Saturday, November 21, 2015

आतंकियों का मजहब

सवाल पुराना है। पहले भी पूछा जाता था लेकिन आज का विश्व जिस तरह सिकुड़ गया है, पुराना प्रश्न अधिक सामयिक हो गया है। आतंकवाद जिस प्रकार संसार को अपने दानवी अत्याचार के शिकंजे में कसने लगा है, लोग न चाहते हुए भी बार-बार पूछते हैं कि अधिकांश नृशंस आतंकवादी किसी विशेष मजहब या राजनीतिक विचारधारा से ही सम्बद्ध क्यों हैं?

इस प्रश्न का उद्देश्य किसी मज़हब को निशाने पर लाना नहीं है बल्कि एक निर्दोष उत्सुकता और सहज मानवाधिकार चिंता है। कोई कहता है कि किसी व्यक्ति के पापकर्म के लिए किसी भी समुदाय को दोषी ठहराना जायज़ नहीं है जबकि कोई कहता है कि यदि ऐसा होता तो फिर आतंकवादियों की पृष्ठभूमि में भी वैसी ही विभिन्नता दिखती जैसी विश्व में है। लेकिन हमारा अवलोकन ऐसा नहीं कहता। अधिकांश आतंकवादी कुछ सीमित मजहबी और राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े हुये हैं।

किसी व्यक्ति के मन में नृशंसता का क्रूर विचार चाहे उसके अपने चिंतन से आया हो चाहे उसे बाहर से पढ़ाया-सिखाया गया हो, उसे अपनाने का दोष सबसे पहले उसका अपना ही हुआ। हत्यारा किसी भी धर्म का हो उसका पाप उसका ही है। लेकिन अगर संसार भर के आतंकवादियों की प्रोफाइल देखने पर निष्कर्ष किसी मजहब या विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाता है और एक आम धारणा यही बनती है कि उस पंथ या समुदाय की नीतियों और शिक्षा में कहीं भारी कमी हो सकती है तो हमें गहराई तक जाकर यह ज़रूर देखना पडेगा की ऐसा क्यों हो रहा है।

पंजाब के आतंकवाद के आगे जब सुपरकॉप कहे जाने वाले रिबेरो जैसे मशहूर अधिकारी बुरी तरह असफल हो गए तो खालसा के नाम पर फैलाये जा रहे उस आतंकवाद को एक सिख के. पी. एस. गिल और उसकी सिख टीम ने ही कब्जे में लिया। जितने सिख आतंकवाद के साथ थे उससे कहीं अधिक उसके ख़िलाफ़ न सिर्फ़ लड़े बल्कि शहीद हुए। इसी तरह मिजोरम, नागालैंड, उत्तरी असम, या झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि के ईसाई आतंकवादियों की बात करें तो भी कभी भी किसी भी चर्च या मिशनरी ने निर्दोषों की हत्याओं का समर्थन नहीं किया।

"एकम् सत विप्र: बहुधा वदंति" के पालक हिन्दुओं की तो बात ही निराली है। अहिंसा और विश्वबंधुत्व, हिन्दुत्व के मूल में है। मानव के आपसी प्रेम की बात आज के सभ्य समाज में अब आम है लेकिन भारतीय परंपरा में मानव के आपसी प्रेम के आत्मानुशासन से कहीं आगे जीवमात्र के प्रति भूतदया की अवधारणा है। भूतदया और अहिंसा की यह हज़ारों साल पुरानी अवधारणा भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक विचारधाराओं के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। हिन्दुत्व के "सर्वे भवन्तु सुखिन:" जैसे निर्मल सिद्धांतों के पालकों के लिए, असहिष्णुता और मजहबी आक्रोश की बात करने वाले लोग, धर्म के ऐसे दुश्मन हैं जो कभी भी प्रमुख धार्मिक नेताओं का समर्थन नहीं पा सकते।

दुर्भाग्य से इस मामले में इस्लाम की स्थिति थोड़ी अलग है। आतंकवादी घटनायें दुनिया में कहीं भी हों, जांच से पहले ही लोगों का शक इस्लाम के अनुयायियों पर जाता है। कम्युनिस्ट, हिन्दू या ईसाई बहुल देश ही नहीं, आतंकी घटना जब किसी इस्लामिक राष्ट्र में हो तो भी शक किसी न किसी इस्लामी समुदाय की संलिप्तता पर ही जाता है। शर्म की बात है कि ऐसे शक शायद ही कभी गलत साबित होते हों।

लोगों की धारणाएं बनती हैं जुम्मे की नमाज़ के बाद के बाद आने वाले भड़काऊ बयानों से जिन्हें दुनिया भर की मस्जिदों में इस्लाम के नाम पर परोसा जाता है। ये बनती हैं ओसामा बिन लादेन, सद्दाम हुसैन, मुअम्मर गद्दाफी, जिया उल हक़ और जनरल मुशर्रफ़ जैसे निर्दयी तानाशाहों को हीरो बनाने से। मुसलमानों के असहिष्णु होने का संदेश जाता है जब तसलीमा नसरीन और सलमान रश्दी की जान भारत में खतरे में पड़ती है और उनको इस "अतिथि देवो भवः" देश से बाहर जिंदगी गुजारनी पड़ती है। इस्लाम की ग़लत छवि बनती है जब गांधी की अहिंसा की धारणा को इस्लाम-विरोधी करार दिया जाता है और हिन्दू बहुल धर्म-निरपेक्ष और सहिष्णु राष्ट्र को नकारकर पाकिस्तान को मुसलमानों की जन्नत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। देश को काटकर पाकिस्तान बनाने के लिए जिन हिंदुओं के गाँव के गाँव काट दिये गए थे, उनके बच्चे असहिष्णुता का असली अर्थ समझते हैं। कश्मीर से लेकर कुनमिंग, न्यूयॉर्क, पेरिस, जेरूसलम, बमाको, मयादुगुरी, मुंबई, संसार भर में कहीं भी, निर्दोषों के हत्यारे अपने कुकृत्यों को इस्लाम पर आधारित धर्मयुद्ध ही बताते हैं।  

तैमूर लंग की तकनीकी क्षमता के अभाव के कारण मामूली क्षति मात्र झेलने वाले बमियान के बुद्ध को नष्ट करने के धार्मिक एजेंडा का काम जब तालेबान पूरा करती है तब राम जन्मभूमि को बाबरी मस्जिद कहने वालों की नीयत पर शक स्वाभाविक लगता है। और इसके नाम पर इस्लाम को खतरे में बताकर देश के विभिन्न क्षेत्रों में आतंक फैलाने की कार्यवाही करनेवालों की मजहबी प्रतिबद्धता छिपने का कोई बहाना नहीं बचता।  

मुझे ग़लत न समझें लेकिन जब बकरा ईद आने से हफ्तों पहले जानबूझकर ऐसा दुष्प्रचार किया जाता है कि पशुबलि हिंदू धर्म की अनिवार्यता है तो उसका अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। जब खास होली के दिन कुछ लोग जानबूझकर बुर्राक सफ़ेद कपड़े पहन कर तमंचे लेकर रंग डालने वाले बच्चों को "ये हिंदू पागल हो गए हैं" कहते हुए धमकाते हैं तब पूरा समुदाय बदनाम होता है और तब भी जब दीवाली के दिन पर्यावरण की और गंगा दशहरा के दिन जल-प्रदूषण की बढ़-चढ़कर चिंता की जाती है। जब अबू कासिम और याक़ूब मेमन जैसे आतंकियों के जनाज़े में मजहब के नाम पर लाखों की भीड़ जुटती है तो वह कुछ और ही कहानी कहती है। जब कश्मीर में AK-47 चला रहे आतंकवादियों को आड़ देने के लिए बुर्काधारी महिलायें ढाल बनकर चल रही होती हैं या जब लाखों पंडितों के पुश्तैनी घरों के दरवाज़े पर एक तारीख चस्पा करके कहा जाता है कि - धर, इस दिन के बाद यहाँ रहे तो ज़िंदा नहीं रहोगे और एक प्राचीन राज्य के मूल निवासी समुदाय को अपने ही देश में शरणार्थी बनकर भटकना पड़ता है - तब इस्लाम बदनाम होता है। अफ़सोस कि इस्लाम के अनुयाइयों की ओर से  ऐसे गंदे काम करने वाले हैवानों का स्पष्ट विरोध किये जाने के बजाय उनके कृत्यों को हर बार अमरीकी-यहूदी (और अब तो हिन्दू भी) साजिश बताया जाता है। आतंक के ख़िलाफ़ मुसलमानों द्वारा दबी ढकी ज़ुबाँ में कुछ सुगबुगाहट, कवितायें आदि तो मिलती हैं मगर करारा और स्पष्ट विरोध कतई नहीं दिखता है। बल्कि ऐसे हर कुकृत्य के बाद जब लश्कर-ए-तोएबा से लेकर अल कायदा और हिज़्बुल-मुजाहिदीन होते हुए बोको हराम तक सभी इस्लामिक आतंकी संगठनों के कुकर्मों का दोष अमेरिका और इसराएल पर डालने का प्रोपेगेंडा किया जाता है तब आतंक का इस्लाम से संबंध कमजोर नहीं होता बल्कि उसकी कड़ियाँ स्पष्ट होने लगती हैं।

आतंकवाद और धर्म की बात चलने पर एक और पक्ष अक्सर छिपा रह जाता है। जिस प्रकार किसी देश, धर्म, जाति या संप्रदाय मेँ सब लोग अच्छे नहीँ होते उसी प्रकार सब देश, धर्म, जाति, संविधान, विचारधारायें, या संप्रदाय अच्छे और सहिष्णु हों ही यह ज़रूरी नहीं। एक खराब इंसान का इलाज अच्छे संविधान, प्रशासन, कानून या अन्य वैकल्पिक सामाजिक तंत्र से किया जा सकता है। लेकिन यदि कोई तंत्र ही आधा-अधूरा असहिष्णु या असंतुलित हो तो स्थिति बड़ी खतरनाक हो जाती है। क्योंकि उस तंत्र के अंतर्गत पाये गए उदार और बुद्धिमान लोग विद्रोही मानकर उड़ा दिये जाते हैं और कट्टर, कायर, हिंसक, अल्पबुद्धि, असहिष्णु रोबोट उसके योगक्षेम और प्रसार-प्रचार का साधन बनते हैं। जब लोग एक बुरे देश, धर्म, जाति या संप्रदाय की बात करते हैं तो उनका संकेत अक्सर इस नियंत्रणवादी असंतुलन की ओर ही होता है जो अपने से अलग दिखने वाली हर संस्कृति के प्रति असहिष्णु होता है और उसे नष्ट करना अपना उद्देश्य समझता है।

ऐसी स्थिति में जमिअत-उल-उलमा-ए-हिंद, मुंबई के मौलाना मंज़र हसन खाँ अशरफी मिसबही, केरल के नदवातउल मुजाहिदीन आदि की पहल पर भारत में जारी ताज़े फतवे एक स्वागतयोग्य पहल हैं। भारत में पहले भी इस प्रकार के फतवे सामने आए हैं लेकिन इससे आगे बढ़कर आतंकवाद के मसले पर संसारभर को  एकमत होकर दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की आवश्यकता है।
संबन्धित कड़ियाँ
* माओवादी नक्सली हिंसा हिंसा न भवति
* मुम्बई - आतंक के बाद

Saturday, October 17, 2015

अंगूठाटेक हस्ताक्षर की भाषा - हिन्दी विमर्श

भारत वैविध्य से भरा देश है। अन्य विविधताओं के साथ-साथ यहाँ भाषाई व लिपिक विविधता भी प्रचुर है। विभिन्न भाषाओं के सक्रियतावादी अपने-अपने उद्देश्यों के लिए समय-समय पर बहुत से काम करते रहते हैं। तमिलनाडु में हिन्दी के नामपट्टों पर कालिख पोतने का आंदोलन भी एक समय में फैशन में रहा था, यद्यपि आज उसका कोई जनाधार नहीं है। अपनी-अपनी भाषा या बोली को संविधान में राष्ट्रीय भाषा के रूप में या अपने राज्य की एक राज्यभाषा के रूप में मान्यता दिलाने के आंदोलन भी चलते रहते हैं। इसी प्रकार कई सरकारी कार्यालय हिन्दी पखवाड़े में हिन्दी हस्ताक्षर अभियान भी चलाते हैं।

