बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सम्मान मॉरिशस की संसद की स्पीकर शांतिबाई हनुमानजी जीओएसके द्वारा मॉरिशस में आयोजित एक सम्मान में प्रदान किया गया। निम्न विडियो में देखिये मॉरिशस टीवी पर प्रस्तुत इस समारोह की रिपोर्ट की एक झलक और बताइये किस भाषा में क्या कहा गया है:



पितृपक्ष चल रहे हैं। सालभर के कामधंधे और उलझनों के कारण बिसर गये पितरों से वापस जुड़ने का समय है। उन्हीं यादों के बीच ये कुछेक यादें मानो याद दिलाने आईं कि मेरे अपने जीवन पर मेरा कितना कम नियंत्रण रहा है। पितरों के संघर्षों द्वारा संवरी अपनी ज़िंदगी के पुनरावलोकन का समय यह भी विचार करने का है कि हम आने वाली संतति द्वारा कैसे पितरों के रूप में याद किये जायेंगे। उनके लिये हम धरा पर कौन सी विरासत, कैसी धरोहर छोड़कर जायेंगे।

फिर मिलेंगे ब्रेक के बाद

Sunday, July 9, 2017

आह्वान या आवाहन? दोनों का अंतर

हिंदी के बहुत से शब्दों का दुरुपयोग होता है, अक्सर बोलने में उनके मिलते-जुलते होने के कारण। ऐसा ही एक उदाहरण आवाहन और आह्वान का भी है। जैसा कि पहले कह चुका हूँ, हिंदी के बहुत से शब्दों का सत्यानाश आलसी मुद्रकों और अज्ञानी सम्पादकों ने भी किया है। संयुक्ताक्षर को सटीक रूप से अभिव्यक्त करने वाले साँचे के अभाव में वे उन्हें ग़लत लिखते रहे हैं, ह्व, ह्य, ह्र आदि भी कोई अपवाद नहीं। आह्वान का ह्व न होने की स्थिति में वे कभी आहवान तो कभी आवाहन छाप कर काम चला लेते थे। इस शब्द पर लिखने की बात पहले भी कई बार मन में आई लेकिन हर बार किसी अन्य अधिक महत्वपूर्ण प्राथमिकता के कारण पीछे छूट गई। गत एक जुलाई को 'भारतीय नागरिक-Indian Citizen' की पोस्ट पर निम्न प्रश्न देखा तो आज लिखने का योग बना:

प्रश्न: आह्वान और आवाहन दोनों में अंतर है, क्या है मुझे इस समय बड़ा भ्रम है, कृपया बताएँ 

उत्तर: आह्वान एक पुकार, विनती, या ललकार है। मतलब यह कि आह्वान में बोलकर कहना प्रमुख है। जबकि आवाहन में किसी को आमंत्रित करने की क्रिया है। वाहन चलने-चलाने के लिये है, आवागमन का साधन है। आवाहन में आपके देव अपने वाहन से आकर आपके सामने स्थापित होते हैं। जबकि उससे पहले आप उनके आने का आह्वान कर सकते हैं। आह्वान आप देश की जनता का भी कर सकते हैं कि वह भ्रष्टाचार का विरोध करे। आव्हान एक वचन है जबकि आवाहन एक कर्म है। आह्वान में कथन है जबकि आवाहन में विचलन है।

Saturday, February 27, 2016

भूत, पिशाच और राक्षस - देवासुर संग्राम 8



इस शृंखला की पिछली कड़ियों में हमने देव और असुर के सम्बंध को समझने का प्रयास किया, देवताओं के शास्त्रीय लक्षणों की चर्चा की, और सुर और असुर के अंतर की पडताल की है। देव, देवता, और सुर जैसे शब्दों के अर्थ अब स्पष्ट हैं लेकिन लोग अक्सर असुर, दैत्य, दानव, राक्षस और पिशाच आदि शब्दों को समानार्थी मानते हुए जिस प्रकार उनका प्रयोग शैतानी ताकतों के लिये ही करते हैं, वह सही नहीं है। इन सभी शब्दों में सूक्ष्म लेकिन महत्त्वपूर्ण अंतर हैं। असुर शब्द तो सम्माननीय ही है और जैसा कि हमने पिछली कड़ियों में देखा, असुर तो सुरों के पूर्वज ही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सुर असुर की ही एक विकसित शाखा हैं। आइये आगे बढने से पहले आज तीन सम्बंधित शब्दों भूत, पिशाच और राक्षस पर दृष्टिपात करते हैं।

भूत 
सर्वभूत, या पंचभूत जैसे शब्दों में मूलतत्व की भावना छिपी है। संसार में जो कुछ भी दृष्टव्य है वह इन्हीं भूतों से बना है. भौतिक शब्द, भूत से ही सम्बंधित है। शरीर का भौतिक स्वरूप है लेकिन उसमें जीवन का संचरण हमें वास्तविक स्वरूप देता है। प्राणांत के बाद केवल देह यानि भौतिक तत्व अर्थात पंचभूत (या मूलभूत) ही बचते हैं. तो भूत का सामान्य अर्थ मृतक से ही लिया जाना चाहिये। जो अब जीवित नहीं है, वह भूतमात्र रहा है। शायद इसी कारण से केवल प्राणी ही नहीं, काल के प्रयोग में भी भूत अतीत को भी दर्शाता है। वर्तमान से अलग, विगत ही भूत है, जो था परंतु अब नहीं है

पिशाच
अंग्रेज़ी में अतीत के लिये एक शब्द है, पास्ट (past). संस्कृत का पश्च भी उसी का समानार्थी है। भारत को विश्वगुरु कहा जाता है तो उसके पीछे यह भावना है कि भारत ने हज़ारों वर्ष पहले समाज को ऐसे क्रांतिकारी कार्य सफलतापूर्वक कर दिखाये जिन्हें अपनाने के लिये शेष विश्व आज भी संघर्ष कर रहा है। समाज के एक बडे वर्ग को अहिंसक बनाना. कृषिकर्म, शाकाहार की प्रवृत्ति, अग्नि द्वारा अंतिम संस्कार, शर्करा की खोज, लहू में लौह के होने की जानकारी सहित उन्नत धातुकर्म, अंकपद्धति, गणित, तर्क, ज्योतिष, हीरे जैसे रत्न को शेष विश्व से परिचित कराना आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग धरातल पर रखते हैं। स्पष्ट है कि यह समाज अपने समकालीनों से कहीं उन्नत थी। अहिंसक जीवनशैली का प्रकाश आने के बाद भी हमारे आस-पडोस के जो पिछडे समुदाय उस नए क्रांतिकारी दौर को न अपना सके, पिशाच (पश्च past पिछला, पिछड़ा) कहलाए। वैसे ही ‪देवनागरी‬ जैसी उन्नत ‪लिपि‬ के आगमन के समय जो लिपियाँ पश्च (past) हो गईं, ‪पैशाची‬ कहलाईं। कई पैशाची प्रचलन से बाहर हो गईं, कई आज भी मूल/परवर्धित रूप में जीवित हैं। पिशाच या पैशाची कोई भाषा, जाति, नस्ल या क्षेत्र नहीं, पिछडेपन का तत्सम है।

राक्षस
ऋषि पुलस्त्य के दो पौत्र क्रमशः यक्षों व राक्षसों के शासक बने। यक्ष समुदाय भी क्रूर माना गया है परंतु वे अतीव धनवान थे। पूजा-पाठ के अलावा जादू-टोने में विश्वास रखते थे। मनोविलास और पहेलियां पूछना उनका शौक था। सही उत्तर देने पर प्रसन्न होते थे और गलत उत्तर पर क्रूर दण्ड भी देते थे। रक्ष संस्कृति यक्ष संस्कृति से कई मायनों में भिन्न थी। जहाँ यक्ष अक्सर एकाकी भ्रमण के किस्सों में मिलते हैं वहीं रक्ष समूहों में आते हैं। यक्ष मानव समाज में मिलने में कठिनाई नहीं पाते वहीं रक्षगण युद्धप्रिय हैं। यक्षों के आदर्शवाक्य वयम् यक्षामः की तर्ज़ पर राक्षसों का आदर्श वाक्य वयम् रक्षामः था, जोकि उनके बारे में काफ़ी कुछ कह जाता है। वयं रक्षामः से तात्पर्य यही है कि वे अपनी रक्षा स्वयं अपने बलबूते पर करने का दावा कर रहे हैं। वे किसी दैवी सहारे की आवश्यकता नहीं समझते, और वे भौतिक बल को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। राक्षसी विचारधारा के कई समूह रहे होंगे लेकिन ब्राह्मण पिता और दैत्य माता की संतति राक्षसराज रावण द्वारा अपने लंकाधिपति भाई कुबेर से हथियाये लंका में शासित वर्ग सबसे प्रसिद्ध राक्षस समूह बना।

[क्रमशः]