सं. रा. अमेरिका के निधि-सचिव जेकब जोसेफ ल्यू के आधिकारिक हस्ताक्षर 
हस्ताक्षर या दस्तख़त किसी व्यक्ति द्वारा किसी विशिष्ट शैली में बनाई हुई प्रामाणिक पहचान और आशय का प्रतीक है। यह उसका लिखा हुआ नाम, उपनाम, चिह्न, प्रतीक, रेखाचित्र या कुछ भी हो सकता हैं। किसी प्रपत्र पर किया हस्ताक्षर उस प्रपत्र को प्रमाणिक बनाता है। हस्ताक्षर किसी भी ज्ञात या अज्ञात लिपि में किया जा सकता है। यदि व्यक्ति हस्ताक्षर करने में सक्षम न हो तो अंगूठे का निशान लगाने के विकल्प को वैश्विक स्वीकृति है।

प्राचीन काल में भारतीय समाज में मुद्रिका चिह्न लगाने की प्रथा थी। आज भी कितने राजकीय, न्यायिक व शैक्षिक दस्तावेजों में मुद्रिका (seal) का प्रयोग होता है जो किसी भी लिपि, शब्द, संकेत, चिह्न, चित्र या कला या इनके संयोजन से बने हुए हो सकते हैं। कम आधिकारिक महत्व के कागजों पर किए जाने वाले हस्ताक्षर के लघु रूप को मज़ाक में हम लोग चिड़िया उड़ाना कहते थे।

आधिकारिक प्रपत्र पर किए जाने वाले हस्ताक्षर के साथ साथ हस्ताक्षरकर्ता का पूरा नाम, पद आदि भी अक्सर प्रपत्र में प्रयुक्त लिपि में लिखा जाता है, यद्यपि ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। हस्ताक्षर के अलावा पहले कागज पर एम्बोसिंग का प्रयोग भी होता था। फिर हाल-फिलहाल तक रबर स्टेम्प का भी काफी प्रचालन रहा। जापान में छोटे और सामान्यतः गोलाकार मुद्रिकाओं का प्रयोग आज भी होता है जिन्हें लोग साथ लेकर चलते हैं और हस्ताक्षर की जगह प्रयोग में लाते हैं।

भारत में लंबे समय तक बैंक की नौकरी में अन्य अधिकारियों की तरह मुझे भी अपने हस्ताक्षरों के अधीन बहुत से आधिकारिक लेन-देन निबटाने पड़ते थे। ये कागज बैंक की हजारों शाखाओं और कार्यालयों में जाते थे, कई बार बैंक की परिधि के बाहर देश-विदेश स्थित अन्य बैंकों, ग्राहकों और न्यायालय आदि में भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे। हस्ताक्षर की प्रामाणिकता के लिए सक्षम अधिकारियों के हस्ताक्षर का एक नमूना लेकर उसे एक विशिष्ट कूट संख्या देकर सभी शाखाओं को उपलब्ध कराया जाता था और न्यायिक वाद की स्थिति में उसी मूल नमूने से पहचान कराकर सत्यापन होता था। धोखाधड़ी आदि के कितने ही मामलों की जाँच इसी आधार पर निर्णीत हुई हैं कि हस्ताक्षर बैंक में सुरक्शित रखे गए नमूने से मिलते हैं या नहीं। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि प्रपत्र किस भाषा या लिपि में लिखित या टंकित है। हस्ताक्षर को बिलकुल वैसा ही होना चाहिए जैसा कि नमूने में अंकित हो।

एक जापानी हस्ताक्षर इंका 
दिल्ली की एक विशालकाय शाखा में जब मैं हिन्दी या अङ्ग्रेज़ी में बने डिमांड ड्राफ्ट बनाता था तो उनपर भी अपने प्रामाणिक हस्ताक्षर ही अंकित करता था क्योंकि भाषा या लिपि (या अपने मूड, आलस या सनक) के हिसाब से हस्ताक्षर बदले नहीं जा सकते। ऐसा करना न केवल उनकी प्रामाणिकता को नष्ट करता बल्कि अफरा-तफरी का माहौल भी पैदा करता क्योंकि यह डिमांड ड्राफ्ट जिस शाखा में भी भुनाने के लिए प्रस्तुत होता वहाँ उसकी प्रामाणिकता का सत्यापन जारीकर्ता के हस्ताक्षरों की उस शाखा में सुरक्षित रखे आधिकारिक प्रति से मिलान करके ही किया जाता। बैंक अधिकारी ही नहीं, बैंक के ग्राहकों के लिए भी यही नियम लागू रहे हैं। ये संभव है कि ग्राहक अपना चेक आदि देवनागरी, रोमन या किसी अन्य मान्यता प्राप्त लिपि या भाषा में तैयार करें लेकिन उस पर उनका हस्ताक्षर नमूने के हस्ताक्षर जैसा ही होना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर बैंक-कर्म से संबन्धित परक्राम्य लिखत अधिनियम (नेगोशिएबल इन्स्ट्रूमेंट एक्ट = Negotiable Instrument Act) को भी मैंने सदा एकरूप हस्ताक्षरों के पक्ष में ही पाया है।

कंप्यूटर युग ने हस्ताक्षर को एक और कूटरूप प्रदान किया है जो आपके कंप्यूटर के पहचान अंक, आपका ईमेल पता या संख्याओं या अक्षरों का ऐसा कोई संयोग हो सकता है जिसे केवल आप ही जान सकें। किसी इलेक्ट्रोनिक करार पर हस्ताक्षर करने के बजाय आपको अपनी जन्मतिथि, पिनकोड संख्या और मकान नंबर को एक ही क्रम में लिखने को कहा जा सकता है। इस नए आंकिक या गणितीय हस्ताक्षर को डिजिटल या इलेक्ट्रोनिक सिग्नेचर कहा जाता है।

अंगूठा टेकने से लेकर, राजमुद्रा तक होते हुए आंकिक कूटचिह्न तक पहुँची इस यात्रा में, समझने की बात इतनी ही है कि हस्ताक्षर का उद्देश्य किसी भाषा या लिपि का प्रचार या विरोध नहीं बल्कि एक कानूनी पहचान का सत्यापन मात्र है। यह लिपि से स्वतंत्र एक प्रतीक चिह्न है। नाम किसी लिपि (भाषा नहीं,लिपि) में लिखा जाता है, हस्ताक्षर को ऐसी बाध्यता नहीं है। हस्ताक्षर का उद्देश्य अभिव्यक्ति नहीं, पहचान और आशय की स्थापना या/और सत्यापन है। व्याकरण, लिपि या भाषा का विषय नहीं विधिक विषय है और बुद्धिमता इसे वहीं रहने देने में ही है।

Saturday, October 10, 2015

तुम और हम - कविता

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

तुम खूब रहे हम खूब रहे
तुम पार हुए हम डूब रहे

अपना न मुरीद रहा कोई
पर तुम सबके मतलूब रहे

तुम धूप हिमाल शुमाल की
हम शामे-आबे-जुनूब रहे

दोज़ख की आग तपाती हमें
और तुम फ़िरदौसी खूब रहे

हमसे पहचान हुई न मगर
तुम दुश्मन के महबूब रहे

शब्दार्थ:
मतलूब = वांछनीय, मनवांछित; हिमाल = हिमालय; शुमाल = उत्तर दिशा; आब = जल, सागर;
शाम = संध्या; जुनूब = दक्षिण दिशा; दोज़ख = नर्क; दुश्मन = शत्रु;
महबूब = प्रिय; फ़िरदौसी = फिरदौस (स्वर्ग) का निवासी = स्वर्गलोक का आनंद उठाता हुआ

Monday, September 14, 2015

श और ष का अंतर


हिन्दी दिवस पर बधाई और मंगलकामनायें !
भारतीय भाषाओं में कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जिनके आंचलिक उच्चारण कालांतर में मूल से छिटक गए हैं। कुछ समय के साथ लुप्तप्राय हो गए, कुछ बहस का मुद्दा बने और कुछ मिलती-जुलती ध्वनि के भ्रम में फंस गए। उच्चारण के विषय में इस प्रकार की दुविधा को देखते हुए इस ब्लॉग पर तीन आलेख पहले लिखे जा चुके हैं (अ से ज्ञ तक, लिपियाँ और कमियाँ, और उच्चारण ऋ का)। आज हिन्दी दिवस पर इसी शृंखला में एक और बड़े भ्रम पर बात करना स्वाभाविक ही है। यह भ्रम है श और ष के बीच का।

भारतीय वाक् में ध्वनियों को जिस प्रकार मुखस्थान या बोलने की सुविधा के हिसाब से बांटा गया है उससे इस विषय में किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए परंतु हमारे हिन्दी शिक्षण में जिस प्रकार वैज्ञानिकता के अभाव के साथ-साथ तथाकथित विद्वानों द्वारा परंपरा के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार किया जाता है उससे ऐसे भ्रम पैदा होना और बढ़ना लाज़मी है।

आरंभ "श" से करते हैं। श की ध्वनि सरल है। आमतौर पर विभिन्न भाषाओं में और भाषाओं से इतर आप श (SH) जैसी जो ध्वनि बोलते सुनते हैं वह श है। यदि आज तक आप श और ष को एक जैसे ही बोलते रहे हैं तो यक़ीन मानिए आप श की ध्वनि को एकदम सही बोलते रहे हैं, अलबत्ता ष का कबाड़ा ज़रूर करते रहे हैं। ओंठों को खोलकर, दंतपंक्तियों को निकट लाकर, या चिपकाकर, जीभ आगे की ओर करके हवा मुँह से बाहर फेंकते हुये श आराम से कहा जा सकता है। श बोलते समय जीभ का स्थान स से थोड़ा सा ऊपर है। वस्तुतः यह एक तालव्य ध्वनि है और इसके बोलने का तरीका तालव्य व्यंजनों (चवर्ग) जैसा ही है। इसमें कुछ विशेष नहीं है।

अब आते हैं ष पर। जहाँ श तालव्य है, ष एक मूर्धन्य ध्वनि है। कई शब्दों में आम वक्ता द्वारा "श" जैसे बोलने के अलावा कुछ भाषाई क्षेत्रों में इसे "ख" जैसे भी बोला जाता है। अगर स और श से तुलना करें तो ष बोलने के लिए जीभ की स्थिति श से भी ऊपर होती है। बात आसान करने के लिए यहाँ मैं बाहर से आई एक ध्वनि को भी इस वर्णक्रम के बीच में जोड़ कर इन सभी ध्वनियों को जीभ की स्थिति नीचे से उठकर उत्तरोत्तर ऊपर होते जाने के क्रम में रख रहा हूँ

स (s) => श (sh) => ज़ (z) => ष (?)

कहते समय क्षैतिज (दंत्य) रहा जीभ का ऊपरी सिरा कहने तक लगभग ऊर्ध्वाधर (मूर्धन्य) हो जाता है। इन दोनों ध्वनियों के बीच की तालव्य ध्वनि आती है। शब्दों में के प्रयोग का त्वरित अवलोकन इसे और सरल कर सकता है। आइये ऐसे कुछ शब्दों पर नज़र डालें जिनमें का प्रयोग हुआ है -

विष्णु, जिष्णु, षण्मुख, दूषण, ऋषि, षड, षडयंत्र, षोडशी, षडानन, षट्‌कोण, चतुष्कोण, झष, श्रेष्ठ, कोष्ठ, पुष्कर, कृषि, आकर्षण, कष्ट, चेष्टा, राष्ट्र, संघर्ष, ज्योतिष, धनिष्ठा, निरामिष, पोषण, शोषण, भाषा, परिषद, विशेष

संस्कृत वाक् में ध्वनियों को सहज बनाने का प्रयास तो है ही, उनके मामूली अंतर को भी प्रयोग के आधार पर चिन्हित किया गया है। यद्यपि उपरोक्त अधिकांश शब्दों में ष को श से प्रतिस्थापित करना आसान है लेकिन आरंभ के शब्दों में यदि आप यह प्रतिस्थापन करेंगे तो आप शब्द को प्रवाह से नहीं बोल सकते। यदि अंतर अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है तो निम्न दो शब्दों को प्रवाह से बोलकर देखिये और उनमें आने वाली SH की ध्वनि (और जिह्वा की स्थिति) के अंतर को पकड़िए -

विष्णु और विश्नु या विष्णु और विश्ड़ु

मूर्धन्य स्वर ऋ तथा मूर्धन्य व्यंजनों र, ट, ठ, ड, ढ, ण के साथ ‘ष’ की उपस्थिति सहज और स्वाभाविक है। ण के साथ तो ष का चोली-दामन का साथ है। इसके अतिरिक्त अवसरानुकूल अन्य वर्गों के वर्णों (उपरोक्त उदाहरणों में क, घ, त आदि) के साथ भी प्रयुक्त किया जा सकता है। एक बार फिर एक सरल सूत्र -
स - दंत्य
श - तालव्य
ष - मूर्धन्य

क्या भाषा/लिपि पढ़ाते समय इन ध्वनियों को अंत में एक साथ समूहित करने के बजाय संबन्धित व्यंजनों के साथ पढ़ाया जाना चाहिए ताकि गलतियों को रोका जा सके? 
* हिन्दी, देवनागरी भाषा, उच्चारण, लिपि, व्याकरण विमर्श *
अ से ज्ञ तक
लिपियाँ और कमियाँ
उच्चारण ऋ का
लोगो नहीं, लोगों
श और ष का अंतर

Monday, August 24, 2015

सोशल मीडिया पर मेरे प्रयोग

अंतर्जाल पर अपनी उपस्थिति के बारे में मैं आरंभ से ही बहुत सजग रहा हूँ। बरेली ब्लॉग और पिटरेडियो (Pitt Radio) के अरसे बाद 2008 में शुरू किए इस ब्लॉग "बर्ग वार्ता" पर भी स्मार्ट इंडियन (Smart Indian) के छद्मनाम से ही आया। उद्देश्य परिचय छिपाने का नहीं था बल्कि नाम की इश्तिहारी पर्चियाँ उड़ाने से बचने का था। जिसे अधिक जानकारी की इच्छा और आवश्यकता होती उससे कुछ छिपाने की ज़रूरत मैंने कभी महसूस नहीं की, लेकिन खबरों में रहने की कोई इच्छा भी कभी नहीं थी। कालांतर में विचार करने पर ऐसा लगा कि इस हिन्दी चिट्ठास्थल पर अपना नाम और परिचय सामने रखना ही मेरे पाठकों के हित में है।

व्यवहार से संकोची व्यक्ति हूँ। भीड़ जुटाने या खबरों में रहने का कभी शौक नहीं रहा। यत्र-तत्र तैरते-उतराते मठों और उनके महंतो से मेरा कोई लेना-देना नहीं था तो भी कुछ आशंकित मठाधीशों ने शायद मुझे विपक्षी मानकर जो दूरी बनाई वह मेरे जैसे रिजर्व प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए लाभप्रद ही सिद्ध हुई। किसी से जुड़ने, न जुड़ने के प्रति "तत्र को मोहः कः शोक: एकत्वमनुपश्यतः" वाली धारणा चलती रही लेकिन समय गुजरने के साथ एक से बढ़कर एक मित्र मिले और अपनी हैसियत से कहीं अधिक ही प्रेम मिला। बेशक, एकाध लोग मेरी स्पष्टवादिता से खफा भी हुए, लेकिन यह तय है कि वे लोग जिस प्रकार किसी को पहले शत्रु बनाकर, फिर उन्हें व्यूह में बुलाकर, घेरकर मारने में लगे थे, वैसा कोई काम मैंने न कभी किया, न ही उसे समर्थन दिया। कमजोर अस्थाई अवरोधों से बाधित हुए बिना मेरी हिन्दी ब्लॉगिंग लेखन, वाचन, पठन-पाठन के साथ निर्विघ्न चलती रही। इस ब्लॉग के अतिरिक्त सामूहिक ब्लॉगों में निरामिष और रेडियो प्लेबैक इंडिया (जो पहले हिंदयुग्म पर आवाज़ के नाम से चल रहा था) पर सर्वाधिक सक्रियता रही। हाल के दिनों में भारत मननशाला द्वारा कुछ काम की बातें सामने रखने का भी प्रयास किया जो कि मित्रों की और अपनी दुनियादारी के झमेलों के कारण अभी तक शैशवावस्था में ही रहा।

आज तो हिन्दी ब्लॉगिंग में टिप्पणी मॉडरेशन आम हो चुका है लेकिन मैंने हिन्दी ब्लॉगिंग के पहले दिन से ही मॉडरेशन लागू कर दिया था। ब्लॉगिंग के आरंभिक दिनों में बहुत से लोग मॉडरेशन लगाने के कारण खफा हुए। एक संपादक जी ने तो यह भी कहा कि मॉडरेशन से उन्हें ऐसा लगता है जैसे किसी ने घर बुलाकर दरवाजा बंद कर दिया हो। लेकिन मेरा दृष्टिकोण ऐसा नहीं था। मेरा दरवाजा सदा खुला था, बस इतनी निगरानी थी कि कोई अवैध या जनहित-विरोधी वस्तु वहाँ न छोड़ी जाये। और यह बात मैंने अपने टिप्पणी बॉक्स पर स्पष्ट शब्दों में लिखी थी। अपने ब्लॉग के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि वहाँ कोई क्या छोडकर जाता है उसे जनता के सामने प्रकाशित होने से पहले हम जाँचें और समाज के लिए हानिप्रद बातों को अवांछित समझकर हटाएँ।

सूचना प्रोद्योगिकी, कंप्यूटर, और डिजिटल जगत लंबे समय से मेरी रोज़ी होने के कारण उसकी अद्यतन जानकारी भी मेरे लिए महत्वपूर्ण विषय था और वहाँ व्यावसायिक उपस्थिति भी थी। लेकिन पुरानी कहावत, "मजहब उत्ता ही पालना चाहिए जित्ते में नफा अपना और नुकसान पराया हो" का अनुसरण करते हुए सेकंड लाइफ, ट्विटर आदि से जल्दी ही सन्यास ले लिया। ख़ानाबदोश ब्राह्मणों के साधारण परिवार की पृष्ठभूमि होने के कारण देश-विदेश में बिखरे परिजनों से जुड़े रहने के लिए ऑर्कुट ठीकठाक युक्ति थी, सो चलती रही। समय के साथ कुछ साथी ब्लॉगर भी मित्र-सूची में जुडते गए। गूगल द्वारा ऑर्कुट की हत्या किए जाने से पहले ही जब फेसबुक ने उसे मृतप्राय कर दिया तो अपन भी फेसबुक पर सक्रिय हो गए।
  
पिछले साल तक मैं अपनी फेसबुक फ्रेंडलिस्ट के प्रति बहुत सजग था। जहाँ मेरे कई मित्र 5,000 का शिखर छू रहे थे वहीं 200 के अंदर सिमटा मैं फेसबुक पर केवल अपने परिजनों, सहकर्मियों और मित्रों से संपर्क बनाए रखने के लिए यहाँ था। मेरी मित्र-सूची में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिसकी वास्तविकता से मैं परिचित न होऊँ। अधिकांश (99%) मित्रों से मेरी फोन-वार्ता या साक्षात्कार हो चुका था। हिन्दी ब्लॉग जगत के अधिकांश मठाधीशों का मुझसे कोई संपर्क नहीं था, मुझे तो उनसे जुड़ने की क्या आकांक्षा होती। ज़्यादातर से, 'कैसे कह दूँ के मुलाक़ात नहीं होती है, रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है' वाला संबंध था। सो वे किसी तीसरे की वाल पर आमने-सामने पड़ जाने के बावजूद अपने-अपने गुटों में सीमित रहकर मुझसे अलग ही रहे।

मेरी सूची में घूघूती-बासूती अकेली ऐसी व्यक्ति हैं जिन्हें मैंने पूर्ण अपरिचित होते हुए भी, उनका वास्तविक चित्र देखे बिना, उनका नाम तक पता न होते हुए भी खुद मैत्री अनुरोध भेजा। नारीवाद जैसे कुछ विषयों पर हमारे अनुभव, पृष्ठभूमि और निष्कर्ष आदि में अंतर होते हुए भी समस्त हिन्दी ब्लोगिंग में अगर कोई एक व्यक्ति विचारधारा में मुझे अपने सबसे निकट दिखा तो ये वे ही थीं। जानने वालों से भी अक्सर बचकर निकलने वाले किसी व्यक्ति के लिए किसी को जाने बिना इतना विश्वसनीय समझना सुनने में शायद अजीब लगे, लेकिन मेरे लिए यह भी सामान्य सी बात है।

किसी अन्जान व्यक्ति से मैत्री-अनुरोध आने पर मैंने कभी उनके स्टेटस/व्यवसाय/शिक्षा आदि पर ध्यान न देकर केवल इतना देखा कि समाज और मानवता के प्रति उनका दृष्टिकोण कैसा है। फिर पिछले दो वर्षों में वह समय आया जब उनमें से भी कुछ लोग अपनी खब्त के आधार पर कम करने शुरू किए। कई सिर्फ इसलिए गए क्योंकि वे अपने को ज़ोर-शोर से जिस उद्देश्य के लिए लड़ने वाला बताते थे उसी उद्देश्य का गला घोंटने वालों के कुकर्मों पर न केवल चुप थे बल्कि उनके साथ हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे। तड़ीपार की कुछ क्रिया दूसरी ओर से भी हुई, खासकर नियंत्रणवादी विचारधाराओं के ऐसे प्रचारक जो अपनी असलियत बलपूर्वक छिपाए रखते हैं, मेरे साथ संवाद नहीं रख सके। व्हाट्सऐप पर आए मेसेजों को ब्लॉग पर चेप-चेपकर नवलखी साहित्यकार बने एक व्यक्ति द्वारा एक जाति-विशेष के विरुद्ध विषवमन करने पर जब मैंने उससे एक प्रश्न किया तो उसने अपने कुकृत्य की ज़िम्मेदारी किसी और पर डाली, कुछ बहाने बनाए फिर वे बहाने गलत साबित किए जाने पर वह पोस्ट तो हटा ली लेकिन तड़ से मुझे ब्लॉक कर दिया। अच्छी बात ये हुई कि उस दिन के बाद उसने अपने ब्लॉग से वे लघुकथाएँ हटा दीं जिनका अन्यत्र स्वामित्व स्पष्ट था और कॉपीराइट की चोरी सिद्ध होने में कोई शंका नहीं थी। फेसबुक वाल से हटीं या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। कुछ लोगों को मैंने भी ब्लॉक किया है लेकिन उसका कारण कोई व्यक्तिगत परिवाद नहीं है। ऐसे किसी भी व्यक्ति से फेसबुक पर मेरा संवाद नहीं रहा है। बस उनके मन की स्थायी कड़वाहट पढ़-पढ़्कर मेरे मन में कभी खीझ उत्पन्न न हो इसीलिए उनसे बचना ही श्रेयस्कर समझा। इसके अलावा कुछ अन्य मित्रों का सूची से हटना ऐसा रहस्य है जहाँ न मुझे उन्हें हटाना याद है, न उन्हें मुझे हटाना। लंबे समय बाद जब हमारी मुलाक़ात हुई तो पता लगा कि एक दूसरे की सूची में नहीं हैं। अब मुझे लगता है कि शायद हम फेसबुक पर कभी मित्र रहे ही नहीं होंगे, और हमें ऑर्कुट की दोस्ती की वजह से यह गलतफहमी हुई होगी।