Saturday, October 17, 2015

अंगूठाटेक हस्ताक्षर की भाषा - हिन्दी विमर्श

भारत वैविध्य से भरा देश है। अन्य विविधताओं के साथ-साथ यहाँ भाषाई व लिपिक विविधता भी प्रचुर है। विभिन्न भाषाओं के सक्रियतावादी अपने-अपने उद्देश्यों के लिए समय-समय पर बहुत से काम करते रहते हैं। तमिलनाडु में हिन्दी के नामपट्टों पर कालिख पोतने का आंदोलन भी एक समय में फैशन में रहा था, यद्यपि आज उसका कोई जनाधार नहीं है। अपनी-अपनी भाषा या बोली को संविधान में राष्ट्रीय भाषा के रूप में या अपने राज्य की एक राज्यभाषा के रूप में मान्यता दिलाने के आंदोलन भी चलते रहते हैं। इसी प्रकार कई सरकारी कार्यालय हिन्दी पखवाड़े में हिन्दी हस्ताक्षर अभियान भी चलाते हैं।

सं. रा. अमेरिका के निधि-सचिव जेकब जोसेफ ल्यू के आधिकारिक हस्ताक्षर 
हस्ताक्षर या दस्तख़त किसी व्यक्ति द्वारा किसी विशिष्ट शैली में बनाई हुई प्रामाणिक पहचान और आशय का प्रतीक है। यह उसका लिखा हुआ नाम, उपनाम, चिह्न, प्रतीक, रेखाचित्र या कुछ भी हो सकता हैं। किसी प्रपत्र पर किया हस्ताक्षर उस प्रपत्र को प्रमाणिक बनाता है। हस्ताक्षर किसी भी ज्ञात या अज्ञात लिपि में किया जा सकता है। यदि व्यक्ति हस्ताक्षर करने में सक्षम न हो तो अंगूठे का निशान लगाने के विकल्प को वैश्विक स्वीकृति है।

प्राचीन काल में भारतीय समाज में मुद्रिका चिह्न लगाने की प्रथा थी। आज भी कितने राजकीय, न्यायिक व शैक्षिक दस्तावेजों में मुद्रिका (seal) का प्रयोग होता है जो किसी भी लिपि, शब्द, संकेत, चिह्न, चित्र या कला या इनके संयोजन से बने हुए हो सकते हैं। कम आधिकारिक महत्व के कागजों पर किए जाने वाले हस्ताक्षर के लघु रूप को मज़ाक में हम लोग चिड़िया उड़ाना कहते थे।

आधिकारिक प्रपत्र पर किए जाने वाले हस्ताक्षर के साथ साथ हस्ताक्षरकर्ता का पूरा नाम, पद आदि भी अक्सर प्रपत्र में प्रयुक्त लिपि में लिखा जाता है, यद्यपि ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। हस्ताक्षर के अलावा पहले कागज पर एम्बोसिंग का प्रयोग भी होता था। फिर हाल-फिलहाल तक रबर स्टेम्प का भी काफी प्रचालन रहा। जापान में छोटे और सामान्यतः गोलाकार मुद्रिकाओं का प्रयोग आज भी होता है जिन्हें लोग साथ लेकर चलते हैं और हस्ताक्षर की जगह प्रयोग में लाते हैं।

भारत में लंबे समय तक बैंक की नौकरी में अन्य अधिकारियों की तरह मुझे भी अपने हस्ताक्षरों के अधीन बहुत से आधिकारिक लेन-देन निबटाने पड़ते थे। ये कागज बैंक की हजारों शाखाओं और कार्यालयों में जाते थे, कई बार बैंक की परिधि के बाहर देश-विदेश स्थित अन्य बैंकों, ग्राहकों और न्यायालय आदि में भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे। हस्ताक्षर की प्रामाणिकता के लिए सक्षम अधिकारियों के हस्ताक्षर का एक नमूना लेकर उसे एक विशिष्ट कूट संख्या देकर सभी शाखाओं को उपलब्ध कराया जाता था और न्यायिक वाद की स्थिति में उसी मोल नमूने से पहचान कराकर सत्यापन होता था। धोखाधड़ी आदि के कितने ही मामलों की जांच इसी आधार पर निर्णीत हुई हैं कि हस्ताक्षर बैंक में सुरक्शित रखे गए नमूने से मिलते हैं या नहीं। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि प्रपत्र किस भाषा या लिपि में लिखित या टंकित है। हस्ताक्षर को बिलकुल वैसा ही होना चाहिए जैसा कि नमूने में अंकित हो।

एक जापानी हस्ताक्षर इंका 
दिल्ली की एक विशालकाय शाखा में जब मैं हिन्दी या अङ्ग्रेज़ी में बने डिमांड ड्राफ्ट बनाता था तो उनपर भी अपने प्रामाणिक हस्ताक्षर ही अंकित करता था क्योंकि भाषा या लिपि (या अपने मूड, आलस या सनक) के हिसाब से हस्ताक्षर बदले नहीं जा सकते। ऐसा करना न केवल उनकी प्रामाणिकता को नष्ट करता बल्कि अफरा-तफरी का माहौल भी पैदा करता क्योंकि यह डिमांड ड्राफ्ट जिस शाखा में भी भुनाने के लिए प्रस्तुत होता वहाँ उसकी प्रामाणिकता का सत्यापन जारीकर्ता के हस्ताक्षरों की उस शाखा में सुरक्षित रखे आधिकारिक नमूने से मिलान करके ही किया जाता। बैंक अधिकारी ही नहीं, बैंक के ग्राहकों के लिए भी यही नियम लागू रहे हैं। ये संभव है कि ग्राहक अपना चेक आदि देवनागरी, रोमन या किसी अन्य मान्यता प्राप्त लिपि या भाषा में तैयार करें लेकिन उस पर उनका हस्ताक्षर नमूने के हस्ताक्षर जैसा ही होना चाहिए। जहां ज़रूरत पड़ी बैंक-कर्म से संबन्धित नेगोशिएबल इन्स्ट्रूमेंट एक्ट (Negotiable Instrument Act) को भी मैंने सदा इसी पक्ष में खड़ा पाया।

कंप्यूटर युग ने हस्ताक्षर को एक और कूटरूप प्रदान किया है जो आपके कंप्यूटर के पहचान अंक, आपका ईमेल पता या संख्याओं या अक्षरों का ऐसा कोई संयोग हो सकता है जिसे केवल आप ही जान सकें। किसी इलेक्ट्रोनिक करार पर हस्ताक्षर करने के बजाय आपको अपनी जन्मतिथि, पिनकोड संख्या और मकान नंबर को एक ही क्रम में लिखने को कहा जा सकता है। इस नए आंकिक या गणितीय हस्ताक्षर को डिजिटल या इलेक्ट्रोनिक सिग्नेचर कहा जाता है।

अंगूठा टेकने से लेकर, राजमुद्रा तक होते हुए आंकिक कूटचिह्न तक पहुंची इस यात्रा में, समझने की बात इतनी ही है कि हस्ताक्षर का उद्देश्य किसी भाषा या लिपि का प्रचार या विरोध नहीं बल्कि एक कानूनी पहचान का सत्यापन मात्र है। यह लिपि से स्वतंत्र एक प्रतीक चिह्न है। नाम किसी लिपि (भाषा नहीं,लिपि) में लिखा जाता है, हस्ताक्षर को ऐसी बाध्यता नहीं है। हस्ताक्षर का उद्देश्य अभिव्यक्ति नहीं, पहचान और आशय की स्थापना या/और सत्यापन है। व्याकरण, लिपि या भाषा का विषय नहीं विधिक विषय है और बुद्धिमता इसे वहीं रहने देने में ही है।

Monday, September 14, 2015

श और ष का अंतर


हिन्दी दिवस पर बधाई और मंगलकामनायें !
भारतीय भाषाओं में कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जिनके आंचलिक उच्चारण कालांतर में मूल से छिटक गए हैं। कुछ समय के साथ लुप्तप्राय हो गए, कुछ बहस का मुद्दा बने और कुछ मिलती-जुलती ध्वनि के भ्रम में फंस गए। उच्चारण के विषय में इस प्रकार की दुविधा को देखते हुए इस ब्लॉग पर तीन आलेख पहले लिखे जा चुके हैं (अ से ज्ञ तक, लिपियाँ और कमियाँ, और उच्चारण ऋ का)। आज हिन्दी दिवस पर इसी शृंखला में एक और बड़े भ्रम पर बात करना स्वाभाविक ही है। यह भ्रम है श और ष के बीच का।

भारतीय वाक् में ध्वनियों को जिस प्रकार मुखस्थान या बोलने की सुविधा के हिसाब से बांटा गया है उससे इस विषय में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए परंतु हमारे हिन्दी शिक्षण में जिस प्रकार वैज्ञानिकता के अभाव के साथ-साथ तथाकथित विद्वानों द्वारा परंपरा के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है उससे ऐसे भ्रम पैदा होना और बढ़ना लाज़मी है।

आरंभ "श" से करते हैं। श की ध्वनि सरल है। आमतौर पर विभिन्न भाषाओं में और भाषाओं से इतर आप श (SH) जैसी जो ध्वनि बोलते सुनते हैं वह श है। यदि आज तक आप श और ष को एक जैसे ही बोलते रहे हैं तो यक़ीन मानिए आप श की ध्वनि को एकदम सही बोलते रहे हैं, अलबत्ता ष का कबाड़ा ज़रूर करते रहे हैं। ओंठों को खोलकर, दंतपंक्तियों को निकट लाकर, या चिपकाकर, जीभ आगे की ओर करके हवा मुँह से बाहर फेंकते हुये श आराम से कहा जा सकता है। श बोलते समय जीभ का स्थान स से थोड़ा सा ऊपर है। वस्तुतः यह एक तालव्य ध्वनि है और इसके बोलने का तरीका तालव्य व्यंजनों (चवर्ग) जैसा ही है। इसमें कुछ विशेष नहीं है।

अब आते हैं ष पर। जहाँ श तालव्य है, ष एक मूर्धन्य ध्वनि है। कई शब्दों में आम वक्ता द्वारा "श" जैसे बोलने के अलावा कुछ भाषाई क्षेत्रों में इसे "ख" जैसे भी बोला जाता है। अगर स और श से तुलना करें तो ष बोलने के लिए जीभ की स्थिति श से भी ऊपर होती है। बात आसान करने के लिए यहाँ मैं बाहर से आई एक ध्वनि को भी इस वर्णक्रम के बीच में जोड़ कर इन सभी ध्वनियों को जीभ की स्थिति नीचे से उठकर उत्तरोत्तर ऊपर होते जाने के क्रम में रख रहा हूँ

स (s) => श (sh) => ज़ (z) => ष (?)

कहते समय क्षैतिज (दंत्य) रहा जीभ का ऊपरी सिरा कहने तक लगभग ऊर्ध्वाधर (मूर्धन्य) हो जाता है। इन दोनों ध्वनियों के बीच की तालव्य ध्वनि आती है। शब्दों में के प्रयोग का त्वरित अवलोकन इसे और सरल कर सकता है। आइये ऐसे कुछ शब्दों पर नज़र डालें जिनमें का प्रयोग हुआ है -

विष्णु, जिष्णु, षण्मुख, दूषण, ऋषि, षड, षडयंत्र, षोडशी, षडानन, षट्‌कोण, चतुष्कोण, झष, श्रेष्ठ, कोष्ठ, पुष्कर, कृषि, आकर्षण, कष्ट, चेष्टा, राष्ट्र, संघर्ष, ज्योतिष, धनिष्ठा, निरामिष, पोषण, शोषण, भाषा, परिषद, विशेष

संस्कृत वाक् में ध्वनियों को सहज बनाने का प्रयास तो है ही, उनके मामूली अंतर को भी प्रयोग के आधार पर चिन्हित किया गया है। यद्यपि उपरोक्त अधिकांश शब्दों में ष को श से प्रतिस्थापित करना आसान है लेकिन आरंभ के शब्दों में यदि आप यह प्रतिस्थापन करेंगे तो आप शब्द को प्रवाह से नहीं बोल सकते। यदि अंतर अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है तो निम्न दो शब्दों को प्रवाह से बोलकर देखिये और उनमें आने वाली SH की ध्वनि (और जिह्वा की स्थिति) के अंतर को पकड़िए -

विष्णु और विश्नु या विष्णु और विश्ड़ु

मूर्धन्य स्वर ऋ तथा मूर्धन्य व्यंजनों र, ट, ठ, ड, ढ, ण के साथ ‘ष’ की उपस्थिति सहज और स्वाभाविक है। ण के साथ तो ष का चोली-दामन का साथ है। इसके अतिरिक्त अवसरानुकूल अन्य वर्गों के वर्णों (उपरोक्त उदाहरणों में क, घ, त आदि) के साथ भी प्रयुक्त किया जा सकता है। एक बार फिर एक सरल सूत्र -
स - दंत्य
श - तालव्य
ष - मूर्धन्य

क्या भाषा/लिपि पढ़ाते समय इन ध्वनियों को अंत में एक साथ समूहित करने के बजाय संबन्धित व्यंजनों के साथ पढ़ाया जाना चाहिए ताकि गलतियों को रोका जा सके? 
* हिन्दी, देवनागरी भाषा, उच्चारण, लिपि, व्याकरण विमर्श *
अ से ज्ञ तक
लिपियाँ और कमियाँ
उच्चारण ऋ का
लोगो नहीं, लोगों
श और ष का अंतर

Thursday, February 19, 2015

लोगो नहीं, लोगों - हिन्दी व्याकरण विमर्श


मेरे पास आओ, मेरे दोस्तों - बहुवचन सम्बोधन में अनुस्वार का प्रयोग व्याकरणसम्मत है

हिन्दी बहुवचन सम्बोधन और अनुस्वार
अनुस्वार सम्बोधन, राजभाषा विभाग के एक प्रकाशन से
इन्टरनेट पर कई जगह यह प्रश्न देखने में आता है कि बच्चा का बहुवचन बच्चों होगा या बच्चो। इसी प्रकार कहीं दोस्तों और दोस्तो के अंतर के बारे में भी हिन्दी, हिन्दुस्तानी, उर्दू मंडलों में चर्चा सुनाई देती है। शायद कभी आप का सामना भी इस प्रश्न से हुआ होगा। जब कोई आपको यह बताता है कि जिन शब्दों को आप सदा प्रयोग करते आए हैं, वे व्याकरण के किसी नियम के हिसाब से गलत हैं तो आप तुरंत ही अपनी गलती सुधारने के प्रयास आरंभ कर देते हैं।

सुनने में आया कि आकाशवाणी के कुछ केन्द्रों पर नए आने वाले उद्घोषकों को ऐसा बताया जाता है कि किसी शब्द के बहुवचन में अनुस्वार होने के बावजूद उसी शब्द के संबोधन में बहुवचन में अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है। इन्टरनेट पर ढूंढने पर कई जगह इस नियम का आग्रह पढ़ने को मिला। इस आग्रह के अनुसार "ऐ मेरे वतन के लोगों" तथा "यारों, सब दुआ करो" जैसे प्रयोग तो गलत हुए ही "बहनों और भाइयों" या "देवियों, सज्जनों" आदि जैसे आम सम्बोधन भी गलत कहे जाते हैं।

बरसों से न, न करते हुए भी पिछले दिनों अंततः मुझे भी इसी विषय पर एक चर्चा में भाग लेना पड़ा तो हिन्दी व्याकरण के बारे में बहुत सी नई बातें सामने आईं। आज वही सब अवलोकन आपके सामने प्रस्तुत हैं। मेरा पक्ष स्पष्ट है, मैं अनुस्वार हटाने के आग्रह को अनुपयोगी और अनर्थकारी समझता हूँ। आपके पक्ष का निर्णय आपके विवेक पर छोडता हूँ।
1) 19 वीं शताब्दी की हिन्दी और हिन्दुस्तानी व्याकरण की कुछ पुस्तकों में बहुवचन सम्बोधन के अनुस्वाररहित होने की बात कही गई है। मतलब यह कि किसी को सम्बोधित करते समय लोगों की जगह लोगो, माँओं की जगह माँओ, कूपों की जगह कूपो, देवों की जगह देवो के प्रयोग का आग्रह है।    
2) कुछ आधुनिक पुस्तकों और पत्रों में भी यह आग्रह (या नियम) इसके उद्गम, कारण, प्रचलन या परंपरा की पड़ताल किए बिना यथावत दोहरा दिया गया है।
ऐ मेरे वतन के लोगो (logo)

3) हिन्दी व्याकरण की अधिसंख्य पुस्तकों में ऐसे किसी नियम का ज़िक्र नहीं है अर्थात बहुवचन के सामान्य स्वरूप (अनुस्वार सहित) का प्रयोग स्वीकार्य है।

4) जिन पुस्तकों में इस नियम का आग्रह है, वे भी इसके उद्गम, कारण और लाभ के बारे में मूक है।

5) भारत सरकार के राजभाषा विभाग सहित अधिकांश प्रकाशन ऐसे किसी नियम या आग्रह का ज़िक्र नहीं करते हैं।

6) हिन्दी उर्दू के गीतों को आदर्श इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उनमें गलत उच्चारण सुनाई देने की घटनाएँ किसी सामान्य श्रोता के अनुमान से कहीं अधिक हैं। एक ही गीत में एक ही शब्द दो बार गाये जाने पर अलग-अलग सुनाई देता है। हमें, तुम्हें, उन्होंने आदि जैसे सामान्य शब्दों से भी अक्सर अनुस्वार गायब लगते हैं।