ऐसे मुक्तहस्त और उदार मित्र भी मिले जिन्होंने मित्रसूची से बाहर होने के बाद फिर से मैत्री अनुरोध भेजे और मैं अपनी भूल स्वीकारते हुए उनसे फिर जुड़ा। 2014 के अंत में जब बहुतेरे पाँच-हजारी हर तीसरे दिन "ऐसा किया तो लिस्ट से बाहर कर दूंगा/दूँगी", "कभी लाइक/कमेन्ट नहीं करते तो फ्रेंडशिप क्यों?" और "आज मैंने अपनी सूची इतनी हल्की की" के स्टेटस लगाने में व्यस्त थे, मैंने तय किया कि समय देकर पेंडिंग पड़े मित्रता अनुरोधों का अध्ययन करके उन सभी को स्वीकृत कर लूँगा जो किसी भी प्रकार का द्वेष फैलाने में नहीं जुटे हुए हैं। मित्र सूची में 'रिस्टरिक्टेड' विकल्प प्रदान करके फेसबुक ने यह काम और आसान कर दिया। मेरे नव वर्ष संकल्प का एक भाग यह भी था कि अंतर्जाल पर अक्सर सामने पड़ते रहे उन सभी लोगों को मित्रता अनुरोध भेजूँगा जो अपनी किसी भी सार्वजनिक या गुप्त गतिविधि के कारण मेरी अवांछित व्यक्ति (persona non grata) सूची में नहीं हैं।

आरंभ उन लोगों से करने की सोची जिन्हें मैंने ही यह सोचकर अनफ्रेंड किया था कि जिनसे व्यक्तिगत परिचय नहीं, मित्र-सूची में होने न होने से संवाद में कोई अंतर नहीं, वे मेरे पोस्ट्स पढ़कर मित्र सूची के बाहर रहते हुए भी कमेन्ट कर सकते हैं और मैं उनकी पोस्ट्स पर। सुखद आश्चर्य की बात है कि उनमें से अनेक तक मेरा निवेदन पहुँच भी न सका क्योंकि वे अभी भी फेसबुक की मित्र सीमा से आगे थे। उसके बाद उन लोगों का नंबर आया जिनसे किसी को कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेरी उनसे मैत्री या परिचय का अब तक कोई मौका नहीं पड़ा। उन्हें शायद मेरे बारे में जानकारी न हो लेकिन मैंने कभी न कभी उन्हें पढ़ा, सुना हो। इनमें भी बहुत से अपनी मित्र-सीमा के कारण निवेदन पा न सके। जिन तक निवेदन पहुँचे उनमें से कुछ कई महीने बाद आज भी पेंडिंग हैं लेकिन अधिकांश की सूची में जुडने पर मुझे गर्व है। जो महान साहित्यकार मेरे निवेदन के बाद कट-पेस्ट कवियित्रियों से लेकर निश्चित-फेक सुकन्याओं के निवेदन लगातार स्वीकारते हुए भी मेरा निवेदन लंबित रखे रहे उन्हें कष्ट से बचाने के लिए मैं ही पीछे लौट आया। मैं अपनी सूची में अपने जैसे विश्वसनीय लोगों को ही रखना चाहता हूँ। और फेक-प्रोफाइल की खूबसूरती देखते ही निवेदन स्वीकार करना मेरी नज़र में उन साहित्यकारों की विश्वसनीयता भी कम करता है।

मैंने अभी भी मित्र निवेदन भेजना रोका नहीं है, और साथ ही आए हुए निवेदन स्वीकार कर रहा हूँ। दुविधा तब आती है जब निवेदक के प्रोफाइल पर चित्र, नाम, पता या कोई भी जानकारी सामने नहीं होती है। कई रिक्वेस्ट शायद ऐसी भी हैं जहाँ यूजर ने बिना देखे ही फेसबुक को अपनी कांटेक्ट लिस्ट में उपस्थित हर व्यक्ति को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने का विकल्प चुना होता है। ब्लॉगिंग के ऐसे साथी जो फेसबुक पर मेरे मित्र नहीं बने, कभी मेरे ब्लॉग पर नहीं आए, जब लिंक्डइन नेटवर्क पर मैत्री-निवेदन भेजते हैं तो अचंभा होता है।

खैर, ये थी मेरी सोशल मीडिया दास्ताँ। नए जमाने की नई दोस्ती के ये दौर चलते रहेंगे। मेरी दास्ताँ मेरे सोचने के तरीके से प्रभावित है। आपकी दास्ताँ आपके व्यक्तित्व की एक खिड़की खोलती है। मेरा अनुरोध यही है कि जब किसी व्यक्ति को मैत्री अनुरोध भेजें तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दें ताकि उन्हें स्वीकारने/अस्वीकारने में आसानी हो जाये। और जो लोग केवल अपना आभामंडल बढ़ाने के लिए निवेदन भेजते/स्वीकारते हैं, उन्हें याद रहे कि सूर्य को भी ग्रहण लगता है, वे तो अभी ठीक से चाँद-मियाँ भी नहीं हो पाये हैं। कभी-कभी अपने भक्तों की वाल पर भी झांक लें तो उनकी चाँदनी कम नहीं हो जाएगी।  

Friday, August 21, 2015

बुद्धू - लघुकथा

राज और रूमा के विवाह को सम्पन्न हुए कुछ महीने बीत चुके थे। पति-पत्नी दोनों शाम को छज्जे पर बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मज़ाक की कोई बात चलने पर रूमा ने कहा, "अगर उस दिन रीना की शादी में आपने मुझे देखा ही न होता तब?"

"तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर तुम मुझे देखकर दीदी से बात नहीं करतीं, तो मुझे कैसे पता लगता?" राज ने कहा।

"क्या कैसे पता लगता?" आवाज़ में कुतूहल था।

"वही सब जो तुमने दीदी से कहा?"

"मैंने? कुछ भी तो नहीं। उनसे बस इतना पूछा था कि जलपान किया या नहीं। फिर वे बात करने लगीं।"

"क्या बात करने लगीं? तुमने उनसे मेरे बारे में क्या कहा?" राज कुछ सुनने को उतावला था।

"मैंने तो कुछ भी नहीं कहा था। वे खुद ही तुम्हारी बातें बताने लगी थीं" रूमा ने ठिठोली की।

"मुझे सब पता है, दीदी ने मुझे उसी दिन सारी बात बता दी थी।"

"अच्छा! क्या क्या बताया?"  

"जो कुछ भी तुमने मेरे बारे में कहा। ... वह लड़का जो आपके साथ आया था, वही जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें इतनी सुंदर हैं, लंबी नाक, चौड़ा माथा। इतना सभ्य, शांत सा, इस शहर के दंभी लड़कों से बिल्कुल अलग।"

"क्या? ये सब कहा दीदी ने तुमसे?"

"हाँ, सारी बात बता दी, एक एक शब्द।"

"लेकिन मैंने तो ये सब कहा ही नहीं। सोचा ज़रूर था, लगभग यही सब। लेकिन उनसे तो ऐसा कुछ भी नहीं कहा।"

"सच? तब तो ये भी नहीं कहा होगा कि कद थोड़ा अधिक होता तो बिलकुल अमिताभ बच्चन होता, वैसे संजीव कुमार, धर्मेंद्र, शशि कपूर वगैरा को तो अभी भी मात कर रहा है।"

"बिल्कुल नहीं। हे भगवान! ये दीदी भी न ..."

"समझ गया दीदी की शरारत। बनाने को एक मैं ही मिला था?"

"एक मिनट, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने भी मेरे बारे में उनसे कुछ नहीं कहा हो?" 

"मैंने? मैं तो कभी किसी से कुछ कहता ही नहीं, उनसे कैसे कहता? ... और फिर, तुम्हें देखने के बाद तो मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था।"

"क्या? तुमने मेरी तारीफ़ में उनसे कुछ नहीं कहा था? इसका मतलब यह कि दीदी ने हम दोनों को ही  बुद्धू बना दिया।"

"कमाल की हैं दीदी भी। लेकिन इस मज़ाक के लिए मैं जीवन भर उनका आभारी रहूँगा।"

"मैं भी। दीदी ने गजब का बुद्धू  बनाया हमें।"

राज ने स्वगत ही कहा, "मेरी माइंड रीडर दीदी।" और दोनों अपनी-अपनी हसीन बेवकूफी पर एकसाथ हँस पड़े।

[समाप्त]

Saturday, August 15, 2015

हुतात्मा मदनलाल ढींगरा

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि मैं अपनी ही माँ से पुनर्जन्म लेता रहूँ और इसी पवित्र कार्य के लिए मृत्युवरण करता रहूँ ~ हुतात्मा मदनलाल ढींगरा
स्वतन्त्रता सेनानी मदन लाल ढींगरा
(18 सितंबर 1883 :: 17 अगस्त 1909)
17 अगस्त 1909 के दिन भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के ज्वलंत क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा को ब्रिटेन के भारत सचिव के विशेष राजनीतिक सलाहकार (political aide-de-camp to the Secretary of State for India) 61 वर्षीय अंग्रेज अधिकारी सर विलियम हट कर्ज़न वाईली (Sir William Hutt Curzon Wyllie) की हत्या के आरोप में फांसी पर लटकाकर मृत्युदंड दिया गया था। इन हुतात्मा का अंतिम संस्कार भी देश की धरती पर नहीं हो पाया लेकिन देशप्रेमियों के हृदय में उनकी याद आज भी अमिट है।

 मदनलाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर, 1883 को अमृतसर में हुआ माना जाता है। उनके पिता रायसाहब डॉ दित्तामल ब्रिटिश सरकार में एक सिविल सर्जन थे। प्रतिष्ठित और सम्पन्न परिवार धन और शिक्षा के हिसाब से उस समय के उच्च वर्ग में गिना जाता था। पिता अपने खान-पान और रहन-सहन में पूरे अंग्रेज़ थे जबकि उनकी माँ भारतीय संस्कारों में रहने वाली शाकाहारी महिला थीं। अफसोस की बात है कि ढूँढने पर भी उनका नाम मुझे अब तक कहीं मिला नहीं। अंग्रेजों के विश्वासपात्र पिता के बेटे मदनलाल को जब भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों से सम्बन्ध रखने के आरोप में लाहौर में विद्यालय से निकाल दिया गया, तो उनके पिता ने मदनलाल से नाता तोड लिया। पढ़ने में आता है कि उन दिनों मदनलाल ने क्लर्क, मजदूर, और तांगा-चालक के व्यवसाय किए। बाद में पंजाब छोडकर कुछ दिन उन्होंने मुम्बई में भी काम किया। अपने बड़े भाई बिहारीलाल ढींगरा (तत्कालीन जींद रियासत के प्रधानमंत्री) की सलाह और आर्थिक सहयोग से सन् 1906 में वे उच्च शिक्षा के लिए 'यूनिवर्सिटी कॉलेज' लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी में प्रवेश लेने इंगलेंड चले गये।

लंडन टाइम्स, 19 अगस्त 1909 (सौजन्य: executedtoday.com) 
 लंदन में वे विनायक दामोदर "वीर" सावरकर सहित अन्य देशभक्तों के संपर्क में आए और हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी लिया। वे भारतीय विद्यार्थियों के संगठनों 'अभिनव भारत मंडल' और 'इंडिया हाउस' के सदस्य बने। जब भारत से खुदीराम बोस जैसे किशोर सहित अनेक देशभक्तों को फाँसी दिए जाने के समाचार ब्रिटेन पहुँचे तो भारतीय छात्रों के हृदय ब्रिटिश क्रूरता के प्रति क्षोभ से भर गए। मदनलाल ढींगरा ने भी बदला लेने की एक योजना बना ली।

 1 जुलाई 1909 को लंदन के जहाँगीर हाल में 'इंडियन नेशनल एसोसिएशन' तथा 'इंस्टीट्युट आफ इम्पीरियल स्टडीज' द्वारा आयोजित वार्षिक समारोह कार्यक्रम में मदनलाल ढींगरा भी पहुँचे। समारोह का मुख्य अतिथि ब्रिटिश अधिकारी सर वायली अपने भारत विरोधी रवैये के लिए कुख्यात था। मदनलाल ने उस पर अपने रिवाल्वर से गोलियां चला दीं। वाइली की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई। उसे बचाने के प्रयास में एक पारसी डॉक्टर कोवासजी लाल काका की भी मृत्यु हो गई। कहते हैं कि वाइली को गोली मारने के बाद मदनलाल ने आत्महत्या का प्रयास भी किया लेकिन पकड लिये गए। वायली हत्याकांड की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट लंदन में हुई। एक भारतीय नागरिक के ऊपर ब्रिटिश न्यायालय की वैधता को नकारते हुए मदनलाल ढींगरा ने अपनी पैरवी के लिए कोई वकील करने से इंकार कर दिया। 23 जुलाई को इस एकपक्षीय मुकदमे में उन्हें मृत्युदण्ड सुनाया गया जोकि 17 अगस्त सन् 1909 को पैटनविली जेल में फांसी देकर पूरा किया गया। कहते हैं कि मदनलाल ने ब्रिटिश जज को मृत्युदंड के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि वे अपने देशवासियों के बेहतर कल के लिए मरना चाहते हैं।