7) ध्यान से सुनने पर कुछ अहिंदीभाषी गायक तो अनुस्वार को नियमित रूप से अनदेखा करते पाये गए हैं। यद्यपि कुछ गीतों में में ये माइक्रोफोन द्वारा छूटा या संगीत द्वारा छिपा हुआ भी हो सकता है। पंकज उधास और येसूदास जैसे प्रसिद्ध गायक भी लगभग हर गीत में मैं की जगह मै या मय कहते हैं।  
आकाशवाणी के कार्यक्रम "आओ बच्चों" की आधिकारिक वर्तनी

8) मुहम्मद रफी और मुकेश बहुवचन सम्बोधन में कहीं भी अनुस्वार का प्रयोग करते नहीं सुनाई देते हैं। अन्य गायकों पर असहमतियाँ हैं। मसलन, किशोर "कुछ ना पूछो यारों, दिल का हाल बुरा होता है" गाते हैं तो दोनों बार अनुस्वार एकदम स्पष्ट है। अमिताभ बच्चन भी आम हिंदीभाषियों की तरह बहुवचन सम्बोधन में भी सदा अनुस्वार का प्रयोग करते पाये गए हैं।

9) ऐ मेरे वतन के लोगों गीत की इन्टरनेट उपस्थिति में बहुवचन सम्बोधन शब्द लोगों लगभग 16,000 स्थानों में अनुस्वार के साथ और लगभग 4,000 स्थानों में अनुस्वार के बिना है। सभी प्रतिष्ठित समाचारपत्रों सहित भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट में भी "ऐ मेरे वतन के लोगों" ही छपा है। लता मंगेशकर के गायन में भी अनुस्वार सुनाई देता है।

11) rekhta.org और बीबीसी उर्दू जैसी उर्दू साइटों पर सम्बोधन को अनुस्वार रहित रखने के उदाहरण मिलते हैं।

अनुस्वार हटाने से बने अवांछित परिणामों के कुछ उदाहरण - देखिये अर्थ का अनर्थ:
  1. लोटों, यहाँ मत लोटो (सही) तथा लोटो, यहाँ मत लोटो (भ्रामक - लोटो या मत लोटो? लोटा पात्र की जगह भूमि पर लोटने या न लोटने की दुविधा) 
  2. भेड़ों, कपाट मत भेड़ो (सही) तथा भेड़ो, कपाट मत भेड़ो (भ्रामक - भेड़ों का कोई ज़िक्र ही नहीं?)
  3. बसों, यहाँ मत बसो (सही) तथा बसो, यहाँ मत बसो (भ्रामक - बस वाहन का ज़िक्र ही नहीं बचा, बसो या न बसो की गफ़लत अवश्य आ गई?)
  4. ऐ मेरे वतन के लोगों (देशवासी) तथा ऐ मेरे वतन के लोगो (देश का प्रतीकचिन्ह, अशोक की लाट)
उपरोक्त उदाहरणों में 1, 2 व 3 में लोटे, भेड़ और बस को बहुवचन में सम्बोधित करते समय यदि आप अनुस्वार हटा देंगे तो आपके आशय में अवांछित ही आ गए विरोधाभास के कारण वाक्य निरर्थक हो जाएँगे। साथ ही लोटों, भेड़ों और बसों के संदर्भ भी अस्पष्ट (या गायब) हो जाएँगे। इसी प्रकार चौथे उदाहरण में भी अनुस्वार लगाने या हटाने से वाक्य का अर्थ बदल जा रहा है। मैंने आपके सामने तीन शब्दों के उदाहरण रखे हैं। ध्यान देने पर ऐसे अनेक शब्द मिल सकते हैं जहाँ अनुस्वार हटाना अर्थ का अनर्थ कर सकता है।
10) कवि प्रदीप के प्रसिद्ध गीत "इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के" गीत के अनुस्वार सहित उदाहरण कवि प्रदीप फाउंडेशन के शिलापट्ट तथा अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों पर हैं जबकि अधिकांश अनुस्वाररहित उदाहरण फेसबुक, यूट्यूब या अन्य व्यक्तिगत और अप्रामाणिक पृष्ठों पर हैं।
ऐ मेरे वतन के लोगों - टिकट पर अनुस्वार है

12) इस विषय पर छिटपुट चर्चायें हुई हैं। इस नियम (या आग्रह) के पक्षधर, बहुसंख्यक जनता द्वारा इसके पालन न करने को प्रचलित भूल (ग़लतुल-आम) बताते हैं।

13) अर्थ का अनर्थ होने के अलावा इस पूर्णतः अनुपयोगी आग्रह/नियम के औचित्य पर कई सवाल उठते हैं, यथा, "ऐ दिले नादाँ ..." और "दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है" जैसी रचनाओं में एकवचन में भी अनुस्वार हटाया नहीं जाता तो फिर जिस बहुवचन में अनुस्वार सदा होता है उससे हटाने का आग्रह क्योंकर हो?

14) अनुस्वार हटाकर बहुवचन का एक नया रूप बनाने के आग्रह को मैं हिन्दी के अथाह सागर का एक क्षेत्रीय रूपांतर मानता हूँ और अन्य अनेक स्थानीय व क्षेत्रीय रूपांतरों की तरह इसके आधार पर अन्य/भिन्न प्रचलित परम्पराओं को गलत ठहराए जाने का विरोधी हूँ। हिंदी मातृभाषियों का बहुमत बहुवचन में सदा अनुस्वार का प्रयोग स्वाभाविक रूप से करता रहा है।

15) भारोपीय मूल की अन्य भाषाओं में भी ऐसा कोई आग्रह नहीं है। उदाहरण के लिए अङ्ग्रेज़ी में boy का बहुवचन boys होता है तो सम्बोधन में भी वह boys ही रहता है। सम्बोधन की स्थिति में boys के अंत से s हटाने या उसका रूपांतर करने जैसा कोई नियम वहाँ नहीं है, उसकी ज़रूरत ही नहीं है। ज़रूरत हिंदी में भी नहीं है।

16) इस नियम (या आग्रह) से अपरिचित जन और इसके विरोधी, इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एक आपत्ति यह रखते हैं कि इस नियम के कारण एक ही शब्द के दो बहुवचन संस्करण बन जाएँगे जो अनावश्यक तो हैं ही, कई बार भिन्न अर्थ वाले समान शब्द होने के कारण अर्थ का अनर्थ करने की क्षमता भी रखते हैं। उदाहरणार्थ बिना अनुस्वार के "ऐ मेरे वतन के लोगो" कहने से अशोक की लाट (भारत का लोगो) को संबोधित करना भी समझा जा सकता है जबकि लोगों कहने से लोग का बहुवचन स्पष्ट होता है और किसी भी भ्रांति से भली-भांति बचा जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि हिन्दी के बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने का आग्रह एक फिजूल की बंदिश से अधिक कुछ भी नहीं। कुछ पुस्तकों में इसका ज़िक्र अवश्य है और हिन्दुस्तानी के प्रयोगकर्ताओं का एक वर्ग इसका पालन भी करता है। साथ ही यह भी सच है कि हिंदीभाषियों और व्याकरणकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसे किसी आग्रह को जानता तक नहीं है, मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इस आग्रह का कारण और उद्गम भी अज्ञात है। इसके प्रायोजक, प्रस्तोता और पालनकर्ता और पढने के बाद इसे दोहराने वाले, इसके उद्गम के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। संभावना है कि हिन्दी की किसी बोली, संभवतः लश्करी उर्दू या क्षेत्र विशेष में इसका प्रचालन रहा है और उस बोली या क्षेत्र के लोग इसका प्रयोग और प्रसार एक परिपाटी की तरह करते रहे हैं। स्पष्टतः इस आग्रह के पालन से हिन्दी भाषा या व्याकरण में कोई मूल्य संवर्धन नहीं होता है। इस आग्रह से कोई लाभ नहीं दिखता है, अलबत्ता भ्रांति की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी भ्रांतियों के कुछ उदाहरण इस आलेख में पहले दिखाये जा चुके हैं।
कुछ समय से यह बहस सुनता आया हूँ, फिर भी इस पर कभी लिखा नहीं क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन अब जब इस हानिप्रद आग्रह के पक्ष में लिखे हुए छिटपुट उदाहरण सबूत के तौर पर पेश किए जाते देखता हूँ और इस आग्रह का ज़िक्र न करने वाली पुस्तकों को सबूत का अभाव माना जाता देखता हूँ तो लगता है कि शांति के स्थान पर नकार का एक स्वर भी आवश्यक है ताकि इन्टरनेट पर इस भाषाई दुविधा के बारे में जानकारी खोजने वालों को दूसरा पक्ष भी दिख सके, शांति का स्वर सुनाई दे। इस विषय पर आपके अनुभव, टिप्पणियों और विचारों का स्वागत है। यदि आपको बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने में कोई लाभ नज़र आता है तो कृपया उससे अवगत अवश्य कराएं। धन्यवाद!

ऐ मेरे वतन के लोगों - लता मंगेशकर का स्वर, कवि प्रदीप की रचना

* हिन्दी, देवनागरी भाषा, उच्चारण, लिपि, व्याकरण विमर्श *
अ से ज्ञ तक
लिपियाँ और कमियाँ
उच्चारण ऋ का
लोगो नहीं, लोगों
श और ष का अंतर

Sunday, July 6, 2014

ऋषियों का अमृत - उच्चारण ऋ का

स्वर स्वतंत्र हैं
ॐ अ आ इ ई उ ऊ ॠ ऌ ॡ ऎ ए ऐ ऒ ऑ ओ औ अं अः

लिपियाँ और कमियाँ लिखने के बाद इतनी जल्दी इस विषय पर और लिखना होगा यह सोचा नहीं था। भगवान भला करें आचार्य गिरिजेश राव और जिज्ञासु शिल्पा मेहता का, कि उच्चारण का एक संदर्भ आया और एक इस आलेख को मौका मिला। भारत की क्षमता, संभावना, इतिहास को मद्देनजर रखते हुए जब सद्य-भूत, वर्तमान और निकट भविष्य को देखते हैं तो यह आश्चर्यजनक लगता है कि संसार को अंकशास्त्र, योग, अहिंसा, संस्कृति, नागरी और संस्कृत देने वाले लोग आधुनिक भारतीयों के ही पूर्वज थे। भाषा और लिपि की बाबत मानवता काफी अनम्य रही है लेकिन भारत इस मामले में भी एक महासागर है। तो भी आज अपने ही शब्दों के उच्चारण के बारे में हम हद दर्जे के आलसी नज़र आते हैं। औरों की क्या कहूँ, मुझे खुद भी वर्ष की जगह बरस कहना सरल लगता है। एक पुरानी कविता में मैंने सरबस शब्द का प्रयोग किया था, जब एक प्रसिद्ध संपादिका जी ने कुछ पूछे-गछे बिना उसे सर्वस्व कर दिया तो मुझे ऐसा लगा जैसे उन्होने उस कविता का नहीं, बल्कि मेरा गला मरोड़ दिया था। भले ही उनकी विद्वता के हिसाब से उनका कृत्य सही रहा हो।

व्यंजन ज्ञ के उच्चारण का झमेला तो देश-व्यापी है लेकिन एक स्वर भी ऐसा है जिस पर आम सहमति बनती नहीं दिखती। इन्टरनेट पर उसे समझाने के कई उदाहरण उपस्थित हैं जिनमें से अधिकांश गलत ही लगते हैं। यह स्वर है , और सबसे अधिक गलत उच्चारण रि और रु के बीच झूलते दिखते हैं कृष्ण जी कहीं क्रिश्न जैसे लगते हैं और कहीं क्रुश्न हो जाते हैं। लगभग यही गति अमृत की भी होती है। संयोग से इस क्रम की पिछली पोस्ट "लिपियाँ और कमियाँ" मेँ “र्“ व्यञ्जन के असामान्य व्यवहार की बात चलाने पर र्यूरी/ॠयूरी और र्याल्/र्‍याल् जैसे शब्दों का का ज़िक्र आया था। आज उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

स्वर की बात करने से पहले एक नज़र स्वर और व्यंजन के मूलभूत अंतर पर डालते चलें। सामान्य अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के अनुसार स्वर वे हैं जिन्हें मुखर पथ (vocal tract) से निर्बाध रूप से निरंतरता के साथ बोला जा सकता है। स्वर में एक नैसर्गिक गेयता है, शायद इसीलिए संगीत स्वरों से बनता है। एक स्वर से दूसरे में संक्रमण स्वाभाविक है। व्यंजनों के साथ ऐसा संभव नहीं है क्योंकि वे बलाघात से बोले जाते हैं और इसलिए वहाँ एक स्थिरता है जो एक व्यंजन की ध्वनि को दूसरे से अलग करती है। सरल शब्दों में कहें तो स्वरों के लिए केवल वायु प्रवाह चाहिए। स्वर को एक बार बोलने के बाद उसे वायु प्रवाह के साथ न केवल जारी रखा जा सकता है बल्कि वायु प्रवाह की दिशा या मात्रा बदलने भर से ही एक स्वर से दूसरे स्वर में निर्बाध गमन संभव है। जबकि व्यंजन का आरंभ और अंत मर्यादित है इसलिए एक व्यंजन से दूसरे में गमन भी लगभग वैसे ही है जैसे किसी दरवाजे से होकर एक कक्ष से दूसरे में प्रस्थान करना। यह बात और है कि अनेक ध्वनियाँ स्वर और व्यंजन की संधि पर खड़ी हैं।

ध्वनियों को पढ़कर समझना आसान नहीं है लेकिन ऋ के उच्चारण को जैसा मैंने समझा है वैसा, लिखकर बताने का प्रयास करता हूँ। प्रयास कितना सफल होता है, यह तो आप ही तय कर पाएंगे।
  1. सबसे पहले दो तीन बार स्पष्ट रूप से "र" बोलिए और देखिये किस प्रकार जीभ ने ऊपरी दाँत के ऊपरी भाग को छुआ।
  2. मुँह से हवा निकालते हुए स्वर "उ" की ध्वनि लगातार निकालें और जीभ की इस स्थिति को ध्यान में रखें।
  3. "उ" कहते कहते ही जीभ के सिरे को हल्का सा ऊपर करके निर्बाध "ऊ" कहने लगें।
  4. "ऊ" कहते-कहते ही जीभ के सिरे को हल्के से ऊपर तालू की ओर तब तक ले जाते जाएँ जब तक बाहर आती हवा जीभ से टकराकर प्रतिरोध की ध्वनि उत्पन्न न करे।
  5. जीभ को थोड़ा समायोजित करके वहाँ रखें जहाँ यह निरंतर ध्वनि RRRRRRR जैसी हो जाये
  6. यदि आप अब तक इस "ऋ" ध्वनि को सुनकर "र" से उसके भेद को पहचान गए तो काफी है, वरना अगले कदम पर चलते हैं।
  7. र की ध्वनि पर बिना अटके, झटके से हृषिकेश या हृतिक बोलिए, और उसे सुनते समय आरंभिक "ह" को इगनोर कर आगे की ध्वनि सुनिये तब भी शायद ऋ की ध्वनि स्पष्ट हो जाये
  8. अगर आप अभी भी अटके हैं तो यकीन मानिए यह ध्वनि आप अङ्ग्रेज़ी द्वारा बेहतर समझ पाएंगे। इंगलिश बोलने वाले लोग अपने शब्दों के बीच में आए "र" को अक्सर अर्ध-मूक सा बोलते हैं जिसे बोलते समय जीभ दाँत, तालू आदि की ओर आए बिना हवा में स्वतंत्र ही रह जाती है। कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ।
  9. कुछ लोग अङ्ग्रेज़ी शब्द party को पा.र.टी कहकर र को स्पष्ट कहते हैं जबकि कुछ लोग उसे "पा अ टी" जैसे बोलते हैं। इसी प्रकार अङ्ग्रेज़ी शब्द morning को कई भारतीय "र" के साथ मॉ.र.निंग जैसे कहते हैं जबकि कुछ लोग ऐसे कहते हैं कि वह कुछ कुछ मॉण्णिंग या मॉर्णिंग जैसा लगता है। दोनों ही शब्दों को बाद वाली ध्वनि में बोलते हुए सुनिए और उपरोक्त पांचवें बिन्दु की निरंतर RRRRRRR ध्वनि से साम्य देखने - लाने का प्रयास कीजिये।
  10. अब उन शब्दों का उच्चारण करें जिनमें ऋ बीच में आती है, या संधि होकर अर्ध र जैसी बनती है, यथा - अमृत, मृत, महर्षि और राजर्षि आदि - ध्यान रहे कि ऋ की ध्वनि सुनने में "र" और "अ" के बीच की होगी और उस समय जीभ हवा में स्वतंत्र होगी।
  11. यदि किसी को आकाशवाणी समाचार पर श्री बरुन हलदर द्वारा पढ़ा जाता "द न्यूज व्येड/उएड बाय बोरेन हाल्डा" जैसा कुछ याद हो तो मुझे लगता है कि उनके कहे "रैड बाय" की ध्वनि में र नहीं "ऋ" जैसा ही कुछ होता था। क्या कोई उनकी किसी ऑडियो क्लिप को ढूंढ सकता है?
  12. नीचे दिये वीडियो क्लिप में अङ्ग्रेज़ी शब्द read के ऐसे दो उच्चारण सुनाई दे रहे हैं, जिन्हें हम हिन्दी में रीड और रैड जैसे लिखते हैं। पहचानने का प्रयास कीजिये कि "र" की ध्वनि हमारे "र" वाले किसी शब्द, जैसे "राम" या "रीमा" आदि से कितनी अलग है। नोटिस कीजिये कि R की ध्वनि कहने में जीभ हवा में है, "र" जैसे प्रहारावस्था में नहीं। यह उच्चारण निरंतरता के मामले में र की अपेक्षा ऋ के निकट है