 मंगल पाण्डेय को अपना आदर्श मानने वाले हुतात्मा मदनलाल ढींगरा को ऊधमसिंह, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, और कर्तार सिंह सारभा जैसे क्रांतिकारी अपना आदर्श मानते थे।

 हमारे स्वर्णिम आज की आशा में अगणित देशभक्तों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आज हम उन्हें केवल श्रद्धांजलि और आदर ही दे सकते हैं लेकिन यह भी सच है कि उनकी प्रेरणा से हम आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत और विश्व को आज से अधिक बेहतर भी बना सकते हैं।

मदनलाल ढींगरा के जीवन के नाट्यरूपांतर का एक अंश
संबन्धित कड़ियाँ
प्रेरणादायक जीवन चरित्र
हुतात्मा खुदीराम बोस
चापेकर बंधु - प्रथम क्रांतिकारी
1857 के महानायक मंगल पाण्डेय
शहीदों को तो बख्श दो
मदन लाल ढींगरा - अङ्ग्रेज़ी विकीपीडिया पर

Thursday, July 30, 2015

मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन - 31 जुलाई

मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)
मुंशी प्रेमचंद का हिन्दी कथा संकलन मानसरोवर
आज मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन है। हिन्दी और उर्दू साहित्य में रुचि रखने वाला कोई विरला ही होगा जो उनका नाम न जानता हो। हिन्दी (एवं उर्दू) साहित्य जगत में यह नाम एक शताब्दी से एक सूर्य की तरह चमक रहा है। विशेषकर, ज़मीन से जुड़े एक कथाकार के रूप में उनकी अलग ही पहचान है। उनके पात्रों और कथाओं का क्षेत्र काफी विस्तृत है फिर भी उनकी अनेक कथाएँ भारत के ग्रामीण मानस का चित्रण करती हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे उर्दू में नवाब राय और हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखते रहे। आम आदमी की बेबसी हो या हृदयहीनों की अय्याशी, बचपन का आनंद हो या बुढ़ापे की जरावस्था, उनकी कहानियों में सभी अवस्थाएँ मिलेंगी और सभी भाव भी। अपने साहित्यिक जीवनकाल में उन्होने सैकड़ों कहानियाँ और कुछ लेख, उपन्यास व नाटक भी लिखे। उनकी कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं और अनेक रेडियो व टीवी कार्यक्रम भी। उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर १९१५ के अंक में "सौत" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी और उनकी अंतिम प्रकाशित (१९३६) कहानी "कफन" थी।
जिस युग में उन्होंने लिखना आरंभ किया, उस समय हिंदी कथा-साहित्य जासूसी और तिलस्मी कौतूहली जगत् में ही सीमित था। उसी बाल-सुलभ कुतूहल में प्रेमचंद उसे एक सर्व-सामान्य व्यापक धरातल पर ले आए। ~ महादेवी वर्मा

प्रेमचंद की हिन्दी कथाओं की ऑडियो सीडी
मैं पिछले लगभग सात वर्षों से इन्टरनेट पर देवनागरी लिपि में उपलब्ध हिन्दी (उर्दू एवं अन्य रूप भी) की मौलिक व अनूदित कहानियों के ऑडियो बनाने से जुड़ा रहा हूँ। विभिन्न वाचकों द्वारा "सुनो कहानी" और "बोलती कहानियाँ" शृंखलाओं के अंतर्गत पढ़ी गई कहानियों में से अनेक कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद की हैं। आप उनकी कालजयी रचनाओं को घर बैठे अपने कम्प्युटर या चल उपकरणों पर सुन सकते हैं। प्रेमचंद की कुछ कहानियो से हिन्द युग्म ने एक ऑडियो सीडी भी जारी की थी। कुछ चुनिन्दा ऑडियो कथाओं के लिंक यहाँ संकलित हैं। आशा है आपको पसंद आएंगे। यदि आप उनकी (या अपनी पसंद के किसी अन्य साहित्यकार की हिन्दी में मौलिक या अनूदित) कोई कथा विशेष सुनना चाहते हों तो अवश्य बताइये ताकि उसे रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक "बोलती कहानियाँ" कार्यक्रम में सुनवाया जा सके।
मुंशी प्रेमचंद की 57 कहानियों के ऑडियो का भंडार, 4 देशों से 9 वाचकों के स्वर में

(31 जुलाई 1880 - 8 अक्तूबर 1936)
सौत (शन्नो अग्रवाल) [दिसंबर १९१५]
निर्वासन (अर्चना चावजी और अनुराग शर्मा)
आत्म-संगीत (शोभा महेन्द्रू और अनुराग शर्मा)
प्रेरणा (शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह एवं अनुराग शर्मा)
बूढ़ी काकी (नीलम मिश्रा)
ठाकुर का कुआँ' (डॉक्टर मृदुल कीर्ति)
स्त्री और पुरुष (माधवी चारुदत्ता)
शिकारी राजकुमार (माधवी चारुदत्ता)
मोटर की छींटें (माधवी चारुदत्ता)
अग्नि समाधि (माधवी चारुदत्ता)
मंदिर और मस्जिद (शन्नो अग्रवाल)
बड़े घर की बेटी (शन्नो अग्रवाल)
पत्नी से पति (शन्नो अग्रवाल)
पुत्र-प्रेम (शन्नो अग्रवाल)
माँ (शन्नो अग्रवाल)
गुल्ली डंडा (शन्नो अग्रवाल)
दुर्गा का मन्दिर' (शन्नो अग्रवाल)
आत्माराम (शन्नो अग्रवाल)
नेकी (शन्नो अग्रवाल)
मन्त्र (शन्नो अग्रवाल)
पूस की रात (शन्नो अग्रवाल)
स्वामिनी (शन्नो अग्रवाल)
कायर (अर्चना चावजी)
दो बैलों की कथा (अर्चना चावजी)
खून सफ़ेद (अर्चना चावजी)
अमृत (अनुराग शर्मा)
अपनी करनी (अनुराग शर्मा)
अनाथ लड़की (अनुराग शर्मा)
अंधेर (अनुराग शर्मा)
आधार (अनुराग शर्मा)
आख़िरी तोहफ़ा (अनुराग शर्मा)
इस्तीफा (अनुराग शर्मा)
ईदगाह (अनुराग शर्मा)
उद्धार (अनुराग शर्मा)
कौशल (अनुराग शर्मा)
क़ातिल (अनुराग शर्मा)
घरजमाई (अनुराग शर्मा)
ज्योति (अनुराग शर्मा)
बंद दरवाजा (अनुराग शर्मा)
बांका ज़मींदार (अनुराग शर्मा)
बालक (अनुराग शर्मा)
बोहनी (अनुराग शर्मा)
देवी (अनुराग शर्मा)
दूसरी शादी (अनुराग शर्मा)
नमक का दरोगा (अनुराग शर्मा)
नसीहतों का दफ्तर (अनुराग शर्मा)
पर्वत-यात्रा (अनुराग शर्मा)
पुत्र प्रेम (अनुराग शर्मा)
वरदान (अनुराग शर्मा)
विजय (अनुराग शर्मा)
वैराग्य (अनुराग शर्मा) 
शंखनाद (अनुराग शर्मा)
शादी की वजह (अनुराग शर्मा)
सभ्यता (अनुराग शर्मा)
समस्या (अनुराग शर्मा)
सवा सेर गेंहूँ (अनुराग शर्मा)
कफ़न (अमित तिवारी) [१९३६]

Wednesday, July 22, 2015

अमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद

यदि देशहित मरना पडे मुझको सहस्रों बार भी
तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊँ कभी
हे ईश भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो
मृत्यु का कारण सदा देशोपकारक कर्म हो

(~ अमर स्वतन्त्रता सेनानी एवं प्राख्यात कवि पण्डित रामप्रसाद "बिस्मिल")
चन्द्रशेखर आज़ाद का एक दुर्लभ चित्र
चन्द्रशेखर "आज़ाद" 
जन्म: 23 जुलाई 1906
भावरा ग्राम (अलीराजपुर, मध्य प्रदेश)
बदरका ग्राम ( उन्नाव, उत्तर प्रदेश)
देहांत: 27 फरवरी 1931
(इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश)
माँ: जगरानी देवी
पिता: सीताराम तिवारी
शिक्षा: महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सम्मानित सदस्य और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्लाह खाँ और भाई भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिकारियों के साथी और भगतसिंह सरीखे क्रांतिकारियों के दिग्दर्शक चन्द्रशेखर "आज़ाद" भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन अनुकरणीय महानायकों में से हैं जिनका सहारा अनेक नायकों को मिला
  • सन 1921 में 15 वर्षीय चन्द्रशेखर ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भागीदारी की 
  • सन 1922 में असहयोग आंदोलन की वापसी पर अंग्रेज़ी सत्ता का जुझारू विरोध
  • हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की कार्यवाहियों में सक्रिय सहयोग 
  • सन 1925, काकोरी कांड में भागीदारी   
  • सन 1927, पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की फांसी   
  • सन 1928: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना
  • सन 1928: भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सहयोग
  • सन 1928, पुलिस लाठीचार्ज से लाला लाजपत राय का देहावसान
  • सन 1928, लाहौर में जॉन सॉन्डर्स की हत्या 
  • सन 1929, दिल्ली में असेंबली बम काण्ड और शहीदत्रयी की गिरफ्तारी 
  • सन 1930, शहीदत्रयी को जेल से छुड़ाने की योजना में भाई भगवती चरण वोहरा की मृत्यु 
  • सन 1930-31, आज़ाद द्वारा राजनीतिक सहयोग से शहीदत्रयी को छुड़ाने के प्रयास 
  • 27 फरवरी 1931 - इलाहाबाद: एक महान सेनानी का अवसान 
लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक का जन्मदिन भी आज ही है। उन्हें भी हार्दिक श्रद्धांजलि!
संबन्धित कड़ियाँ
* अमर नायक चन्द्रशेखर आज़ाद का जन्मदिन
* महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर "आज़ाद"
* नायकत्व क्या है - सारांश और विमर्श
* अमर क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा - आज़ाद के निकटतम सहयोगी
* शहीदों को तो बख़्श दो

Sunday, July 19, 2015

किस्सागो का पक्ष - अनुरागी मन

अनुरागी मन से दो शब्द

अपनी कहानियों के लिए, उनके विविध विषयों, रोचक पृष्ठभूमि और यत्र-तत्र बिखरे रंगों के लिए मैं अपने पात्रों का आभारी हूँ। मेरी कहानियों की ज़मीन उन्होंने तैयार की है। वे सब मेरे मित्र हैं यद्यपि मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता हूँ।

कथा निर्माण के उदेश्य से मैं उनसे मिला अवश्य हूँ। कहानी लिखते समय मैं उन्हें टोकता भी रहता हूँ। लेकिन हमारा परिचय केवल उतना ही है जितना कहानी में वर्णित है। बल्कि वहाँ भी मैंने लेखकीय छूट का लाभ उठाया है। इस हद तक, कि कुछ पात्र शायद अपने को वहाँ पहचान न पायें। कई तो शायद खफा ही हो जाएँ क्योंकि मेरी कहानी उनका जीवन नहीं है।

मेरे पात्र भले लोग हैं। अच्छे या बुरे, वे सरल और सहज हैं, जैसे भीतर, तैसे बाहर। मेरी कहानियाँ इन पात्रों की आत्मकथाएँ नहीं हैं। उन्हें मेरी आत्मकथा समझना तो और भी ज्यादती होगी। मेरी कहानियाँ समाचारपत्र की रिपोर्ट भी नहीं हैं। मैंने अपने या पात्रों के अनुभवों में से कुछ भी यथावत नहीं परोसा है।

मेरी हर कहानी एक संभावना प्रदान करती है। एक अँधेरे कमरे में खिड़की की किसी दरार से दिखते तारों की तरह। किसी सुराख से आती प्रकाश की एक किरण जैसे, मेरी कहानियाँ आशा की कहानियाँ हैं। यदि कहीं निराशा दिखती भी है, वहाँ भी जीवन की नश्वरता के दुःख के साथ मृत्योर्मामृतम् गमय का उद्घोष है। कल अच्छा था, आज बेहतर है, कल सर्वश्रेष्ठ होगा।

हृदयस्पर्शी संस्मरण लिखने के लिए पहचाने जाने वाले अभिषेक कुमार ने अपने ब्लॉग पर अनुरागी मन की एक सुंदर समीक्षा लिखी है, मन प्रसन्न हो गया। आभार अभिषेक!

इसे भी पढ़िये:
अनुरागी मन की समीक्षा अभिषेक कुमार द्वारा
लेखक बेचारा क्या करे? भाग 1
लेखक बेचारा क्या करे? भाग 2
* अच्छे ब्लॉग लेखन के सूत्र
* बुद्धिजीवी कैसे बनते हैं? 

Thursday, July 2, 2015

सच या झूठ - लघुकथा

पुत्र: ज़माना कितना खराब हो गया है। सचमुच कलयुग इसी को कहते हैं। जिन माँ-बाप का सहारा लेकर चलना सीखा, बड़े होकर उन्हीं को बेशर्मी से घर से निकाल देते हैं, ये आजकल के युवा।

माँ: अरे बेटा, पहले के लोग भी कोई दूध के धुले नहीं होते थे। कितने किस्से सुनने में आते थे। किसी ने लाचार बूढ़ी माँ को घर से निकाल दिया, किसी ने जायदाद के लिए सगे चाचा को मारकर नदी में बहा दिया। सौतेले बच्चों पर भी भांति-भांति के अत्याचार होते थे। अब तो देश में कायदा कानून है। और फिर जनता भी पढ लिख कर अपनी ज़िम्मेदारी समझती है।

पुत्र: नहीं माँ, कुछ नहीं बदला। आज सुबह ही एक बूढ़े को फटे पुराने कपड़ों में सड़क किनारे पड़ी सूखी रोटी उठाकर खाते देखा तो मैंने उसके बच्चों के बारे में पूछ लिया। कुछ बताने के बजाय गाता हुआ चला गया
 खुद खाते हैं छप्पन भोग, मात-पिता लगते हैं रोग।

माँ: बेटा, उसने जो कहा तुमने मान लिया? और उसके जिन बच्चों को अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं मिला, उनका क्या? हो सकता है बच्चे अपने पूरे प्रयास के बावजूद उसे संतुष्ट कर पाने में असमर्थ हों। हो सकता है वह कोई मनोरोगी हो?

पुत्र: लेकिन अगर वह इनमें से कुछ भी न हुआ तो?

माँ: ये भी तो हो सकता है कि वह झूठ ही बोल रहा हो।

पुत्र: हाँ, यह बात भी ठीक है। 

Tuesday, May 5, 2015

सांप्रदायिक सद्भाव

(लघुकथा व चित्र: अनुराग शर्मा)
जब मुसलमानों ने मकबूल की जमीन हथियाकर उस पर मस्जिद बनाई तो हिंदुओं के एक दल ने मुकुल की जमीन पर मठ बना दिया। मुकुल और मकबूल गाँव के अलग-अलग कोनों में उदास बैठे हैं फिर भी गाँव में शांति है क्योंकि इस बार कोई यह नहीं कह सकता कि हिंदुओं ने मुसलमान या मुसलमानों ने हिन्दू को सताया है।

Monday, May 4, 2015

5 मई - क्रांतिकारी प्रीतिलता वादेदार का जन्मदिन


प्रीतिलता वादेदार (5 मई 1911 – 23 सितम्बर 1932)
5 मई को महान क्रांतिकारी व प्रतिभाशाली छात्रा प्रीतिलता वादेदार का जन्मदिन है। आइये इस दिन याद करें उन हुतात्माओं को जिन्होने अपने वर्तमान की परवाह किए बिना हमारे स्वतंत्र भविष्य की कामना में अपना सर्वस्व नोछावर कर दिया।

प्रीतिलता वादेदार का जन्म 5 मई 1911 चटगाँव (अब बंगला देश) में हुआ था। उन्होने सन् 1928 में चटगाँव के डॉ खस्तागिर शासकीय कन्या विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की और सन् 1929 में ढाका के इडेन कॉलेज में प्रवेश लेकर इण्टरमीडिएट परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में पाँचवें स्थान पर आयीं। दो वर्ष बाद प्रीतिलता ने कोलकाता के बेथुन कॉलेज से दर्शनशास्त्र से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। कोलकाता विश्वविद्यालय के ब्रितानी अधिकारियों ने उनकी डिग्री को रोक दिया था जो उन्हें 80 वर्ष बाद मरणोपरान्त प्रदान की गयी।

उन्होने निर्मल सेन से युद्ध का प्रशिक्षण लिया था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन के दल की सक्रिय सदस्य प्रीतिलता ने 23 सितम्बर 1932 को एक क्रांतिकारी घटना में अंतिम समय तक अंग्रेजो से लड़ते हुए स्वयं ही मृत्यु का वरण किया था। अनेक भारतीय क्रांतिकारियों की तरह प्रीतिलता ने एक बार फिर यह सिद्ध किया किया कि त्याग और निर्भयता की प्रतिमूर्तियों के लिए मात्र 21 वर्ष के जीवन में भी अपनी स्थाई पहचान छोड़ कर जाना एक मामूली सी बात है।

प्रीतिलता वादेदार, विकीपीडिया पर

Thursday, April 16, 2015

अस्फुट मंत्र - कविता

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

प्रेम का जादू यही
इक एहसास वही

अमृती धारा  बही
पीर अग्नि में दही

मैं की दीवार ढही
रात यूँ ढलती रही

बंद होठों से सही
बात जो तूने कही 

Saturday, April 11, 2015

ऊँट, पहाड़, हिरण, शेर और शाकाहार - लघुकथा

(चित्र व कथा: अनुराग शर्मा)
झुमकेचल प्रसाद काम में थोड़ा कमजोर था। बदमाशियाँ भी करता था। दिखने में ठीक-ठाक था और उसके साथियों ने उसके इस ठीक-ठाक का भाव काफी चढ़ाया हुआ था। सो, वह अपने आप को डैनी, नहीं, शायद राजेश खन्ना समझता था। अब नौजवान राजेश खन्ना अपने से कई साल छोटे और कई किलो हल्के अधिकारी के अधीनस्थ होकर आराम से तो काम कर नहीं सकता सो हर बात में थोड़ा बहुत विद्रोह भी दिखाता रहता था। अकारण द्रोह का एक कारण शायद उस अधिकारी का अनारक्षित कोटे से आना भी था।

झुमकेचल के काम में काफी कमियाँ थीं। लेकिन अधिकारी उसकी क्षमता को जानते हुए उसे कुछ जताए बिना शाम को घर जाने से पहले उसकी गलतियाँ ठीक कर देता था। जितना जायज़ था उतनी छूट अधिकारी उसे हमेशा देता रहा। वह फरीदाबाद से दिल्ली आता था। आने में अक्सर देर हो जाती थी। वरिष्ठ प्रबंधक कड़कसिंह रोज़ सुबह दरवाजे पर लगी घड़ी के नीचे खड़ा हर देर से आने वाले की क्लास लगाता था। उसकी समस्या को ध्यान से सुनने के बाद अधिकारी ने कड़कसिंह से कड़क बहसें कर के अपने अधीनस्थों की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए उसकी देरी सदा के लिए अनुशासन के दायरे से निकलवा दी। हर सुबह बाकी लेट-लतीफों को झिड़कता कड़कसिंह जब उसे कुछ नहीं कहता तो उसकी सुबह, जोकि अब लगभग दोपहर हो चुकी होती थी, उत्साह से भर जाती। इसी उत्साह में अब वह नियमित रूप से देर से आने लगा। जब कई दिन तक अधिकारी की ओर से उसकी नियमित देरी का कोई प्रतिरोध नहीं दिखा तो एक दिन अपनी सुबह की देरी को कम्पनसेट करने के उद्देश्य से उसने शाम को जल्दी घर जाने की बात की। अधिकारी ने उस दिन आराम से जाने दिया तो अगले दिन से उसने जल्दी जाने का अधिकार अपने गमछे में खोंस लिया और प्रतिदिन जल्दी जाने लगा।

आप सोचेंगे कि अधिकारी से मिलने वाले हर लाभ के बाद वह बेहतर होता गया होगा लेकिन हुआ इसका उलट। न तो उसके काम की गलतियों में कोई सुधार हुआ, न ही उसके नाजायज अक्खड़पन में कोई कमी आई। कुछ दिन बाद जब उसके लंच से वापस आने का समय उसके स्वास्थ्य की अनिवार्यता, यानी टेबल टेनिस के खेल के कारण बढ़ गया तो अधिकारी ने उसे कुछ कहे बिना भविष्य में कोई रियायत न देने का निश्चय किया।

एक दिन उसने बताया कि घर में चल रही पुताई के कारण वह लंचटाइम में ही घर चला जाएगा। अधिकारी को क्या एतराज़ होता, उसने विनम्रता से बता दिया कि छुट्टियाँ उसकी कमाई हुई हैं, आधा दिन की ले या पूरे दिन की, उसकी मर्ज़ी। छुट्टी का नाम सुनते ही वह गरम हो गया। शोर-शराबा सुनकर टेबल टेनिस के कुछ दबंग कामरेड भी मौका-ए-वारदात पर पहुँच गए। जिन्होंने सरकारी बैंक में काम किया हो उन्हें पता ही होगा कि बैंकिंग चुटकुलों में अधिकारियों का प्रयोग अक्सर ताश के जोकर की तरह किया जाता है। सो एकाध महारथी ने अपने मित्र के पक्ष में घिसे हुये चुटकुले जैसा कुछ कहा। अधिकारी ने उसके अधूरे ज्ञान वाले चुट्कुले वाला पूरा उपन्यास बाँच दिया। एकाध साथी ने वैज्ञानिक तर्क दिये, तो उनके आगे वैज्ञानिक निष्कर्ष रख दिये गए। फिर शाखा के सबसे भारी बोझ ने अपने वजन का प्रयोग किया तो इस छोटे से अधिकारी ने उसी के वजन और मूमेंटम का तात्कालिक प्रयोग करते हुए उसे काउंटर की दीवार पे दोहरा हो जाने दिया। कराहता हुआ बोझ अपनी सीट पर जाकर बड़बड़ाते हुए स्टाफ सेक्शन के नाम एक हाथापाई की शिकायत लिखने लगा।

बात हाथ से निकलते देखकर झुमकेचल प्रसाद जी अधिकारी को बताने लगे कि वे रोज़ जल्दी भले चले जाते हों, अपना सारा काम सही-सही पूरा करके जाते हैं। बात गलत थी सो अधिकारी ने रिजेक्ट कर दी। झुमकेचल की आवाज़ फिर ऊँची हो गई। गरजकर बोला "मेरे काम में एक भी कमी निकाल कर दिखा दो।" अधिकारी ने उस महीने की बनाई उसकी विवरणियों के फोल्डर सामने रख दिये। हर पेज पर लाल स्याही से ठीक की हुई कम से कम एक गलती चमक रही थी। कहीं स्पेलिंग, कहीं संख्या, कहीं जोड़, कहीं कोड, कहीं कुछ और। क्षण भर में झुमकेचल का चेहरा, शरीर, हाव-भाव, सब ऐसा हो गया जैसे किसी ने उसे पकड़कर दस जूते मारे हों। उसने मरी हुई आवाज़ में पूछा, "लेकिन आपने इसके लिए कभी डाँटा भी नहीं, न मुझसे कभी ठीक कराया।"