यदि अभी भी अस्पष्टता है लेकिन अधैर्य नहीं, तो फिर खास आपके लिए है हिन्दी की यह ऑडियो क्लिप। सुनिए (विशेषकर जब RRRRRRRRRR बोला जा रहा है) और अपना फीडबैक दीजिये:

ऋ - डाउनलोड ऑडियो क्लिप

नोट: अपनी ही ऑडियो क्लिप स्वयं सुनने के बाद मुझे अब इस बात पर संशय है कि ऐसी ध्वनियों को केवल ऑडियो के माध्यम से समझाया जा सकता है। फोन पर अक्सर "स" और "फ" की ध्वनियाँ एक सी ही सुनाई देती हैं। इसलिए यदि अभी भी बात स्पष्ट न हो पाई हो तो कमी आपके समझने की नहीं, शायद मेरे समझाने की ही है जो कि व्यक्तिगत कक्षा में आसानी से दूर की जा सकती है।
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श और ष का अंतर

Saturday, June 28, 2014

लिपियाँ और कमियाँ



स्वर
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ऎ ए ऐ ऒ ऑ ओ औ अं अः

व्यञ्जन
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल ळ व श ष स ह
क्ष त्र ज्ञ श्र क़ ख़ ग़ ज़ ड़ ढ़ फ़

मात्रायें व चिह्न
फिर कभी

सम्प्रेषण का एक माध्यम ही तो है लिपि। ध्वनियों को, संवाद, विचार, कथ्य, तथ्य, समाचार और साहित्य को रिकार्ड करने का एक प्रयास ताकि वह सुरक्षित रहे, देश-काल की सीमाओं से परे संप्रेषित हो सके। समय के साथ लिपियाँ बनती बिगड़ती रही हैं। कुछ प्रसारित हूईं, कुछ काल के गर्त में समा गईं। जहां सिन्धी, पंजाबी, कश्मीरी, जापानी, हिन्दी, संस्कृत आदि अनेक भाषायेँ एकाधिक लिपियों में लिखी जाती रही हैं, वहीं रोमन, देवनागरी आदि लिपियाँ अनेक भाषाओं के साथ जूड़ी हैं। रोचक है लिपि-भाषा का यह अनेकानेक संबंध। अचूक हो या त्रुटिपूर्ण, पिरामिडों के अंकन निर्कूट तो कर लिए गए हैं लेकिन सिंधु-सरस्वती सभ्यता की लिपि आज भी एक चुनौती बनी हुई है। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने जर्मनों द्वारा पकड़े जा रहे सैन्य संदेशों को सुरक्षित रखने के लिए मूल अमेरिकी (नेटिव इंडियन) समुदाय की एक लगभग अप्रचलित भाषा चोकटा (Choctaw) का सफल प्रयोग किया जिसके लिए उस समय किसी लिपि का प्रयोग ज्ञात नहीं था। जर्मन उन संदेशों को भेद नहीं सके और इस प्रकार वह संदेश प्रणाली एक अकाट्य शस्त्र साबित हुई।  

फेसबुक और कुछ काव्य मंचों पर हिन्दी शब्द लेखन की बारीकियों पर चल रही बहसों के मद्देनजर अपनी जानकारी में रहे कुछ तथ्य सामने रख रहा हूँ। स्पष्ट कर दूँ कि इस ब्लॉग की अन्य पोस्टों की तरह इस आलेख के पीछे भी केवल परंपरा से आई जानकारी मात्र है, हिन्दी का आधिकारिक अध्ययन नहीं, क्योंकि हिन्दी ब्लॉगिंग में उपस्थित हिन्दी शोधार्थियों के बीच अपनी हिन्दी केवल इंटरमीडिएट पास है। यह भी संयोग है कि इस ब्लॉग की छः साल पहले लिखी पहली पोस्ट संयुक्ताक्षर 'ज्ञ' पर थी।

सच यह है कि कमी किसी भी लिपि में हो सकती है। हाँ इतना ज़रूर है कि वाक और लिपि के अंतर की बात चलने पर देवनागरी में अन्य लिपियों की अनेक मौजूदा कमियाँ बहुत पहले ही दूर की जा चुकी हैं। sh जैसी ध्वनि के लिए भी श और ष जैसे अलग अक्षर रखना मामूली ध्वनिभेद को भी चिह्नित करने के प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ल तथा ळ का अंतर महान राष्ट्रीय नायक लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक के कुलनाम को ही बदल देता है जबकि मराठी और हिन्दी की लिपि एक होने के कारण हम हिंदीभाषियों द्वारा उद्दंडता से यह गलती करते रहने का कोई कारण नहीं बनता। ध्वनि के कई अंतर उन अप्रचलित अक्षरों में निहित हैं जिनका ज्ञान किसी सरकारी या तथाकथित प्रगतिशील कारणवश हिन्दी कक्षाओं से क्षरता जा रहा है।

अगर हम किसी शब्द को गलत बोलते रहे हैं तो यह गलती हमारे बोलने की हुई लिपि की नहीं। लिपि की कमी तब होगी जब वह लिपि किसी भाषा में प्रयुक्त किसी ध्वनि/शब्द को यथावस्तु लिख न सके। एक जगह अमृतम् गमय को जोड़कर किसी ने अमृतंगमय लिख दिया था। पढ़ने वाले ने उसको अमृ + तङ्ग + मय करके पढ़ा तो यह लिपि की गलती नहीं, बल्कि लिखने और पढ़ने वाले का भाषा अज्ञान है। इसी प्रकार यदि "स्त्री" शब्द को इस्त्री या स्तर को अस्तर कहा जाये तो यह वाक-कौशल की कमी का हुई न कि लिपि की। कालिदास की कथा में वे उष्ट्र को उट्र कहते पाये गए थे। यदि उस समय लिपि होती या नहीं होती, उनके उच्चारण का दोष उनके उच्चारण का ही रहता, लिखने और पढे जाने के अंतर का नहीं। महाराष्ट्र के गाँव शिर्वळ को हर सरकारी, गैर-सरकारी बोर्ड पर शिरवल लिखा जाता था जो किसी भी अंजान व्यक्ति को पढ़ने में शिखल लगता था। पहले छापेखाने के सीमित अक्षरों और लेखकों, संपादकों व प्रकाशकों की लापरवाही से कई पुस्तकों, अखबारों में स्र को अक्सर स्त्र लिखा जाता देखा था। लिखे हुए को ब्रह्मवाक्य समझने वालों ने पढ़कर ही पहली बार जाने कई शब्दों, जैसे "सहस्र" आदि के उच्चारण इस कारण ही गलत समझे। आजकल कितनी कमियाँ हमारे कम्प्यूटरों/फोन आदि की आगम-लेखन-सुझाव क्षमताओं के कारण भी होते हैं क्योंकि इन क्षमताओं का अनुकूलन भारतीय लिपियों के लिए उतना भी नहीं हुआ है जितना सामान्य लेखन के लिए ज़रूरी है।

दिल्ली में हर सरकारी साइन पर ड को ड़ लिखने की कुप्रथा थी, जिसमें हर रोड, रोड़ हो जाती थी। हद तो तब हो गई जब मंडी हाउस को भी पथ-चिह्नों में मंड़ी हाउस लिखा पाया। स्कूल को उत्तर प्रदेश में कितने लोग इस्कूल कहते हैं और पंजाब में अस्कूल भी कहते हैं। कई हिन्दी भाषी तो टीवी पर स्पष्ट को भी अस्पष्ट कहकर अर्थ का अनर्थ कर रहे होते हैं। उर्दू सहित अनेक बोलियों के आलस और फारसी, रोमन जैसी लिपियों की कमियों के कारण भी कितने ही संस्कृत शब्द समयान्तराल में अपना मूल रूप खो बैठे हैं। फेसबुक पर नागरी लिपि और हिन्दी भाषा के बारे में लिखे गए कुछ स्टेटस पढ़कर तो यही लगता है कि हिन्दी के मानकीकरण और शिक्षण पर और ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है, ताकि वाचन की क्षेत्रीय या व्यक्तिगत कमियों को लिपि की कमी न समझा जाये।