खैर, बंदा एकदम सुधर गया। जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्ज़ी अधिकारी के सामने रख दी जो अधिकारी ने अपने विवेक से निरस्त भी कर दी। कुछ दिन बाद जब वह अधिकारी व्यक्तिगत काम से एक हफ्ते की छुट्टी पर गया तो उसके वापस आते ही झुमकेचल ने सबसे पहले अपने अधिकारी से उसके सब्स्टिट्यूट की शिकायत की, "मैंने बस 15 मिनट पहले जाने के लिए पूछा तो बोले सारा काम सही-सही पूरा करके चले जाना और जब सब कर दिया तो कहने लगे कि जाओ सीनियर मेनेजर से पर्मिशन ले लो।"

"आज चले जाना" कहकर अधिकारी मुस्करा दिया। पहाड़ ऊँट से ऊँचा हो गया था।
निष्कर्ष: शेर अगर हिरण को न खाये तो उसका मतलब ये नहीं होता कि हिरण शेर से ताकतवर हो गया है। इसका अर्थ ये है कि शेर शाकाहारी है। लेकिन हिरण तेंदुए से फिर भी काम नहीं निकलवा सकता।

Friday, March 27, 2015

पुरानी दोस्ती - लघुकथा

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)

बेमेल दोस्ती की गंध
कल उसका फोन आया था। ताबड़तोड़ प्रमोशनों के बाद अब वह बड़ा अफसर हो गया है। किसी ज़माने में हम दोनों निगम के स्कूल में एक साथ काम करते थे। मिडडे मील पकाने से लेकर चुनाव आयोग की ड्यूटी बजाने तक सभी काम हमारे जिम्मे थे। ऊपर से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। इन सब से कभी समय बच जाता था तो बच्चों की क्लास भी ले लेते थे।  

उसे अपने असली दिल्लीवाला (मूलनिवासी) होने का गर्व था। मुझे हमेशा 'ओए बिहारी' कहकर ही बुलाता था। दिल का बुरा नहीं था  लेकिन हज़ार बुराइयाँ भी उसे सामान्य ही लगती थीं। अपनी तो मास्टरी चलती रही लेकिन वह असिस्टेंट ग्रेड पास करके सचिवालय में लग गया। अब तो बहुत आगे पहुँच गया है।

आज मूड ऑफ था उसका। अपने पुराने दोस्त से बात करके मन हल्का करना चाहता था सो बरसों बाद उस दिन मुझे फोन किया।

"कैसा है तू?"

"हम ठीक हैं। आप कैसे हैं?"

"गुड ... और तेरी बिहारिन कैसी है?"

इतने साल बाद बात होने पर भी उसका यह लहज़ा सुनकर बुरा लगा। मुझे लगा था कि उम्र बढ़ने के साथ उसने कुछ तमीज़ सीख ली होगी। मैं आरा का सही, उसका इलाका तो दिल्ली देहात ही था। सोचा कि उसे उसी के तरीके से समझाया जा सकता है।

"हाँ, हम सब ठीक हैं, तू बता, तेरी देहातन कैसी है?"

"ओए बिहारी, ये तू-तड़ाक मुझे बिलकुल पसंद नहीं। और ये देहातिन किसे बोला? अपनी भाभी के बारे में इज़्ज़त से बात किया कर।"

फोन कट गया था। बरसों की दोस्ती चंद मिनटों में खत्म हो गई थी।

[समाप्त]

Saturday, March 21, 2015

सीमित जीवन - कविता

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)
इस जीवन की आपूर्ति सीमित है, कृपया सदुपयोग करें

अवचेतन की
कुछ चेतन की
थोड़ी मन की
बाकी तन की
कुछ यौवन की
कुछ जीवन की
इस नर्तन की
उस कीर्तन की
परिवर्तन की
और दमन की
सीमायें होती हैं
लेकिन
सीमा होती नहीं
पतन की...

Monday, February 23, 2015

खिलखिलाहट - लघुकथा

दादी और दादा
(चित्र व कथा: अनुराग शर्मा)

"बोलो उछलना।"

"उछलना।"

"अरे बिलकुल ठीक तो बोल रही हो।"

"हाँ, उछलना को ठीक बोलने में क्या खास है।"

"तो फिर बच्चों के सामने छुछलना क्यों कहती हो? सब हँसते हैं।"

"इसीलिए तो।"

"इसीलिए किसलिए?"

"ताकि वे हंस सकें। उनकी दैवी खिलखिलाहट पर सारी दुनिया कुर्बान।"

Thursday, February 19, 2015

लोगो नहीं, लोगों - हिन्दी व्याकरण विमर्श


मेरे पास आओ, मेरे दोस्तों - बहुवचन सम्बोधन में अनुस्वार का प्रयोग व्याकरणसम्मत है

हिन्दी बहुवचन सम्बोधन और अनुस्वार
अनुस्वार सम्बोधन, राजभाषा विभाग के एक प्रकाशन से
इन्टरनेट पर कई जगह यह प्रश्न देखने में आता है कि बच्चा का बहुवचन बच्चों होगा या बच्चो। इसी प्रकार कहीं दोस्तों और दोस्तो के अंतर के बारे में भी हिन्दी, हिन्दुस्तानी, उर्दू मंडलों में चर्चा सुनाई देती है। शायद कभी आप का सामना भी इस प्रश्न से हुआ होगा। जब कोई आपको यह बताता है कि जिन शब्दों को आप सदा प्रयोग करते आए हैं, वे व्याकरण के किसी नियम के हिसाब से गलत हैं तो आप तुरंत ही अपनी गलती सुधारने के प्रयास आरंभ कर देते हैं।

सुनने में आया कि आकाशवाणी के कुछ केन्द्रों पर नए आने वाले उद्घोषकों को ऐसा बताया जाता है कि किसी शब्द के बहुवचन में अनुस्वार होने के बावजूद उसी शब्द के संबोधन में बहुवचन में अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता है। इन्टरनेट पर ढूंढने पर कई जगह इस नियम का आग्रह पढ़ने को मिला। इस आग्रह के अनुसार "ऐ मेरे वतन के लोगों" तथा "यारों, सब दुआ करो" जैसे प्रयोग तो गलत हुए ही "बहनों और भाइयों" या "देवियों, सज्जनों" आदि जैसे आम सम्बोधन भी गलत कहे जाते हैं।

बरसों से न, न करते हुए भी पिछले दिनों अंततः मुझे भी इसी विषय पर एक चर्चा में भाग लेना पड़ा तो हिन्दी व्याकरण के बारे में बहुत सी नई बातें सामने आईं। आज वही सब अवलोकन आपके सामने प्रस्तुत हैं। मेरा पक्ष स्पष्ट है, मैं अनुस्वार हटाने के आग्रह को अनुपयोगी और अनर्थकारी समझता हूँ। आपके पक्ष का निर्णय आपके विवेक पर छोडता हूँ।
1) 19 वीं शताब्दी की हिन्दी और हिन्दुस्तानी व्याकरण की कुछ पुस्तकों में बहुवचन सम्बोधन के अनुस्वाररहित होने की बात कही गई है। मतलब यह कि किसी को सम्बोधित करते समय लोगों की जगह लोगो, माँओं की जगह माँओ, कूपों की जगह कूपो, देवों की जगह देवो के प्रयोग का आग्रह है।    
2) कुछ आधुनिक पुस्तकों और पत्रों में भी यह आग्रह (या नियम) इसके उद्गम, कारण, प्रचलन या परंपरा की पड़ताल किए बिना यथावत दोहरा दिया गया है।
ऐ मेरे वतन के लोगो (logo)

3) हिन्दी व्याकरण की अधिसंख्य पुस्तकों में ऐसे किसी नियम का ज़िक्र नहीं है अर्थात बहुवचन के सामान्य स्वरूप (अनुस्वार सहित) का प्रयोग स्वीकार्य है।

4) जिन पुस्तकों में इस नियम का आग्रह है, वे भी इसके उद्गम, कारण और लाभ के बारे में मूक है।

5) भारत सरकार के राजभाषा विभाग सहित अधिकांश प्रकाशन ऐसे किसी नियम या आग्रह का ज़िक्र नहीं करते हैं।

6) हिन्दी उर्दू के गीतों को आदर्श इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उनमें गलत उच्चारण सुनाई देने की घटनाएँ किसी सामान्य श्रोता के अनुमान से कहीं अधिक हैं। एक ही गीत में एक ही शब्द दो बार गाये जाने पर अलग-अलग सुनाई देता है। सम्बोधन ही नहीं बल्कि हमें, तुम्हें, उन्होंने आदि जैसे सामान्य शब्दों से भी अक्सर अनुस्वार गायब लगते हैं।

7) ध्यान से सुनने पर कुछ अहिंदीभाषी गायक तो अनुस्वार को नियमित रूप से अनदेखा करते पाये गए हैं। यद्यपि कुछ गीतों में में ये माइक्रोफोन द्वारा छूटा या संगीत द्वारा छिपा हुआ भी हो सकता है। पंकज उधास और येसूदास जैसे प्रसिद्ध गायक भी लगभग हर गीत में मैं की जगह मै या मय कहते हैं।  
आकाशवाणी के कार्यक्रम "आओ बच्चों" की आधिकारिक वर्तनी

8) मुहम्मद रफी और मुकेश बहुवचन सम्बोधन में कहीं भी अनुस्वार का प्रयोग करते नहीं सुनाई देते हैं। अन्य गायकों पर असहमतियाँ हैं। मसलन, किशोर "कुछ ना पूछो यारों, दिल का हाल बुरा होता है" गाते हैं तो दोनों बार अनुस्वार एकदम स्पष्ट है। अमिताभ बच्चन भी आम हिंदीभाषियों की तरह बहुवचन सम्बोधन में भी सदा अनुस्वार का प्रयोग करते पाये गए हैं।

9) ऐ मेरे वतन के लोगों गीत की इन्टरनेट उपस्थिति में बहुवचन सम्बोधन शब्द लोगों लगभग 16,000 स्थानों में अनुस्वार के साथ और लगभग 4,000 स्थानों में अनुस्वार के बिना है। सभी प्रतिष्ठित समाचारपत्रों सहित भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट में भी "ऐ मेरे वतन के लोगों" ही छपा है। लता मंगेशकर के गायन में भी अनुस्वार सुनाई देता है।

11) rekhta.org और बीबीसी उर्दू जैसी उर्दू साइटों पर सम्बोधन को अनुस्वार रहित रखने के उदाहरण मिलते हैं।

अनुस्वार हटाने से बने अवांछित परिणामों के कुछ उदाहरण - देखिये अर्थ का अनर्थ:
  1. लोटों, यहाँ मत लोटो (सही) तथा लोटो, यहाँ मत लोटो (भ्रामक - लोटो या मत लोटो? लोटा पात्र की जगह भूमि पर लोटने या न लोटने की दुविधा) 
  2. भेड़ों, कपाट मत भेड़ो (सही) तथा भेड़ो, कपाट मत भेड़ो (भ्रामक - भेड़ों का कोई ज़िक्र ही नहीं?)
  3. बसों, यहाँ मत बसो (सही) तथा बसो, यहाँ मत बसो (भ्रामक - बस वाहन का ज़िक्र ही नहीं बचा, बसो या न बसो की गफ़लत अवश्य आ गई?)
  4. ऐ मेरे वतन के लोगों (देशवासी) तथा ऐ मेरे वतन के लोगो (देश का प्रतीकचिन्ह, अशोक की लाट)
उपरोक्त उदाहरणों में 1, 2 व 3 में लोटे, भेड़ और बस को बहुवचन में सम्बोधित करते समय यदि आप अनुस्वार हटा देंगे तो आपके आशय में अवांछित ही आ गए विरोधाभास के कारण वाक्य निरर्थक हो जाएँगे। साथ ही लोटों, भेड़ों और बसों के संदर्भ भी अस्पष्ट (या गायब) हो जाएँगे। इसी प्रकार चौथे उदाहरण में भी अनुस्वार लगाने या हटाने से वाक्य का अर्थ बदल जा रहा है। मैंने आपके सामने चार शब्दों के उदाहरण रखे हैं। ध्यान देने पर ऐसे अनेक शब्द मिल सकते हैं जहाँ अनुस्वार हटाना अर्थ का अनर्थ कर सकता है।
10) कवि प्रदीप के प्रसिद्ध गीत "इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के" गीत के अनुस्वार सहित उदाहरण कवि प्रदीप फाउंडेशन के शिलापट्ट तथा अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों पर हैं जबकि अधिकांश अनुस्वाररहित उदाहरण फेसबुक, यूट्यूब या अन्य व्यक्तिगत और अप्रामाणिक पृष्ठों पर हैं।
ऐ मेरे वतन के लोगों - टिकट पर अनुस्वार है

12) इस विषय पर छिटपुट चर्चायें हुई हैं। इस नियम (या आग्रह) के पक्षधर, बहुसंख्यक जनता द्वारा इसके पालन न करने को प्रचलित भूल (ग़लतुल-आम) बताते हैं।

13) अर्थ का अनर्थ होने के अलावा इस पूर्णतः अनुपयोगी आग्रह/नियम के औचित्य पर कई सवाल उठते हैं, यथा, "ऐ दिले नादाँ ..." और "दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है" जैसी रचनाओं में एकवचन में भी अनुस्वार हटाया नहीं जाता तो फिर जिस बहुवचन में अनुस्वार सदा होता है उससे हटाने का आग्रह क्योंकर हो?