जब “र्“ व्यञ्जन की अपने बाद आने वाले किसी अन्य अक्षर से संधि होती है तो यह अगले अक्षर के ऊपर “र्क“, "र्ख" और “र्ट“ जैसे दिखाता है और संधि में जब र बाद में हो तो पिछले अक्षर के नीचे “क्र”, "ख्र" और “ट्र” जैसा दिखाता है। देवनागरी अपनाने वाली भाषाओं में "र्" से आरंभ होने वाले शब्द सीमित ही होंगे। कम से कम इस समय मुझे ऐसा कोई शब्द याद नहीं आ रहा है। लेकिन विदेशी भाषाओं में ऐसे शब्द सर्व सुलभ हैं जिन्हें लिखते और पढ़ते समय "र्" की संधि लिखने के पहले नियम के कारण अजीब सा लगता है। जैसे पक्वान्न के लिए प्रयुक्त होने वाला एक जापानी शब्द, जिसे रोमन में ryooree या ryuri जैसा लिखा जा सकता है, उसे नागरी में र्यूरी लिखते समय ध्यान न देने पर उच्चारण की गलती हो सकती है, यद्यपि यह लिपि की नहीं, बल्कि भाषा, लिपि और व्यक्ति के बीच की घनिष्ठता की कमी हुई। यह भी संभावना है कि इस शब्द का बेहतर लेखन र्यूरी न होकर ॠयूरी जैसा कुछ हो। एक ऑनलाइन नेपाली चर्चा में मैंने र्याल् (ryal) की ध्वनि को र्‍याल् लिखने का सुझाव देखा है। कंप्यूटर पर र्‍याल् कैसे लिखा कैसे जाएगा, यह नहीं पता चला। कोई संस्कृत विद्वान शायद अधिकार से स्पष्ट कर सकें। लेकिन हम सामान्य लोगों के लिए भी सत्यान्वेषण का पहला कदम तो अज्ञान के निराकरण का ही होना चाहिए।

कुछ अन्य उच्चारण भी हैं जिन्हें ठीक न लिखे जाने पर संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे अकलतरा लिखने पर वह अक-लतरा भी पढ़ा जा सकता है और अकल-तरा भी। यद्यपि रोमन में तो वही शब्द अकलतरा (akaltara) लिखने पर तो नागरी से कहीं अधिक ही संभावित उच्चारण बन जाते हैं। जहां अङ्ग्रेज़ी की गलतियों पर हम अति भावुक हो जाते हैं वहीं भारतीय भाषा-लिपि में होने वाली गलतियों की उपेक्षा ही नहीं कई बार उन्हें इस खामोख्याली में उत्साहित भी करते हैं, मानो हिन्दी का अज्ञान स्वतः ही अङ्ग्रेज़ी का सुपर-ज्ञान मान लिया जाएगा। अच्छा यही होगा कि लिखते समय उच्चारण का ध्यान रखा जाये और चन्द्रबिन्दु आदि चिह्नों का समुचित प्रयोग हो। लिपि-पाठ में दुविधा की स्थिति के लिए मेरा सुझाव तो यही है कि संदेह की स्थिति में कोई भी निर्णय लेते समय यह ध्यान रहे कि गलतियाँ बोलने,लिखने और पढ़ने, तीनों में ही संभव हैं। क्षेत्रीय उच्चारण की भिन्नताएँ भी स्वाभाविक ही हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वाक लेखन से पहले जन्मा है और बाद तक रहेगा। भाषा मूल है लिपि उसकी सहायक है।

काफी कुछ लिखना है इस विषय पर। ध्यान रहने और समय मिलने का संगम होते ही कुछ और ...
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Sunday, May 27, 2012

ब्राह्मण कौन?

(आलेख व चित्र: अनुराग शर्मा)
ज्ञानी जन तौ नर कुंजर में, सम भाव धरत सब प्रानिन में। 
सम दृष्टि सों देखत सबहिं, गौ श्वानन में चंडालन में ॥
 [डॉ. मृदुल कीर्ति - गीता पद्यानुवाद]
जब से बोलना सीखा, दिल की बात कहता आया हूँ। मेरे दिल की बात क्या है, कुछ मौलिक नहीं, वही सब जो अपने आसपास सुना, पढा, समझा और सीखा है। सब कुछ सही होने का दावा नहीं कर सकता हाँ इतना प्रयास अवश्य रहता है कि सत्य अपनाया जा सके और उसे प्रिय और श्रेयस्कर मान सकूँ।

उपनिषदों में जाबालि ऋषि सत्यकाम की कथा है जो जाबाला के पुत्र हैं। जब सत्यकाम के गुरु गौतम ने नये शिष्य बनाने से पहले साक्षात्कार में उनके पिता का गोत्र पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि उनकी माँ जाबाला कहती हैं कि उन्होंने बहुत से ऋषियों की सेवा की है, उन्हें ठीक से पता नहीं कि सत्यकाम किसके पुत्र हैं। ज्ञानवृत्ति के पालक ऋषि सत्य को सर्वोपरि रखते आये हैं। सत्यकाम की बात सुनते ही गौतम ऋषि उन्हें सत्यव्रती ब्राह्मण स्वीकार करके जाबालि गोत्र का नाम देकर पुकारते हैं।
खून से ही वंश की परम्परा नहीं चलती, जो विश्वास वहन करता है, वही होता है असली वंशधर ~ सत्यकाम फ़िल्म से (रजिन्दर सिंह बेदी लिखित) एक सम्वाद 
बात की शुरुआत हुई एक मित्र के फ़ेसबुक स्टेटस से जिसका शीर्षक था "बन्दउँ प्रथम महीसुर चरना :)" संलग्न लिंक था टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक खबर से जिसमें चर्चा थी उस ट्रेंड की जहाँ निसंतान भारतीय दम्पत्तियों की पहली पसन्द ब्राह्मण संतति प्राप्त करना पाई गयी थी। ब्राह्मण शब्द पर ज़ोर था। काफ़ी दिन बाद फिर से ध्यान गया उस शब्द पर जिसकी चर्चा अक्सर होती है पर उसका अर्थ शायद अलग-अलग लोगों के लिये अलग ही रहा है। एक बुज़ुर्ग भारतीय मित्र हैं जो जाति पूछे जाने पर अपने को "जन्मना ब्राह्मण" कहते थे क्योंकि तथाकथित ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने को कभी ब्राह्मण नहीं माना। एक अन्य जन्मना ब्राह्मण मित्र हैं जो अक्सर जन्मना ब्राह्मणों को कोसते दिखाई देते हैं। विद्वान हैं, कई बातें सही भी हैं लेकिन कई बार यह विघ्नकारी हो जाता है।

अली सैयद जी के ब्लॉग उम्मतें की एक पोस्ट "कभी यहां तुम्हें ढूंढा...कभी वहां देखा...!" पढते समय ध्यान गया कि शास्त्रों के काल से लेकर आज तक भले ही भृगु, विश्रवा, च्यवन आदि ब्रह्मर्षियों की बात हो या वर्तमान समाज में देखें तो पं. अयोध्यानाथ (अभिनेत्री तबस्सुम के पिता), अरुणा आसफ़ अली, सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गांधी जैसे स्वाधीनता सेनानियों की, भारत में यदि कोई एक जाति अंतर्जातीय सम्बन्धों में आगे रही है तो वह ब्राह्मण जाति ही है। ब्राह्मण परिवार में जन्मी पॉप गायिका पार्वती खान का नाम कई पाठकों को याद होगा। पढ़ने में आता है कि डॉ भीमराव अंबेडकर की पत्नी डॉ शारदा कबीर (माई सविता अंबेडकर) भी एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं। मैं अपने आसपास के अंतर्जातीय विवाहों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो जन्मना ब्राह्मणों को अग्रणी पाता हूँ। प्रेम की तरह शायद कट्टरता के भी कई रूप होते हैं, एक सर्वभूतहितेरतः वाला और दूसरा अहमिन्द्रो न पराजिग्ये वाला। 

प्रथम ब्राह्मण रेजिमेंट (1776-1931) भारतीय सेना
ब्राह्मण याने द्विज यानि दूसरे जन्म याने संस्कार से बना हुआ व्यक्ति। मतलब यह कि ब्राह्मण जन्म से होता ही नहीं। ब्राह्मण होने का मतलब ही है आनुवंशिकता के महत्व को नकारकर ज्ञान, शिक्षा और संस्कार के महत्व को प्रतिपादित करना। विश्व के अन्य राष्ट्रों की तरह भारतीय जातियाँ पितृकुल से भी हैं, मातृकुल से भी। लेकिन भारत के ब्राह्मण गोत्र संसार भर से अलग एक अद्वितीय प्रयोग हैं। ब्राह्मण मातृकुल, पितृकुल, कम्यून आदि से बिल्कुल अलग ऐसी परिकल्पना है जो गुरुकुल से बनी है। जातिवाद और ब्राह्मणत्व दो विरोधी प्रवृत्तियाँ हैं। इनका घालमेल करना निपट अज्ञान ही नहीं, एक तरह से भारतीय परम्परा का निरादर करना भी है।