14) अनुस्वार हटाकर बहुवचन का एक नया रूप बनाने के आग्रह को मैं हिन्दी के अथाह सागर का एक क्षेत्रीय रूपांतर मानता हूँ और अन्य अनेक स्थानीय व क्षेत्रीय रूपांतरों की तरह इसके आधार पर अन्य/भिन्न प्रचलित परम्पराओं को गलत ठहराए जाने का विरोधी हूँ। हिंदी मातृभाषियों का बहुमत बहुवचन में सदा अनुस्वार का प्रयोग स्वाभाविक रूप से करता रहा है।

15) भारोपीय मूल की अन्य भाषाओं में भी ऐसा कोई आग्रह नहीं है। उदाहरण के लिए अङ्ग्रेज़ी में boy का बहुवचन boys होता है तो सम्बोधन में भी वह boys ही रहता है। सम्बोधन की स्थिति में boys के अंत से s हटाने या उसका रूपांतर करने जैसा कोई नियम वहाँ नहीं है, उसकी ज़रूरत ही नहीं है। ज़रूरत हिंदी में भी नहीं है।

16) इस नियम (या आग्रह) से अपरिचित जन और इसके विरोधी, इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एक आपत्ति यह रखते हैं कि इस नियम के कारण एक ही शब्द के दो बहुवचन संस्करण बन जाएँगे जो अनावश्यक तो हैं ही, कई बार भिन्न अर्थ वाले समान शब्द होने के कारण अर्थ का अनर्थ करने की क्षमता भी रखते हैं। उदाहरणार्थ बिना अनुस्वार के "ऐ मेरे वतन के लोगो" कहने से अशोक की लाट (भारत का लोगो) को संबोधित करना भी समझा जा सकता है जबकि लोगों कहने से लोग का बहुवचन स्पष्ट होता है और किसी भी भ्रांति से भली-भांति बचा जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि हिन्दी के बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने का आग्रह एक फिजूल की बंदिश से अधिक कुछ भी नहीं। कुछ पुस्तकों में इसका ज़िक्र अवश्य है और हिन्दुस्तानी के प्रयोगकर्ताओं का एक वर्ग इसका पालन भी करता है। साथ ही यह भी सच है कि हिंदीभाषियों और व्याकरणकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसे किसी आग्रह को जानता तक नहीं है, मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इस आग्रह का कारण और उद्गम भी अज्ञात है। इसके प्रायोजक, प्रस्तोता और पालनकर्ता और पढने के बाद इसे दोहराने वाले, इसके उद्गम के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। संभावना है कि हिन्दी की किसी बोली, संभवतः लश्करी उर्दू या क्षेत्र विशेष में इसका प्रचालन रहा है और उस बोली या क्षेत्र के लोग इसका प्रयोग और प्रसार एक परिपाटी की तरह करते रहे हैं। स्पष्टतः इस आग्रह के पालन से हिन्दी भाषा या व्याकरण में कोई मूल्य संवर्धन नहीं होता है। इस आग्रह से कोई लाभ नहीं दिखता है, अलबत्ता भ्रांति की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी भ्रांतियों के कुछ उदाहरण इस आलेख में पहले दिखाये जा चुके हैं।
कुछ समय से यह बहस सुनता आया हूँ, फिर भी इस पर कभी लिखा नहीं क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन अब जब इस हानिप्रद आग्रह के पक्ष में लिखे हुए छिटपुट उदाहरण सबूत के तौर पर पेश किए जाते देखता हूँ और इस आग्रह का ज़िक्र न करने वाली पुस्तकों को सबूत का अभाव माना जाता देखता हूँ तो लगता है कि शांति के स्थान पर नकार का एक स्वर भी आवश्यक है ताकि इन्टरनेट पर इस भाषाई दुविधा के बारे में जानकारी खोजने वालों को दूसरा पक्ष भी दिख सके, शांति का स्वर सुनाई दे। इस विषय पर आपके अनुभव, टिप्पणियों और विचारों का स्वागत है। यदि आपको बहुवचन सम्बोधन से अनुस्वार हटाने में कोई लाभ नज़र आता है तो कृपया उससे अवगत अवश्य कराएं। धन्यवाद!

ऐ मेरे वतन के लोगों - लता मंगेशकर का स्वर, कवि प्रदीप की रचना

* हिन्दी, देवनागरी भाषा, उच्चारण, लिपि, व्याकरण विमर्श *
अ से ज्ञ तक
लिपियाँ और कमियाँ
उच्चारण ऋ का
लोगो नहीं, लोगों
श और ष का अंतर

Saturday, February 14, 2015

मुफ्तखोर - लघुकथा

(लघुकथा व चित्र: अनुराग शर्मा)


कमरे की बत्ती और पंखा खुला छोडकर वह घर से निकला और बस में बिना टिकट बैठ गया। आज से सब कुछ मुफ्त था। आज़ादी के लंबे इतिहास में पहली बार मुफ्तखोर पार्टी सत्ता में आई थी। उनके नेता श्री फ़ोकटपाल ने चुनाव जीतते ही सब कुछ मुफ्त करने का वादा किया था। उसने भी मुफ्तखोर पार्टी को विजयी बनाने के लिए बड़ी लगन से काम किया था। कारखाने में रोज़ हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद घर आते ही पोस्टर लगाने निकल पड़ता था। सड़क पर पैदल या बस में आते जाते भी लोगों को मुफ्तखोर पार्टी के पक्ष में जोड़ने का प्रयास करता।

फैक्टरी पहुँचते ही उल्लास से काम पर जुट गया। एक तो सब कुछ मुफ्त होने की खुशी ऊपर से आज तो वेतन मिलने का दिन था। लंच के वक्फ़े में जब वह तन्खाबाबू को सलाम ठोकने गया तो उन्हें लापता पाया। वापसी में सेठ उधारचंद दिख गए। सेठ उधारचंद फैक्ट्री के मालिक हैं और अपने नाम को कितना सार्थक करते हैं इसकी गवाही शहर के सभी सरकारी बैंक दे सकते हैं।

उसने सेठजी को जयरामजी कहने के बाद हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया, "तन्खाबाबू नहीं दिख रहे, आज छुट्टी पर हैं क्या?"

"कुछ खबर है कि नईं? मुफतखोर पार्टी की जीत का जशन चल रिया हैगा।"

"तन्खाबाबू क्या जश्न में गए हैं?"

"बीस-बीस हज़ार के लंच करे हैं हमने फ़ोकटपाल्जी के साथ। पचास-पचास हज़ार के चेक भी दिये हैं चंदे में। इसीलिए ना कि वे हमें भी कुछ मुफत देवें।"

"जी" वह प्रश्नवाचक मुद्रा में आ गया था।

"हमने फ़ोकटपाल्जी को जिताया है। अब तन्खाबाबू की कोई जरूरत ना है। आज से इस फैक्ट्री में सब काम मुफत होगा। गोरमींट अपनी जाकिट की पाकिट में हैगी।"

उसे ऐसा झटका लगा कि नींद टूट गई। बत्ती, पंखा, सब बंद था क्योंकि मुफ्तखोर पार्टी जीतने के बावजूद भी उसकी झुग्गी बस्ती में बिजली नहीं थी।

[समाप्त] 

Saturday, January 31, 2015

किनाराकशी - लघुकथा

(चित्र व लघुकथा: अनुराग शर्मा)
गाँव में दो नानियाँ रहती थीं। बच्चे जब भी गाँव जाते तो माता-पिता के दवाब के बावजूद भी एक ही नानी के घर में ही रहते थे। दूसरी को सदा इस बात की शिकायत रही। बहला-फुसलाकर या डांट-डपटकर जब बच्चे दूसरी नानी के घर भेज दिये जाते तो जितनी देर वहाँ रहते उन्हें पहली नानी का नाम ले-लेकर यही उलाहनाएं मिलतीं कि उनके पास बच्चों को वशीभूत करने वाला ऐसा कौन सा मंत्र है?  ये वाली तो पहली वाली से कितने ही मायनों में बेहतर हैं। यह वाली नानी क्या बच्चों को मारती-पीटती हैं जो बच्चे उनके पास नहीं आते? बच्चे 10-15 मिनट तक अपना सिर धुनते और फिर सिर झुकाकर पहले वाली नानी के घर वापस चले जाते।

हर साल दूसरी नानी के घर जाकर उनसे मिलने वाले बच्चों की संख्या कम होते-होते एक समय ऐसा आया जब मैं अकेला वहाँ गया। तब भी उन्होने यही शिकवा किया कि उनके सही और सच्चे होने के बावजूद भोले बच्चों ने पहली नानी के किसी छलावे के कारण उनसे किनाराकशी कर ली है। उस दिन के बाद मेरी भी कभी उनसे मुलाक़ात नहीं हुई, हाँ सहानुभूति आज भी है।

Monday, January 12, 2015

कंजूस मक्खीचूस - लघुकथा

दिवाली मिलन के समारोह में जब सुरेखा जी मुस्कराती हुई नजदीक आईं तो खुशी के साथ मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। शहर की सबसे धनी और प्रसिद्ध भारतीय डॉक्टर। बड़े-बड़े लोगों से पहचान। बिना अपॉइंटमेंट के एक मिनट की बात भी संभव नहीं और बिना कनेक्शन के अपोइंटमेंट भी संभव नहीं।

अरे इन्हें तो मेरा नाम भी पता है, यह भी मालूम है कि मेरा घर दिल्ली में है और मैं परसों छुट्टी पर भारत जा रहा हूँ। दो मिनट की बातचीत में ही इतनी नजदीकी। लोग यूँ ही इन्हें नकचढ़ा और घमंडी बताते हैं। जलते हैं सब इनकी समृद्धि से। ऐसी सुंदरी को काले दिल वाली और इतनी धनाढ्य होने पर भी एक नंबर की कंजूस मक्खीचूस बताते हैं। जलें, मेरी बला से। मैं तो किसी की बातों में आने से रहा।

समारोह के बाद घर आकर पैकिंग आदि करके सोया तो सुबह देर से उठा। अलसाई नींद में ऐसा लगा था जैसे किसी ने द्वार की घंटी बजाई थी। सोचा, उठकर देख ही लूँ। शायद कोई सचमुच आया ही हो, थक हारकर लौट न गया हो। दरवाजा खोला तो बाहर पोलीथीन का एक बड़ा सा लिफाफा रखा था। साथ में एक नोट भी था।

"बुरा न मानें, अपना समझकर यह हक़ जता रही हूँ। इस पैकेट में कुछ रेशमी साड़ियाँ हैं। आप भारत जा ही रहे हैं। वहाँ से ड्राइक्लीन करवा लाइये, यहाँ तो बहुत महंगा है। वापसी पर बिल के अनुसार भुगतान कर दूँगी।

~ आपकी सुरेखा।"