गुरुकुल शब्द ही ब्राह्मणों के कुल के अनानुवंशिक होने का प्रमाण है। न माता का, न पिता का, गुरु का कुल - ब्राह्मणों के एक नहीं, न जाने कितने गोत्र ऐसे हैं जहाँ पिता और पुत्र के चलाये हुए गोत्र अलग हैं उदाहरणार्थ वसिष्ठ का अपना गोत्र है और उनके पौत्र पराशर का अपना - यदि आनुवंशिक आधार होता तो ये दो गोत्र अलग नहीं होते। इसी प्रकार भृगु का अपना गोत्र भी है और उनकी संततियों के अपने-अपने। सभी शिष्य अपने गुरु का कुल चलाते हैं। इस विशाल समुदाय में गुरु के अपने भी एकाध बच्चे होंगे, मगर भूसे के ढेर को उसमें पड़ी एक सुई से परिभाषित नहीं किया जा सकता। शुनःशेप का गोत्र परिवर्तन भी गुरुकुल के सिद्धांत को ही प्रतिपादित करता है।

भारतीय संस्कृति संस्कारों में विश्वास करती है। सभी संस्कार सबके लिये हैं मगर उपनयन किये बिना द्विज नहीं बना जा सकता, मतलब यह कि ब्राह्मणत्व केवल वंश आधारित नहीं हो सकता है। ब्राह्मण परिवार के बाहर जन्मे विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनना ब्राह्मणत्व के जन्म से मुक्त होने का एक दृष्टांत है। विश्वामित्र का हिंसक क्रोध बना रहने तक वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि स्वीकार नहीं करते। इन्हीं विश्वामित्र का पश्चात्ताप वसिष्ठ द्वारा उनके ब्राह्मणत्व को मान्यता देने का आधार बनता है। यह संयोग मात्र नहीं कि विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व प्रदान करने वाले वसिष्ठ स्वयं भी किसी ब्राह्मणी के नहीं बल्कि अप्सरा उर्वशी के पुत्र हैं। उनके अतिरिक्त व्यास, कौशिक, ऋष्यशृंग, अगस्त्य, जम्बूक आदि ऋषियों के अब्राह्मण जन्म की कथायें शास्त्रों में मिलती हैं परंतु उन सबका ब्राह्मणत्व सुस्थापित और सर्वमान्य हैं।

बुद्ध के शब्दों में ब्राह्मण अकिंचनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
जो अकिंचन है, अपरिग्रही और त्यागी है, उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
वारि पोक्खरपत्ते व आरग्गे रिव सासपो।
यो न लिम्पति कामेसु तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
कमल के पत्ते पर जल की बूंद और आरे की धार पर सरसों के दाने की तरह भोगों से निर्लिप्त रहने वाले को मैं ब्राह्मण कहता हूँ।
निधाय दंडं भूतेसु तसेसु ताबरेसु च।
यो न हन्ति न घातेति तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं॥
चर-अचर, किसी प्राणी को जो दंड नहीं देता, न मारता है, न हानि पहुंचाता है वही ब्राह्मण कहलाएगा।


आज ब्राह्मण जाति की उपस्थिति देश के लगभग हर क्षेत्र में हैं परंतु असम का ब्राह्मण पंजाबी ब्राह्मण के मुकाबले एक असमी से अधिक मिलता हुआ होता है और यह बात तमिळ, नेपाली, कश्मीरी, गुजराती सब ब्राह्मणों के बारे में कमोबेश सही है। हाँ राष्ट्रभर में बिखरा हुआ यह समुदाय वैचारिक रूप से अवश्य एकरूप हुआ है मगर उसका कारण संस्कार, दीक्षा, दृष्टि और परिवेश है न कि आनुवंशिकता। ब्राह्मण अलग वर्ण अवश्य है लेकिन अलग आनुवंशिक जाति कदापि नहीं।

गीता के मेरे प्रिय श्लोकों में से एक है:
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनिचैव श्वपाके चः पंडिताः समदर्शिनः
ज़र्रे-ज़र्रे में एक ही ईश्वर का अंश देखने वाली भारतीय परम्परा में हर प्राणी के लिये समदर्शी होने में कोई अनोखी बात नहीं है। गाय, हाथी, ब्राह्मण, कुत्ता और यहाँ तक कि कुत्ता खाने वाले में भी समानता देखने वाली परम्परा में मज़हब, भाषा आदि जैसी दीवारों के नामपर बँटवारा और फ़िरकापरस्ती के लिये कोई जगह नहीं है। एक ओर हम भेदभाव विहीन समाज की मांग करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने परिवार के विवाह सम्बन्ध ढूंढते समय, बच्चे गोद लेते समय और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के समाचार के अनुसार उससे भी एक क़दम आगे बढकर जाति में गौरव ढूंढते हैं, यह कैसा विरोधाभास है?

रेखाचित्र: अनुराग शर्मा
इसी प्रकार कुछ लोग जात-पाँत को सही ठहराने के लिये प्राचीन वर्ण व्यवस्था का नाम लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि वर्ण व्यवस्था वास्तव में वर्णाश्रम व्यवस्था थी। आश्रम के आग्रह के बिना वर्ण के आग्रह का कोई अर्थ नहीं रहता। दूसरे, शास्त्रसम्मत चार वर्ण और आज की भेदभावपरक हज़ारों जातियाँ दो अलग-अलग बातें हैं। और फिर प्राचीन व्यवस्था में से कितनी अन्य बातें आज हमने बचाकर रखी हैं? उस पर यह भी एक तथ्य है कि ब्राह्मण भले ही वर्णाश्रम-व्यवस्था का अंग हों, विभिन्न जातियाँ भारत में सभी धर्मों में स्पष्ट और गहराई से गढी हुई दिखाई देती हैं। मुसलमानों में अशरफ़, अजलाफ़, अरजाल आदि समूहों में बंटी सैकड़ों जातियाँ मिल जायेंगी। बल्कि मुसलमानों में अनेक ऐसी जातियाँ भी हैं जो हिन्दुओं में नहीं होतीं। सिखों में जाट, खत्री, मज़हबी समूहों के अतिरिक्त हिन्दू जातियों में पाये जाने वाले कुलनाम मिलेंगे और ईसाई समुदाय में तो अपने को दलित, सीरियन, सारस्वत आदि मानकर भिन्नता बरतने वाले आसानी से दिखाई देते हैं। इस प्रकार, जातियाँ आनुवंशिक, क्षेत्रीय या दोनों हो सकती हैं जबकि ब्राह्मण इन दोनों से ही अलग हैं। इसी प्रकार जातियाँ हिन्दूओं से इतर मान्यता वाले समूहों में भी उपस्थित हैं जबकि ब्राह्मण नहीं।

जन्मना जायतेशूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते:
शास्त्र का वचन है कि जन्म से सभी मनुष्य शूद्र हैं। ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से यज्ञोपवीत लेकर शिक्षा लेने वाला मनुष्य द्विज कहलाता है। अर्थात ब्राह्मण वह है जो ज्ञान प्राप्ति द्वारा समाज के उत्थान हेतु अपने जन्म, जाति, देश, अस्तित्व आदि के बन्धनों का त्याग करता है।

सामवेद शाखा के वज्रसूचिकोपनिषद (वज्रसूचि उपनिषद) में ब्राह्मण विषय पर विस्तार से वार्ता हुई है। प्रश्न हैं, सम्भावनायें हैं, उनका सकारण खंडन है और फिर परिभाषा भी है:
क्या जीव ब्राह्मण है? नहीं!
क्या शरीर ब्राह्मण है? नहीं!
क्या जाति ब्राह्मण है? नहीं!
क्या ज्ञान ब्राह्मण है? नहीं!
क्या कर्म ब्राह्मण है? नहीं!
क्या (सत्कर्म का) कर्ता ब्राह्मण है? नहीं!

तब फिर ब्राह्मण है कौन? जिसे आत्मा का बोध हो गया है, जो जन्म और कर्म के बन्धन से मुक्त है, वह ब्राह्मण है। ब्राह्मण को छः बन्धनों से मुक्त होना अनिवार्य है - क्षुधा, तृष्णा, शोक, भ्रम, बुढापा, और मृत्यु। एक ब्राह्मण को छः परिवर्तनों से भी मुक्त होना चाहिये जिनमें पहला ही जन्म है। इन सब बातों का अर्थ यही निकलता है कि जन्म और भेद में विश्वास रखने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता। ब्राह्मण वह है जिसकी इच्छा शेष नहीं रहती। सच्चिदानन्द की प्राप्ति (या खोज) ब्राह्मण की दिशा है। ब्राह्मण समाज के उत्थान के लिये कार्य करता है। ब्राह्मण का एक और कार्य ब्रह्मदान या ज्ञान का प्रसार है। इसी तरह, असंतोष के रहते कोई ब्राह्मण नहीं रह सकता, भले ही उसका जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो। ऐसा लगता है कि "संतोषः परमो धर्मः" भी ब्राह्मणत्व की एक ज़रूरी शर्त है।

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